परमहंस रामचंद्र दास और प्रारंभिक हिंदू पक्ष की मुकदमेबाजी
1949 के बाद न्यायिक संघर्ष
अयोध्या विवाद के स्वतंत्र भारत वाले न्यायिक इतिहास में गोपाल सिंह विशारद के जनवरी 1950 के मुकदमे के बाद दूसरा महत्वपूर्ण कदम परमहंस रामचंद्र दास का मुकदमा था। 5 दिसंबर 1950 को दायर इस वाद का उद्देश्य व्यापक रूप से वही था—राम जन्मभूमि पर स्थापित रामलला की पूजा में हस्तक्षेप न हो, मूर्तियां न हटाई जाएं और हिंदू पूजा-अधिकार सुरक्षित रहें। सर्वोच्च न्यायालय ने 2019 के अंतिम निर्णय में इसे नियमित वाद संख्या 25 का 1950, बाद में O.O.S. संख्या 2 का 1989, के रूप में दर्ज किया और उल्लेख किया कि यह मुकदमा 18 सितंबर 1990 को वापस ले लिया गया।
इस मुकदमे का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि यह विशारद के वाद की पुनरावृत्ति था। यह उस शुरुआती हिंदू न्यायिक रणनीति को समझने में सहायता करता है जिसमें 1949 के बाद प्राथमिक लक्ष्य तत्काल भूमि-स्वामित्व का अंतिम निर्णय प्राप्त करना नहीं, बल्कि रामलला की वर्तमान स्थिति और पूजा को न्यायिक संरक्षण दिलाना था।
परमहंस रामचंद्र दास अयोध्या के प्रमुख संतों में रहे और आगे चलकर राम जन्मभूमि आंदोलन के सबसे पहचाने जाने वाले धार्मिक नेताओं में शामिल हुए। उनका संबंध दिगंबर अखाड़े की परंपरा से था और वे दशकों तक मंदिर निर्माण की मांग से जुड़े रहे।
1949–50 में उनकी भूमिका को बाद के 1980–90 के दशक के विशाल आंदोलन से अलग समय-संदर्भ में समझना चाहिए।
उस समय—
विश्व हिंदू परिषद अस्तित्व में नहीं थी,
भारतीय जनसंघ नया बनने वाला था,
भाजपा का प्रश्न ही नहीं था,
और राम जन्मभूमि आंदोलन का राष्ट्रीय संगठनात्मक ढांचा अभी दशकों दूर था।
परमहंस उस स्थानीय संत-आधारित निरंतरता का हिस्सा थे जिसने विवाद को जीवित रखा।
गोपाल सिंह विशारद जनवरी में ही मुकदमा दायर कर चुके थे और उन्हें अंतरिम संरक्षण भी मिल चुका था।
फिर परमहंस को अलग मुकदमे की आवश्यकता क्यों पड़ी?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के रिकॉर्ड से एक महत्वपूर्ण कारण सामने आता है। परमहंस के वाद में उत्तर प्रदेश सरकार और डिप्टी कमिश्नर को प्रतिवादी बनाने से पहले 7 फरवरी 1950 को धारा 80, सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत नोटिस दिया गया था। उच्च न्यायालय ने बाद में टिप्पणी की कि यह वाद संभवतः इसी कारण अलग से दायर किया गया क्योंकि विशारद के पहले वाद से पूर्व धारा 80 सूचना नहीं दिया गया था।
यह तकनीकी बात अत्यंत महत्वपूर्ण है।
सरकार के विरुद्ध दीवानी मुकदमे में धारा 80 दीवानी प्रक्रिया संहिता का सूचना प्रक्रियागत requirement था।
इसलिए परमहंस का मुकदमा केवल धार्मिक दोहराव नहीं, संभवतः प्रक्रियागत reinforcement भी था।
परमहंस रामचंद्र दास ने 5 दिसंबर 1950 को फैजाबाद के सिविल जज की अदालत में नियमित वाद संख्या 25 का 1950 दायर किया। उसी दिन मामला स्वीकार किया गया। बाद में, जब अयोध्या के मुकदमे इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ में स्थानांतरित हुए, इसे O.O.S. संख्या 2 का 1989 नया नंबर मिला।
