अशोक सिंघल, महंत अवैद्यनाथ और संत नेतृत्व की भूमिका
संगठित जनांदोलन का उदय
राम जन्मभूमि आंदोलन के आधुनिक संगठित चरण में दो प्रकार का नेतृत्व समानांतर दिखाई देता है। एक था संगठनात्मक नेतृत्व, जिसका सबसे प्रभावशाली चेहरा अशोक सिंघल बने। दूसरा था धार्मिक-संत नेतृत्व, जिसका प्रमुख स्तंभ महंत अवैद्यनाथ थे। इन दोनों के साथ परमहंस रामचंद्र दास, महंत नृत्यगोपाल दास और अनेक अखाड़ों-मठों के संत जुड़े। इसी संयोजन ने आंदोलन को वह संरचना दी जिसमें धार्मिक वैधता, संगठनात्मक अनुशासन और जनसंपर्क एक साथ काम करने लगे।
1984 में बनी राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति की संरचना इस साझेदारी को बहुत स्पष्ट करती है। लिब्रहान आयोग ने दर्ज किया कि समिति जून 1984 में दिगंबर अखाड़े में गठित हुई; महंत अवैद्यनाथ इसके अध्यक्ष बने, दाऊ दयाल खन्ना संयोजक/महासचिव, जबकि नृत्यगोपाल दास और परमहंस रामचंद्र दास उपाध्यक्षों में थे। उसी समय “ताला खोलो” अभियान को आगे बढ़ाने के लिए एक अलग कार्यकारी संरचना भी बनाई गई।
राम मंदिर आंदोलन केवल धार्मिक उपदेश से राष्ट्रीय अभियान नहीं बन सकता था और केवल संगठनात्मक कैडर से उसे धार्मिक वैधता भी नहीं मिल सकती थी।
इसीलिए लगभग स्वाभाविक कार्य-विभाजन उभरा—
अशोक सिंघल और विश्व हिंदू परिषद — संगठन, रणनीति, संत संपर्क, यात्राएं, जनसंपर्क।
महंत अवैद्यनाथ और संत नेतृत्व — धार्मिक प्रामाणिकता, संकल्प, आंदोलन का आध्यात्मिक चेहरा।
परमहंस रामचंद्र दास और स्थानीय अयोध्या संत — ऐतिहासिक निरंतरता और स्थल से प्रत्यक्ष संबंध।
नृत्यगोपाल दास — अयोध्या में स्थायी संस्थागत आधार।
इस संयोजन ने आंदोलन को किसी एक व्यक्ति या पार्टी पर निर्भर नहीं रहने दिया।
अशोक सिंघल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि से आए थे। वे इंजीनियरिंग शिक्षा प्राप्त कर चुके थे और लंबे समय तक प्रचारक के रूप में काम करते रहे। लगभग 1980–81 के आसपास उन्हें विश्व हिंदू परिषद के काम में लगाया गया। 1984 तक वे विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय नेतृत्व में आ चुके थे और पहली धर्म संसद के प्रमुख आयोजकों में गिने जाते हैं।
उनकी भूमिका को समझने के लिए “मंदिर आंदोलन के चेहरे” से आगे जाना होगा।
वे मूलतः तंत्र-builder थे।
उनका काम था—
संतों को एक मंच पर लाना,
स्थानीय मुद्दे को राष्ट्रीय बनाना,
कार्यक्रमों को क्रमबद्ध करना,
धार्मिक भाषा को जन-संचार में बदलना,
और आंदोलन को लगातार अगले चरण तक पहुंचाना।
वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शैली के अनुशासन और संत-संपर्क की धार्मिक राजनीति—दोनों को समझते थे।
संत समाज को किसी राजनीतिक पार्टी की तरह आदेश नहीं दिया जा सकता।
हर महंत की अपनी संस्था, परंपरा और प्रतिष्ठा होती है।
सिंघल की सफलता इस बात में थी कि वे ऐसे स्वतंत्र धार्मिक नेताओं को साझा लक्ष्य पर सहमत करने में सक्षम हुए।
यही क्षमता 1984 की धर्म संसद, बाद की यात्राओं और रामशिला अभियान में निर्णायक सिद्ध हुई।
1981 के मीनाक्षीपुरम धर्मांतरण के बाद विश्व हिंदू परिषद में हिंदू सामाजिक एकीकरण की चिंता तेज हुई। सिंघल का विश्व हिंदू परिषद में सक्रिय स्थान इसी दौर में मजबूत हुआ। बाद के विवरण बताते हैं कि विश्व हिंदू परिषद ने सामाजिक समरसता, मंदिर-प्रवेश और धर्मांतरण-विरोध पर कार्य बढ़ाया।
