अमित शाह और भाजपा का राष्ट्रीय विस्तार
संगठन, चुनावी रणनीति, गठबंधन और शासन में योगदान
लेखक: ओमकार चौधरी | OCN Network
अध्ययन की संदर्भ-तिथि: 27 अक्टूबर 2026। प्रत्येक चुनावी आँकड़े के साथ उसका चुनाव-वर्ष दिया गया है। तालिकाओं में चुनाव में जीती गई सीटें हैं; उन्हें आज की सदन-संख्या न माना जाए। जहाँ विलंबित मतदान या परिणाम का अंतर है, वहाँ अलग टिप्पणी दी गई है।

चित्र: प्रधानमंत्री कार्यालय/PIB, Wikimedia Commons; Government Open Data License–India के अंतर्गत श्रेय सहित पुनः उपयोग। मूल उपलब्ध चित्र लगभग 65 KB। चित्र और अनुमति का विवरण।
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1. प्रस्तावना: भाजपा के विस्तार में अमित शाह का स्थान
भारत की राजनीति में अमित शाह का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि वे भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और देश के गृह मंत्री रहे हैं। उनका विशेष स्थान उस संगठनात्मक परिवर्तन में है, जिसके दौरान भाजपा ने अपने पुराने प्रभाव-क्षेत्रों की सीमाएँ पार कीं, कमजोर राज्यों में प्रतिस्पर्धी ढाँचा खड़ा किया और कई जगह मुख्य विपक्ष से सत्तारूढ़ दल बनने की यात्रा पूरी की। नरेंद्र मोदी इस दौर के सबसे बड़े जनाकर्षक नेता रहे; शाह ने उस आकर्षण को स्थानीय उम्मीदवारों, सामाजिक समीकरणों, बूथ-व्यवस्था और गठबंधन की आवश्यकताओं से जोड़ने में प्रमुख भूमिका निभाई।
इस भूमिका को समझने के लिए केवल चुनावी विजय के बाद की तस्वीर पर्याप्त नहीं है। जिस राज्य में भाजपा पहले से मजबूत थी, वहाँ सरकार बचाना एक चुनौती थी। जिस राज्य में वह तीसरे या चौथे स्थान पर थी, वहाँ मुख्य प्रतिद्वंद्वी बनना दूसरी चुनौती थी। जहाँ अपने बूते बहुमत संभव नहीं था, वहाँ विश्वसनीय सहयोगियों के साथ सत्ता का विकल्प बनाना तीसरी चुनौती थी। शाह के राजनीतिक योगदान का अध्ययन इन अलग परिस्थितियों में अपनाई गई कार्यपद्धति से होना चाहिए।
इस अध्याय की केंद्रीय स्थापना है कि शाह भाजपा के राष्ट्रीय विस्तार के प्रमुख संगठनात्मक वास्तुकारों में रहे हैं। यह एक विश्लेषणात्मक निष्कर्ष है, किसी चुनाव में उनके कारण आए मतों की गणना नहीं। चुनाव में मतदाता अनेक कारणों से निर्णय करता है। इसलिए यहाँ परिणाम, प्रमाणित राजनीतिक भूमिका और लेखक का निष्कर्ष अलग-अलग पहचाने गए हैं।
“चाणक्य” उनकी लोकप्रिय राजनीतिक पहचान है। इस संबोधन की उपयोगिता तभी है जब उसके पीछे निर्णय लेने की क्षमता, दीर्घकालीन तैयारी, सहयोगी चुनने की समझ, राजनीतिक अवसर पहचानने और कठिन मुकाबलों में संगठन सक्रिय करने के उदाहरण सामने रखे जाएँ। उपाधि को प्रमाण मानने के स्थान पर प्रमाणों से उस पहचान का मूल्यांकन करना इस अध्ययन का उद्देश्य है।
2. अध्ययन की पद्धति: सफलता को कैसे मापा गया है
इस अध्ययन में चार चीजें अलग रखी गई हैं: भाजपा की अपनी सीटें, उसके सहयोगियों की सीटें, चुनाव के बाद बनी सरकार और कार्यकाल के बीच बदली सरकार। गठबंधन की पूरी शक्ति को भाजपा की अपनी शक्ति बताने से उसका वास्तविक विस्तार समझ में नहीं आता। इसी तरह सबसे बड़ा दल बनना और सरकार बनाना भी हमेशा एक ही घटना नहीं होती।
भौगोलिक विस्तार की तुलना के लिए संबंधित राज्य में राष्ट्रीय विस्तार से पहले का उपयुक्त चुनाव आधार बनाया गया है। सभी राज्यों में विधानसभा चुनाव एक ही वर्ष नहीं हुए थे; इसलिए हर तालिका में वर्ष स्पष्ट है। विधानसभा की तुलना विधानसभा से और लोकसभा की तुलना लोकसभा से की गई है। अलग वर्षों के चुनिंदा राज्यों की सीटें जोड़कर उसे किसी एक वर्ष का अखिल भारतीय आँकड़ा नहीं बताया गया है।
मत प्रतिशत से आशय संबंधित चुनाव में पूरे राज्य में पार्टी के हिस्से आए मतों का प्रकाशित प्रतिशत है, जब तक किसी अन्य आधार का उल्लेख न हो। गठबंधन में कम सीटों पर लड़ने वाली पार्टी का राज्यव्यापी प्रतिशत कम दिख सकता है। इससे यह निष्कर्ष अपने आप नहीं निकलता कि उसका प्रत्येक क्षेत्र में समर्थन उतना ही कमजोर है। NOTA को शामिल करने या न करने और अंतिम सांख्यिकीय संशोधन से भी प्रतिशत के दशमलव बदल सकते हैं।
निर्वाचन आयोग के अभिलेख परिणामों का प्राथमिक आधार हैं। PRS Legislative Research के विधानसभा-प्रोफाइल तुलनात्मक आँकड़ों में सहायक हैं। पार्टी की सदस्यता अथवा संगठन-संख्या को पार्टी का दावा कहकर प्रस्तुत किया गया है। सरकारी उपलब्धियों के आँकड़ों में उनका प्रकाशन-दिन और सरकारी स्रोत बताया गया है। किसी रणनीति के प्रभाव को परिणाम से जोड़ना लेखक का आकलन है, जब तक उसके पक्ष में अलग सर्वेक्षण या प्रत्यक्ष साक्ष्य न हो।
स्रोत: निर्वाचन आयोग—सांख्यिकीय रिपोर्ट · PRS—राज्य विधानसभाओं के अध्ययन
3. गुजरात का अनुभव और राष्ट्रीय भूमिका की पृष्ठभूमि
शाह का राष्ट्रीय राजनीतिक उदय गुजरात में अर्जित संगठनात्मक और प्रशासनिक अनुभव की पृष्ठभूमि में हुआ। चुनावी कार्यकर्ता, विधायक और राज्य सरकार में जिम्मेदारियाँ निभाने वाले नेता के रूप में उन्होंने ऐसी राजनीति देखी जिसमें उम्मीदवार की स्थानीय पकड़, संगठन की सक्रियता और नेतृत्व के संदेश का तालमेल महत्वपूर्ण होता है। नरेंद्र मोदी के साथ लंबे समय का कार्य-संबंध राष्ट्रीय स्तर पर उनकी जिम्मेदारियों का महत्वपूर्ण आधार बना।
इस अनुभव का महत्व किसी एक गुजरात चुनाव का श्रेय तय करने में नहीं, बल्कि कार्यशैली की निरंतरता पहचानने में है। शाह की राजनीति में विवरण की माँग, क्षेत्रवार समीक्षा, जिम्मेदारी तय करना और संगठन को चुनाव के बीच के वर्षों में सक्रिय रखना बार-बार दिखाई देता है। राष्ट्रीय विस्तार में इसी शैली को कहीं प्रदेश के सामाजिक समूहों, कहीं गठबंधन और कहीं कमजोर सीटों की विशेष तैयारी से जोड़ा गया।
वर्ष 2013 में उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी उनके लिए निर्णायक राष्ट्रीय अवसर बनी। जुलाई 2014 में वे भाजपा अध्यक्ष नियुक्त हुए। जनवरी 2016 में पुनः अध्यक्ष चुने गए। जनवरी 2020 में जे.पी. नड्डा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने तक शाह ने पार्टी का नेतृत्व किया। 2019 में गृह मंत्री बनने के बाद सरकारी जिम्मेदारी जुड़ गई थी; इसलिए 2019–20 का समय दोनों भूमिकाओं का आंशिक संगम भी था। इसके बाद उनकी भूमिका को “राष्ट्रीय अध्यक्ष” के बजाय वरिष्ठ रणनीतिकार और केंद्रीय नेतृत्व के प्रमुख सदस्य के रूप में समझना चाहिए।
स्रोत: भाजपा—अमित शाह का परिचय · भाजपा—जे.पी. नड्डा का परिचय
4. उत्तर प्रदेश 2014: राष्ट्रीय उदय की निर्णायक प्रयोगशाला
उत्तर प्रदेश का महत्व केवल उसकी 80 लोकसभा सीटों में नहीं है। विभिन्न क्षेत्रों, जातीय समूहों, धार्मिक समुदायों और स्थानीय नेतृत्व वाला यह प्रदेश राष्ट्रीय दल की संगठनात्मक क्षमता की कठिन परीक्षा है। भाजपा यहाँ पहले भी सरकार चला चुकी थी, लेकिन 2009 में उसकी लोकसभा शक्ति केवल दस सीटों पर रह गई थी। 2014 में उसे 71 सीटें मिलीं; अपना दल की दो सीटों के साथ गठबंधन 73 तक पहुँचा।
इस परिवर्तन में मोदी के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी होने, तत्कालीन केंद्र सरकार के विरुद्ध माहौल और राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों का महत्व था। शाह का विशिष्ट योगदान उस अवसर को क्षेत्रवार तैयारी, सहयोगी दल, उम्मीदवार और बूथ-व्यवस्था से जोड़ने में देखा जाना चाहिए। लहर चुनाव का वातावरण बना सकती है; उसे हर निर्वाचन क्षेत्र में परिणाम में बदलने के लिए स्थानीय तंत्र चाहिए।
उत्तर प्रदेश का अनुभव शाह को राष्ट्रीय रणनीतिकार के रूप में स्थापित करने वाला मोड़ बना। प्रदेश की असाधारण सफलता ने यह संभावना दिखाई कि भाजपा अपने परंपरागत मतदाता से बाहर पहुँचकर व्यापक सामाजिक समर्थन जुटा सकती है। इसके बाद संगठनात्मक विस्तार केवल पार्टी कार्यालय खोलने की गतिविधि नहीं रहा; उसका अर्थ प्रत्येक क्षेत्र में मतदाता तक पहुँचने की क्षमता विकसित करना था।
2014 के परिणाम को स्थायी परिवर्तन सिद्ध करने के लिए अगली परीक्षाएँ जरूरी थीं। विधानसभा चुनाव में स्थानीय विधायकों का मूल्यांकन होता है; संसदीय चुनाव की लहर उसी रूप में मौजूद नहीं रहती। इसलिए 2017 और 2022 को साथ पढ़ना आवश्यक है।