यह विशारद के मुकदमे से लगभग ग्यारह महीने बाद दायर हुआ।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने परमहंस के वादपत्र का सार स्पष्ट रूप से दर्ज किया।
उन्होंने निषेधाज्ञा मांगा कि प्रतिवादी—
भगवान रामचंद्र की जन्मभूमि पर पूजा में हस्तक्षेप न करें,
मूर्तियों को उस स्थान से न हटाएं जहां वे उस समय रखी थीं,
और मूर्तियों की पूजा में कोई बाधा उत्पन्न न करें।
अर्थात विशारद और परमहंस दोनों की तत्काल रणनीति का केंद्र था—
पूजा की रक्षा। मूर्ति की रक्षा। वर्तमान धार्मिक स्थिति की रक्षा।
हाँ।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि परमहंस के वाद का वादपत्र विशारद वाद के वादपत्र का लगभग verbatim पुनरुत्पादन था। valuation, संपत्ति सीमाएँ और मांगी गई राहतें भी लगभग समान थीं।
इससे यह संकेत मिलता है कि शुरुआती हिंदू मुकदमेबाजी में अलग-अलग प्रतिस्पर्धी विधिक theories नहीं थीं।
पहले चरण में लक्ष्य काफी स्पष्ट और एकीकृत था—
1949 के बाद जो स्थिति बनी है, उसे प्रशासन या किसी अन्य पक्ष द्वारा बदले जाने से रोकना।
मुख्य व्यावहारिक अंतर प्रक्रियागत था।
परमहंस वाद में राज्य और डिप्टी कमिश्नर को मुकदमे में शामिल करने से पहले धारा 80 दीवानी प्रक्रिया संहिता सूचना दिया गया था।
इसके अतिरिक्त वादी अलग धार्मिक व्यक्तित्व थे।
गोपाल सिंह विशारद एक व्यक्तिगत हिंदू भक्त के रूप में पूजा-अधिकार मांग रहे थे।
परमहंस एक प्रमुख साधु के रूप में वही धार्मिक अधिकार दावा कर रहे थे।
इससे शुरुआती हिंदू दावा को सामाजिक रूप से भी व्यापक आधार मिलता था—
भक्त का दावा + संत का दावा।
परमहंस का वाद दायर होने के लगभग दो महीने बाद 1 फरवरी 1951 को इसे विशारद के वाद के साथ समेकित करना कर दिया गया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने यह तथ्य स्पष्ट रूप से दर्ज किया।
यह तार्किक था।
दोनों वाद—
लगभग समान संपत्ति,
समान प्रतिवादी,
समान तथ्यात्मक पृष्ठभूमि,
और समान निषेधाज्ञा—
से संबंधित थे।
इसलिए अलग-अलग मुकदमा चलाने से अनावश्यक दोहराव होता।
यदि 1950 के दोनों वाद को साथ पढ़ें तो एक स्पष्ट रणनीति दिखाई देती है।
उस चरण पर हिंदू पक्ष ने यह नहीं कहा—
“अभी तुरंत पूरी मस्जिद का स्वामित्व-अधिकार तय करो।”
उसने पहले यह सुनिश्चित किया कि—
रामलला भीतर बने रहें,
पूजा जारी रहे,
प्रशासन मूर्तियां न हटाए,
और हिंदू श्रद्धालुओं का पूजा-दावा न्यायालय से सुरक्षित हो।
यह विधिक sequencing अत्यंत महत्वपूर्ण था।
पहले positional यथास्थिति सुरक्षित किया गया।
विस्तृत स्वामित्व-अधिकार दावा बाद में आए।
इसका कोई ऐसा समकालीन master-plan उपलब्ध नहीं जिसमें लिखा हो कि 1950 में पहले पूजा, 1959 में प्रबंधन और 1989 में देवता का स्वामित्व-अधिकार दावा किया जाएगा।
इसलिए इसे एक पूर्वनिर्धारित दीर्घकालीन कानूनी षड्यंत्र कहना उचित नहीं।
लेकिन पश्चदृष्टि में मुकदमेबाजी का विकास स्पष्ट चरणों में दिखाई देता है—
