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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–018 · अध्याय 16

गांधी, नेहरू, पटेल, बोस और मौलाना आजाद — वंदे मातरम् पर राष्ट्रीय नेतृत्व का वास्तविक रुख

वंदे मातरम् विवाद की एक समस्या यह है कि वर्तमान राजनीति में ऐतिहासिक नेताओं को दो खेमों में बांटकर प्रस्तुत किया जाता है।

एक ओर यह धारणा बनाई जाती है कि गांधी, नेहरू और आजाद वंदे मातरम् के विरोध में थे।

दूसरी ओर यह कहा जाता है कि 1937 का फैसला पूरी तरह सर्वसम्मत और विवादरहित राष्ट्रीय सहमति थी।

दोनों निष्कर्षों से सावधान रहना चाहिए।

गांधी — गीत के विरोधी नहीं, धार्मिक बाध्यता के विरोधी

महात्मा गांधी के लिए वंदे मातरम् स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत था। वे उसके ऐतिहासिक महत्व से असहमत नहीं थे। लेकिन उनकी राजनीति में एक सिद्धांत लगातार दिखाई देता है—राष्ट्रीयता ऐसी नहीं हो सकती जो किसी नागरिक को उसकी धार्मिक मान्यता के विरुद्ध व्यवहार करने को मजबूर करे।

यही गांधीवादी दृष्टि 1937 के समझौते के पक्ष में इस्तेमाल की गई।

मूल प्रश्न था—

क्या मातृभूमि को देवी-स्वरूप में व्यक्त करने वाला काव्यात्मक रूपक हिंदू के लिए राष्ट्रभक्ति और मुस्लिम के लिए धार्मिक बाध्यता—दोनों एक साथ बन सकता है?

गांधी की राजनीति का उत्तर सामान्यतः यह था कि राष्ट्रभक्ति को धार्मिक विवेक पर बलपूर्वक नहीं थोपा जाना चाहिए।

लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि वे वंदे मातरम् को राष्ट्रीय जीवन से हटाना चाहते थे।

नेहरू — सबसे अधिक दस्तावेज उपलब्ध

नेहरू का रुख प्राथमिक दस्तावेजों से स्पष्ट है।

उनकी स्थिति समय के साथ विकसित हुई।

मार्च 1937 में वे वंदे मातरम् को लंबे राष्ट्रीय प्रयोग के कारण असांप्रदायिक राष्ट्रीय प्रतीक मान रहे थे।

सितंबर में वे गीत को ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष की ऐतिहासिक विरासत बता रहे थे।

अक्टूबर में आनंदमठ पढ़ने और आपत्तियों की जांच के बाद उन्होंने स्वीकार किया कि शिकायत का कुछ वास्तविक आधार है, हालांकि विरोध का बड़ा हिस्सा उनके अनुसार सांप्रदायिक तत्वों द्वारा निर्मित था।

इसलिए नेहरू की स्थिति को—

“वंदे मातरम् विरोधी”

कहना दस्तावेजों से मेल नहीं खाता।

उनका वास्तविक प्रश्न था—

राष्ट्रीय प्रतीक ऐसा कैसे हो जिसे भारत के अधिकतम समुदाय सहजता से अपना सकें?

सुभाषचंद्र बोस — महत्वपूर्ण लेकिन अक्सर भूली हुई भूमिका

वर्तमान राजनीतिक विमर्श में एक दिलचस्प विरोधाभास है।

1937 के समझौते को अक्सर अकेले नेहरू से जोड़ा जाता है।

लेकिन 20 अक्टूबर के नेहरू-बोस पत्राचार से स्पष्ट है कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर की राय लेने का सुझाव सुभाषचंद्र बोस की ओर से आया था।

अर्थात बोस भी समाधान खोजने की प्रक्रिया के हिस्सेदार थे।

यह तथ्य इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सुभाष बोस की राष्ट्रवादी प्रतिष्ठा निर्विवाद है। इसलिए 1937 के फैसले को केवल नेहरू की कथित वैचारिक अरुचि का परिणाम बताना ऐतिहासिक प्रक्रिया को विकृत करता है।

मौलाना अबुल कलाम आजाद

मौलाना आजाद कांग्रेस के भीतर उस राष्ट्रवादी मुस्लिम धारा के सबसे महत्वपूर्ण प्रतिनिधि थे जो मुस्लिम लीग की अलगाववादी राजनीति को अस्वीकार करती थी।

उनका बुनियादी राजनीतिक सिद्धांत था—

भारतीय मुसलमान अलग राष्ट्र नहीं, भारतीय राष्ट्र के अभिन्न अंग हैं।

यही कारण है कि वंदे मातरम् के प्रश्न पर आजाद की स्थिति को मुस्लिम लीग की स्थिति के समान नहीं माना जा सकता।

धार्मिक संवेदनशीलता स्वीकार करना और जिन्ना की राजनीतिक अवधारणा स्वीकार करना दो अलग बातें थीं।

कांग्रेस की 1937 की नीति इसी अंतर को बनाए रखने का प्रयास थी।

सरदार पटेल

पटेल को लेकर भी सावधानी आवश्यक है।

ऐसा कोई आधार नहीं मिलता कि वे वंदे मातरम् की राष्ट्रीय प्रतिष्ठा समाप्त करने के पक्षधर थे। स्वतंत्रता आंदोलन में उसका स्थान कांग्रेस नेतृत्व के लिए स्थापित तथ्य था।

लेकिन 1937 में कांग्रेस का फैसला किसी एक व्यक्ति का आदेश नहीं था।

यह कांग्रेस कार्यसमिति का सामूहिक निर्णय था।

इसलिए बाद में गांधी, नेहरू, पटेल, बोस या आजाद में से किसी एक पर पूरे निर्णय का श्रेय अथवा दोष डालना इतिहास को व्यक्ति-केंद्रित बना देता है।

पांच नेताओं के बीच वास्तविक समानता

उनके राजनीतिक स्वभाव और विचारों में भारी अंतर था।

फिर भी एक साझा बिंदु दिखाई देता है—

वंदे मातरम् की स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका को नकारना उनमें से किसी की घोषित नीति नहीं थी।

मतभेद उसके राष्ट्रीय प्रयोग के स्वरूप पर था।

यहां एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंतर

1937 में सवाल था—

कांग्रेस के सार्वजनिक कार्यक्रम में कितना गाया जाए?

1950 में सवाल होगा—

स्वतंत्र भारत में इसका राष्ट्रीय दर्जा क्या होगा?

इन दोनों को एक समझना आगे भारी भ्रम पैदा करेगा।