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OCN Research Desk · आधुनिक भारत का इतिहास

1956 — भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन

आंदोलन, आयोग, संसदीय बहसें और भारत के नए मानचित्र की कहानी

ओमकार चौधरी / OCN Research Deskतथ्य-जाँचा शोध संस्करण · 3 अक्टूबर 2026

अध्याय का सार

1 नवंबर 1956 को भारत का राजनीतिक मानचित्र एक बड़े प्रशासनिक पुनर्गठन से बदला। 1950 में संविधान ने राज्यों को भाग क, ख, ग और घ में बाँटा था। मूल प्रथम अनुसूची में भाग क के 9, भाग ख के 9 और भाग ग के 10 राज्य दर्ज थे; भाग घ में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह था। कूच-बिहार का पश्चिम बंगाल में विलय 1 जनवरी 1950 से प्रभावी बताया गया है, इसलिए प्रशासनिक गिनती में उसे दो बार नहीं जोड़ा जाना चाहिए। नीचे की पहली सारणी मूल संवैधानिक सूची दिखाती है और विलय को अलग से चिह्नित करती है। राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 लागू होने पर यह भाग-व्यवस्था समाप्त हुई और 14 राज्य तथा 6 केंद्रशासित प्रदेश बने। अधिकांश सीमाएँ भाषा को प्रमुख आधार बनाकर पुनर्निर्धारित की गईं।

उसी दिन केरल, मैसूर (आज का कर्नाटक) और नया मध्य प्रदेश बने। आंध्र प्रदेश में तेलंगाना जुड़ा। मद्रास, बंबई, पंजाब और राजस्थान की सीमाएँ बदलीं। हैदराबाद, त्रावणकोर-कोचीन, मध्य भारत, विंध्य प्रदेश, भोपाल, सौराष्ट्र, कच्छ, कुर्ग, अजमेर और पेप्सू जैसी इकाइयाँ इतिहास बन गईं।

यह परिवर्तन किसी प्रशासनिक मेज़ पर अचानक नहीं हुआ। इसके पीछे लगभग चार दशक पुराना राष्ट्रीय आंदोलन का वादा था, संविधान सभा की अनिच्छा थी, दो विशेषज्ञ समितियों की चेतावनियाँ थीं, एक गांधीवादी नेता का 58 दिन लंबा आमरण अनशन और उनकी मृत्यु थी, देशभर में आंदोलन, गोलीबारी और दंगे थे, और अंततः एक तीन-सदस्यीय आयोग की 267 पृष्ठों की रिपोर्ट, जिस पर संसद में 14 से 23 दिसंबर 1955 के बीच चर्चा हुई।

यह अध्याय उसी पूरी यात्रा की पड़ताल करता है: भाषाई प्रांतों का विचार कहाँ से आया, कांग्रेस ने उसे कैसे अपनाया, स्वतंत्रता के बाद नेतृत्व क्यों हिचका, आंध्र ने कैसे रास्ता खोला, राज्य पुनर्गठन आयोग ने क्या कहा, संसद में क्या बहसें हुईं, बंबई और पंजाब जैसे प्रश्न क्यों अनसुलझे रहे, और 1956 के बाद भारत के संघीय ढाँचे पर इसका क्या असर पड़ा।

स्रोत-पद्धति

इस अध्याय में राज्य पुनर्गठन आयोग की 1955 की रिपोर्ट, भारत के संविधान की मूल प्रथम अनुसूची और अनुच्छेद 3–4, राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956, आंध्र राज्य अधिनियम, 1953 तथा संसदीय और समकालीन अभिलेखों को आधार बनाया गया है। जहाँ किसी घटना या संख्या का दायरा अलग-अलग स्रोतों में बदलता है, वहाँ उसे स्पष्ट रूप से अलग बताया गया है। उद्धरणों का हिंदी रूप भावानुवाद है।

भाग 1: ब्रिटिश प्रांतों की बनावट — “भाषा नहीं, सुविधा”

1.1 प्रांत कैसे बने

ब्रिटिश भारत के प्रांत किसी तार्किक योजना से नहीं बने थे। वे ईस्ट इंडिया कंपनी के सैन्य विजय-अभियानों, संधियों और प्रशासनिक सुविधा के क्रम में धीरे-धीरे जुड़ते गए। तीन पुरानी “प्रेसिडेंसियाँ”—बंगाल, मद्रास और बंबई—व्यापारिक कोठियों से बढ़कर विशाल प्रांत बनीं। उदाहरण के लिए:

मद्रास प्रेसिडेंसी में तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़ और तुलु बोलने वाले क्षेत्र एक साथ थे—उत्तर में गंजाम (उड़िया क्षेत्र) से दक्षिण में कन्याकुमारी के निकट तक, और पश्चिम में मालाबार तक।