1950 — भक्त और संत : पूजा-अधिकार। 1959 — निर्मोही अखाड़ा : प्रबंधन और कब्जा। 1961 — सुन्नी वक्फ बोर्ड : मस्जिद और स्वामित्व-अधिकार/कब्जा। 1989 — रामलला विराजमान : स्वयं देवता का स्वामित्व-अधिकार दावा।
यह विकास अयोध्या विवाद को धीरे-धीरे व्यापक बनाता गया।
एक महत्वपूर्ण न्यायिक तथ्य यह है कि बाद की कार्यवाही में परमहंस और गोपाल सिंह विशारद दोनों ने स्पष्ट किया कि उनका राहत सीता रसोई, भंडार और राम चबूतरा जैसी आयुक्त मानचित्र में दिखाई गई बाहरी संरचनाओं से संबंधित नहीं था।
7 मार्च 1962 के कथन में दोनों वादी ने कहा कि वे उन संरचनाएँ के संबंध में कोई राहत नहीं मांगते और उनका दावा मानचित्र में दर्शाए गए उस enclosed क्षेत्र पर है जो भीतरी विवादित परिसर से संबंधित था।
यह बहुत महत्वपूर्ण है।
इससे स्पष्ट होता है कि 1950 की मुकदमेबाजी का लक्ष्य बाहरी प्रांगण नहीं, मुख्यतः अंदर विराजमान रामलला और भीतरी परिसर तक पूजा-अधिकार था।
1885 में महंत रघुबर दास का मुकदमा राम चबूतरे पर केंद्रित था।
1950 में स्थिति उलट गई।
अब बाहरी प्रांगण के चबूतरे पर निर्माण मुख्य प्रश्न नहीं था।
मूर्तियां भीतरी प्रांगण में थीं।
इसलिए मुकदमेबाजी का केंद्र भी भीतर चला गया।
इस परिवर्तन को समझना अयोध्या न्यायिक इतिहास की एक बड़ी कुंजी है—
1885 : बाहर मंदिर बनाने की मांग। 1950 : भीतर विराजमान मूर्तियों की पूजा और संरक्षण।
1949 की घटना ने मुकदमे का भौगोलिक केंद्र बदल दिया था।
परमहंस रामचंद्र दास का धार्मिक प्रभाव दिगंबर अखाड़े की परंपरा से जुड़ा था।
अयोध्या के विभिन्न अखाड़े केवल धार्मिक आश्रम नहीं थे; वे ऐतिहासिक रूप से साधु-संत नेटवर्क, भूमि, तीर्थ-व्यवस्था और धार्मिक नेतृत्व के संस्थागत केंद्र थे।
इसी संत परंपरा ने विवाद को 1950 के बाद भी स्थानीय धार्मिक स्मृति में जीवित रखा।
यहां दिगंबर अखाड़ा और निर्मोही अखाड़ा अलग संस्थाएं थीं।
इन्हें एक ही संगठन समझना गलत होगा।
निर्मोही अखाड़ा 1959 में अपना स्वतंत्र प्रबंधकीय दावा लेकर अदालत आया।
परमहंस का वाद पूजा-आधारित निषेधाज्ञा था।
निर्मोही अखाड़े का बाद का वाद प्रबंधन और सेवायत-अधिकार/कब्जा से संबंधित था।
अर्थात—
परमहंस कहते थे—
“पूजा मत रोकिए, मूर्ति मत हटाइए।”
निर्मोही अखाड़ा कहेगा—
“स्थान और देवता के प्रबंधन का अधिकार हमें दीजिए।”
दोनों हिंदू पक्ष में थे, लेकिन दोनों के विधिक हित समान नहीं थे।
आगे यही अंतर महत्वपूर्ण विवाद का कारण बना।
धार्मिक उद्देश्य में काफी समानता थी, लेकिन कानूनी दावे अलग-अलग थे।
यह बात पूरे अयोध्या मामले में लगातार ध्यान रखनी होगी।
“हिंदू पक्ष” कोई एक वादी नहीं था।
उसमें थे—
व्यक्तिगत भक्त,
महंत,
अखाड़े,
बाद में स्वयं देवता,
और जन्मभूमि को न्यायिक व्यक्तित्व देने का दावा।
इनमें सहयोग भी था और विधिक दोहराव भी।
कभी-कभी दावों में अंतर्विरोध भी था।
1950 की मुकदमेबाजी उनकी लंबी अयोध्या यात्रा का शुरुआती कानूनी चरण थी।
आगे दशकों में वे मंदिर निर्माण आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े।