अयोध्या इस व्यापक चिंता के भीतर एक ऐसा प्रतीक बन सकती थी जिसमें—
जाति से ऊपर धार्मिक पहचान,
ऐतिहासिक स्मृति,
तीर्थ परंपरा,
और राजनीतिक-सांस्कृतिक आत्मसम्मान—
सभी को जोड़ा जा सके।
1984 की पहली धर्म संसद के आयोजन में सिंघल की भूमिका केंद्रीय थी। समकालीन और बाद के विश्वसनीय विवरण उन्हें इसके प्रमुख आयोजकों में रखते हैं।
यहां उनकी असली उपलब्धि कोई भाषण नहीं थी।
बल्कि—
देशभर के संतों को दिल्ली बुलाना,
विभिन्न परंपराओं को साझा एजेंडे पर लाना,
और राम जन्मभूमि प्रश्न को राष्ट्रीय धार्मिक संकल्प में बदलना—
था।
यहीं से उन्हें आगे “राम मंदिर आंदोलन का प्रमुख शिल्पी” जैसी पहचान मिली।
नहीं।
यह लोकप्रिय संक्षिप्त संकेत है।
आंदोलन बहुत पुराना था।
1949, 1950 और स्थानीय संत संघर्ष उनसे पहले के थे।
महंत अवैद्यनाथ, परमहंस, दाऊ दयाल खन्ना, मोरोपंत पिंगले, नृत्यगोपाल दास और अन्य अनेक व्यक्तियों की स्वतंत्र भूमिकाएं थीं।
इसलिए अधिक सटीक निष्कर्ष होगा—
अशोक सिंघल आधुनिक राष्ट्रीय संगठनात्मक विस्तार के प्रमुख वास्तुकारों में से एक थे, आंदोलन के अकेले निर्माता नहीं।
महंत अवैद्यनाथ गोरखनाथ मठ की उस परंपरा के उत्तराधिकारी थे जिसे उनके गुरु महंत दिग्विजयनाथ ने राम जन्मभूमि प्रश्न से जोड़ा था।
1984 में जब अलग-अलग संत धाराओं को एकजुट करने की आवश्यकता हुई, अवैद्यनाथ स्वाभाविक नेतृत्वकर्ताओं में थे।
लिब्रहान आयोग ने स्पष्ट दर्ज किया कि राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति के अध्यक्ष महंत अवैद्यनाथ बने।
यह केवल औपचारिक पद नहीं था।
यह आंदोलन के धार्मिक चेहरे की घोषणा थी।
उनके पक्ष में कई कारक थे—
गोरखनाथ मठ की प्रतिष्ठा,
दिग्विजयनाथ की पूर्व भूमिका,
संत समाज में संपर्क,
राजनीतिक अनुभव,
हिंदू महासभा से जुड़ी पृष्ठभूमि,
और धार्मिक मुद्दों पर सार्वजनिक वक्तृत्व।
वे ऐसे संत थे जो धार्मिक और राजनीतिक दोनों भाषा समझते थे।
इसीलिए वे विश्व हिंदू परिषद और स्थानीय संतों के बीच सेतु बन सके।
अवैद्यनाथ सक्रिय राजनीति में भी रहे थे।
इससे वे केवल आश्रम-आधारित संत नहीं थे।
वे जानते थे—
राज्य सरकार कैसे काम करती है,
चुनाव का दबाव क्या होता है,
सभा कैसे संगठित होती है,
और धार्मिक मांग को सार्वजनिक राजनीतिक प्रश्न में कैसे बदला जाता है।
राम जन्मभूमि आंदोलन को ठीक ऐसी ही मिश्रित क्षमता की आवश्यकता थी।
अवैद्यनाथ के बारे में बाद की सामग्री बार-बार बताती है कि वे हिंदू सामाजिक एकता और जातिगत विभाजनों को कम करने पर जोर देते थे। राम मंदिर आंदोलन को उन्होंने केवल सवर्ण धार्मिक आंदोलन बने रहने देने की बजाय व्यापक हिंदू पहचान से जोड़ने का प्रयास किया।
आगे दलित भागीदारी और कामेश्वर चौपाल का शिलान्यास इसी व्यापक आंदोलनकारी रणनीति से जुड़ता है।
बाद के कई विवरण कहते हैं कि उन्होंने लगभग 1980 में सक्रिय पार्टी राजनीति से दूरी बनाई और हिंदू सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यों पर अधिक ध्यान दिया।
लेकिन इसे पूर्ण और स्थायी राजनीतिक संन्यास मानना सावधानी मांगता है, क्योंकि आगे वे फिर चुनावी राजनीति में भी सक्रिय हुए।
इसलिए सही भाषा होगी—
1980 के शुरुआती वर्षों में उन्होंने अपना प्रमुख ध्यान धार्मिक-सामाजिक संगठन और राम जन्मभूमि आंदोलन पर केंद्रित किया।
