उत्तर प्रदेश के 2024 लोकसभा परिणामों की सबसे चर्चित बात भाजपा की सीटें घटना और समाजवादी पार्टी का सबसे बड़ा दल बनना थी। लेकिन इस जनादेश की गहराई समझने के लिए संसदीय सीटों के नीचे विधानसभा क्षेत्रों तक उतरना पड़ता है। वही अध्ययन बताता है कि किस इलाके में पुराना समर्थन बना रहा, कहाँ विपक्ष ने प्रवेश किया और किन क्षेत्रों में मतदाता ने 2022 से अलग फैसला दिया। इस तुलना की पहली शर्त भी स्पष्ट होनी चाहिए। लोकसभा में किसी विधानसभा क्षेत्र की बढ़त उस क्षेत्र का विधायक बदलने वाला चुनाव परिणाम नहीं है।

प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में सपा ने 37, भाजपा ने 33 और कांग्रेस ने छह सीटें जीतीं। रालोद को दो, अपना दल सोनेलाल को एक और आजाद समाज पार्टी को एक सीट मिली। सपा-कांग्रेस का संयुक्त प्रदर्शन 43 सीटों तक पहुँचा, जबकि भाजपा और उसके सहयोगी 36 पर रहे। यह राज्य की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में महत्वपूर्ण परिवर्तन था। विपक्ष ने दिखाया कि वह बड़े स्तर पर संसदीय सीटें जीत सकता है। सरकार के पक्ष में मजबूत संगठन और नेतृत्व होने के बावजूद मतदाता का फैसला एकतरफा नहीं था।

विधानसभा क्षेत्रवार अध्ययन इस तस्वीर को और विस्तृत करता है। उपलब्ध संकलनों में भाजपा 162 खंडों में आगे रही। रालोद की आठ और अपना दल सोनेलाल की चार बढ़त मिलाने पर एनडीए का आँकड़ा 174 होता है। सपा और कांग्रेस की संयुक्त बढ़त 223 खंडों में थी; तृणमूल कांग्रेस की एक बढ़त जोड़ने पर उनके गठबंधन का योग 224 होता है। आजाद समाज पार्टी पाँच खंडों में आगे थी। संयुक्त आँकड़ा साफ है, हालाँकि सपा और कांग्रेस के अलग-अलग हिस्से के प्रकाशित वर्गीकरण में एक सीट का अंतर मिलता है।

इस अंतर को छिपाना उचित नहीं होगा। एक नामवार संकलन सपा को 183 और कांग्रेस को 40 खंड देता है, जबकि दूसरे प्रकाशित सारांश में यह संख्या 184 और 39 है। दोनों का संयुक्त योग 223 ही है। अंतिम दलवार निर्धारण के लिए संबंधित क्षेत्र का मूल निर्वाचन रिकॉर्ड मिलाना जरूरी है। इससे व्यापक राजनीतिक निष्कर्ष नहीं बदलता कि विपक्ष ने अनेक क्षेत्रों में बढ़त बनाई, लेकिन अपूर्ण सत्यापन वाले ब्योरे को अंतिम सरकारी आँकड़ा घोषित करना शोध की विश्वसनीयता को कमजोर करेगा। चुनावी विश्लेषण में छोटी संख्या भी स्पष्ट आधार चाहती है।

भाजपा के लिए 2022 की 255 विधानसभा जीतों और 2024 की 162 खंडवार बढ़त का अंतर समीक्षा का विषय है। लेकिन इसे सीधे 93 विधानसभा सीटों की हार कहना गलत होगा। दोनों चुनावों में प्रत्याशी, मुद्दे और मतदाता की प्राथमिकताएँ अलग थीं। इसके अलावा भाजपा की कुछ बढ़त उन क्षेत्रों में भी थी जहाँ 2022 में कोई दूसरा दल जीता था। सही तुलना के लिए हर सीट पर पहले का विजेता और बाद की बढ़त अलग-अलग दर्ज करनी होगी। केवल दो कुल संख्याओं का घटाव राजनीतिक आवाजाही का पूरा विवरण नहीं देता।