जब 1980 के दशक में राम जन्मभूमि प्रश्न फिर राष्ट्रीय आंदोलन बना, तब परमहंस उन कुछ धार्मिक नेताओं में थे जो 1949–50 के चरण से ऐतिहासिक निरंतरता का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व कर सकते थे।
इस कारण उनकी प्रतीकात्मक भूमिका बहुत बढ़ गई।
नहीं।
यह अंतर महत्वपूर्ण है।
परमहंस का वाद अयोध्या की स्थानीय/धार्मिक मुकदमेबाजी का हिस्सा था।
1950 में देशव्यापी रामशिला अभियान नहीं था।
लाखों कारसेवकों का नेटवर्क नहीं था।
राष्ट्रीय रथयात्रा नहीं थी।
यह मुख्यतः अदालत और स्थानीय संत-समाज के माध्यम से चल रही लड़ाई थी।
इसीलिए 1950–80 के काल को समझे बिना 1984 के बाद के विस्फोटक आंदोलन को समझना अधूरा होगा।
चूंकि यह मुकदमा लगभग समान राहतों वाला था और 1951 में विशारद वाद से समेकित करना कर दिया गया, शुरुआती न्यायिक संरक्षण का मुख्य आधार दोनों मामलों की संयुक्त स्थिति बन गया।
विशारद को पहले ही अंतरिम निषेधाज्ञा मिल चुका था।
इसलिए परमहंस वाद ने मौजूद विधिक संरक्षण को एक और वादी के माध्यम से सुदृढ़ करना किया।
कानूनी दृष्टि से कई कारण हो सकते थे—
यदि एक वाद प्रक्रियागत defect से प्रभावित हो,
यदि वादी की व्यक्तिगत स्थिति पर प्रश्न उठे,
यदि धारा 80 सूचना का मुद्दा आए,
तो दूसरे वाद का अस्तित्व संरक्षण दे सकता था।
इलाहाबाद हाई कोर्ट की टिप्पणी कि वाद 2 संभवतः धारा 80 सूचना की वजह से दायर हुआ, इस व्याख्या को बल देती है।
यानी शुरुआती मुकदमेबाजी में प्रक्रियागत redundancy भी एक सुरक्षा बन सकती थी।
उनका प्राथमिक राहत निषेधाज्ञा था।
उन्होंने स्वयं के नाम संपूर्ण विवादित संपत्ति का अंतिम स्वामित्व संबंधी घोषणा नहीं मांगा।
इसलिए उनका वाद full-व्यापकता स्वामित्व-अधिकार न्यायनिर्णयन नहीं था।
यही कारण है कि आगे अन्य वाद की आवश्यकता बनी रही।
यह प्रश्न स्वाभाविक है।
संभव कारणों में—
दिसंबर 1949 की तत्काल स्थिति को पहले सुरक्षित करना,
प्रशासनिक कुर्की,
ऐतिहासिक स्वामित्व-अधिकार साक्ष्य की जटिलता,
और पूजा के तत्काल खतरे—
सब शामिल थे।
अंतरिम निषेधाज्ञा अपेक्षाकृत तेज और व्यावहारिक उपचार थी।
स्वामित्व वाद दशकों लंबा हो सकता था—जैसा आगे हुआ भी।
इसलिए तत्काल पूजा-संरक्षण कानूनी रूप से अधिक उपयोगी था।
जब पूजा न्यायालयी संरक्षण में जारी रही, तो हर गुजरता वर्ष निरंतरता बढ़ाता गया।
1950 में यह कुछ सप्ताह पुरानी भीतरी-प्रांगण पूजा थी।
1960 तक दस वर्ष।
1980 तक तीस वर्ष।
1986 तक लगभग छत्तीस वर्ष।
इससे राजनीतिक और साक्ष्यगत दोनों प्रकार की स्थिरता बनी।
लेकिन फिर वही सावधानी—
इस निरंतरता से 1949 की मूल घटना स्वतः वैध नहीं हुई।
उनकी शिकायत थी कि 1949 में वे मस्जिद से बाहर हुए।
फिर हिंदू वादी ने अदालत से निषेधाज्ञा प्राप्त किया।
इसके बाद समय गुजरता गया और बदली हुई स्थिति संस्थागत होती गई।
इसीलिए मुस्लिम मुकदमेबाजी को केवल किसी सिद्धांतगत धार्मिक विवाद के रूप में नहीं, पुनर्स्थापना और कब्जा के प्रश्न के रूप में भी समझना चाहिए।