लिब्रहान आयोग के अनुसार जून 1984 में दिगंबर अखाड़े में समिति बनी। दाऊ दयाल खन्ना संयोजक और महासचिव थे; नृत्यगोपाल दास और परमहंस रामचंद्र दास उपाध्यक्ष; अवैद्यनाथ अध्यक्ष। 1 जुलाई 1984 की वाल्मीकि भवन बैठक में नेतृत्व संरचना को फिर व्यवस्थित किया गया।
यह रिकॉर्ड विशेष महत्व का है क्योंकि बाद की अलग-अलग समयरेखाएँ समिति गठन की तारीख और पदाधिकारियों में थोड़ा अंतर देती हैं।
हमारे शोध में लिब्रहान आयोग का आधिकारिक कालक्रम अभिलेख प्राथमिकता योग्य है।
कुछ स्रोत 18 जून कहते हैं।
कुछ 21 जुलाई।
कुछ जून 1984 सामान्य रूप से।
इसका कारण संभवतः यह है कि—
प्रारंभिक गठन,
पदाधिकारियों की घोषणा,
और बाद की औपचारिक बैठकें—
अलग-अलग तारीखों पर हुईं।
इसलिए किसी एक तारीख को पूरे संगठनात्मक प्रक्रिया का अकेला “गठन दिवस” मानना अत्यधिक सरल होगा।
सबसे सुरक्षित निष्कर्ष—
जून–जुलाई 1984 में समिति और उसके नेतृत्व का औपचारिक संस्थानीकरण हुआ।
परमहंस की भूमिका इस नेतृत्व संरचना में विशेष थी।
वे 1950 से मुकदमे में थे।
इसलिए जब 1984 का नया आंदोलन खड़ा हुआ, वे उसकी पुरानी जड़ का जीवित प्रमाण थे।
उनका संदेश यह था—
यह आंदोलन नया नहीं।
हम दशकों से यहां हैं।
इससे विश्व हिंदू परिषद की नई संगठनात्मक ताकत को पुराने स्थानीय संघर्ष की वैधता मिली।
लिब्रहान आयोग ने राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति में परमहंस रामचंद्र दास को उपाध्यक्षों में दर्ज किया है।
यह भूमिका बहुत प्रतीकात्मक थी।
एक ओर अवैद्यनाथ व्यापक धार्मिक-राजनीतिक नेतृत्व थे।
दूसरी ओर परमहंस अयोध्या की स्थानीय निरंतरता।
दोनों को एक ही समिति में लाना आंदोलन के लिए अत्यंत उपयोगी था।
महंत नृत्यगोपाल दास अयोध्या की मणिरामदास छावनी से जुड़े प्रमुख संत थे और 1960 के दशक से वहां महंत की भूमिका में थे। 1984 से वे सक्रिय रूप से राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े।
लिब्रहान आयोग उन्हें राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति के उपाध्यक्षों में दर्ज करता है।
उनकी भूमिका का महत्व था—
अयोध्या में स्थायी धार्मिक संस्थान,
साधु नेटवर्क,
तीर्थयात्री संपर्क,
और लंबे समय तक आंदोलन की स्थानीय संस्थागत उपस्थिति।
आंदोलन के राष्ट्रीय नेता बदल सकते हैं।
लेकिन अयोध्या में रोज रहने वाला धार्मिक नेतृत्व अलग शक्ति रखता है।
नृत्यगोपाल दास ने इसी स्थानीय संस्थागत निरंतरता को संभाला।
आगे वे राम जन्मभूमि न्यास के नेतृत्व में भी आए और मंदिर निर्माण के नए संस्थागत दौर तक सक्रिय रहे।
इसलिए उनका महत्व 1984 तक सीमित नहीं है।
विश्व हिंदू परिषद आंदोलन को संगठित करती थी।
लेकिन उसे धार्मिक निर्णय अपने नाम से थोपने में सावधानी रखनी पड़ती थी।
इसीलिए नेतृत्व संरचना ऐसी बनाई गई जिसमें संत अग्रभूमि में रहें।
यह आंदोलन को दो लाभ देता था—
पहला, धार्मिक वैधता।
दूसरा, पार्टी-राजनीति से शुरुआती दूरी।
इस प्रकार विश्व हिंदू परिषद स्वयं coordinator दिखाई देती थी, “धर्म की अंतिम प्राधिकरण” नहीं।
नहीं।
यह मानना भी गलत होगा।
अवैद्यनाथ, परमहंस और नृत्यगोपाल दास जैसे संत वास्तविक निर्णयकारी भूमिकाओं में थे।
उनके अपने मठ, अनुयायी और प्रभाव क्षेत्र थे।
वे विश्व हिंदू परिषद के वेतनभोगी प्रचारक की तरह नियंत्रित नहीं होते थे।
इसलिए आंदोलन को सहमति राजनीति की जरूरत थी।
यही उसकी जटिलता और शक्ति दोनों थी।
भारत की संत परंपरा अत्यंत विविध है—
शैव,
वैष्णव,
रामानंदी,
अखाड़े,
मठ,
संप्रदाय,