यही बात सपा पर भी लागू होती है। 2022 में वह 111 विधानसभा सीटें जीती थी; 2024 में उसका संसदीय विस्तार उससे कहीं अधिक खंडों तक पहुँचा। पर लोकसभा उम्मीदवार के समर्थन को अगली बार विधानसभा उम्मीदवार के पक्ष में समान मात्रा में मान लेना संभव नहीं। एक लोकप्रिय संसदीय उम्मीदवार कई विधानसभा क्षेत्रों के विभिन्न सामाजिक समूहों को जोड़ सकता है। विधानसभा चुनाव में उन क्षेत्रों के स्थानीय प्रत्याशी अलग होंगे। इसलिए विपक्ष के लिए 2024 उपलब्धि भी है और स्थानीय संगठन खड़ा करने की जिम्मेदारी भी।

कांग्रेस का मामला विशेष महत्व रखता है। 2022 में दो विधानसभा सीटें जीतने वाली पार्टी ने 2024 में छह लोकसभा सीटें जीतीं। सपा के साथ समझौते ने उसके उम्मीदवारों को व्यापक मुकाबले में स्थान दिया। लेकिन संसदीय सफलता से हर संबंधित विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस का स्वतंत्र संगठन मजबूत हो गया, ऐसा मानना जल्दबाजी होगी। पार्टी को यह देखना होगा कि उसके अपने कार्यकर्ता कहाँ सक्रिय हैं, सहयोगी दल के समर्थन का योगदान कितना है और स्थानीय नेतृत्व की अगली पंक्ति कहाँ तैयार हो रही है। गठबंधन का लाभ संगठन निर्माण का विकल्प नहीं होता।

इस बदलाव को समझने में रालोद की स्थिति भी उपयोगी है। 2022 में वह सपा के साथ था और आठ विधानसभा सीटें जीता। 2024 में वह भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा बनकर लड़ा तथा दोनों संसदीय सीटें जीत गया। इसलिए 2022 के पूरे विपक्षी गठबंधन और 2024 के विपक्षी गठबंधन को एक समान मानना गलत होगा। सहयोगियों के स्थान बदलने से क्षेत्रीय मुकाबला और वोट हस्तांतरण प्रभावित होता है। हर गठबंधन की ताकत उसकी उस चुनाव में वास्तविक संरचना के अनुसार गिनी जानी चाहिए।

बहुजन समाज पार्टी के लिए 2024 में लोकसभा सीट न मिलना गंभीर राजनीतिक चुनौती थी। फिर भी उसकी भूमिका केवल जीती सीटों से नहीं समझी जा सकती। किसी निर्वाचन क्षेत्र में तीसरे दल को मिले वोट मुकाबले की दिशा प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन हर पराजय का कारण उसी दल को बताना भी प्रमाण के बिना आरोप होगा। यह जानने के लिए स्थानीय मत-विभाजन, पिछले समर्थन और उम्मीदवार के प्रभाव का अध्ययन चाहिए। मतदाताओं को किसी दल की निजी संपत्ति मानकर यह नहीं कहा जा सकता कि उसके न लड़ने पर सारे वोट एक निश्चित पक्ष को मिलते।

आजाद समाज पार्टी की नगीना में जीत और पाँच विधानसभा खंडों की बढ़त एक अलग स्थानीय केंद्र का संकेत देती है। इससे छोटे दलों या नए नेतृत्व की संभावना दिखाई देती है, लेकिन एक क्षेत्र की सफलता को पूरे राज्य का समान रुझान बताना उचित नहीं। पार्टी को अपनी क्षेत्रीय सफलता को स्थायी संगठन और दूसरे इलाकों तक पहुँच में बदलना होगा। बड़े दलों के लिए भी संदेश है कि हर असंतुष्ट मतदाता अपने आप उनके पास नहीं लौटता। कुछ क्षेत्र नए राजनीतिक विकल्प को स्थान दे सकते हैं।