बंबई प्रेसिडेंसी में मराठी, गुजराती, कन्नड़ और सिंधी (1936 तक सिंध भी इसका हिस्सा था) भाषी क्षेत्र थे।

बंगाल प्रेसिडेंसी में कभी बिहार, उड़ीसा और असम के हिस्से भी शामिल थे।

मध्य प्रांत और बरार में हिंदी और मराठी क्षेत्र एक साथ थे।

हैदराबाद रियासत में तेलुगु (तेलंगाना), मराठी (मराठवाड़ा) और कन्नड़ (हैदराबाद-कर्नाटक) क्षेत्र थे।

1.2 1905 का बंगाल विभाजन और भाषा-चेतना

1905 में लॉर्ड कर्ज़न ने बंगाल का विभाजन किया। आधिकारिक कारण प्रशासनिक बताया गया, पर राष्ट्रवादियों ने इसे “फूट डालो और राज करो” की नीति माना। स्वदेशी आंदोलन के दबाव में 1911 में विभाजन रद्द हुआ, और साथ ही बिहार-उड़ीसा को बंगाल से अलग प्रांत बनाया गया, तथा असम को फिर से अलग मुख्य आयुक्त प्रांत बनाया गया। इस घटना ने यह चेतना जगाई कि भाषा और सांस्कृतिक पहचान राजनीतिक संगठन के आधार हो सकते हैं।

1.3 भाषाई आधार पर बने पहले प्रांत

बिहार और उड़ीसा (1912), फिर उड़ीसा (1 अप्रैल 1936) एक अलग प्रांत बना। उड़ीसा भारत का पहला प्रांत था जो स्पष्ट रूप से भाषाई आधार पर बना। मधुसूदन दास और “उत्कल सम्मिलनी” (1903 से) ने उड़िया भाषी क्षेत्रों के एकीकरण का लंबा आंदोलन चलाया था।

सिंध (1936) बंबई प्रेसिडेंसी से अलग हुआ, हालाँकि इसमें धार्मिक-राजनीतिक कारण भी प्रमुख थे।

इस तरह स्वतंत्रता से पहले ही भाषाई प्रांतों का उदाहरण मौजूद था।

भाग 2: राष्ट्रीय आंदोलन और भाषाई प्रांतों का वादा

2.1 आंध्र आंदोलन की शुरुआत (1913)

तेलुगु भाषियों के लिए अलग आंध्र प्रांत की माँग 1913 में बापटला में हुए पहले “आंध्र महासभा” सम्मेलन से औपचारिक रूप से उठी। कोंडा वेंकटप्पय्या, पट्टाभि सीतारमैया, के. नागेश्वर राव जैसे नेताओं ने इसका नेतृत्व किया। उनका तर्क था कि मद्रास प्रेसिडेंसी में तमिल अभिजात वर्ग का प्रभुत्व है, और तेलुगु भाषी शिक्षा, नौकरियों और प्रशासन में पिछड़ रहे हैं।

2.2 कांग्रेस का पुनर्गठन: 1917-1920

1917 में कांग्रेस ने आंध्र के लिए अलग “प्रांतीय कांग्रेस समिति” बनाने की अनुमति दी। 1918 में सिंध के लिए भी ऐसा हुआ।

नागपुर अधिवेशन (दिसंबर 1920) एक निर्णायक मोड़ था। गांधीजी के नेतृत्व में कांग्रेस ने अपने संविधान में बदलाव किया और अपनी प्रांतीय समितियों को ब्रिटिश प्रांतों के बजाय भाषाई क्षेत्रों के आधार पर संगठित किया—जैसे आंध्र, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्कल, बिहार, हिंदुस्तानी मध्य प्रांत, मराठी मध्य प्रांत (विदर्भ) आदि। कुल 21 के आसपास “प्रदेश कांग्रेस समितियाँ” बनीं।

गांधीजी का तर्क था कि जनता को उसकी अपनी भाषा में राजनीति से जोड़ना आवश्यक है। जनांदोलन तभी जन-आंदोलन बन सकता है जब वह लोगों की भाषा बोले। यह निर्णय कांग्रेस को अभिजात, अंग्रेज़ी-भाषी संगठन से जन-संगठन में बदलने की प्रक्रिया का हिस्सा था।

2.3 नेहरू रिपोर्ट (1928)

मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट ने भाषाई प्रांतों का स्पष्ट समर्थन किया। रिपोर्ट में कहा गया कि प्रांतों के पुनर्वितरण में मुख्य विचार “जनता की इच्छा और क्षेत्र की भाषाई एकता” होना चाहिए। रिपोर्ट ने तर्क दिया कि लोकतंत्र तभी प्रभावी हो सकता है जब प्रशासन और शिक्षा जनता की भाषा में हो।