महामंडलेश्वर,
स्थानीय महंत।
इनके अपने सिद्धांतगत और संस्थागत मतभेद थे।
अवैद्यनाथ जैसे नेता और सिंघल जैसे आयोजक इसलिए महत्वपूर्ण बने क्योंकि उन्होंने “राम जन्मभूमि” को ऐसा साझा मुद्दा बनाया जिसके आसपास इन अंतरों के बावजूद सहयोग संभव था।
1984 के बाद एक लगभग स्पष्ट कार्य-विभाजन उभरता है—
धार्मिक संकल्प और आह्वान।
योजना और प्रचार।
कार्यकर्ता और संगठनात्मक तंत्र।
युवा लामबंदी और यात्रा-सुरक्षा।
अयोध्या में स्थायी आधार।
चुनावी और संसदीय राजनीतिक प्रतिनिधित्व।
यही बहुस्तरीय संरचना आगे आंदोलन के तीव्र विस्तार की एक बड़ी वजह बनी।
सिंघल की सबसे प्रभावशाली शैली थी—
संतों को मंच देना, स्वयं संगठन चलाना।
वे अक्सर धर्माचार्यों के निर्णय को आंदोलन के केंद्रीय निर्णय के रूप में प्रस्तुत करते थे।
इससे विश्व हिंदू परिषद की योजना को धर्म संसद की वैधता मिलती थी।
लिब्रहान आयोग बाद में इसी संगठनात्मक दोहराव को बहुत महत्वपूर्ण मानता है।
अशोक सिंघल और अवैद्यनाथ की बढ़ती प्रसिद्धि के कारण दाऊ दयाल खन्ना का योगदान अक्सर पृष्ठभूमि में चला जाता है।
लेकिन 1983 में अयोध्या–मथुरा–काशी प्रश्न उठाने और 1984 समिति में संयोजक/महासचिव बनने की उनकी भूमिका स्पष्ट है। लिब्रहान आयोग उन्हें समिति के संयोजक और सामान्य secretary के रूप में दर्ज करता है।
इससे आंदोलन की शुरुआती बहु-स्रोत उत्पत्ति फिर स्पष्ट होती है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक मोरोपंत पिंगले आगे रामशिला और व्यापक जन संपर्क जैसे अभियानों के रणनीतिकारों में गिने गए।
उनकी भूमिका मंचीय संत नेतृत्व से अलग थी।
ऐसे प्रचारक—
मार्ग,
कार्यकर्ता-तंत्र,
स्थानीय इकाई,
सामग्री,
सूचना प्रवाह,
और कार्यक्रम पुनरावृत्ति—
जैसे प्रश्न संभालते थे।
अशोक सिंघल की सार्वजनिक संगठनात्मक भूमिका और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रचारकों की पर्दे के पीछे योजना मिलकर अभियान की क्षमता बढ़ाती थी।
1984–85 का पहला ठोस लक्ष्य ताला खोलना था।
लिब्रहान आयोग बताता है कि 1 जुलाई 1984 को राम जन्मभूमि कार्रवाई समिति बनाई गई थी, जिसका उद्देश्य Tala Kholo आंदोलन शुरू करना था।
यह महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि ताला खोलने की मांग फरवरी 1986 के अदालत आदेश से अचानक पैदा नहीं हुई।
1984 से वह संगठित आंदोलन का घोषित लक्ष्य थी।
लिब्रहान आयोग दर्ज करता है कि 19 दिसंबर 1985 को बजरंग दल ने अयोध्या का ताला खोलने की मांग के समर्थन में बंद कराया।
इससे आंदोलन का तीव्रता दिखाई देता है—
1984 — धर्म संसद।
1984 — यात्रा।
1985 — यात्राओं का विस्तार।
दिसंबर 1985 — बंद।
फरवरी 1986 — न्यायालय से ताला खुलना।
अर्थात जनदबाव धीरे-धीरे बढ़ रहा था।
पूरी तरह नहीं।
मुकदमे चलते रहे।
लेकिन वे केवल अदालत की गति पर निर्भर रहने को तैयार नहीं थे।
उनकी रणनीति थी—
कानूनी प्रक्रिया चलने दो,
साथ-साथ धार्मिक जनमत बनाओ।
यही दोहरी दिशा वाला दृष्टिकोण आगे भी बनी रही।
यदि अदालत अनुकूल निर्णय दे—
आंदोलन उसे जनसमर्थन की विजय के रूप में प्रस्तुत कर सकता था।
यदि निर्णय देर से आए—
आंदोलन न्यायिक देरी को लामबंदी तर्क बना सकता था।
इस तरह संगठनात्मक दृष्टि से आंदोलन दोनों परिस्थितियों में सक्रिय रह सकता था।
1984 में यह दूरी रणनीतिक रूप से लाभकारी थी।