विशारद और परमहंस दोनों के मुकदमों में सरकार स्वयं प्रतिवादी बनी।
यह बहुत महत्वपूर्ण था।
अर्थात हिंदू वादी केवल मुस्लिम पक्ष से अधिकार नहीं मांग रहे थे।
वे राज्य से भी कह रहे थे—
आप मूर्तियां न हटाएं और पूजा में हस्तक्षेप न करें।
इस प्रकार स्वतंत्र भारत का राज्य स्वयं अयोध्या दीवानी मुकदमेबाजी का प्रत्यक्ष पक्ष बन गया।
26 जनवरी 1950 के बाद संविधान लागू हो चुका था।
इससे पूजा दावा को नया संवैधानिक वातावरण मिला।
हालांकि वाद प्रक्रियागत दीवानी कानून के अंतर्गत थे, उनका नैतिक और संवैधानिक अर्थ धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ता गया।
हिंदू वादी अपने पूजा-अधिकार पर बल देते थे।
मुस्लिम पक्ष भी अपने नमाज और मस्जिद-अधिकार की मांग करता था।
इसीलिए अयोध्या धीरे-धीरे धार्मिक स्वतंत्रता बनाम परस्पर विरोधी संपत्ति अधिकार की जटिल समस्या बनी।
भारत में दीवानी मुकदमों की धीमी प्रक्रिया, अनेक संबंधित वाद, पक्षकारों की मृत्यु, substitutions, दस्तावेज, ऐतिहासिक साक्ष्य और jurisdictional प्रश्न—सभी ने विवाद को लंबा किया।
परमहंस का मुकदमा 1950 में दायर हुआ और 1990 तक formally जीवित रहा।
यानी लगभग चालीस वर्ष।
यह अपने आप में अयोध्या मुकदमेबाजी की असाधारण दीर्घता का उदाहरण है।
1989 तक अयोध्या की राजनीतिक और कानूनी स्थिति 1950 से बिल्कुल बदल चुकी थी।
विश्व हिंदू परिषद का आंदोलन राष्ट्रीय स्तर पर चल रहा था।
शिलान्यास की तैयारी थी।
रामलला विराजमान और जन्मभूमि की ओर से एक नया वाद दाखिल हुआ।
और विभिन्न पुराने मुकदमे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में स्थानांतरित हो चुके थे।
परमहंस का पुराना नियमित वाद संख्या 25/1950 अब मूल वाद संख्या 2 का 1989 कहलाता था।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के रिकॉर्ड के अनुसार परमहंस के पुराने वाद में सुन्नी केंद्रीय बोर्ड का वक्फ को 1989 में प्रतिवादी संख्या 8 के रूप में जोड़ा गया था।
इससे पता चलता है कि चार दशक पुराने मुकदमे को भी नए समेकित मुकदमेबाजी ढाँचा के अनुरूप अद्यतन किया जा रहा था।
लेकिन यह प्रक्रिया ज्यादा समय नहीं चली।
परमहंस रामचंद्र दास ने 23 अगस्त 1990 को अपना मुकदमा वापस लेने के लिए आवेदन दिया।
अदालत ने इसे 18 सितंबर 1990 को स्वीकार किया और वाद संख्या 2 खारिज के रूप में वापस लिया हो गया।
सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने 2019 कालक्रम में यही अंतिम तिथि दर्ज की।
यहीं तथ्य और बाद की राजनीतिक कथा को अलग रखना जरूरी है।
आधिकारिक न्यायिक कालक्रम यह निश्चित करती है कि मुकदमा वापस लिया गया।
लेकिन उपलब्ध प्रमुख न्यायिक निर्णय वापसी के राजनीतिक/व्यक्तिगत कारण का विस्तृत प्रामाणिक व्याख्या नहीं देते।
इसलिए बिना स्वतंत्र प्राथमिक प्रमाण यह कहना उचित नहीं होगा कि—
किस विशिष्ट नेता के कहने पर,
किस समझौते के तहत,
या किस एक राजनीतिक उद्देश्य से
मुकदमा वापस हुआ।
सुरक्षित तथ्य है—
23 अगस्त आवेदन, 18 सितंबर 1990 वापसी allowed.