| उत्तर प्रदेश—लोकसभा चुनाव | भाजपा की सीटें | राजनीतिक अर्थ |
|---|---|---|
| 2009 | 10 | सीमित संसदीय शक्ति |
| 2014 | 71 | असाधारण विस्तार; अपना दल सहित गठबंधन 73 |
| 2019 | 62 | सपा–बसपा गठबंधन के बीच मजबूत स्थिति |
| 2024 | 33 | महत्वपूर्ण गिरावट; पुनर्समीक्षा की आवश्यकता |
यह क्रम उत्थान के साथ सीमा भी बताता है। 2014 की सफलता को समझना जितना जरूरी है, 2024 की कमजोरी को दर्ज करना भी उतना ही जरूरी है। एक शोध-अध्याय की विश्वसनीयता पूरी श्रृंखला दिखाने से बनती है। स्रोत: निर्वाचन आयोग—लोकसभा चुनावों के अभिलेख · आकाशवाणी—2024 परिणाम विवरण
5. बूथ, सदस्यता और संगठन को चुनावी क्षमता में बदलना
शाह की संगठनात्मक पहचान का सबसे स्पष्ट तत्व बूथ पर जोर है। इसका अर्थ केवल मतदान के दिन कार्यकर्ता बैठाना नहीं है। सक्रिय बूथ-संरचना मतदाता-संपर्क, स्थानीय शिकायत, नए समर्थक, क्षेत्रीय मुद्दे और मतदान की तैयारी के बीच संबंध बनाती है। संगठन के ऊपर के स्तर को जमीनी स्थिति की जानकारी भी इसी से मिलती है।
जून 2016 की समकालीन रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश के लगभग 1.07 लाख बूथों पर कम-से-कम दस सदस्यों वाली समितियाँ बनने और लखनऊ से नियमित फोन-संपर्क द्वारा समीक्षा का उल्लेख था। यह उस समय की संगठनात्मक तैयारी का विवरण था, सभी बूथों पर समान प्रभावशीलता का स्वतंत्र प्रमाण नहीं। फिर भी इससे शाह के कार्यकाल में निगरानी और जिम्मेदारी को दिए गए महत्व का प्रत्यक्ष उदाहरण मिलता है। स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस, 10 जून 2016
अध्यक्षीय कार्यकाल में सदस्यता-अभियान भी प्रमुख रहा। भाजपा ने 2015 में अपनी सदस्यता ग्यारह करोड़ से अधिक होने का दावा किया। इसे सक्रिय कार्यकर्ताओं की संख्या नहीं माना जा सकता; सदस्य, नियमित कार्यकर्ता और प्रशिक्षित पदाधिकारी अलग श्रेणियाँ हैं। विस्तार की राजनीतिक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करती है कि नए सदस्य से संपर्क बना रहे और उसे स्थानीय काम में जिम्मेदारी मिले। स्रोत: भाजपा, सितंबर 2015 का संगठनात्मक विवरण
शाह के मॉडल को समझने का उपयोगी तरीका चार चरणों में है: संभावित समर्थक की पहचान, उससे नियमित संपर्क, स्थानीय संगठन में भागीदारी और मतदान तक उसका संबंध बनाए रखना। यह कोई स्वचालित प्रक्रिया नहीं है। गलत उम्मीदवार, क्षेत्रीय असंतोष या मजबूत प्रतिद्वंद्वी होने पर व्यापक संगठन भी हार सकता है। फिर भी संगठन होने से पार्टी को पुनर्निर्माण के लिए आधार मिलता है।
कमजोर क्षेत्रों पर विशेष ध्यान इस मॉडल की दूसरी विशेषता है। राजनीतिक संसाधन सीमित होते हैं; हर सीट पर समान प्रयास का समान परिणाम नहीं मिलता। कमजोर सीट का कारण पहचानना—उम्मीदवार, सामाजिक पहुँच, स्थानीय नेतृत्व या कार्यकर्ता की कमी—सामान्य प्रचार से अलग काम है। शाह की रणनीति का विश्लेषण इसी स्तर पर अधिक उपयोगी होता है।
6. सामाजिक विस्तार: पुराने समर्थन से बाहर नए समूह
भाजपा को केवल परंपरागत शहरी और ऊँची जातियों के मतदाताओं की पार्टी बने रहने से बाहर निकालना राष्ट्रीय विस्तार की आवश्यकता थी। उत्तर प्रदेश में गैर-यादव पिछड़े और गैर-जाटव दलित समुदायों तक पहुँच, हरियाणा में व्यापक गैर-जाट समर्थन और पूर्वोत्तर में स्थानीय समुदायों तथा जनजातीय नेतृत्व के साथ संबंध इस प्रक्रिया के अलग रूप हैं।
इसका अर्थ जातीय पहचान का अंत नहीं था। कई जगह भाजपा ने उन समुदायों की राजनीतिक आकांक्षाओं को स्थान दिया जिन्हें किसी प्रमुख क्षेत्रीय दल की सामाजिक संरचना में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दिखता था। टिकट, संगठनात्मक पद, स्थानीय नेतृत्व और मुद्दों के चयन ने इस पहुँच को आकार दिया।
कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों से संपर्क ने एक और आधार जोड़ा। राशन, आवास, रसोई गैस और अन्य सुविधाओं से जुड़े परिवारों तक राजनीतिक संदेश पहुँचाना जाति से अलग अनुभव पर संवाद का अवसर देता था। लेकिन लाभ लेने वाले सभी मतदाताओं ने एक ही पार्टी को वोट दिया, ऐसा मानना गलत होगा। योजनाओं का लाभ और उसका चुनावी प्रभाव अलग प्रश्न हैं।
इन प्रक्रियाओं के संयुक्त प्रभाव को “सामाजिक गठबंधन” कहना अधिक सटीक है। इसमें जाति, वर्ग, क्षेत्र, पहचान, नेतृत्व और शासन-अनुभव एक साथ काम करते हैं। शाह की विशेषता इन तत्वों को प्रत्येक राज्य की परिस्थिति में संयोजित करने की कोशिश थी। कोई एक सामाजिक समीकरण पूरे देश पर लागू नहीं किया गया।
7. उत्तर प्रदेश 2017 और 2022: समर्थन को टिकाऊ आधार बनाने की परीक्षा
2017 में भाजपा को 312 विधानसभा सीटें और उसके तत्कालीन गठबंधन को 325 सीटें मिलीं। 2022 में भाजपा 255 और उसके सहयोगियों सहित गठबंधन 273 सीटों पर पहुँचा। भाजपा ने सरकार दोहराई, लेकिन उसकी अपनी सीटें कम हुईं। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी 47 से 111 सीटों पर पहुँची। बसपा 19 से एक और कांग्रेस सात से दो पर आई। स्रोत: PRS—उत्तर प्रदेश की 18वीं विधानसभा
| पार्टी | विधानसभा 2017 | विधानसभा 2022 | परिवर्तन |
|---|---|---|---|
| भाजपा | 312 | 255 | −57 |
| समाजवादी पार्टी | 47 | 111 | +64 |
| बसपा | 19 | 1 | −18 |
| कांग्रेस | 7 | 2 | −5 |
2022 की वापसी में योगी आदित्यनाथ के राज्य नेतृत्व, मोदी की लोकप्रियता, सरकारी योजनाओं और पार्टी संगठन के योगदान को साथ समझना चाहिए। शाह को इस व्यापक प्रयास का प्रमुख रणनीतिक सदस्य मानना उचित है; प्रदेश सरकार और स्थानीय नेतृत्व की भूमिका को उनके खाते में समाहित कर देना उचित नहीं होगा।
यहाँ एक महत्वपूर्ण विश्लेषण निकलता है। भाजपा की अपनी सीटें घटीं, फिर भी सरकार बनी रही। सपा की सीटें बढ़ीं, फिर भी बहुमत नहीं मिला। कांग्रेस और बसपा कमजोर हुईं, लेकिन उनका पूरा नुकसान भाजपा को नहीं मिला। इसलिए विपक्ष का संकुचन एक समान प्रक्रिया नहीं था; प्रतिस्पर्धा का स्वरूप भी बदला।
निर्वाचन आयोग के सांख्यिकीय संकलन में 2022 में भाजपा का राज्यव्यापी मत लगभग 41.29 प्रतिशत और सपा का लगभग 32.06 प्रतिशत दर्ज है। मत-वृद्धि, मतों का क्षेत्रीय वितरण और सीटों में उसका रूपांतरण अलग-अलग देखना इस अध्ययन का आवश्यक हिस्सा है। स्रोत: निर्वाचन आयोग—Electoral Statistics, तालिका 10.4(B)
8. असम: सहयोगी और स्थानीय नेतृत्व से नई सत्ता का रास्ता
असम की यात्रा राष्ट्रीय विस्तार का महत्वपूर्ण उदाहरण है। 2011 में भाजपा के पाँच और कांग्रेस के 78 विधायक चुने गए थे। 2016 में भाजपा 60 और कांग्रेस 26 पर पहुँची। असम गण परिषद की 14 और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट की 12 सीटों ने भाजपा-नेतृत्व वाले गठबंधन को स्पष्ट बहुमत दिया।
यह अकेले भाजपा को बड़ा बनाने की रणनीति नहीं थी। असमिया क्षेत्रीय राजनीति, बोडो क्षेत्र की आवश्यकताओं और कांग्रेस-विरोधी समर्थन को साझा व्यवस्था में स्थान मिला। सर्वानंद सोनोवाल का स्थानीय नेतृत्व और हिमंत बिस्व सरमा की संगठनात्मक तथा राजनीतिक क्षमता इस प्रक्रिया के आवश्यक हिस्से थे। समकालीन अध्ययन ने AGP और BPF से समझौते को विशेष महत्व दिया। स्रोत: IPCS—Verdict 2016: Assam · असम के मुख्य निर्वाचन अधिकारी—2016 के विस्तृत परिणाम
शाह के योगदान का सही अर्थ यह है कि राष्ट्रीय नेतृत्व ने स्थानीय क्षमता के साथ गठबंधन को राजनीतिक साधन बनाया। यह मानना कि दिल्ली ने अकेले पूरे राज्य की सामाजिक परिस्थिति बदल दी, प्रदेश नेतृत्व और दीर्घकालीन संगठनात्मक काम को कम करके देखना होगा। इसके विपरीत, केवल स्थानीय कारण बताने से राष्ट्रीय स्तर पर समझौते और संसाधन जुटाने की भूमिका छूट जाएगी।
2021 में भाजपा ने फिर 60 सीटें जीतीं। 2026 में यह संख्या 82 हुई। 2026 के प्रकाशित परिणामों में उसका राज्यव्यापी मत 37.81 प्रतिशत बताया गया। कांग्रेस के लिए उसी चुनाव में 29.84 प्रतिशत मत और 19 सीटें दर्ज हुईं। यह आँकड़ा बताता है कि पर्याप्त मत होने के बावजूद सीटें कम हो सकती हैं; गठबंधन, मतों का वितरण और जीत का अंतर महत्वपूर्ण होते हैं। स्रोत: इकोनॉमिक टाइम्स, 5 मई 2026—निर्वाचन आयोग के आँकड़ों पर रिपोर्ट
| असम—विधानसभा | भाजपा | कांग्रेस |
|---|---|---|
| 2011 | 5 | 78 |
| 2016 | 60 | 26 |