अवैद्यनाथ की अपनी राजनीतिक पृष्ठभूमि थी, लेकिन राम जन्मभूमि समिति किसी एक पार्टी की आधिकारिक समिति नहीं थी।
इससे—
कांग्रेस पृष्ठभूमि वाले लोग,
हिंदू महासभाई,
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समर्थक,
और गैर-दलीय संत—
सभी शामिल हो सकते थे।
यह विस्तार आंदोलन के शुरुआती विस्तार के लिए बहुत महत्वपूर्ण थी।
1984 की धर्म संसद और समिति गठन के समय भाजपा आंदोलन की केंद्रीय संचालक नहीं थी।
यह तथ्य दो कारणों से महत्वपूर्ण है।
पहला—आंदोलन की धार्मिक जड़ स्वतंत्र थी।
दूसरा—बाद में भाजपा के जुड़ने से आंदोलन को नया चुनावी आयाम मिला।
इसलिए 1984 और 1989 को एक ही राजनीतिक स्थिति समझना गलत होगा।
1984 लोकसभा चुनाव में भाजपा की भारी हार के बाद पार्टी के भीतर वैचारिक पुनर्संयोजन शुरू हुआ।
विश्व हिंदू परिषद का आंदोलन meanwhile बढ़ता रहा।
1986 ताला खुलने और 1989 पालमपुर प्रस्ताव तक आते-आते दोनों धाराएं अधिक स्पष्ट रूप से जुड़ने लगीं।
इसलिए अशोक सिंघल–अवैद्यनाथ चरण ने वह सामाजिक आधार तैयार किया जिस पर बाद में भाजपा अपनी राजनीतिक रणनीति विकसित कर सकी।
महंत अवैद्यनाथ और विश्व हिंदू परिषद दोनों ने यह समझा कि यदि आंदोलन को देशव्यापी बनाना है तो जातीय सीमाएं तोड़नी होंगी।
राम मंदिर को केवल उच्च जातीय धार्मिक अभिजात का आंदोलन समझा गया तो उसकी सीमा बनी रहेगी।
इसलिए—
दलित संपर्क,
सामूहिक भोजन,
सामाजिक समरसता,
और आगे शिलान्यास में सामाजिक प्रतीक—
महत्वपूर्ण बने।
संतों की भागीदारी ने आंदोलन की भाषा को लगातार धार्मिक बनाए रखा—
यज्ञ,
संकल्प,
धर्म संसद,
रथ,
शिला,
कारसेवा।
लेकिन इन्हीं कार्यक्रमों के राजनीतिक परिणाम गहरे थे।
यह धर्म और राजनीति का सीधा दोहराव था।
समर्थकों की दृष्टि में यह धार्मिक अधिकार की वैध सार्वजनिक अभिव्यक्ति थी।
आलोचकों की दृष्टि में धार्मिक प्रतीकों का राजनीतिक लामबंदी।
दोनों व्याख्याएँ आगे भारतीय राजनीति में केंद्रीय बहस बने।
सिंघल की भूमिका केवल बंद कमरे की बैठक तक सीमित नहीं थी।
वे लगातार—
पत्रकार वार्ताएं,
संत सम्मेलन,
यात्राएं,
जनसभाएं,
और बाद में शिलान्यास तथा कारसेवा—
से जुड़े।
उन्होंने आंदोलन को ऐसा शब्दावली दिया जिसमें ऐतिहासिक शिकायत और तत्काल कार्रवाई एक साथ दिखाई देते थे।
इससे आंदोलन लगातार शीर्षक में बना रहा।
अवैद्यनाथ के वक्तव्य हिंदू पवित्र स्थान की “मुक्ति” और समाज की धार्मिक एकता पर केंद्रित रहे।
उनका प्रभाव उन क्षेत्रों में विशेष था जहां गोरखनाथ मठ का सामाजिक-धार्मिक नेटवर्क मजबूत था।
इससे आंदोलन को पूर्वी उत्तर प्रदेश में मजबूत धार्मिक आधार मिला।
गोरखपुर अयोध्या नहीं है।
फिर भी दिग्विजयनाथ–अवैद्यनाथ परंपरा ने दोनों को लंबे समय तक जोड़े रखा।
यह दिखाता है कि अयोध्या आंदोलन स्थानीय सीमाओं से बाहर पहले ही धार्मिक संस्थागत connectors बना चुका था।
आगे यही परंपरा योगी आदित्यनाथ के दौर में मंदिरोत्तर अयोध्या की राजनीति से भी जुड़ती है।
परमहंस की ताकत थी—
अयोध्या की स्थानीय वैधता।
अवैद्यनाथ की ताकत—
व्यापक संत और राजनीतिक पहुँच।
एक व्यक्ति कह सकता था—
“मैं 1950 से इस संघर्ष में हूं।”
दूसरा—
“मैं विभिन्न संत-परंपराओं को एकत्र कर सकता हूं।”
दोनों का साथ आंदोलन के लिए अत्यंत उपयोगी था।
नृत्यगोपाल दास उस त्रिकोण का तीसरा पक्ष थे—
स्थायी अयोध्या संस्था।
उनके पास मणिरामदास छावनी जैसे बड़े धार्मिक केंद्र का आधार था।
इसलिए आंदोलन केवल occasional यात्राओं पर निर्भर नहीं रहा।