क्षेत्रवार तुलना का सबसे उपयोगी पहलू यह है कि वह नेताओं को सामान्य दावों से स्थानीय जिम्मेदारी की ओर ले जाती है। जिस विधानसभा में पार्टी का विधायक है, वहाँ संसदीय चुनाव में पीछे रहने के कई कारण हो सकते हैं। उम्मीदवार चयन, गुटबाजी, स्थानीय असंतोष या राष्ट्रीय मुद्दा, इनमें से किसका कितना असर था, इसका उत्तर केवल ऊपर से नहीं दिया जा सकता। इसी तरह जहाँ पार्टी बिना विधायक के आगे रही, वहाँ नई संभावना को पहचानना होगा। दोनों स्थितियों में स्थानीय कार्यकर्ता और मतदाता से बातचीत जरूरी है।

किसी विधानसभा क्षेत्र की बढ़त पढ़ते समय जीत का अंतर और मतदान का स्तर भी देखना चाहिए। बहुत छोटी बढ़त और व्यापक समर्थन एक जैसी राजनीतिक स्थिति नहीं हैं। मतदाताओं का अनुपात बदलने से भी परिणाम प्रभावित हो सकता है। राष्ट्रीय चुनाव में एक समूह अधिक संख्या में मतदान करे और दूसरे में कम उत्साह हो तो विधानसभा खंड की तस्वीर बदल सकती है। लेकिन कुल मतदान घटने से कौन सा पक्ष लाभान्वित हुआ, यह बिना विशिष्ट प्रमाण नहीं बताया जा सकता। संख्या के पीछे की व्याख्या के लिए अलग अध्ययन की जरूरत होती है।

2024 के परिणामों ने भाजपा को अपनी चुनावी पकड़ की समीक्षा और विपक्ष को अपनी क्षमता बढ़ाने का अवसर दिया। भाजपा के लिए चुनौती है कि वह अपने शासन के समर्थन को स्थानीय विश्वास से जोड़े तथा असंतोष को केवल प्रचार मानकर खारिज न करे। सपा-कांग्रेस के लिए चुनौती है कि वे संसदीय सफलता को साझा कार्यक्रम और प्रभावी स्थानीय नेतृत्व में बदलें। एक-दूसरे के मतदाताओं तक पहुँच और सीट बँटवारे की स्वीकृति भी महत्वपूर्ण होगी। केवल पिछले परिणाम की पुनरावृत्ति की उम्मीद पर्याप्त चुनावी रणनीति नहीं है।

आम पाठक के लिए इस अध्ययन का अर्थ दलों की जोड़-घटाव से अधिक है। वह अपने विधानसभा क्षेत्र को बड़े राज्यव्यापी चित्र में देख सकता है। अपने विधायक का 2022 जनादेश, 2024 में उसी क्षेत्र का संसदीय मतदान और स्थानीय समस्याओं की स्थिति, इन तीनों को साथ पढ़कर अधिक सार्थक प्रश्न पूछे जा सकते हैं। सार्वजनिक चर्चा इसी तरह मजबूत होती है। चुनावी आँकड़ा तब उपयोगी बनता है जब वह मतदाता को प्रमाण के साथ सवाल पूछने की क्षमता दे, केवल किसी पक्ष की संभावित विजय का उत्साह न बढ़ाए।

2024 ने उत्तर प्रदेश में प्रतिस्पर्धा का दायरा बढ़ाया और कई पुराने अनुमानों को चुनौती दी। विधानसभा खंडों की बढ़त बताती है कि राजनीतिक समर्थन क्षेत्रवार बदल सकता है। लेकिन वह भविष्य का तय नक्शा नहीं बनाती। 2027 तक उम्मीदवार, गठबंधन, संगठन और शासन का अनुभव फिर परखा जाएगा। इसलिए पिछले परिणाम को सम्मान देने का सही तरीका उसे भविष्यवाणी में बदलना नहीं, उसके संदेश को समझना है। दोनों प्रमुख पक्षों के सामने अवसर खुले हैं; अंतिम फैसला फिर उन्हीं मतदाताओं का होगा जिन्होंने अलग चुनावों में अलग संतुलन बनाया है।