| 2021 | 60 | 29 |
| 2026 | 82 | 19 |
असम का निष्कर्ष तीन स्तरों पर है: कमजोर पार्टी का सत्ता तक पहुँचना, सत्ता में रहते हुए आधार बनाए रखना और बाद में अपनी शक्ति बढ़ाना। इनमें शाह के अध्यक्षीय दौर की शुरुआत और बाद के नेतृत्व में निरंतरता अलग चरण हैं।
9. त्रिपुरा: लगभग शून्य से वामपंथ का विकल्प
त्रिपुरा में भाजपा का उभार इसलिए अलग महत्व रखता है कि वहाँ उसकी प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस की सरकार नहीं, लंबे समय से स्थापित वाम शासन था। 2013 में भाजपा कोई विधानसभा सीट नहीं जीत सकी थी। 2018 में उसने स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया और माणिक सरकार के नेतृत्व वाले वाम शासन का अंत हुआ। शुरुआती 59 सीटों की गणना में भाजपा 35 पर थी; चरिलाम का विलंबित चुनाव जीतने के बाद पूरे चुनाव की उसकी जीतें 36 हुईं। सहयोगी IPFT ने आठ सीटें जीतीं।
यहाँ कमजोर कांग्रेस की राजनीतिक जगह पर कब्जा करने और वाम सरकार को चुनौती देने की प्रक्रियाएँ साथ चलीं। आदिवासी क्षेत्रों में साझेदारी, सरकारी कर्मचारियों की अपेक्षाएँ, युवाओं के अवसर और स्थानीय नेतृत्व के निर्माण को साझा अभियान में स्थान मिला। भाजपा ने केवल सरकार-विरोधी भावनाओं की प्रतीक्षा नहीं की; सत्ता का विकल्प उपलब्ध होने का विश्वास भी बनाना पड़ा।
शाह के अध्यक्षीय दौर का यह परिणाम संगठनात्मक निवेश की दीर्घकालीन उपयोगिता दिखाता है। इसके साथ सुनील देवधर, बिप्लब कुमार देब और प्रदेश के कार्यकर्ताओं का काम भी शामिल था। “शून्य से सरकार” का संक्षिप्त वाक्य तभी सार्थक है जब उसके भीतर इन स्तरों का श्रम पहचाना जाए। 2023 में भाजपा ने 32 सीटें जीतकर सत्ता बनाए रखी; मुख्यमंत्री परिवर्तन के बाद भी संगठन और गठबंधन ने निरंतरता दी।
स्रोत: निर्वाचन आयोग—त्रिपुरा के चुनावी अभिलेख · इंडिया टुडे नॉर्थ ईस्ट, 15 मार्च 2018—चरिलाम परिणाम
10. पूर्वोत्तर के अन्य राज्य: अपनी शक्ति और गठबंधन की पहुँच
पूर्वोत्तर को एक ही राजनीतिक इकाई मानना भूल होगी। असम का आकार, त्रिपुरा की प्रतिस्पर्धा, नागालैंड का क्षेत्रीय नेतृत्व, मेघालय की बहुदलीय व्यवस्था और अरुणाचल की राजनीतिक संरचना अलग हैं। भाजपा की रणनीति का महत्व इस विविधता के अनुसार साधन बदलने में था।
मणिपुर 2017 में कांग्रेस 28 और भाजपा 21 सीटें जीतकर आई थी। भाजपा ने सहयोगी समर्थन जुटाकर सरकार बनाई। मेघालय 2018 में कांग्रेस 21 सीटों के साथ सबसे बड़ा दल थी, जबकि भाजपा के पास केवल दो सीटें थीं; सरकार NPP के नेतृत्व वाले गठबंधन की बनी और भाजपा उसमें शामिल हुई। इन परिणामों को भाजपा का अपने बूते जनादेश कहना गलत होगा, लेकिन राजनीतिक साझेदारी की क्षमता के उदाहरण के रूप में उनका महत्व स्पष्ट है।
अरुणाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार से भाजपा की सत्ता तक पहुँचना केवल एक सामान्य चुनावी पलटाव नहीं था। उसमें दलगत पुनर्संयोजन का चरण भी था। बाद के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने अपनी स्थिति को जनादेश से पुष्ट किया। नागालैंड में क्षेत्रीय सहयोगी नेतृत्व के साथ काम करना राज्य के राजनीतिक संदर्भ का हिस्सा रहा।
इसलिए पूर्वोत्तर के विस्तार में दो उपलब्धियाँ अलग हैं: अपनी पार्टी के लिए मत और सीटें बढ़ाना; तथा सीमित सीटों के बावजूद क्षेत्रीय सरकारों के साथ राजनीतिक साझेदारी बनाना। दूसरी उपलब्धि को पहली का विकल्प या प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए। दोनों की अपनी राजनीतिक उपयोगिता है। स्रोत: निर्वाचन आयोग—राज्यवार अभिलेख
11. ओडिशा: क्षेत्रीय प्रभुत्व के बीच नया विकल्प
ओडिशा में भाजपा 2014 में दस विधानसभा सीटों पर थी। 2019 में वह 23 और 2024 में 78 सीटों पर पहुँची। यह अपने दम पर पहली सरकार बनाने का परिणाम था। 2024 में बीजद को 51 और कांग्रेस को 14 सीटें मिलीं। बीजद की 2014 की 117 सीटों से तुलना करें तो लंबे समय में सत्ता-संतुलन का परिवर्तन स्पष्ट होता है। स्रोत: PRS—ओडिशा की 17वीं विधानसभा
ओडिशा की विशेषता यह थी कि राष्ट्रीय राजनीति में केंद्र के कुछ प्रस्तावों को समर्थन देने वाला क्षेत्रीय दल राज्य में भाजपा का प्रतिद्वंद्वी था। इससे संबंध दो स्तरों पर चलते थे। संगठन का विस्तार करते समय भाजपा को स्वतंत्र विकल्प बनना था, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर संवाद भी बना रहा। इस जटिलता को केवल व्यक्तिगत शत्रुता या मित्रता से नहीं समझा जा सकता।
2024 के अभियान में ओड़िया पहचान, प्रशासनिक पहुँच, जगन्नाथ मंदिर और शासन-परिवर्तन के प्रश्न प्रमुख रहे। मोदी के राष्ट्रीय नेतृत्व को स्थानीय आकांक्षाओं से जोड़ा गया। शाह की केंद्रीय भूमिका के साथ धर्मेंद्र प्रधान और प्रदेश नेतृत्व का योगदान भी महत्वपूर्ण था। किसी एक नेता की भूमिका को सामने लाने के लिए दूसरे स्तरों का काम हटाने की आवश्यकता नहीं है।
यह जीत कांग्रेस के संकुचन की सीधी कहानी भी नहीं थी। कांग्रेस की सीटें 2019 से 2024 के बीच नौ से चौदह हुईं, फिर भी भाजपा सरकार में आई। मुख्य सत्ता-परिवर्तन बीजद से भाजपा की ओर था। इस प्रकार भाजपा का विस्तार और कांग्रेस की गिरावट हर राज्य में एक ही अनुपात से नहीं चले।
12. पश्चिम बंगाल: मुख्य विपक्ष से सत्ता तक लंबी यात्रा
बंगाल में भाजपा का अध्ययन केवल 2026 के परिणाम से शुरू करने पर उसकी संगठनात्मक यात्रा छूट जाती है। 2016 में पार्टी के तीन विधायक थे। 2019 के लोकसभा चुनाव में उसने 18 सीटें जीतीं। 2021 में विधानसभा की मुख्य मतगणना में उसे 77 सीटें मिलीं, लेकिन सरकार तृणमूल की बनी। 2024 लोकसभा में भाजपा 12 सीटों पर आ गई। 2026 में भाजपा पहली बार राज्य में सरकार बनाने में सफल हुई।
यह सीधी रेखा में चढ़ता ग्राफ नहीं था। 2021 और 2024 के परिणामों ने उसकी सीमा भी दिखाई। शाह के योगदान का महत्वपूर्ण पक्ष हार के बाद राज्य को दीर्घकालीन प्राथमिकता में बनाए रखना था। क्षेत्रीय नेतृत्व, संगठनात्मक पुनर्निर्माण और स्थानीय मुद्दों के साथ राष्ट्रीय संदेश का तालमेल यहाँ लगातार चुनौती रहा।
2026 की मुख्य मतगणना में 293 सीटों के परिणाम आए और भाजपा की 207 जीतें दर्ज हुईं। फलता में पुनर्मतदान बाद में हुआ। 24 मई को वहाँ भाजपा की जीत भी जुड़ी। इस प्रकार पूरे चुनाव की निर्वाचन-क्षेत्रवार जीतें 208 हुईं; दो सीट जीतने वाले सदस्य के इस्तीफे अथवा बाद के उपचुनाव से किसी दिन की सदन-संख्या अलग हो सकती है। इस अध्याय में “पूरे चुनाव में जीती सीट” और “वर्तमान विधायक” को अलग रखा गया है। स्रोत: आकाशवाणी, 24 मई 2026—फलता परिणाम · ANI का परिणाम-विवरण, 24 मई 2026
बंगाल के परिवर्तन की व्याख्या केवल रैली की भीड़ से नहीं हो सकती। प्रमुख विपक्ष बनना, स्थानीय असंतोष को राजनीतिक विकल्प देना और पराजय के बाद कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखना अलग क्षमताएँ हैं। शाह के मूल्यांकन में इन्हीं प्रक्रियाओं के प्रत्यक्ष प्रमाण महत्वपूर्ण हैं। साथ ही मतदाता-सूची और चुनाव-प्रक्रिया पर उठे विवादों को उनके संबंधित आधिकारिक या न्यायिक निष्कर्ष के साथ ही अंतिम तथ्य माना जाना चाहिए; किसी पक्ष का आरोप स्वयं निष्कर्ष नहीं है।
13. हरियाणा: पहली सरकार से लगातार तीसरे कार्यकाल तक
हरियाणा में 2009 में भाजपा चार सीटों पर थी। 2014 में 47 सीटें जीतकर उसने पहली बार अपने बूते सरकार बनाई। 2019 में वह 40 पर आई और गठबंधन से सरकार बनी। 2024 में उसे 48 सीटें मिलीं और अपने दम पर बहुमत लौटा। इस यात्रा में संगठन, नेतृत्व का चयन और सामाजिक समर्थन का विस्तार तीनों दिखाई देते हैं।
2024 में मनोहर लाल की जगह नायब सिंह सैनी के नेतृत्व में चुनाव लड़ना महत्वपूर्ण राजनीतिक निर्णय था। शाह और केंद्रीय नेतृत्व की भूमिका को इस बदलाव, उम्मीदवारों के चयन और व्यापक गैर-जाट समर्थन के प्रयास में परखा जाना चाहिए। परंतु राज्य सरकार के निर्णय, सैनी की व्यक्तिगत पहुँच और स्थानीय कार्यकर्ताओं की सक्रियता भी परिणाम के अंग थे।
| हरियाणा—विधानसभा | भाजपा | कांग्रेस |
|---|---|---|
| 2009 | 4 | 40 |
| 2014 | 47 | 15 |
| 2019 | 40 | 31 |
| 2024 | 48 | 37 |