व्यवहार में निर्णायक रूप से नहीं।
क्योंकि तब तक—
विशारद वाद जीवित था,
निर्मोही अखाड़ा वाद जीवित था,
सुन्नी वक्फ बोर्ड वाद था,
और 1989 का रामलला विराजमान वाद दायर हो चुका था।
अर्थात मुकदमेबाजी अब परमहंस के व्यक्तिगत वाद पर निर्भर नहीं थी।
इसीलिए उनका वापसी पूरे हिंदू दावा का वापसी नहीं था।
यदि कोई वादी अपना व्यक्तिगत वाद वापस लेता है तो इसका प्रभाव उस particular कार्यवाही पर पड़ता है।
लेकिन दूसरे वादी और अलग कारण का कार्रवाई स्वतः समाप्त नहीं होते।
अयोध्या में अलग-अलग पक्षकार अलग विधिक हित दावा कर रही थीं।
इसलिए परमहंस का वापसी—
रामलला का दावा,
निर्मोही अखाड़े का दावा,
या विशारद का पूजा-अधिकार
समाप्त नहीं कर सकता था।
मुकदमा ऐसे समय वापस हुआ जब अयोध्या प्रश्न अदालत की अपेक्षा सड़क और राष्ट्रीय राजनीति पर कहीं अधिक तेज गति से चल रहा था।
सितंबर 1990—
एल. के. आडवाणी की सोमनाथ–अयोध्या रथयात्रा प्रारंभ होने वाली थी।
अक्टूबर में कारसेवा का आह्वान था।
मुलायम सिंह यादव सरकार और मंदिर आंदोलन के बीच तनाव तेजी से बढ़ रहा था।
इस समय पुराना 1950 निषेधाज्ञा वाद आंदोलन की केंद्रीय रणनीति नहीं रहा था।
यह संदर्भ वापसी को समझने में उपयोगी है, यद्यपि इससे विशिष्ट उद्देश्य स्वतः सिद्ध नहीं होता।
बिल्कुल नहीं।
वे आगे भी राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख संत नेताओं में सक्रिय रहे।
उनकी धार्मिक और आंदोलनकारी भूमिका विधिक वादी की भूमिका से कहीं व्यापक थी।
इसलिए 1990 का वापसी किसी वैचारिक पीछे हटना का स्वतः प्रमाण नहीं है।
व्यक्ति मुकदमा वापस ले सकता है और राजनीतिक-धार्मिक आंदोलन में सक्रिय रह सकता है।
परमहंस इसका स्पष्ट उदाहरण हैं।
1950 की सबसे दिलचस्प विशेषता यही है।
एक ओर गोपाल सिंह विशारद जैसे भक्त अदालत गए।
दूसरी ओर परमहंस जैसे संत।
इससे अदालत के सामने हिंदू दावा दो सामाजिक रूपों में उपस्थित हुआ—
व्यक्तिगत धार्मिक अधिकार।
और
संत-परंपरा का धार्मिक दावा।
आगे 1959 में संस्थागत अखाड़ा दावा जुड़ने वाला था।
क्योंकि कोई भक्त या महंत देवता का पूर्ण विधिक विकल्प नहीं होता।
1989 के नए वाद में यह तर्क लिया गया कि पूर्व वाद अपर्याप्त थे क्योंकि पीठासीन देवता और स्वयं अस्थान को दल नहीं बनाया गया था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के रिकॉर्ड में 1989 वादपत्र का यही तर्काधार दर्ज है।
इससे 1950 मुकदमेबाजी की मूल कानूनी सीमा सामने आती है।
वह श्रद्धालु की मुकदमेबाजी थी।
देवता की स्वयं की मुकदमेबाजी नहीं।
उन्होंने चार महत्वपूर्ण चीजें सुरक्षित रखीं—
रामलला का भौतिक उपस्थिति।
पूजा की निरंतरता।
स्थल मानचित्र और न्यायिक अभिलेख।
और अदालत द्वारा धार्मिक यथास्थिति का संरक्षण।
1989 का रामलला वाद एक बिल्कुल खाली साक्ष्यगत परिदृश्य में नहीं आया।
उसके पीछे चार दशकों की न्यायिक निरंतरता थी।