2.4 1937-1946: बार-बार दोहराया गया वादा

1930 के दशक में मद्रास प्रांत के भीतर अलग आंध्र और अन्य भाषाई इकाइयों की माँग पर चर्चा जारी रही। मद्रास विधानसभा द्वारा आंध्र और केरल दोनों के लिए प्रस्ताव पारित किए जाने के दावे के लिए यहाँ मूल विधानसभा कार्यवाही का पर्याप्त संदर्भ उपलब्ध नहीं है; इसलिए इसे पुष्ट संसदीय निर्णय के रूप में नहीं रखा गया है।

1938 में आंध्र, केरल और कर्नाटक के प्रतिनिधिमंडलों ने कांग्रेस कार्यसमिति के सामने भाषाई प्रांतों की माँग रखी। उपलब्ध विवरणों के आधार पर इसे कार्यसमिति द्वारा सिद्धांत की स्पष्ट पुनर्पुष्टि कहना उचित नहीं; उसके निर्णय के सटीक शब्दों के लिए मूल कार्यवाही देखनी चाहिए।

1945-46 के चुनाव घोषणापत्र में कांग्रेस ने कहा कि “जहाँ तक संभव हो, प्रशासनिक इकाइयों का गठन भाषाई और सांस्कृतिक आधार पर” किया जाएगा।

इस प्रकार 1947 तक भाषाई प्रांत कांग्रेस का एक घोषित, लगभग तीन दशक पुराना वादा बन चुका था।

भाग 3: स्वतंत्रता के बाद की हिचक (1947-1952)

3.1 विभाजन ने सब कुछ बदल दिया

1947 के विभाजन ने भारतीय नेतृत्व की प्राथमिकताएँ बदल दीं। धर्म के आधार पर देश के टूटने, लाखों मौतों और करोड़ों के विस्थापन के बाद नेहरू, पटेल और राजेंद्र प्रसाद जैसे नेताओं को लगने लगा कि भाषा के आधार पर राज्य बनाना एक और विभाजनकारी शक्ति को जगाना होगा। उस समय की प्राथमिकताएँ थीं:

560 से अधिक रियासतों का विलय और एकीकरण;

कश्मीर में युद्ध;

शरणार्थियों का पुनर्वास;

खाद्य संकट और आर्थिक पुनर्निर्माण;

संविधान निर्माण।

नेहरू ने 1947 के अंत में कहा कि पहले सुरक्षा, एकता और आर्थिक समृद्धि आवश्यक है; भाषाई प्रांतों जैसा विषय, जो “भावनाएँ भड़काता है”, कुछ समय तक टाला जाना चाहिए।

3.2 संविधान सभा और धर आयोग (1948)

भाषाई प्रांतों की माँग के दबाव में संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने जून 1948 में भाषाई प्रांत आयोग नियुक्त किया, जिसकी अध्यक्षता इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एस. के. धर ने की। इसके अन्य सदस्य थे पन्ना लाल (सेवानिवृत्त ICS) और जगत नारायण लाल (संविधान सभा सदस्य)। आयोग को मुख्यतः आंध्र, कर्नाटक, केरल और महाराष्ट्र की माँगों की जाँच करनी थी।

धर आयोग की रिपोर्ट (10 दिसंबर 1948) के मुख्य निष्कर्ष:

प्रांतों का गठन केवल या मुख्यतः भाषाई आधार पर करना “भारतीय राष्ट्र के व्यापक हित में” नहीं होगा।

पुनर्गठन के मुख्य आधार प्रशासनिक सुविधा, ऐतिहासिक कारक, भौगोलिक निकटता और वित्तीय आत्मनिर्भरता होने चाहिए।

भाषाई प्रांत “उप-राष्ट्रीयता” (sub-nationalism) को बढ़ावा देंगे और प्रांतों में भाषाई अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव का खतरा पैदा करेंगे।

इस समय पुनर्गठन का कोई कार्य नहीं होना चाहिए; राष्ट्रीय एकता को प्राथमिकता दी जाए।

रिपोर्ट से आंध्र, कर्नाटक और महाराष्ट्र में भारी निराशा और असंतोष फैला।

3.3 जेवीपी समिति (1948-1949)

असंतोष को देखते हुए जयपुर कांग्रेस अधिवेशन (दिसंबर 1948) में एक नई समिति बनी, जिसमें जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल और पट्टाभि सीतारमैया (तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष) थे—इसलिए इसे “जेवीपी समिति” कहा गया।

जेवीपी समिति की रिपोर्ट (1 अप्रैल 1949) ने कहा:

कांग्रेस ने अतीत में भाषाई प्रांतों का समर्थन किया था, किंतु विभाजन के बाद परिस्थितियाँ बदल गई हैं। अब प्राथमिकता “भारत की सुरक्षा, एकता और आर्थिक समृद्धि” है।