2019 से 2024 की तुलना में भाजपा और कांग्रेस दोनों की सीटें बढ़ीं। जजपा दस से शून्य पर आई। भाजपा की जीत के साथ कांग्रेस की सीटें भी बढ़ सकती हैं—यह तथ्य “हर चुनाव में विपक्ष का जनाधार लगातार घटा” वाली सरल धारणा को सुधारता है। स्रोत: PRS—हरियाणा की 15वीं विधानसभा
2024 में भाजपा का मत लगभग 39.94 प्रतिशत और कांग्रेस का 39.09 प्रतिशत था। इस निकट मत-अंतर के बीच सीटों का अंतर ग्यारह था। परिणाम का महत्व भाजपा की तीसरी सरकार में है, लेकिन मतों में कांग्रेस की प्रतिस्पर्धी स्थिति भी रिकॉर्ड का हिस्सा है। स्रोत: ADR—हरियाणा 2024 मत प्रतिशत एवं विजय-अंतर अध्ययन
14. मध्य प्रदेश: पुराना गढ़, हार और व्यापक वापसी
मध्य प्रदेश को भाजपा की नई खोज कहना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा। यहाँ पार्टी शाह के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से पहले ही मजबूत थी। इसलिए उनके योगदान का प्रश्न नया आधार बनाने के साथ पुराने आधार को पुनर्गठित करने और कठिन परिस्थितियों में परिणाम निकालने का है।
2018 में कांग्रेस को 114 और भाजपा को 109 सीटें मिलीं। कांग्रेस सरकार बनी। 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया और समर्थक विधायकों से जुड़े घटनाक्रम के बाद सरकार गिरी और भाजपा सत्ता में लौटी। यह 2018 के चुनाव में भाजपा की विजय नहीं थी। 2023 में भाजपा को 163 और कांग्रेस को 66 सीटें मिलीं; यह अलग, प्रत्यक्ष चुनावी जनादेश था। स्रोत: PRS—मध्य प्रदेश की 16वीं विधानसभा
2023 की तैयारी में कमजोर सीटों की पहचान, अपेक्षाकृत पहले उम्मीदवार घोषित करना और अनुभवी केंद्रीय नेताओं को मैदान में उतारना उल्लेखनीय था। शिवराज सिंह चौहान की लाड़ली बहना योजना और राज्य में लंबे संगठनात्मक काम को भी उसी परिप्रेक्ष्य में देखना होगा। शाह की शैली को स्थानीय सरकार, कल्याण और केंद्रीय प्रचार के समन्वय के रूप में समझना अधिक उपयोगी है।
2018 की हार से 2023 की जीत तक केवल समय नहीं बदला; सत्ता की परिस्थितियाँ और नेतृत्व-संयोजन भी बदले। इसीलिए “हार से सीखना” शोध का स्वतंत्र विषय है। यदि हर पराजय के बाद संगठन जस का तस बना रहे, तो शुरुआती सफलता टिकाऊ संस्था नहीं बन पाती। भाजपा की वापसी का अध्ययन उसके परिवर्तनों से होना चाहिए।
15. राजस्थान और छत्तीसगढ़: सत्ता वापसी के दो अलग उदाहरण
राजस्थान 2023 में भाजपा को मुख्य गणना में 115 और कांग्रेस को 69 सीटें मिलीं। 2018 में कांग्रेस 100 और भाजपा 73 पर थी। राजस्थान में सत्ता बदलने की पुरानी प्रवृत्ति, स्थानीय नेतृत्व और कांग्रेस के अंदरूनी मतभेद महत्वपूर्ण संदर्भ थे। केंद्रीय नेतृत्व ने किसी एक मुख्यमंत्री प्रत्याशी के बजाय साझा चुनावी अभियान और मोदी के नेतृत्व को आगे रखा।
यहाँ मत प्रतिशत का अंतर खास तौर पर ध्यान देने योग्य है। कांग्रेस का राज्यव्यापी मत 2018 के लगभग 39.30 से 2023 में 39.53 प्रतिशत हुआ, फिर भी उसकी सीटें कम हुईं। भाजपा का मत लगभग 38.77 से 41.69 प्रतिशत हुआ। इसका अर्थ है कि कांग्रेस की सत्ता-हानि को केवल उसके मतदाताओं के बड़े पैमाने पर छिटकने से नहीं समझा जा सकता। भाजपा ने अपनी बढ़त और मतों के वितरण को अधिक सीटों में बदला। 2023 का मुख्य परिणाम 199 निर्वाचन क्षेत्रों का था; बाद के करणपुर परिणाम को उसी तारीख की संख्या में नहीं मिलाया गया है। स्रोत: निर्वाचन आयोग—राजस्थान 2023, दलों का प्रदर्शन
छत्तीसगढ़ में 2018 में कांग्रेस 68 और भाजपा 15 सीटों पर थी। 2023 में भाजपा 54 और कांग्रेस 35 पर पहुँची। भाजपा की वापसी के लिए स्थानीय मुद्दे, जनजातीय क्षेत्रों की प्रतिस्पर्धा, उम्मीदवार और केंद्रीय अभियान को साथ देखना होगा। स्रोत: PRS—छत्तीसगढ़ की छठी विधानसभा
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का मत लगभग 43.04 से 42.23 प्रतिशत हुआ—एक प्रतिशत अंक से भी कम कमी। सीटें 33 घटीं। भाजपा का 2023 मत 46.27 प्रतिशत था। इतने छोटे मत-क्षरण के साथ बड़ी सीट-हानि बताती है कि दूसरे दलों की कमजोरी, मतों का पुनर्संयोजन और निकट मुकाबले भी परिणाम बदलते हैं। स्रोत: निर्वाचन आयोग—छत्तीसगढ़ 2023, दलों का प्रदर्शन
इन दोनों राज्यों का संयुक्त निष्कर्ष शाह की भूमिका को कमजोर नहीं करता, बल्कि अधिक सटीक बनाता है। चुनावी रणनीति का महत्व केवल प्रतिद्वंद्वी के मत घटाने में नहीं; अपने समर्थन को इस तरह व्यवस्थित करने में भी है कि सीटों की अधिकतम संभावना बने।
16. महाराष्ट्र: गठबंधन में कनिष्ठ स्थान से प्रमुख शक्ति तक
महाराष्ट्र में भाजपा का परिवर्तन एक अलग प्रकार का विस्तार है। पहले वह शिवसेना के साथ लंबे समय से सहयोगी थी। 2014 में भाजपा ने 122 सीटें जीतकर अपनी स्वतंत्र शक्ति दिखाई। 2019 में भाजपा को 105 सीटें मिलीं, लेकिन शिवसेना के साथ चुनावी बहुमत होने के बावजूद दोनों ने मिलकर सरकार नहीं बनाई। इसलिए इसे सफल गठबंधन-प्रबंधन का निर्विवाद उदाहरण नहीं कहा जा सकता।
इसके बाद राज्य में दलगत विभाजन और सत्ता-पुनर्संयोजन हुए। उन घटनाओं का संवैधानिक और राजनीतिक इतिहास चुनाव-परिणाम से अलग विषय है। 2024 में भाजपा को 132, एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना को 57 और अजित पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को 41 सीटें मिलीं। इन तीन प्रमुख घटकों का योग 230 था। कांग्रेस 16, शिवसेना उद्धव बालासाहेब ठाकरे 20 और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी शरदचंद्र पवार दस सीटों पर रही। स्रोत: PRS—महाराष्ट्र की 15वीं विधानसभा
शाह की भूमिका उम्मीदवारों, सीट-बँटवारे, सहयोगी संबंधों और केंद्रीय संसाधनों के समन्वय में देखी जानी चाहिए। देवेंद्र फडणवीस, एकनाथ शिंदे और अजित पवार की अलग राजनीतिक क्षमताएँ भी परिणाम का हिस्सा थीं। शिवसेना अथवा राष्ट्रवादी कांग्रेस के पुराने संयुक्त आँकड़े की तुलना विभाजन के बाद के केवल एक गुट से करना गलत निष्कर्ष देगा।
महाराष्ट्र बताता है कि भाजपा का विस्तार कभी क्षेत्रीय दल को हटाकर और कभी उसके एक हिस्से के साथ साझेदारी करके हुआ। इसे केवल जनाधार के स्थानांतरण की कहानी कहना अधूरा होगा; संगठनात्मक शक्ति, नेतृत्व-विभाजन और सरकार में साझेदारी की प्रक्रियाएँ भी शामिल थीं।
17. बिहार और आंध्र प्रदेश: सहयोगी को स्थान देना भी रणनीति
बिहार में भाजपा और जनता दल यूनाइटेड के संबंधों में सहयोग और अलगाव दोनों रहे हैं। 2015 की पराजय को दर्ज किए बिना बाद के परिणामों की व्याख्या अधूरी होगी। 2020 में भाजपा ने 74 और जदयू ने 43 सीटें जीतीं; सरकार राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की बनी। 2025 में भाजपा 89, जदयू 85 और गठबंधन 202 सीटों पर पहुँचा। राजद 75 से 25 और कांग्रेस 19 से छह पर आई। स्रोत: PRS—बिहार की 18वीं विधानसभा
इस परिणाम में नीतीश कुमार का नेतृत्व, सहयोगियों का सामाजिक आधार और सीटों का वितरण केंद्रीय थे। शाह के योगदान को गठबंधन के साझा उद्देश्य और भाजपा की भूमिका को संगत बनाने में समझना चाहिए। प्रत्येक सफल गठबंधन में सहयोगी की शक्ति स्वीकार करना पड़ता है। केवल अपनी सीटों का अधिकतम दावा करके साझा बहुमत नहीं बनता।
आंध्र प्रदेश 2024 में तेलुगु देशम पार्टी, जनसेना और भाजपा का गठबंधन इसी सिद्धांत का दूसरा उदाहरण है। भाजपा राज्य की सबसे बड़ी पार्टी नहीं थी। चंद्रबाबू नायडू और पवन कल्याण की स्थानीय भूमिका निर्णायक थी। राष्ट्रीय नेतृत्व का महत्व साझा समझौते और राष्ट्रीय गठबंधन को पुनर्गठित करने में था।
| आंध्र प्रदेश—विधानसभा 2024 | सीटें |
|---|---|
| तेलुगु देशम पार्टी | 135 |
| जनसेना | 21 |
| भाजपा | 8 |
| YSR कांग्रेस | 11 |
यह परिणाम दिखाता है कि भाजपा को आठ सीटें मिलने पर भी गठबंधन 164 सीटों तक पहुँच सकता है। इसे भाजपा की 164 सीटें कहना गलत होगा। राष्ट्रीय राजनीति के लिए महत्व यह भी था कि लोकसभा में टीडीपी की 16 सीटें तीसरी मोदी सरकार के गठबंधन आधार का महत्वपूर्ण हिस्सा बनीं। स्रोत: निर्वाचन आयोग—2024 परिणाम अभिलेख · PIB—लोकसभा 2024 का दलवार विवरण
18. गुजरात, उत्तराखंड, दिल्ली और दक्षिण की अलग परिस्थितियाँ