अयोध्या में उसका स्थायी संस्थागत home मौजूद था।
उसने आंदोलन को धार्मिक वैधता beyond दल राजनीति दी।
यदि केवल भारतीय जनता पार्टी या किसी अन्य दल ने मंदिर मांग उठाई होती, तो उसे चुनावी एजेंडा कहकर सीमित किया जा सकता था।
जब विभिन्न संत एक साथ मांग करते थे, आंदोलन स्वयं को धार्मिक समाज का autonomous आग्रह बता सकता था।
यह उसकी वैचारिक शक्ति का प्रमुख स्रोत था।
संत समाज एकरूप नहीं था।
प्रबंधन के अपने हित थे।
अखाड़ों के मतभेद थे।
राजनीतिक प्राथमिकताएं भिन्न थीं।
आगे शिलान्यास, कारसेवा और सरकारों से बातचीत के समय इन मतभेदों की झलक मिलती है।
इसलिए विश्व हिंदू परिषद का संगठनात्मक समन्वय लगातार आवश्यक रहा।
इतिहास का सटीक उत्तर है—
दोनों को एक-दूसरे की आवश्यकता थी।
विश्व हिंदू परिषद के पास तंत्र था, लेकिन अकेले धार्मिक प्राधिकरण नहीं।
संतों के पास धार्मिक प्राधिकरण थी, लेकिन राष्ट्रीय संगठनात्मक तंत्र सीमित थी।
आंदोलन दोनों की साझेदारी से बना।
इसे केवल “संतों का आंदोलन” या “विश्व हिंदू परिषद का नियंत्रित अभियान” कहना दोनों ही अधूरे निष्कर्ष होंगे।
लिब्रहान आयोग ने 1992 तक के पूरे आंदोलन का विश्लेषण करते हुए विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विभिन्न संबद्ध संगठनों के बीच व्यापक समन्वय को महत्वपूर्ण माना। उसकी कालक्रम 1984 में धर्म संसद, राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति, कार्रवाई समिति और यात्राओं के गठन को क्रमशः दर्ज करती है।
लेकिन आयोग की 1992 पर केंद्रित व्यापक राजनीतिक निष्पत्तियों को 1984 के हर व्यक्ति की व्यक्तिगत मंशा का स्वतः प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।
कालक्रम और षड्यंत्र मूल्यांकन अलग स्तर हैं।
1984 के बाद नेतृत्व की यात्रा इस प्रकार दिखाई देती है—
1984 — संतों का संस्थानीकरण।
1984–85 — ताला खोलो और यात्राएं।
1986 — ताला खुलना; विश्व हिंदू परिषद की राजनीतिक दृश्यता बढ़ी।
1989 — रामशिला और शिलान्यास।
1990 — भारतीय जनता पार्टी/आडवाणी की रथयात्रा से चुनावी राजनीति का पूर्ण प्रवेश।
1992 — कारसेवा और विध्वंस।
इस पूरे क्रम में सिंघल और संत नेतृत्व लगातार मौजूद रहे।
सिंघल 1984 की धर्म संसद तक सीमित नहीं रहे।
आगे वे—
रामशिला आंदोलन,
शिलान्यास,
कारसेवा,
सरकारों से वार्ता,
और मंदिर निर्माण अभियान—
में केंद्रीय विश्व हिंदू परिषद चेहरा बने रहे। उनकी दीर्घ भूमिका के कारण उन्हें आंदोलन का “chief architect” कहने की सार्वजनिक परंपरा बनी।
लेकिन शोध में बेहतर शब्द होगा—
“आधुनिक राष्ट्रीय राम जन्मभूमि आंदोलन के प्रमुख संगठनात्मक रणनीतिकार।”
महंत अवैद्यनाथ भी केवल 1984 समिति अध्यक्ष नहीं रहे।
वे आगे मंदिर आंदोलन की धार्मिक नेतृत्व-श्रृंखला में प्रमुख बने रहे और अयोध्या को हिंदू धार्मिक-राजनीतिक कार्यसूची में बनाए रखा। बाद के स्रोत उन्हें राम जन्मभूमि आंदोलन के अग्रणी संतों में गिनते हैं।
उनका विशेष योगदान था—
दिग्विजयनाथ की पुरानी धारा को नए विश्व हिंदू परिषद-आधारित आंदोलन से जोड़ना।
यह बात महत्वपूर्ण है।
अशोक सिंघल,
अवैद्यनाथ,
परमहंस,
नृत्यगोपाल दास—
प्रमुख चेहरे थे।
लेकिन आंदोलन में सैकड़ों स्थानीय संत, अखाड़े, धर्माचार्य और क्षेत्रीय आयोजक थे।
राष्ट्रीय आंदोलन का निर्माण बहुत सारे छोटे nodes से हुआ।
