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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–018 · अध्याय 23

संविधान की प्रति हाथ में और वंदे मातरम् के दो अंतरे — क्या कांग्रेस संविधान और संसद की अवहेलना कर रही है?

2026 की राजनीतिक बहस में यह सबसे तीखा प्रश्न है।

राहुल गांधी सार्वजनिक कार्यक्रमों में संविधान की प्रति दिखाते रहे हैं। दूसरी ओर कांग्रेस कार्यसमिति ने पहले दो अंतरे गाने की नीति बरकरार रखी है।

भाजपा इसे विरोधाभास के रूप में प्रस्तुत कर रही है।

अमित शाह ने 20 अगस्त को कांग्रेस के फैसले को न केवल तुष्टिकरण बल्कि संसद के बनाए कानून की अवहेलना भी कहा। (The New Indian Express)

इस आरोप को कानूनी रूप से अलग-अलग हिस्सों में जांचना जरूरी है।

संविधान सभा ने क्या कहा?

24 जनवरी 1950 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा कि जन गण मन राष्ट्रीय गान होगा और स्वतंत्रता संघर्ष में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाला “song Vande Mataram” उसके समान सम्मान और दर्जा रखेगा। (Constitution of India)

महत्वपूर्ण बात—

उन्होंने “केवल पहले दो अंतरे” नहीं कहा।

लेकिन—

उन्होंने “प्रत्येक नागरिक छह अंतरे गाएगा” भी नहीं कहा।

इसलिए दोनों अतियों से बचना होगा।

2026 में संसद ने क्या किया?

जुलाई 2026 में संसद ने *Prevention of Insults to National Honour Act, 1971* की धारा 3 में संशोधन करके राष्ट्रीय गीत को राष्ट्रगान जैसी वैधानिक सुरक्षा देने वाला विधेयक पारित किया। 11 अगस्त को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की स्वीकृति मिलने के बाद यह कानून बन गया। (Akashvani News)

कानून का प्रभाव है—

राष्ट्रीय गीत का गायन जानबूझकर रोकना अथवा उसे गा रही सभा में व्यवधान पैदा करना अपराध है।

लेकिन कानून क्या नहीं कहता?

यह अत्यंत महत्वपूर्ण है।

यह कानून यह नहीं कहता कि—

हर नागरिक वंदे मातरम् गाए;

हर नागरिक सभी छह अंतरे गाए;

या किसी राजनीतिक दल की हर आंतरिक बैठक में पूरा संस्करण अनिवार्य रूप से गाया जाए।

इसलिए “कांग्रेस ने दो अंतरे गाकर कानून तोड़ दिया” कहना उपलब्ध वैधानिक पाठ से स्वतः सिद्ध नहीं होता।

गृह मंत्रालय का 2026 प्रोटोकॉल अलग प्रश्न है

28 जनवरी 2026 के गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों ने आधिकारिक संस्करण को छह अंतरों वाला निर्धारित किया। अवधि लगभग 3 मिनट 10 सेकंड है और निर्धारित सरकारी अवसरों पर पूर्ण संस्करण के प्रयोग का प्रोटोकॉल बनाया गया। उत्तराखंड लोक भवन ने फरवरी में इन्हीं दिशा-निर्देशों के अनुपालन में पूर्ण छह-अंतरे वाला संस्करण अपनाया। (Governor UK)

अर्थात—

सरकारी आधिकारिक प्रोटोकॉल = छह अंतरे।

लेकिन—

हर नागरिक/दल पर छह अंतरे गाने का आपराधिक दायित्व = अलग बात।

इन दोनों को मिलाना उचित नहीं होगा।

सुप्रीम कोर्ट का सिद्धांत भी महत्वपूर्ण है

1986 के *Bijoe Emmanuel v. State of Kerala* मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रगान के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांत स्थापित किया।

तीन विद्यार्थी धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगान नहीं गाते थे, लेकिन सम्मानपूर्वक खड़े रहते थे।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून किसी व्यक्ति को राष्ट्रगान गाने के लिए बाध्य नहीं करता और सम्मानपूर्वक खड़े रहकर न गाना अपने-आप अपमान नहीं है। अदालत ने अनुच्छेद 19(1)(a) और 25 के अंतर्गत उनके अधिकारों की रक्षा की। (Indian Kanoon)

यह फैसला वंदे मातरम् पर सीधे नहीं था, इसलिए उसे यांत्रिक रूप से लागू नहीं करना चाहिए।

लेकिन राष्ट्रीय प्रतीक और अंतःकरण की स्वतंत्रता के संबंध में इसका संवैधानिक सिद्धांत अत्यंत प्रासंगिक है।

और मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने गृह मंत्रालय के वंदे मातरम् दिशा-निर्देशों को चुनौती देने वाली याचिका पर भी ध्यान दिलाया कि परिपत्र ने गायन न करने पर कोई दंड निर्धारित नहीं किया था। (Live Law)

इसलिए हमारा विधिक निष्कर्ष स्पष्ट होना चाहिए

कांग्रेस की नीति की राजनीतिक आलोचना की जा सकती है।

उससे पूछा जा सकता है कि वह संविधान सभा द्वारा पूरे गीत को दिए सम्मान की भावना और नए सरकारी प्रोटोकॉल के बावजूद 1937 पर क्यों अड़ी है।

लेकिन बिना किसी विशिष्ट उल्लंघन के यह कहना कि—

“दो अंतरे गाना अपने-आप संविधान अथवा संसद के कानून का उल्लंघन है”

कानूनी रूप से अतिरंजित होगा।

शोध की विश्वसनीयता के लिए यह अंतर बनाए रखना आवश्यक है।