गुजरात पहले से भाजपा का गढ़ था। शाह की भूमिका को वहाँ “भाजपा की स्थापना” कहना गलत होगा। कठिन चुनाव में संगठन बनाए रखना और बाद में विस्तार करना प्रासंगिक प्रश्न हैं। 2017 में भाजपा 99 सीटों पर रही; 2022 में 156 पर पहुँची। कांग्रेस 77 से 17 पर आई। 2022 में आम आदमी पार्टी की उपस्थिति ने प्रतिस्पर्धा का स्वरूप भी बदला। इसे केवल कांग्रेस से भाजपा के बीच सीधा मत-स्थानांतरण नहीं माना जा सकता।
उत्तराखंड में भाजपा ने 2017 में 57 और 2022 में 47 सीटें जीतीं। सरकार दोहराना उपलब्धि थी, लेकिन सीटों की कमी भी दर्ज होनी चाहिए। हिमाचल में 2017 की भाजपा जीत के बाद 2022 में कांग्रेस की वापसी हुई। दोनों पड़ोसी राज्यों को एक समान विजय-कथा में समेटना तथ्य के अनुकूल नहीं है। स्रोत: निर्वाचन आयोग—राज्य विधानसभा रिपोर्ट
दिल्ली में 2015 और 2020 की पराजयों के बाद 2025 में भाजपा ने 48 सीटें जीतीं; आम आदमी पार्टी 22 पर आई और कांग्रेस शून्य पर रही। यह सफलता कांग्रेस से सत्ता लेने की नहीं, आप को पराजित करने की थी। स्रोत: आकाशवाणी—9 फरवरी 2025 का समाचार-बुलेटिन
कर्नाटक भाजपा की दक्षिण भारत में पहले से स्थापित प्रमुख प्रयोगशाला रही। 2023 में कांग्रेस को 135 और भाजपा को 66 सीटें मिलीं। 2024 लोकसभा में भाजपा और जदएस का गठबंधन अलग परिस्थिति में लड़ा। तेलंगाना में भाजपा ने 2023 विधानसभा में आठ सीटें और 2024 लोकसभा में आठ सीटें जीतीं—दो अलग चुनाव, जिनकी सीटें जोड़ना अर्थहीन होगा।
केरल में 2024 लोकसभा की त्रिशूर सीट जीतना भाजपा का महत्वपूर्ण प्रवेश था। तमिलनाडु में उसी लोकसभा चुनाव में पार्टी सीट नहीं जीत सकी। इन उदाहरणों का उद्देश्य दक्षिण में विस्तार की कठिनाई समझना है; इन्हें 2026 विधानसभा के अंतिम आँकड़ों का विकल्प नहीं माना गया है। राज्यों की स्थानीय राजनीतिक परंपराएँ और गठबंधन राष्ट्रीय रणनीति की सीमा तथा संभावना दोनों तय करते हैं।
19. तीन मोदी सरकारें: शाह की भूमिका के तीन अलग चरण
| लोकसभा चुनाव | भाजपा | कांग्रेस | शाह के योगदान को समझने का संदर्भ |
|---|---|---|---|
| 2014 | 282 | 44 | उत्तर प्रदेश का अभियान और राष्ट्रीय विस्तार की शुरुआत |
| 2019 | 303 | 52 | राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में संगठन और गठबंधन का नेतृत्व |
| 2024 | 240 | 99 | वरिष्ठ रणनीतिक भूमिका; सहयोगियों के बहुमत का बढ़ा महत्व |
स्रोत: निर्वाचन आयोग—लोकसभा सांख्यिकीय रिपोर्ट · 2019 का अंतिम दलवार परिणाम · PIB—2024 परिणाम सारणी
2014 में मोदी ने भाजपा को स्पष्ट राष्ट्रीय नेतृत्व दिया। शाह की उत्तर प्रदेश में जिम्मेदारी का प्रभाव राष्ट्रीय बहुमत के लिए विशेष महत्व रखता था। लेकिन वे उस चुनाव के पहले पूरे राष्ट्रीय संगठन के अध्यक्ष नहीं थे। इस अंतर को मिटाने से वास्तविक योगदान के बजाय अतिरंजना पैदा होगी।
2019 में परिस्थिति अलग थी। पार्टी उनके अध्यक्षीय नेतृत्व में पाँच वर्षों का संगठनात्मक विस्तार लेकर चुनाव में गई। नए राज्यों में प्रतिस्पर्धा, सहयोगियों के साथ समायोजन और मजबूत क्षेत्रों को बनाए रखने की जिम्मेदारी राष्ट्रीय संगठन पर थी। यह उनके प्रत्यक्ष संस्थागत नेतृत्व का सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय चुनाव था।
2024 में भाजपा अकेले बहुमत से नीचे आई। मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने, लेकिन उसके लिए सहयोगियों का समर्थन अनिवार्य था। टीडीपी और जदयू सहित विभिन्न दलों का साझा बहुमत इस सरकार का आधार बना। शाह के योगदान का मूल्यांकन यहाँ चुनाव से पहले के गठबंधन और परिणाम के बाद साझा राजनीतिक व्यवस्था में उनकी प्रमाणित भूमिका से होना चाहिए। बंद कमरों की हर वार्ता का श्रेय बिना दस्तावेज किसी एक व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता।
इन तीन चरणों से निष्कर्ष निकलता है कि मोदी–शाह साझेदारी की उपयोगिता भूमिकाओं के पूरक होने में रही। मोदी राष्ट्रीय नेतृत्व और संदेश के प्रमुख केंद्र रहे; शाह संगठन, राजनीतिक वार्ता और चुनावी तैयारी के प्रमुख स्तंभों में रहे। यह कार्य-विभाजन पूर्ण या स्थिर नहीं था, लेकिन साझेदारी को समझने का उपयोगी आधार है।
20. कांग्रेस का संकुचन: लंबा इतिहास और शाह-काल का प्रभाव
कांग्रेस की कमजोरी का पूरा इतिहास 2014 से शुरू नहीं होता। उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में उसका प्रभुत्व बहुत पहले कमजोर हो चुका था। कई राज्यों में मंडल राजनीति, क्षेत्रीय नेतृत्व, वाम दलों और सामाजिक आधार के बदलाव ने उसे चुनौती दी थी। इस पूर्व इतिहास को शाह की राष्ट्रीय भूमिका का परिणाम नहीं कहा जा सकता।
इसके बाद का प्रश्न अधिक विशिष्ट है: भाजपा ने किन राज्यों में कांग्रेस की कमजोरी को अपने विस्तार में बदला? असम और हरियाणा जैसे राज्यों में उसने सत्ता तथा अपना आधार दोनों बढ़ाया। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में प्रतिस्पर्धा मुख्यतः दोनों राष्ट्रीय दलों की रही। मणिपुर और मेघालय में कांग्रेस सबसे बड़ा दल होकर भी सरकार नहीं बना सकी। अरुणाचल और मध्य प्रदेश के बीच-कार्यकाल परिवर्तनों की प्रकृति अलग थी।
सत्ता जाने से संगठन के लिए अवसर और संसाधन कम हो सकते हैं, लेकिन सत्ता-हानि को सामाजिक समर्थन के पूर्ण अंत के बराबर नहीं माना जाना चाहिए। कांग्रेस ने विभिन्न चुनावों में कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल में वापसी भी की। 2024 की 99 लोकसभा सीटें भी उसके राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व में सुधार दिखाती हैं। इसलिए शाह की भूमिका को कांग्रेस की प्रत्येक कमजोरी का सार्वभौमिक कारण बनाने के बजाय विशिष्ट राज्यों और घटनाओं में परखना अधिक प्रभावी होगा।
चयनित राज्यों में कांग्रेस की सीट-हानि
| राज्य | पहले का चुनाव और कांग्रेस सीटें | सत्ता-हानि वाला चुनाव और सीटें | परिवर्तन का स्वरूप |
|---|---|---|---|
| हरियाणा | 2009: 40 | 2014: 15 | भाजपा को अपना बहुमत |
| महाराष्ट्र | 2009: 82 | 2014: 42 | कांग्रेस–राकांपा सत्ता का अंत |
| झारखंड | 2009: 14 | 2014: 6 | कांग्रेस-सहभागिता वाली सरकार का अंत; कांग्रेस का मुख्यमंत्री नहीं था |
| असम | 2011: 78 | 2016: 26 | भाजपा-नेतृत्व वाला गठबंधन सत्ता में |
| उत्तराखंड | 2012: 32 | 2017: 11 | भाजपा का स्पष्ट बहुमत |
| हिमाचल प्रदेश | 2012: 36 | 2017: 21 | भाजपा सरकार; 2022 में कांग्रेस की वापसी |
| मणिपुर | 2012: 42 | 2017: 28 | सबसे बड़ा दल होने पर भी सरकार नहीं बनी |
| मेघालय | 2013: 29 | 2018: 21 | सबसे बड़ा दल होने पर भी गठबंधन सत्ता से बाहर |
| राजस्थान | 2018: 100 | 2023 मुख्य गणना: 69 | भाजपा का बहुमत |
| छत्तीसगढ़ | 2018: 68 | 2023: 35 | भाजपा की सत्ता में वापसी |
तालिका अलग-अलग वर्षों के दस राज्य-अध्ययनों की है। मणिपुर और मेघालय हटाने पर शेष आठ पंक्तियों का जोड़ 450 से 225 तथा सभी दस का 521 से 274 बनता है। यह गणित सही है, लेकिन इसे “एक ही अवधि में पूरे देश में कांग्रेस आधी हो गई” नहीं लिखा जा सकता। झारखंड को “कांग्रेस मुख्यमंत्री की सरकार” कहना भी गलत होगा। परिणाम के वर्ष और सत्ता की प्रकृति सहित प्रस्तुत करने पर ही यह तुलना उपयोगी है। आधार: निर्वाचन आयोग—संबंधित राज्य चुनावों की सांख्यिकीय रिपोर्ट
इस अध्ययन का अधिक महत्वपूर्ण निष्कर्ष कुल जोड़ नहीं, प्रत्येक राज्य की प्रक्रिया है। कहीं सीधे मतदाता का समर्थन बदला, कहीं सहयोगी बदले, कहीं दूसरे दल की सीटें घटने से मुकाबला दोध्रुवीय हुआ और कहीं नेतृत्व-संकट ने प्रभाव डाला। शाह की राजनीतिक दक्षता इन परिस्थितियों को पहचानने और भाजपा के लिए अवसर बनाने में दिखाई देती है।
21. क्षेत्रीय दलों का परिवर्तन: पराजय, साझेदारी और पुनर्संयोजन
क्षेत्रीय दलों को एक ही श्रेणी में रखना विश्लेषण को कमजोर करेगा। बीजद, तृणमूल, सपा, बसपा, जदयू, टीडीपी और शिवसेना की राजनीतिक स्थितियाँ अलग हैं। कुछ भाजपा के सीधे प्रतिद्वंद्वी रहे, कुछ सहयोगी और कुछ अलग समय पर दोनों भूमिकाओं में रहे।
ओडिशा में सत्ता बीजद से भाजपा की ओर गई। बंगाल में तृणमूल के प्रभुत्व को चुनौती देकर भाजपा सत्ता तक पहुँची। दिल्ली में आप पराजित हुई। उत्तर प्रदेश में बसपा कमजोर हुई, लेकिन सपा 2022 विधानसभा और 2024 लोकसभा में मजबूत हुई। बिहार में भाजपा के विस्तार के साथ जदयू साझेदार बना रहा। आंध्र प्रदेश में टीडीपी और जनसेना की मजबूती भाजपा के राष्ट्रीय गठबंधन के लिए उपयोगी बनी।
