अठारह चुनावों में उत्तर प्रदेश की सत्ता यात्रा
उत्तर प्रदेश के अगले विधानसभा चुनाव को समझने का रास्ता केवल आज के नेताओं और गठबंधनों से होकर नहीं गुजरता। इसके पीछे स्वतंत्र भारत के 18 विधानसभा चुनावों की यात्रा है, जिसमें कांग्रेस का एकछत्र प्रभुत्व, किसान राजनीति का उभार, गठबंधन सरकारों की अस्थिरता और लगातार पूर्ण बहुमत वाले जनादेश शामिल हैं। इस इतिहास की सबसे उपयोगी सीख यह है कि राज्य का मतदाता किसी दल को स्थायी मालिकाना अधिकार नहीं देता। वह सामाजिक प्रतिनिधित्व, नेतृत्व, संगठन और शासन के अपने मूल्यांकन के आधार पर सत्ता का संतुलन बदलता रहा है।
पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 430 में से 388 सीटें मिली थीं। गोविंद बल्लभ पंत के नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन से निकली राजनीतिक प्रतिष्ठा सरकार की सबसे बड़ी पूँजी थी। कांग्रेस के भीतर ही अलग सामाजिक समूहों और नेतृत्व धाराओं के लिए जगह थी। विपक्ष मौजूद था, लेकिन सत्ता का स्वाभाविक दावेदार नहीं बन पाया था। 1957 में कांग्रेस 286 और 1962 में 249 सीटों पर आई। वह बहुमत में बनी रही, पर उसके प्रभुत्व की चौड़ाई धीरे-धीरे घट रही थी।
इस दौर में मुख्यमंत्री बदलने के लिए हर बार चुनावी पराजय जरूरी नहीं थी। पंत के बाद सम्पूर्णानन्द और चन्द्रभानु गुप्त आए। सुचेता कृपलानी ने अक्टूबर 1963 में मुख्यमंत्री पद संभाला और देश की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। इससे सत्ता की दो अलग प्रक्रियाएँ दिखाई देती हैं। एक प्रक्रिया जनता के मतदान से सरकार चुनने की थी; दूसरी सत्तारूढ़ दल के भीतर नेतृत्व बदलने की। इसलिए मुख्यमंत्री कार्यकाल की सूची को चुनाव परिणामों की सूची समझना इतिहास को अधूरा पढ़ना होगा।
1967 निर्णायक मोड़ था। कांग्रेस 199 सीटों के साथ सबसे बड़ा दल रही, लेकिन बहुमत से दूर थी। पहले चन्द्रभानु गुप्त ने सरकार बनाई; फिर चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में संयुक्त विधायक दल की सरकार बनी। उत्तर प्रदेश में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार का गठन कांग्रेस की गिरती सीटों से अधिक व्यापक सामाजिक बदलाव का संकेत था। किसान नेतृत्व, क्षेत्रीय आकांक्षाएँ और कांग्रेस से अलग राजनीतिक पहचान बनाने की इच्छा अब सत्ता तक पहुँच सकती थीं। विपक्ष की भूमिका केवल विरोध करने तक सीमित नहीं रही।
हालाँकि गैर-कांग्रेसी प्रयोग ने स्थिरता की समस्या भी सामने रखी। अलग विचार और अलग राजनीतिक आधार वाले दल कांग्रेस-विरोध पर एकत्र हो सकते थे, लेकिन सरकार चलाने के लिए लगातार सहमति चाहिए थी। 1968 में राष्ट्रपति शासन लगा। 1969 में कांग्रेस फिर सबसे बड़ा दल बनी और 1974 में उसे बहुमत मिला। इससे स्पष्ट हुआ कि किसी पार्टी का प्रभुत्व टूटना और उसका राजनीतिक अंत होना अलग बातें हैं। सत्ता से बाहर जाने के बाद भी संगठन, नेतृत्व और सामाजिक संबंध उसकी वापसी का आधार बन सकते हैं।
आपातकाल के बाद 1977 में जनता पार्टी ने 352 सीटें जीतीं। कांग्रेस 47 पर सिमट गई। रामनरेश यादव मुख्यमंत्री बने और बाद में बनारसी दास ने पद संभाला। यह केवल राज्य सरकार के कामकाज पर फैसला नहीं था; राष्ट्रीय स्तर की असंतुष्टि और लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं का प्रश्न भी मतदाता के सामने था। लेकिन जनता पार्टी की आंतरिक एकता टिक नहीं सकी। 1980 में कांग्रेस ने 309 सीटों के साथ वापसी की। बड़ी जीत स्थायी संगठनात्मक एकता का विकल्प नहीं बनती, यह बात उस दौर ने स्थापित की।
1980 के दशक में विश्वनाथ प्रताप सिंह, श्रीपति मिश्र, नारायण दत्त तिवारी और वीर बहादुर सिंह जैसे नेताओं ने सरकारों का नेतृत्व किया। 1985 में कांग्रेस को 269 सीटें मिलीं, फिर भी उसके भीतर नेतृत्व परिवर्तन चलता रहा। दशक के अंतिम वर्षों में राष्ट्रीय राजनीति, सामाजिक न्याय की बहस और नए राजनीतिक नेतृत्व ने राज्य की प्रतिस्पर्धा बदल दी। 1989 में जनता दल 208 सीटों के साथ सबसे बड़ा दल बना और मुलायम सिंह यादव पहली बार मुख्यमंत्री बने। कांग्रेस का पुराना व्यापक सामाजिक गठजोड़ अब अलग-अलग राजनीतिक दावेदारों में बँट रहा था।