इसलिए व्यक्तित्व-केंद्रित इतिहास के साथ संस्थागत इतिहास भी आवश्यक है।
उसके तीन प्रमुख तत्व थे—
आस्था — जन्मभूमि राम की है।
ऐतिहासिक स्मृति — यहां मंदिर रहा और अन्याय हुआ।
कर्तव्य — वर्तमान पीढ़ी को मंदिर निर्माण का संकल्प पूरा करना है।
इन तीनों ने साधारण राजनीतिक माँग को धार्मिक duty जैसा नैतिक स्वर दिया।
यही आंदोलन की मनोवैज्ञानिक सत्ता थी।
समर्थकों के लिए यह धार्मिक अधिकार और सांस्कृतिक पुनर्स्थापन का संघर्ष था।
आलोचक इसे धर्म के राजनीतिक उपयोग और सांप्रदायिक लामबंदी के रूप में देखते थे।
आगे आंदोलन बढ़ने के साथ यही दो व्याख्याएँ भारतीय सार्वजनिक जीवन में और कठोर होती गईं।
इसलिए संत नेतृत्व केवल धार्मिक परिघटना नहीं रहा; उसने राष्ट्रीय पंथनिरपेक्षता बहस को भी प्रभावित किया।
इसने अयोध्या आंदोलन को तीन स्तरों पर स्थायी बना दिया—
राम जन्मभूमि = धार्मिक-सांस्कृतिक न्याय।
विश्व हिंदू परिषद + समिति + संत संगठन।
यात्रा + स्थानीय इकाई + युवा संगठन।
इसी आधार पर आगे आंदोलन व्यापकता कर सका।
ऐतिहासिक वैकल्पिक-कल्पना निश्चित नहीं हो सकता।
विवाद पहले से मौजूद था।
कोई अन्य नेता भी आगे आ सकता था।
लेकिन उपलब्ध इतिहास बताता है कि 1984 के निर्णायक संगठनात्मक संक्रमण में दोनों की भूमिकाएं असाधारण थीं।
सिंघल ने तंत्र और अभियान वास्तुकला दिया।
अवैद्यनाथ ने धार्मिक नेतृत्व और संतों की राजनीतिक-सामाजिक सेतु भूमिका।
यही complementary संबंध निर्णायक थी।
व्यक्ति — मुख्य आधार — 1984 के आंदोलन में प्रमुख भूमिका
अशोक सिंघल — राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ/विश्व हिंदू परिषद संगठन — संत संपर्क, धर्म संसद, राष्ट्रीय अभियान, जनसंपर्क
महंत अवैद्यनाथ — गोरखनाथ मठ, संत और राजनीतिक अनुभव — राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति के अध्यक्ष, धार्मिक नेतृत्व
परमहंस रामचंद्र दास — दिगंबर अखाड़ा, 1950 से अयोध्या संघर्ष — ऐतिहासिक निरंतरता, उपाध्यक्ष, स्थानीय वैधता
महंत नृत्यगोपाल दास — मणिरामदास छावनी — अयोध्या का स्थायी संस्थागत आधार, उपाध्यक्ष
दाऊ दयाल खन्ना — कांग्रेस पृष्ठभूमि, धार्मिक अभियान — प्रारंभिक पुनर्सक्रियता, समिति के संयोजक/महासचिव
मोरोपंत पिंगले — राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संगठन — रणनीतिक संगठन, आगे व्यापक जन-संपर्क अभियानों का विस्तार
समिति की प्रमुख पद-संरचना का आधिकारिक आयोगीय रिकॉर्ड महंत अवैद्यनाथ को अध्यक्ष तथा दाऊ दयाल खन्ना, नृत्यगोपाल दास और परमहंस रामचंद्र दास को प्रमुख पदों में दर्ज करता है।
अधूरा। विवाद और आंदोलन की स्थानीय धारा उनसे दशकों पुरानी थी। वे आधुनिक राष्ट्रीय संगठनात्मक विस्तार के प्रमुख रणनीतिकार थे।
गलत सरलीकरण। उनकी भूमिका संत, मठाधीश, पूर्व हिंदू महासभाई राजनीतिक व्यक्ति और राम जन्मभूमि धार्मिक नेतृत्व—सभी स्तरों पर थी।
बहुत सरल निष्कर्ष। संगठनात्मक समन्वय विश्व हिंदू परिषद के हाथ में मजबूत था, लेकिन बड़े संतों की अपनी स्वतंत्र प्राधिकरण और वास्तविक निर्णय-making भूमिका थी।
गलत। वे 1950 के मुकदमे से ही अयोध्या संघर्ष की न्यायिक इतिहास में मौजूद थे।
गलत। उस चरण में विश्व हिंदू परिषद–संत नेटवर्क मुख्य चालक था; भाजपा का निर्णायक राजनीतिक समावेश बाद के वर्षों में हुआ।
अप्रैल 1984 — धर्म संसद; सिंघल प्रमुख आयोजकों में।