महाराष्ट्र में क्षेत्रीय दलों के विभाजन ने नाम और राजनीतिक विरासत की तुलना को जटिल बनाया। पुराने एकीकृत दल की कुल सीट और बाद के किसी एक गुट की सीट के बीच सीधी रेखा खींचना मतदाताओं की वास्तविक दिशा नहीं बताता। दोनों गुटों, गठबंधन और चुनाव के प्रकार को साथ देखना होगा।
इसलिए शाह के योगदान का व्यापक वर्णन यह है कि उन्होंने भाजपा की क्षमता को दो दिशाओं में बढ़ाने में भूमिका निभाई: प्रतिद्वंद्वी की जगह अपना विकल्प बनाना और उपयोगी क्षेत्रीय शक्तियों को राष्ट्रीय गठबंधन में स्थान देना। क्षेत्रीय दल का अंत हर जगह उनका लक्ष्य या परिणाम नहीं था। अनेक राज्यों में सहयोग उस विस्तार का माध्यम था।
22. गृह मंत्री के रूप में भूमिका: राजनीतिक संकल्प को संस्थागत निर्णय में बदलना

चित्र: गृह मंत्रालय/PIB, भारत सरकार; Wikimedia Commons पर GODL–India के अंतर्गत उपलब्ध। मूल उपलब्ध चित्र लगभग 226 KB। चित्र, स्रोत और अनुमति।
चुनाव जीतना और सरकार में नीति को लागू करना अलग क्षमताएँ हैं। गृह मंत्री के रूप में शाह का महत्व ऐसे राजनीतिक और विधायी विषयों की जिम्मेदारी लेने में रहा जिन पर भाजपा का लंबे समय से घोषित दृष्टिकोण था। संसद में विधेयक प्रस्तुत करना, बहस का नेतृत्व करना, मंत्रालयों और राज्यों से समन्वय और कार्यान्वयन की तैयारी सरकारी भूमिका के अलग चरण हैं।
अनुच्छेद 370 के विशेष संवैधानिक प्रबंधों में 2019 का परिवर्तन और जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन इस कार्यकाल का प्रमुख मोड़ था। शाह ने इसकी संसदीय प्रक्रिया का नेतृत्व किया। इसे केवल एक साधारण विधेयक के रूप में गिनना सही नहीं है; राष्ट्रपति आदेशों, प्रस्ताव और पुनर्गठन कानून की अलग प्रकृति थी। राजनीतिक महत्व भाजपा के लंबे समय से घोषित विषय को सरकारी निर्णय में बदलने का था। स्रोत: PIB—5 अगस्त 2019 के निर्णय का आधिकारिक संदर्भ
नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 और 11 मार्च 2024 को उसके नियमों की अधिसूचना दूसरी प्रमुख प्रक्रिया थी। कानून बनना और उसके आवेदन की व्यवस्था लागू होना अलग तारीखें थीं। संबंधित तीन देशों से आए निर्धारित छह धार्मिक समुदायों के पात्र लोगों के लिए नागरिकता का विशेष मार्ग इसका विषय था। इसे देश में सभी के लिए सामान्य नागरिकता कानून का स्थानापन्न नहीं समझा जाना चाहिए। स्रोत: गृह मंत्रालय—वर्षांत समीक्षा 2024
UAPA संशोधन 2019 ने व्यक्तियों को भी आतंकवादी के रूप में नामित करने का प्रावधान जोड़ा। NIA संशोधन ने एजेंसी के कानूनी दायरे में बदलाव किया। ऐसे प्रावधानों का मूल्यांकन वैधानिक अधिकार मिलने और उनके वास्तविक उपयोग के परिणाम—दोनों से होना चाहिए। स्रोत: PIB—UAPA संशोधन पर संसदीय विवरण, 2 अगस्त 2019
प्रमुख विधायी पड़ाव
| वर्ष | प्रमुख निर्णय/कानून | अध्ययन में महत्व |
|---|---|---|
| 2019 | अनुच्छेद 370 संबंधी संवैधानिक प्रक्रिया और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन | लंबे राजनीतिक एजेंडे का संस्थागत क्रियान्वयन |
| 2019 | नागरिकता संशोधन अधिनियम | नागरिकता के विशेष प्रावधान |
| 2019 | UAPA और NIA संशोधन | आतंकवाद-विरोधी कानूनी ढाँचा |
| 2022 | दंड प्रक्रिया (पहचान) अधिनियम | जाँच में पहचान-संबंधी व्यवस्था |
| 2023 | दिल्ली सेवाओं से संबंधित संशोधन | केंद्र–दिल्ली प्रशासनिक व्यवस्था |
| 2023–24 | तीन नए आपराधिक कानून; प्रमुख प्रावधान 1 जुलाई 2024 से लागू | आपराधिक न्याय व्यवस्था का पुनर्गठन |
| 2024 | CAA नियमों की अधिसूचना | कानून के आवेदन की प्रक्रिया |
यह चयनित सूची है, सभी गृह-मंत्रालयीय कानूनों की अंतिम गणना नहीं। “बीस” या “पच्चीस” बड़े कानून जैसी संख्या बिना स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है।
23. नए आपराधिक कानून: विधायी परिवर्तन से आगे कार्यान्वयन की परीक्षा
भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 में पारित हुए और उनके प्रमुख प्रावधान 1 जुलाई 2024 से लागू किए गए। उन्होंने क्रमशः भारतीय दंड संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता और पुराने साक्ष्य कानून का स्थान लिया। सरकार ने इन्हें न्याय, तकनीक और पीड़ित की आवश्यकताओं के अनुकूल बदलाव के रूप में प्रस्तुत किया। स्रोत: PIB—तीन नए कानूनों पर गृह मंत्री का विवरण
शाह की भूमिका यहाँ केवल संसद में भाषण तक सीमित नहीं थी। इतने बड़े बदलाव के लिए पुलिस, अभियोजन, फोरेंसिक क्षमता और न्यायिक प्रक्रियाओं की तैयारी जरूरी थी। नागरिक को परिवर्तन का लाभ तभी मिलता है जब शिकायत दर्ज कराने से साक्ष्य-संग्रह और मुकदमे तक व्यवस्था काम करे। कानून का नाम बदलना, प्रक्रिया बदलना और न्याय मिलने में वास्तविक सुधार—ये तीन अलग स्तर हैं।
इसलिए अध्याय में उपलब्धि को व्यापक कानूनी ढाँचा बदलने और उसके कार्यान्वयन की जिम्मेदारी लेने के रूप में रखा गया है। “सभी मुकदमों में निश्चित अवधि में न्याय मिलने लगा” जैसा निष्कर्ष देशव्यापी परिणामों के बिना नहीं दिया गया है। प्रशिक्षण, तकनीक और संसाधन पर आगे का मूल्यांकन इस योगदान की स्थायित्व-परीक्षा होगा।
24. पूर्वोत्तर में संवाद, समझौते और आंतरिक सुरक्षा
पूर्वोत्तर में सरकारी योगदान को चुनावी विस्तार से जोड़ते समय दोनों को मिलाना नहीं चाहिए। शांति-समझौते नागरिकों और क्षेत्र के लिए होते हैं; उनका मूल्यांकन पुनर्वास, हिंसा में कमी और विश्वास बहाली से होना चाहिए। चुनाव में उनका राजनीतिक प्रभाव अलग अध्ययन का विषय है।
शाह के गृह मंत्री कार्यकाल में संवाद और समझौतों का कई महत्वपूर्ण मामलों में उपयोग हुआ। इनमें ब्रू–रियांग पुनर्वास, बोडो समझौता, कार्बी आंगलोंग और असम–मेघालय सीमा के कुछ विवादित क्षेत्रों पर समझौता शामिल हैं।
| समझौता/प्रक्रिया | तारीख | मुख्य विषय |
|---|---|---|
| ब्रू–रियांग समझौता | 16 जनवरी 2020 | विस्थापित परिवारों का पुनर्वास |
| बोडो समझौता | 27 जनवरी 2020 | राजनीतिक समाधान और शांति-प्रक्रिया |
| कार्बी आंगलोंग समझौता | 4 सितंबर 2021 | सशस्त्र समूहों को मुख्यधारा में लाना |
| असम–मेघालय सीमा समझौता | 29 मार्च 2022 | बारह में छह विवाद-क्षेत्रों पर सहमति |
स्रोत: PIB—असम–मेघालय समझौते का आधिकारिक विवरण, 29 मार्च 2022
जून 2026 के सरकारी विवरण में बारह से अधिक शांति-समझौतों और 10,800 से अधिक युवाओं के हथियार छोड़कर मुख्यधारा में आने का उल्लेख था। यह पूरे बताए गए सरकारी काल का संयुक्त आँकड़ा है; इसे केवल शाह के पद सँभालने के बाद की संख्या नहीं कहा गया है। स्रोत: PIB—पूर्वोत्तर परिषद की बैठक, 4 जून 2026
इस क्षेत्र में शाह के योगदान की प्रमुख विशेषता सुरक्षा और वार्ता को एक साथ साधने का प्रयास है। समझौते पर हस्ताक्षर आरंभिक उपलब्धि है; उसके बाद भूमि, पुनर्वास, प्रशासनिक अधिकार और स्थानीय विश्वास के प्रश्न बने रहते हैं। किसी एक समझौते से पूरे पूर्वोत्तर के सभी विवाद समाप्त मानना सही नहीं है। मणिपुर की जातीय हिंसा और 13 फरवरी 2025 को राष्ट्रपति शासन लगना इस क्षेत्र के शासन-मूल्यांकन की गंभीर कसौटी रहा। स्रोत: PIB—मणिपुर पर संसदीय वक्तव्य, अप्रैल 2025
25. वामपंथी उग्रवाद: समन्वित सुरक्षा-अभियान और विकास
वामपंथी उग्रवाद से निपटना लंबी प्रक्रिया थी, जिसकी संस्थागत नींव शाह के गृह मंत्री बनने से पहले भी मौजूद थी। 2015 की राष्ट्रीय नीति और कार्ययोजना का उल्लेख सरकार ने अपने मूल्यांकन में किया है। शाह के कार्यकाल का प्रश्न उस नीति के समन्वय, निगरानी और अभियान की तीव्रता में उनके नेतृत्व का है।
29 जुलाई 2026 को राज्यसभा में दिए सरकारी उत्तर के अनुसार प्रभावित जिलों की आधिकारिक श्रेणी में संख्या 2018 के 90, 2021 के 70 और अप्रैल 2024 के 38 से घटकर मार्च–अप्रैल 2026 में शून्य हुई। उसी उत्तर में 37 जिलों को “Legacy & Thrust” और एक को “District of Concern” श्रेणी में रखकर सुरक्षा तथा विकास-सहायता जारी रखने की आवश्यकता बताई गई। यह आधिकारिक वर्गीकरण है; इसका अर्थ भविष्य में हिंसा या पुनर्गठन का जोखिम बिल्कुल समाप्त होना नहीं है। स्रोत: गृह मंत्रालय का राज्यसभा उत्तर, PIB, 29 जुलाई 2026