जैसा ऊपर उल्लेखित है, विशारद और परमहंस ने 7 मार्च 1962 को स्पष्ट किया कि वे आयुक्त मानचित्र में दिखाए गए राम चबूतरा, सीता रसोई और भंडार जैसी बाहरी संरचनाओं पर उस वाद में राहत नहीं चाहते।
इसका अर्थ है कि 1950 के वादी अपने मुकदमे को केंद्र कर रहे थे।
उनकी मुकदमेबाजी मुख्यतः उस भीतरी क्षेत्र से जुड़ी थी जहां रामलला दिसंबर 1949 से विराजमान थे।
यह तथ्य बाद के “1950 वाद किस जमीन के बारे में था?” प्रश्न का महत्वपूर्ण उत्तर है।
1950–55 के पहले चरण तक हिंदू वादी ने कई महत्वपूर्ण व्यावहारिक उपलब्धियां प्राप्त कर ली थीं।
मूर्तियां नहीं हटाई गईं।
पूजा जारी रही।
अदालत ने हस्तक्षेप के विरुद्ध निषेधाज्ञा दिया।
उच्च न्यायालय ने अंतरिम व्यवस्था को समाप्त नहीं किया।
स्थल के न्यायिक मानचित्र बने।
राज्य भी मुकदमे का पक्ष बन गया।
यह तत्कालीन परिस्थितियों में एक महत्वपूर्ण विधिक समेकन था।
हाँ।
उन्होंने पूरे स्वामित्व-अधिकार का अंतिम समाधान नहीं कराया।
परिणामतः—
मुस्लिम दावा जीवित रहा।
अखाड़ों के स्वतंत्र दावा पैदा हुए।
स्वामित्व अनिश्चित रहा।
और मामला अनेक परस्पर दोहराते वाद में फैल गया।
जो अल्पकालिक रणनीति थी, वही दीर्घकालिक मुकदमेबाजी जटिलता भी बनी।
परमहंस के दौर से यह बात स्पष्ट होती जाती है कि एक ही स्थल पर अनेक अलग विधिक अधिकार दावा किए जा सकते हैं—
पूजा का अधिकार।
प्रवेश का अधिकार।
प्रबंधन का अधिकार।
मालिकाना स्वामित्व-अधिकार।
देवता का स्वामित्व संबंधी हित।
वक्फ अधिकार।
इनमें से किसी एक वाद का फैसला पूरे विवाद को स्वतः समाप्त नहीं करता।
अयोध्या की विधिक जटिलता का मुख्य कारण यही था।
उन्हें केवल 1950 के वादी के रूप में देखना कम होगा।
उनकी भूमिका तीन अलग युगों को जोड़ती है—
1949–50 का स्थानीय धार्मिक-न्यायिक संघर्ष।
1980 के दशक का संगठित मंदिर आंदोलन।
1990 के दशक का कारसेवा और राष्ट्रीय राजनीतिक चरण।
इस अर्थ में वे आंदोलन के संस्थागत स्मृति-bearers में से एक थे।
शोध की दृष्टि से इसे अधिक संक्षेप में और सटीक रूप में कहा जा सकता है—
परमहंस रामचंद्र दास ने गोपाल सिंह विशारद के पूजा-अधिकार वाद को लगभग समान राहत वाले दूसरे वाद से मजबूती दी।
उन्होंने उचित धारा 80 सूचना देकर प्रक्रियागत असुरक्षा कम की।
उनका वाद विशारद वाद से समेकित करना हुआ।
उन्होंने भीतरी विवादित परिसर में रामलला की पूजा और मूर्ति के बने रहने का दावा बनाए रखा।
और उनका मुकदमा 1990 तक जीवित रहा।
7 फरवरी 1950 — उत्तर प्रदेश राज्य और डिप्टी कमिश्नर को धारा 80 दीवानी प्रक्रिया संहिता सूचना।
5 दिसंबर 1950 — नियमित वाद संख्या 25 का 1950 दायर; पूजा में हस्तक्षेप और मूर्ति हटाने पर निषेधाज्ञा की मांग।
1 फरवरी 1951 — विशारद के वाद संख्या 2/1950 के साथ समेकन।
7 मार्च 1962 — परमहंस और विशारद ने बाहरी प्रांगण की सीता रसोई, भंडार और राम चबूतरा जैसी संरचनाओं के संबंध में राहत न मांगने की संयुक्त स्थिति स्पष्ट की।
