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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–018 · अध्याय 06

ब्रिटिश शासन और वंदे मातरम् — जब एक गीत सत्ता के लिए चुनौती बन गया

वंदे मातरम् के 1937 के विवाद को समझने के लिए पहले यह समझना आवश्यक है कि कांग्रेस इसे आसानी से छोड़ क्यों नहीं सकती थी। इसका उत्तर 1905 से 1908 के बीच के इतिहास में मिलता है।

उन्नीसवीं सदी के अंत तक वंदे मातरम् एक प्रसिद्ध साहित्यिक रचना थी। लेकिन बीसवीं सदी के आरंभ में बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन ने उसका चरित्र बदल दिया। वह गीत से आगे बढ़कर औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध राजनीतिक उद्घोष बन गया।

7 अगस्त 1905 को कलकत्ता टाउन हॉल की ओर बढ़ रहे छात्रों और प्रदर्शनकारियों के बीच वंदे मातरम् के उद्घोष का उल्लेख मिलता है। इसी ऐतिहासिक सभा में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी के पक्ष में प्रस्ताव पारित किया गया। बाद में बंगाल के गांवों, नगरों, विद्यालयों और राजनीतिक सभाओं में यह उद्घोष फैल गया। (Press Information Bureau)

ब्रिटिश प्रशासन की प्रतिक्रिया

औपनिवेशिक शासन ने बहुत जल्दी समझ लिया कि समस्या केवल गीत के शब्द नहीं हैं।

समस्या वह राजनीतिक अर्थ था जो जनता ने उन शब्दों को दे दिया था।

पूर्वी बंगाल के नवगठित प्रशासन ने विद्यालयों और महाविद्यालयों में वंदे मातरम् के गायन अथवा उद्घोष पर रोक लगाने वाले निर्देश जारी किए। राजनीतिक आंदोलन में भाग लेने वाले विद्यार्थियों पर कार्रवाई की चेतावनी दी गई। नवंबर 1905 में रंगपुर के एक विद्यालय के लगभग 200 विद्यार्थियों पर वंदे मातरम् का उद्घोष करने के कारण जुर्माना लगाए जाने का विवरण भी सरकारी ऐतिहासिक संकलन में मिलता है। (Press Information Bureau)

यह तथ्य इसलिए महत्वपूर्ण है कि बाद में नेहरू बार-बार वंदे मातरम् की इसी ऐतिहासिक स्मृति का उल्लेख करते हैं।

उनके लिए यह केवल बंकिम का गीत नहीं रह गया था।

यह वह उद्घोष था जिसके लिए भारतीयों ने ब्रिटिश दमन सहा था।

1906 का बरिसाल प्रकरण

अप्रैल 1906 का बरिसाल प्रांतीय सम्मेलन वंदे मातरम् के राजनीतिक इतिहास की निर्णायक घटनाओं में है।

ब्रिटिश अधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से वंदे मातरम् के उद्घोष को रोकने का प्रयास किया। प्रतिनिधियों ने आदेश का उल्लंघन किया और पुलिस दमन का सामना किया। भारत सरकार के उपलब्ध ऐतिहासिक विवरण में भी बरिसाल में प्रतिनिधियों पर कार्रवाई और सार्वजनिक उद्घोष पर प्रतिबंध का उल्लेख मिलता है। (Press Information Bureau)

31 वर्ष बाद नेहरू स्वयं इस स्मृति को याद कर रहे थे।

1 सितंबर 1937 को अली सरदार जाफरी को लिखे पत्र में उन्होंने कहा कि करीब तीस वर्ष पहले वंदे मातरम् गीत और उद्घोष को अपराध की तरह देखा जाने लगा था, लोग उसके लिए प्रताड़ित हुए और इसी कारण वह जनता की स्मृति में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक बन गया। (The Nehru Archive)

यही बिंदु 1937 की कांग्रेस की दुविधा समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

कांग्रेस के सामने मुस्लिम आपत्तियां थीं।

लेकिन दूसरी ओर उसके सामने उन स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृति भी थी जिन्होंने इसी उद्घोष के कारण लाठियां खाई थीं।

बंगाल से बाहर विस्तार

वंदे मातरम् बंगाल तक सीमित नहीं रहा।

1907 में लाहौर में स्वदेशी नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में युवाओं ने इसका उद्घोष किया। 1908 में तूतीकोरिन के कॉरल मिल मजदूरों के आंदोलन में भी वंदे मातरम् सुनाई दिया। जून 1908 में लोकमान्य तिलक के मुकदमे के समय बंबई में जुटी भीड़ ने इसका प्रयोग किया। (Press Information Bureau)

यानी बीसवीं सदी के पहले दशक तक वंदे मातरम् की तीन पहचानें बन चुकी थीं—

साहित्यिक रचना, राष्ट्रीय गीत और राजनीतिक उद्घोष।

इनमें तीसरी पहचान सबसे विस्फोटक थी।

अंग्रेजों के लिए खतरा क्यों?

वंदे मातरम् की शक्ति उसकी सरल राजनीतिक पहचान में थी।

दो शब्द बोलने भर से व्यक्ति बता सकता था कि वह किस तरफ है।

ब्रिटिश सत्ता की तरफ?

या स्वदेशी और राष्ट्रीय प्रतिरोध की तरफ?

इस प्रकार वंदे मातरम् एक प्रकार का राजनीतिक संकेत-शब्द बन गया।

यही कारण था कि ब्रिटिश सरकार उसके प्रयोग को केवल संगीत या साहित्य का प्रश्न नहीं मानती थी।

1937 से इसका संबंध

अब 1937 पर लौटिए।

यदि कांग्रेस मुस्लिम लीग की मांग के बाद वंदे मातरम् को पूरी तरह छोड़ देती, तो मामला केवल किसी गीत को बदलने का नहीं होता।

कांग्रेस को अपने ही स्वतंत्रता संघर्ष की तीन दशक पुरानी स्मृति से पीछे हटना पड़ता।

इसीलिए नेहरू सितंबर 1937 में बहुत दृढ़ थे।

उन्होंने अली सरदार जाफरी को लिखा कि वंदे मातरम् के राष्ट्रीय अर्थ को केवल आनंदमठ के मूल संदर्भ में बांधना उचित नहीं है; जनता के लिए वह ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक बन चुका था। (The Nehru Archive)

यह नेहरू का सितंबर वाला रुख था।

अक्टूबर में उनके विचार में एक महत्वपूर्ण संशोधन दिखाई देगा।

और वही संशोधन 1937 के फैसले की कुंजी है।

प्रमुख स्रोत एवं दस्तावेज

नेहरू का अली सरदार जाफरी को पत्र, 1 सितंबर 1937। (The Nehru Archive)

बरिसाल, रंगपुर और स्वदेशी आंदोलन संबंधी सरकारी ऐतिहासिक विवरण। (Press Information Bureau)

1896–1905 में वंदे मातरम् के राष्ट्रीय प्रसार संबंधी सरकारी तथ्यपत्र। (Press Information Bureau)