राजनीतिक नेतृत्व की उपयोगिता केंद्र और राज्यों के सुरक्षा तंत्र, खुफिया सहयोग तथा विकास कार्यक्रमों को साझा प्राथमिकता देने में थी। लेकिन अभियान में सुरक्षा बलों, राज्य पुलिस, स्थानीय प्रशासन और प्रभावित समुदायों के योगदान को अलग पहचान मिलनी चाहिए। राष्ट्रीय परिणाम को किसी अकेले व्यक्ति की कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत करना संस्थागत श्रम को छिपाएगा।
आगे की सफलता की कसौटी नागरिक जीवन का सामान्य होना, शिक्षा और स्वास्थ्य की पहुँच, आजीविका तथा स्थानीय प्रशासन में विश्वास है। सुरक्षा उपलब्धि को स्थायी शांति में बदलना सरकार की निरंतर जिम्मेदारी है।
26. साइबर सुरक्षा और सहकारिता: भूमिका का विस्तृत दायरा
डिजिटल अपराधों के बढ़ने के साथ गृह मंत्रालय की जिम्मेदारियों में साइबर समन्वय का महत्व बढ़ा। भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र, राष्ट्रीय रिपोर्टिंग व्यवस्था और 1930 हेल्पलाइन जैसे तंत्र राज्यों, वित्तीय संस्थानों और जाँच एजेंसियों के बीच काम करते हैं। शाह ने इनकी समीक्षा और पुलिस क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया। इन व्यवस्थाओं की उपयोगिता नागरिक की शिकायत पर समय रहते कार्रवाई और धन-प्रवाह रोकने में है। सभी दर्ज शिकायतों को सुलझा हुआ प्रकरण नहीं माना जा सकता। स्रोत: PIB—साइबर धोखाधड़ी सम्मेलन, 10 फरवरी 2026
6 जुलाई 2021 को अलग सहकारिता मंत्रालय बना और शाह को उसकी जिम्मेदारी मिली। इसका उद्देश्य सहकारी संस्थाओं, खासकर ग्रामीण आर्थिक ढाँचे, के लिए नीतिगत समन्वय बढ़ाना था। स्रोत: सहकारिता मंत्रालय—स्थापना और नीति सम्मेलन का विवरण
PACS के कंप्यूटरीकरण का कार्यक्रम इसका प्रमुख उदाहरण है। जुलाई 2026 के सरकारी विवरण के अनुसार आरंभिक 63,000 की स्वीकृति का दायरा बढ़ाकर 79,630 PACS किया गया था। स्वीकृत संख्या को पूरा हो चुका कंप्यूटरीकरण नहीं माना गया है। कार्यान्वयन का मूल्यांकन सक्रिय संस्थाओं, खातों की पारदर्शिता और सदस्यों को मिले लाभ से होना चाहिए। स्रोत: PIB—PACS Digital Automation Framework, 29 जुलाई 2026
सहकारिता और चुनावी संगठन दोनों में स्थानीय नेटवर्क महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन सहकारी संस्था की सार्वजनिक भूमिका को पार्टी संगठन के बराबर नहीं रखा जाना चाहिए। शासन में योगदान का प्रश्न संस्थागत क्षमता और सदस्य के हित का है।
27. शाह की रणनीति से निकलने वाले प्रमुख सूत्र
विभिन्न राज्यों से कोई एक अपरिवर्तनीय फार्मूला नहीं निकलता। एक ऐसी कार्यशैली दिखाई देती है जिसमें राष्ट्रीय लक्ष्य के भीतर राज्य की परिस्थिति के अनुसार साधन बदले जाते हैं।
पहला, राजनीतिक संभावना को संगठन में बदलने की तैयारी। लोकप्रिय नेता का समर्थन तभी अधिक व्यापक परिणाम देता है जब स्थानीय स्तर पर उम्मीदवार, संपर्क और कार्यकर्ता उपलब्ध हों।
दूसरा, सामाजिक प्रतिनिधित्व का विस्तार। परंपरागत समर्थक पर्याप्त न हों तो नए समुदायों को नेतृत्व और राजनीतिक हिस्सेदारी देने की आवश्यकता होती है। यह केवल भाषण की भाषा बदलने से संभव नहीं होता।
तीसरा, कमजोर क्षेत्रों में दीर्घकालीन निवेश। जो राज्य आज सरकार नहीं दे रहा, वह भविष्य में प्रमुख राजनीतिक आधार बन सकता है। असम, त्रिपुरा, ओडिशा और बंगाल की यात्राएँ इस संभावना के अलग उदाहरण हैं।
चौथा, सहयोगियों के लिए राजनीतिक स्थान। हर राज्य में भाजपा का मुख्यमंत्री होना और राष्ट्रीय गठबंधन का विस्तार दो अलग लक्ष्य हैं। जहाँ सहयोग आवश्यक है, वहाँ साझा हित को स्वीकार करना पड़ता है।
पाँचवाँ, निर्णय लेने का जोखिम। उम्मीदवार, नेतृत्व या गठबंधन में परिवर्तन का लाभ निश्चित नहीं होता, लेकिन आवश्यक निर्णय टालने से संगठन जड़ हो सकता है। निर्णय की सफलता उसके बाद के प्रमाण से तय होगी।
छठा, पराजय के बाद काम जारी रखना। किसी हार को अस्थायी कहना पर्याप्त नहीं; संगठन में क्या बदला, यह दिखना चाहिए। वापसी होने पर भी हर बार वही पुरानी रणनीति सफल हुई, ऐसा नहीं मानना चाहिए।
सातवाँ, सरकार में घोषित प्राथमिकता को कार्यान्वयन तक ले जाना। चुनावी घोषणा और प्रशासनिक उपलब्धि के बीच विधायिका, मंत्रालय, राज्य और स्थानीय संस्थाओं का लंबा मार्ग होता है। शाह का व्यापक मूल्यांकन इसी पूरे मार्ग से होगा।
28. पराजय और सीमाएँ: शोध का आवश्यक परीक्षण
दिल्ली 2015 और 2020, बिहार 2015, तीन हिंदी राज्यों में 2018 के परिणाम, बंगाल 2021 तथा 2024 के कुछ प्रमुख राज्यों के लोकसभा परिणाम इस धारणा को गलत ठहराते हैं कि कोई रणनीति अजेय होती है। ये उदाहरण अध्याय की केंद्रीय स्थापना के विरुद्ध कृत्रिम प्रतिवाद नहीं, उसी कार्यशैली की वास्तविक परीक्षाएँ हैं।
मजबूत संगठन के बावजूद स्थानीय असंतोष, प्रभावी विपक्ष, उम्मीदवार या गठबंधन का गलत आकलन और मतदाता की प्राथमिकताएँ परिणाम बदल सकती हैं। भाजपा ने कुछ जगह हार के बाद वापसी की, कुछ जगह संगठनात्मक विस्तार के बावजूद अपेक्षित सफलता नहीं मिली। दोनों स्थितियों को दर्ज करना आवश्यक है।
इसी तरह सरकारी पद का महत्व व्यक्तिगत अधिकारों की सीमा मिटा नहीं देता। ED, CBI, आयकर और NIA अलग प्रशासनिक ढाँचों में हैं। राजनीतिक नेताओं के विरुद्ध किसी कार्रवाई को केवल उस अवधि में शाह के गृह मंत्री होने से उनकी व्यक्तिगत चुनावी रणनीति का परिणाम नहीं माना गया है। मूल संग्रह में एजेंसियों से जुड़ी चर्चा थी; वह स्वतंत्र, प्रकरणवार प्रमाण माँगती है और इस अध्याय की चुनावी स्थापना का आधार नहीं बनाई गई है।
अध्ययन की सबसे बड़ी सीमा कारणों की सटीक हिस्सेदारी तय करने में है। किसी चुनाव में मोदी की लोकप्रियता, शाह की रणनीति, मुख्यमंत्री का काम, संघ का नेटवर्क, उम्मीदवार और विपक्ष की कमजोरी को अलग-अलग प्रतिशत में बाँटने का विश्वसनीय आधार उपलब्ध नहीं है। इसलिए अध्याय योगदान और भूमिका का मूल्यांकन करता है, व्यक्तिगत मत-उत्पादन का दावा नहीं।
29. निष्कर्ष: उपलब्धि का केंद्रीय अर्थ
अमित शाह का योगदान केवल जीते गए चुनावों की संख्या से नहीं मापा जा सकता। उनकी विशिष्टता उस राजनीतिक क्षमता के विकास में है जिसके सहारे भाजपा ने अपने स्थापित क्षेत्रों को बनाए रखने के साथ नई जमीन पर संगठन बनाया, सामाजिक समूहों तक पहुँच बढ़ाई और सहयोगियों के माध्यम से राष्ट्रीय प्रभाव विस्तृत किया।
उत्तर प्रदेश ने उनके राष्ट्रीय उदय का आधार दिया। असम ने सहयोगी और स्थानीय नेतृत्व के महत्व को सामने रखा। त्रिपुरा ने कमजोर शुरुआत से सत्ता तक पहुँचने की संभावना दिखाई। ओडिशा और बंगाल ने लंबे समय से स्थापित क्षेत्रीय प्रभुत्व के बीच विकल्प निर्माण का उदाहरण दिया। हरियाणा, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र ने वापसी, नेतृत्व-निर्णय और पुनर्संयोजन की अलग क्षमताएँ सामने रखीं।
इस विस्तार के दौरान कांग्रेस ने कई सत्ता-केंद्र खोए और कुछ क्षेत्रीय दल कमजोर हुए। लेकिन यह परिवर्तन हर जगह समान नहीं था। कहीं कांग्रेस वापस आई, कहीं मजबूत क्षेत्रीय सहयोगी भाजपा के लिए उपयोगी बना और कहीं भाजपा की अपनी सीटें घटीं। इसलिए राजनीतिक भूगोल के परिवर्तन को समझने के लिए पूरी चुनावी श्रृंखला आवश्यक है।
नरेंद्र मोदी की तीन सरकारों में शाह की भूमिका भी एक जैसी नहीं थी: पहले उत्तर प्रदेश के प्रमुख अभियानकर्ता, फिर राष्ट्रीय अध्यक्ष और फिर वरिष्ठ रणनीतिकार तथा गृह मंत्री। इसी क्रम से उनके योगदान का वास्तविक विस्तार सामने आता है।
सरकार में उनका महत्व बड़े संवैधानिक एवं विधायी निर्णयों, आंतरिक सुरक्षा के समन्वय, पूर्वोत्तर के समझौतों और नई संस्थागत प्राथमिकताओं में दिखाई देता है। इन उपलब्धियों की स्थायित्व-परीक्षा कानून के क्रियान्वयन, नागरिक सुरक्षा, संस्थागत क्षमता और सार्वजनिक लाभ से होगी।
इस अध्ययन का निष्कर्ष है कि अमित शाह भाजपा के राष्ट्रीय विस्तार और मोदी-काल की राजनीतिक व्यवस्था के प्रमुख निर्माताओं में हैं। “चाणक्य” कहे जाने का वास्तविक आधार जादुई अजेयता नहीं, संगठन, सामाजिक प्रतिनिधित्व, गठबंधन और निर्णय को एक संयुक्त राजनीतिक प्रयास में बदलने की उनकी क्षमता है।
परिशिष्ट 1. राज्यवार तुलनात्मक संदर्भ-सारणी