जून 1984 — दिगंबर अखाड़े में राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति; अवैद्यनाथ अध्यक्ष, दाऊ दयाल खन्ना संयोजक/महासचिव, नृत्यगोपाल दास और परमहंस उपाध्यक्ष।
1 जुलाई 1984 — वाल्मीकि भवन बैठक में नेतृत्व संरचना और “ताला खोलो” अभियान के लिए कार्रवाई समिति।
सितंबर–अक्टूबर 1984 — राम-जानकी यात्रा; संत नेतृत्व और विश्व हिंदू परिषद संगठनात्मक नेटवर्क का जनपरीक्षण।
1984 — यात्रा-संबंधी युवा लामबंदी से बजरंग दल का उदय।
1985 — ताला खोलो अभियान तीव्र।
19 दिसंबर 1985 — ताला खोलने की मांग पर बजरंग दल बंद।
1 फरवरी 1986 — न्यायालय के आदेश से ताला खुला; आंदोलन नए चरण में प्रवेश।
आधुनिक राम जन्मभूमि आंदोलन की शक्ति किसी एक नेता में नहीं, बल्कि भूमिकाओं के संयोजन में थी।
अशोक सिंघल ने आंदोलन को संगठनात्मक शरीर दिया।
महंत अवैद्यनाथ ने उसे धार्मिक नेतृत्व दिया।
परमहंस रामचंद्र दास ने अतीत की निरंतरता दी।
नृत्यगोपाल दास ने अयोध्या में स्थायी संस्थागत आधार दिया।
दाऊ दयाल खन्ना ने शुरुआती पुनर्सक्रियता में महत्वपूर्ण राजनीतिक-सामाजिक सेतु का काम किया।
और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारकों ने संगठनात्मक आधारभूत संरचना मजबूत किया।
यही व्यवस्था बाद में भाजपा के राजनीतिक प्रवेश के लिए तैयार सामाजिक धरातल बनी।
इसलिए आंदोलन के इतिहास में प्रश्न केवल यह नहीं होना चाहिए कि “सबसे बड़ा नेता कौन था?”
अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है—
किसने कौन-सी क्षमता उपलब्ध कराई?
और उत्तर है—
धर्माचार्यों ने वैधता,
विश्व हिंदू परिषद ने संगठन,
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने नेटवर्क,
स्थानीय संतों ने निरंतरता,
और बाद में भारतीय जनता पार्टी ने चुनावी सत्ता उपलब्ध कराई।
1984 से पहले राम जन्मभूमि विवाद मौजूद था, संत सक्रिय थे और मुकदमे चल रहे थे। लेकिन इन्हें एक ऐसी स्थायी राष्ट्रीय मशीनरी में बदलना अभी बाकी था जो लगातार कार्यक्रम बना सके, लाखों लोगों तक संदेश पहुंचा सके और सरकारों पर राजनीतिक दबाव डाल सके।
अशोक सिंघल और महंत अवैद्यनाथ की साझेदारी इसी संक्रमण का प्रतीक है।
एक तरफ संगठनकर्ता था जो संतों, यात्राओं, समितियों और कार्यकर्ताओं को जोड़ रहा था।
दूसरी तरफ धर्माचार्य था जो उस अभियान को धार्मिक अधिकार और सामाजिक प्रतिष्ठा दे रहा था।
परमहंस और नृत्यगोपाल दास जैसे अयोध्या संतों ने उसे स्थानीय जड़ दी।
इसी संरचना ने 1984–85 के “ताला खोलो” अभियान को जन्म दिया और कुछ ही वर्षों में आंदोलन को रामशिला, शिलान्यास और कारसेवा तक पहुंचाया।
लेकिन इस पूरी संरचना के पीछे एक और संस्था थी जिसकी भूमिका अधिकतर सार्वजनिक मंच से कम और संगठनात्मक तंत्र में अधिक थी—
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ।
उसकी भूमिका को केवल “समर्थन” कह देना भी अधूरा होगा और हर घटना का प्रत्यक्ष संचालक कहना भी।
इसलिए अगला अध्याय उस प्रश्न को अलग से जांचेगा।
इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद का संबंध, 1949 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जोड़ने वाले दावों की प्रमाणिकता, 1964 में विश्व हिंदू परिषद निर्माण, मोरोपंत पिंगले और अन्य प्रचारकों की भूमिका, शाखा-तंत्र, यात्राओं और रामशिला अभियान की रसद-व्यवस्था, भाजपा से संबंध तथा लिब्रहान आयोग के निष्कर्षों को अलग-अलग प्रमाण-स्तर पर जांचा जाएगा।