1989 — मुकदमा हस्तांतरण के बाद O.O.S. संख्या 2 का 1989 बना; सुन्नी केंद्रीय बोर्ड का वक्फ भी प्रतिवादी के रूप में जोड़ा गया।
23 अगस्त 1990 — परमहंस ने वापसी आवेदन दिया।
18 सितंबर 1990 — अदालत ने वापसी स्वीकार किया; वाद खारिज के रूप में वापस लिया।
परमहंस रामचंद्र दास का 1950 का मुकदमा किसी अलग भूमि-स्वामित्व-अधिकार सिद्धांत का आरंभ नहीं था।
वह प्रारंभिक हिंदू पूजा-अधिकार मुकदमेबाजी को मजबूत करने वाला समानांतर वाद था।
इसका महत्व तीन स्तरों पर है।
पहला, उसने विशारद के धार्मिक-प्रवेश दावा को एक प्रमुख संत के स्वतंत्र दावे से सुदृढ़ करना किया।
दूसरा, धारा 80 दीवानी प्रक्रिया संहिता सूचना देकर सरकारी प्रतिवादियों के संदर्भ में प्रक्रियागत आधार को अधिक सुरक्षित किया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्वयं संकेत किया कि यही दूसरा वाद दायर किए जाने का संभावित मुख्य कारण था।
तीसरा, इस मुकदमेबाजी ने यह स्पष्ट किया कि 1950 के हिंदू वादी का तत्काल केंद्र बाहरी राम चबूतरा नहीं, बल्कि भीतरी विवादित क्षेत्र में विराजमान रामलला की पूजा था।
इसलिए 1950 की मुकदमेबाजी को एक वाक्य में समझा जा सकता है—
हिंदू पक्ष ने पहले रामलला की भौतिक और धार्मिक स्थिति को अदालत से सुरक्षित किया; पूरे प्रबंधन और स्वामित्व की लड़ाई उसके बाद आई।
1949 की घटना के बाद अयोध्या अदालत में पहुंची तो प्रारंभिक हिंदू मुकदमे किसी विशाल राजनीतिक घोषणापत्र की तरह नहीं थे।
वे बहुत व्यावहारिक थे।
मूर्ति न हटे।
पूजा न रुके।
दर्शन-अधिकार सुरक्षित रहे।
राज्य वर्तमान स्थिति न बदले।
गोपाल सिंह विशारद ने भक्त के रूप में यह मांग उठाई और परमहंस रामचंद्र दास ने संत के रूप में लगभग वही कानूनी मोर्चा मजबूत किया। दोनों वाद का समेकन इस शुरुआती रणनीतिक एकरूपता को दिखाता है।
लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, प्रश्न केवल पूजा का नहीं रह सकता था।
कौन पूजा का प्रबंधन करेगा?
किस अखाड़े को सेवायत या प्रबंधकीय अधिकार है?
रिसीवर को हटाकर कब्जा किसे मिले?
यहीं से 1959 में अयोध्या मुकदमेबाजी का अगला और बिल्कुल अलग दावा सामने आया—
निर्मोही अखाड़ा।
अब पहली बार एक धार्मिक संस्था अदालत से कहने वाली थी कि वह केवल भक्त नहीं, बल्कि जन्मस्थान और देवताओं के प्रबंधन की पारंपरिक अधिकारी है।
अगला अध्याय 19 — “1959 : निर्मोही अखाड़े का दावा” होगा। उसमें अखाड़े की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, सेवायत-अधिकार का अर्थ, 17 दिसंबर 1959 का वाद, प्राप्तकर्ता हटाने और प्रबंधन सौंपने की मांग, भीतरी/बाहरी प्रांगण पर उसके दावे, सीमा की समस्या और 2019 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उसके वाद को समय-सीमा से बाहर मानने का विस्तृत विश्लेषण करेंगे।