1991 में भाजपा ने 221 सीटें जीतकर बहुमत प्राप्त किया और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने। राम मंदिर आंदोलन ने उसके विस्तार को गति दी, लेकिन संगठन और नए सामाजिक समर्थन का निर्माण भी इस उभार का हिस्सा था। दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद सरकार का अंत हुआ और राष्ट्रपति शासन लगा। यह चरण याद दिलाता है कि चुनावी बहुमत के साथ संवैधानिक दायित्व भी जुड़े होते हैं। किसी सरकार के कार्यकाल का मूल्यांकन केवल उसके जनादेश की संख्या से पूरा नहीं किया जा सकता।
1993 में भाजपा 177 सीटों के साथ सबसे बड़ा दल बनी, पर सरकार सपा और बसपा के गठबंधन ने बनाई। मुलायम सिंह यादव फिर मुख्यमंत्री बने। यह उदाहरण सबसे बड़े दल और बहुमत जुटाने वाले गठबंधन के बीच फर्क समझाता है। 1995 में मायावती पहली बार मुख्यमंत्री बनीं। उसके बाद बसपा और भाजपा के सहयोग, समर्थन वापसी तथा नेतृत्व परिवर्तन का लंबा दौर आया। 1996 के त्रिशंकु जनादेश के बाद तत्काल निर्वाचित सरकार नहीं बन सकी; मार्च 1997 में मायावती के नेतृत्व में सरकार बनी।
इस दौर को केवल अस्थिरता कह देना भी पर्याप्त नहीं है। दलित और पिछड़े समुदायों के राजनीतिक नेतृत्व को सत्ता के केंद्र में जगह मिली। प्रतिनिधित्व का दायरा बढ़ा, पर गठबंधन चलाने की संस्थागत व्यवस्था कमजोर रही। कल्याण सिंह के बाद रामप्रकाश गुप्त और राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री बने। सरकारों के इस क्रम में मतदाता के मूल जनादेश, दलगत समझौतों और बाद के राजनीतिक परिवर्तनों की भूमिकाएँ अलग थीं। इतिहास का निष्पक्ष अध्ययन इन तीनों को एक ही घटना में समेटने से बचता है।
2002 में समाजवादी पार्टी 143 सीटों के साथ सबसे बड़ा दल थी। बहुमत न बनने पर राष्ट्रपति शासन लगा और बाद में बसपा-भाजपा सहयोग से मायावती मुख्यमंत्री बनीं। अगस्त 2003 में मुलायम सिंह यादव की सरकार बनी। इस बार भी सबसे बड़ी पार्टी, पहली सरकार बनाने वाला गठबंधन और बाद की सरकार का नेतृत्व अलग-अलग चरणों में सामने आए। इसलिए किसी चुनाव का पूरा विवरण जानने के लिए केवल नतीजों का दिन देखना पर्याप्त नहीं। विधानसभा के पूरे कार्यकाल में हुए परिवर्तनों को भी दर्ज करना पड़ता है।
2007 से एक नया दौर शुरू हुआ। बसपा ने 206 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया। मायावती के नेतृत्व में बना सामाजिक गठजोड़ बताता था कि अपनी मूल समर्थक आबादी से बाहर पहुँच बनाने वाला दल अकेले सरकार बना सकता है। 2012 में सपा ने 224 सीटें जीतीं और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने। दोनों चुनावों में मतदाता ने गठबंधन की अनिश्चितता के बजाय एक दल को पर्याप्त संख्या दी। लेकिन लगातार दो अलग दलों को बहुमत मिलना यह भी बताता है कि मतदाता की पसंद बदलने की क्षमता बनी रही।
2017 में भाजपा 312 सीटों तक पहुँची और योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने। 2022 में भाजपा को 255, अपना दल सोनेलाल को 12 और निषाद पार्टी को छह सीटें मिलीं। गठबंधन का कुल आँकड़ा 273 रहा। योगी आदित्यनाथ ने दूसरा कार्यकाल शुरू किया। भाजपा की सीटें पहले चुनाव से घटीं, लेकिन सरकार बनाने का स्पष्ट अधिकार उसके पास रहा। विपक्ष के लिए यह अंतर महत्वपूर्ण है। सत्तारूढ़ दल की सीटों में कमी अपने आप विपक्ष की जीत नहीं बनती; बहुमत तक पहुँचने के लिए उसे पर्याप्त निर्वाचन क्षेत्रों में बढ़त बनानी होती है।
इस पूरे इतिहास में सीटों की संख्या और राज्य की सीमाएँ भी बदली हैं। पुराने अविभाजित उत्तर प्रदेश के परिणामों को आज की 403 सीटों से सीधे नहीं नापा जा सकता। उत्तराखंड के गठन और निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन के बाद चुनावी भूगोल अलग है। मत प्रतिशत, जीती सीटें और सरकार की अवधि तीन अलग संकेतक हैं। इनके बीच संबंध समझे बिना किसी पुराने जनादेश को आज के मुकाबले पर लागू करना भ्रामक हो सकता है। इतिहास तुलना का आधार देता है, तैयार भविष्यवाणी नहीं।
आने वाले चुनाव की गंभीर चर्चा इसी अनुभव से शुरू होनी चाहिए। कांग्रेस की लंबी सत्ता, क्षेत्रीय दलों का विस्तार और भाजपा के लगातार बहुमत बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में संगठन और सामाजिक पहुँच दोनों निर्णायक रहे हैं। नेतृत्व की लोकप्रियता उपयोगी होती है, लेकिन स्थानीय उम्मीदवार, शासन का अनुभव और व्यापक समर्थन उसे चुनावी संख्या में बदलते हैं। मतदाता ने यहाँ सत्ता बदली भी है और सरकार दोहराई भी है। इसलिए सबसे जरूरी प्रश्न किसी दल के अजेय होने का नहीं, उसकी विश्वसनीयता और बदलते समाज से संवाद का है।