इस सारणी में चुने हुए चुनावी पड़ाव हैं। “बाद का पड़ाव” प्रत्येक राज्य का अक्टूबर 2026 का नवीनतम चुनाव नहीं है; उद्देश्य अलग प्रकार के विस्तार और सीमाओं को एक साथ देखना है। सभी संख्याएँ भाजपा की अपनी हैं, गठबंधन की नहीं।
| राज्य/क्षेत्र | आरंभिक संदर्भ: भाजपा सीटें | बाद का संदर्भ: भाजपा सीटें | मुख्य राजनीतिक अर्थ |
|---|---|---|---|
| उत्तर प्रदेश—लोकसभा | 2009: 10 | 2014: 71; 2024: 33 | राष्ट्रीय उभार तथा बाद की सीमा |
| उत्तर प्रदेश—विधानसभा | 2012: 47 | 2017: 312; 2022: 255 | बड़ा सामाजिक विस्तार, फिर सरकार की वापसी |
| असम—विधानसभा | 2011: 5 | 2016: 60; 2026: 82 | नए क्षेत्र में सत्ता और आधार की वृद्धि |
| त्रिपुरा—विधानसभा | 2013: 0 | 2018: 36*; 2023: 32 | वाम शासन का विकल्प |
| ओडिशा—विधानसभा | 2014: 10 | 2019: 23; 2024: 78 | मुख्य विपक्ष से पहली अपनी सरकार |
| पश्चिम बंगाल—विधानसभा | 2016: 3 | 2021: 77*; 2026: 208* | लंबा विस्तार; बीच में हार भी |
| हरियाणा—विधानसभा | 2009: 4 | 2014: 47; 2024: 48 | पहली अपनी सरकार से तीसरे कार्यकाल तक |
| महाराष्ट्र—विधानसभा | 2014: 122 | 2019: 105; 2024: 132 | सहयोगी से प्रमुख शक्ति |
| मध्य प्रदेश—विधानसभा | 2018: 109 | 2023: 163 | चुनावी वापसी; पहले से मजबूत संगठन |
| छत्तीसगढ़—विधानसभा | 2018: 15 | 2023: 54 | कांग्रेस से सत्ता वापस |
| राजस्थान—विधानसभा | 2018: 73 | 2023 मुख्य गणना: 115 | सत्ता वापसी |
| गुजरात—विधानसभा | 2017: 99 | 2022: 156 | पुराने गढ़ में रिकॉर्ड बहुमत |
| उत्तराखंड—विधानसभा | 2017: 57 | 2022: 47 | सीटें कम, सरकार बरकरार |
| हिमाचल—विधानसभा | 2017: 44 | 2022: 25 | सत्ता-हानि |
| बिहार—विधानसभा | 2020: 74 | 2025: 89 | गठबंधन के भीतर अपनी शक्ति बढ़ी |
| दिल्ली—विधानसभा | 2020: 8 | 2025: 48 | आप से सत्ता प्राप्त |
| आंध्र प्रदेश—विधानसभा | 2019: 0 | 2024: 8 | टीडीपी–जनसेना के साथ साझेदारी |
| कर्नाटक—विधानसभा | 2018: 104 | 2023: 66 | मजबूत राज्य में भी पराजय |
| तेलंगाना—लोकसभा | 2019: 4 | 2024: 8 | संसदीय आधार का विस्तार |
| केरल—लोकसभा | 2019: 0 | 2024: 1 | पहला संसदीय प्रवेश |
*त्रिपुरा 2018 में शुरुआती गणना 35, चरिलाम का परिणाम जुड़ने पर 36। बंगाल 2021 में शुरुआती 292 सीटों की गणना का भाजपा आँकड़ा 77 था; विलंबित चुनाव और बाद की सदन-संख्या अलग हैं। बंगाल 2026 में मुख्य गणना 207, फलता सहित पूरे चुनाव की निर्वाचन-क्षेत्रवार जीतें 208। दो सीट जीतने वाले सदस्य के एक सीट छोड़ने को चुनाव में जीती सीटों से न मिलाएँ।
स्रोत-आधार: निर्वाचन आयोग के संबंधित लोकसभा/विधानसभा अभिलेख; ऊपर उद्धृत PRS विधानसभा-प्रोफाइल; त्रिपुरा और फलता के विलंबित परिणामों की दिनांकित रिपोर्ट। यह सारणी अलग चुनावों का विवरण है; इसका स्तंभवार राष्ट्रीय योग नहीं निकाला गया है।
परिशिष्ट 2. सीट और जनाधार: पाँच महत्वपूर्ण उदाहरण
| राज्य और तुलना | कांग्रेस का मत प्रतिशत | कांग्रेस की सीटें | क्या समझ आता है |
|---|---|---|---|
| राजस्थान, 2018 → 2023 मुख्य गणना | 39.30 → 39.53 | 100 → 69 | मत लगभग कायम/थोड़ा बढ़ा, सीटें घटीं |
| छत्तीसगढ़, 2018 → 2023 | 43.04 → 42.23 | 68 → 35 | छोटी मत-कमी, बड़ी सीट-हानि |
| हरियाणा, 2019 → 2024 | 28.08 → 39.09 | 31 → 37 | कांग्रेस बढ़ी, भाजपा फिर भी जीती |
| असम, 2021 → 2026 | 29.67 → 29.84 | 29 → 19 | मत लगभग स्थिर, सीटें कम |
| उत्तर प्रदेश, विधानसभा 2017 → 2022 | सपा सीट-तुलना अलग उदाहरण | सपा: 47 → 111 | भाजपा की सरकार लौटी, मुख्य विपक्ष भी बढ़ा |
अंतिम पंक्ति कांग्रेस की नहीं, विपक्ष की बदलती संरचना समझाने के लिए सपा की है। मत प्रतिशत पूरे राज्य का है; उसे लड़ी गई सीटों के औसत मत प्रतिशत से न मिलाएँ।
राजस्थान 2023: निर्वाचन आयोग · छत्तीसगढ़ 2023: निर्वाचन आयोग · हरियाणा 2024: ADR · असम 2026: आयोग के आँकड़ों पर रिपोर्ट
परिशिष्ट 3. पाँच प्रकार की राजनीतिक सफलता
| श्रेणी | उदाहरण | सही वर्णन |
|---|---|---|
| पहली बार अपनी सरकार | हरियाणा 2014, ओडिशा 2024 | भाजपा की अपनी विधानसभा शक्ति का निर्णायक विस्तार |
| पहली गठबंधन सरकार/नया क्षेत्र | असम 2016 | सहयोगियों और स्थानीय नेतृत्व से नया आधार |
| सत्ता में वापसी या निरंतरता | मध्य प्रदेश 2023, उत्तर प्रदेश 2022 | हार/सत्ता-विरोध के बाद संगठन का उपयोग |
| चुनाव-बाद साझेदारी | मणिपुर 2017, मेघालय 2018 | सबसे अधिक सीटों से अलग सरकार बनाने की क्षमता |
| बीच-कार्यकाल सत्ता परिवर्तन | मध्य प्रदेश 2020 | चुनावी विजय से अलग राजनीतिक घटनाक्रम |
इस वर्गीकरण के बिना “कुल कितनी जीतें” का एक अंक भ्रामक हो सकता है। पुराने संग्रह में लगभग 35 और लगभग 42 की अलग गणनाएँ थीं। इस अध्याय में अस्पष्ट कुल के स्थान पर चुनाव, वर्ष और सफलता का स्वरूप दिया गया है।
परिशिष्ट 4. प्रमुख स्रोत और चित्र-अधिकार
चुनाव, संगठन और राजनीतिक भूमिका
1. निर्वाचन आयोग: पूर्ण सांख्यिकीय रिपोर्ट—चुनाव-वर्ष के मूल परिणाम; ऐतिहासिक संख्या का प्राथमिक आधार। 2. भाजपा: अमित शाह का परिचय—पार्टी द्वारा प्रकाशित पद और संगठनात्मक पृष्ठभूमि; आत्मविवरण को स्वतंत्र मूल्यांकन नहीं माना गया है। 3. भाजपा: जे.पी. नड्डा का परिचय—जनवरी 2020 में अध्यक्षीय परिवर्तन। 4. भाजपा: सितंबर 2015 का संगठनात्मक विवरण—सदस्यता का पार्टी-दावा। 5. इंडियन एक्सप्रेस: उत्तर प्रदेश बूथ-व्यवस्था, 10 जून 2016—समकालीन रिपोर्ट। 6. IPCS: Verdict 2016—Assam—गठबंधन और स्थानीय राजनीति का अध्ययन। 7. CEO Assam: 2016 के निर्वाचन-क्षेत्रवार परिणाम। 8. PRS: उत्तर प्रदेश की 18वीं विधानसभा। 9. PRS: ओडिशा की 17वीं विधानसभा। 10. PRS: हरियाणा की 15वीं विधानसभा। 11. PRS: मध्य प्रदेश की 16वीं विधानसभा। 12. PRS: छत्तीसगढ़ की छठी विधानसभा। 13. PRS: महाराष्ट्र की 15वीं विधानसभा। 14. PRS: बिहार की 18वीं विधानसभा। 15. निर्वाचन आयोग: राजस्थान 2023—दलों का प्रदर्शन। 16. निर्वाचन आयोग: छत्तीसगढ़ 2023—दलों का प्रदर्शन। 17. ADR: हरियाणा 2024—मत प्रतिशत और विजय-अंतर। 18. PIB/न्यू इंडिया समाचार: लोकसभा 2024 के दलवार परिणाम। 19. आकाशवाणी: दिल्ली 2025 का परिणाम, 9 फरवरी 2025। 20. इकोनॉमिक टाइम्स: असम 2026—आयोग के मत और सीट आँकड़े। 21. आकाशवाणी: फलता का विलंबित परिणाम, 24 मई 2026। 22. इंडिया टुडे नॉर्थ ईस्ट: चरिलाम परिणाम, 15 मार्च 2018।
शासन, कानून और संस्थागत योगदान
23. गृह मंत्रालय: वर्षांत समीक्षा 2024। 24. PIB: अनुच्छेद 370 के निर्णय का संदर्भ। 25. PIB: UAPA संशोधन पर संसदीय विवरण, 2 अगस्त 2019। 26. PIB: तीन नए आपराधिक कानूनों पर विवरण। 27. PIB: असम–मेघालय सीमा समझौता, 29 मार्च 2022। 28. PIB: पूर्वोत्तर परिषद, 4 जून 2026। 29. गृह मंत्रालय का राज्यसभा उत्तर: नक्सलवाद की स्थिति, 29 जुलाई 2026। 30. PIB: साइबर धोखाधड़ी पर सम्मेलन, 10 फरवरी 2026। 31. PIB: सहकारिता मंत्रालय की स्थापना और नीति-संदर्भ। 32. PIB: PACS Digital Automation Framework, 29 जुलाई 2026। 33. PIB: मणिपुर पर संसदीय वक्तव्य, अप्रैल 2025।
सरकारी विज्ञप्ति संबंधित सरकार का आधिकारिक विवरण है; उसका उद्धरण प्रत्येक राजनीतिक मूल्यांकन की स्वतंत्र पुष्टि नहीं है। संस्थागत परिणाम और राजनीतिक निष्कर्ष अध्याय में अलग रखे गए हैं।
चित्रों का श्रेय और उपयोग
34. अमित शाह—मंत्रिमंडल बैठक, 10 जून 2024 का चित्र। स्रोत: प्रधानमंत्री कार्यालय/PIB, भारत सरकार; GODL–India; उपलब्ध फाइल 66,670 बाइट। 35. गृह मंत्री का कार्यभार, 1 जून 2019 का चित्र। स्रोत: गृह मंत्रालय/PIB, भारत सरकार; GODL–India; उपलब्ध फाइल लगभग 226 KB।
ये सार्वजनिक डोमेन होने का दावा करके उपयोग नहीं किए गए हैं। ये खुले सरकारी लाइसेंस के अंतर्गत श्रेय सहित पुनः उपयोग योग्य चित्र हैं। फोटो में चेहरे या भाव परिवर्तित नहीं किए गए हैं। स्रोत और लाइसेंस का उल्लेख पुनर्प्रकाशन में भी बनाए रखें।
मूल शोध-संग्रह
अमित शाह और संबंधित राजनीतिक आँकड़ों पर मूल साझा शोध-बातचीत। मूल संग्रह सुरक्षित है; यह अध्याय उसका नए क्रम में तैयार संपादित अध्ययन है। पुरानी बातचीत के लगभग 35/42 चुनावी जीतों जैसे असंगत कुल को अंतिम आँकड़ा नहीं बनाया गया है।