“हर अलगाववादी और विघटनकारी प्रवृत्ति को कठोरता से दबाया जाना चाहिए।”

भाषाई प्रांतों का प्रश्न फिलहाल स्थगित किया जाए।

किंतु यदि किसी क्षेत्र में “जन भावना प्रबल और भारी” हो, तो उस पर विचार किया जा सकता है—बशर्ते संबंधित पक्षों में सहमति हो। समिति ने संकेत दिया कि आंध्र के मामले में यह संभव है, बशर्ते आंध्र के नेता मद्रास शहर पर अपना दावा छोड़ दें।

मद्रास शहर (तमिल-बहुल, पर बड़ी तेलुगु आबादी वाला) का प्रश्न आंध्र की माँग में सबसे बड़ी अड़चन बन गया। तमिल नेता—विशेषकर सी. राजगोपालाचारी—मद्रास को आंध्र को देने के सख्त विरोधी थे।

स्वयं पट्टाभि सीतारमैया, जो आंध्र आंदोलन के पुराने नेता थे, ने समिति की रिपोर्ट पर हस्ताक्षर किए—इस पर आंध्र में उनकी आलोचना हुई।

3.4 संविधान में स्थान

संविधान सभा ने भाषाई प्रांतों का प्रश्न भविष्य पर छोड़ा, किंतु अनुच्छेद 3 में संसद को साधारण कानून से नया राज्य बनाने, किसी राज्य का क्षेत्र बढ़ाने या घटाने और राज्यों की सीमाएँ या नाम बदलने की शक्ति दी। ऐसा विधेयक राष्ट्रपति की सिफारिश पर ही संसद में पेश किया जा सकता है। राष्ट्रपति संबंधित राज्य विधानमंडल से प्रस्ताव पर राय माँगते हैं; वह राय बाध्यकारी नहीं होती। अनुच्छेद 4 के तहत ऐसे कानून को अनुच्छेद 368 के अर्थ में संविधान संशोधन नहीं माना जाता। यही प्रावधान 1953 और 1956 के पुनर्गठन का संवैधानिक आधार बने।

संविधान ने राज्यों को चार भागों में बाँटा था:

यह ढाँचा असमान था—भाग ख के राज्यों पर केंद्र का अधिक नियंत्रण था (अनुच्छेद 371 के तहत दस वर्ष के लिए), भाग ग के राज्य छोटे और आर्थिक रूप से कमज़ोर थे। इस असमानता ने भी पुनर्गठन की आवश्यकता बढ़ाई।

भाग 4: पोट्टि श्रीरामुलु का बलिदान और आंध्र राज्य (1952-1953)

4.1 पृष्ठभूमि: 1952 के चुनाव

1951-52 के पहले आम चुनावों में मद्रास राज्य में कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला। आंध्र क्षेत्र में कम्युनिस्टों और अन्य दलों ने अच्छा प्रदर्शन किया; भाषाई राज्य की माँग चुनावी मुद्दा बन चुकी थी। राजगोपालाचारी मुख्यमंत्री बने (विधान परिषद के रास्ते)। आंध्र की माँग पर केंद्र की चुप्पी से असंतोष बढ़ता गया। स्वामी सीताराम ने 1951 में अनशन किया था, जिसे विनोबा भावे के आग्रह पर तोड़ा गया।

4.2 श्रीरामुलु कौन थे

पोट्टि श्रीरामुलु (1901-1952) मद्रास में जन्मे, बंबई में रेलवे इंजीनियर रहे, और फिर गांधीजी के साबरमती आश्रम से जुड़ गए। नमक सत्याग्रह (1930) और भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में जेल गए। गांधीजी ने उनके बारे में कहा था कि यदि उनके पास श्रीरामुलु जैसे ग्यारह और अनुयायी हों, तो वे एक वर्ष में स्वराज ले आएँगे। उन्होंने दलितों के मंदिर-प्रवेश के लिए नेल्लोर में अनशन भी किए थे।

4.3 अनशन: 19 अक्टूबर – 15 दिसंबर 1952

19 अक्टूबर 1952 को श्रीरामुलु ने मद्रास में बुलुसु सांबमूर्ति के घर (मायलापुर) पर मद्रास शहर सहित अलग आंध्र राज्य की माँग को लेकर आमरण अनशन शुरू किया। प्रारंभ में केंद्र ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। नेहरू ने दिसंबर 1952 की शुरुआत में राजगोपालाचारी को लिखा कि वे दबाव में आकर निर्णय नहीं लेना चाहते।

जैसे-जैसे अनशन लंबा हुआ, आंध्र क्षेत्र में जन भावना उबलने लगी—हड़तालें, जुलूस, सभाएँ। 15 दिसंबर 1952 की रात, अनशन के 58वें दिन, श्रीरामुलु की मृत्यु हो गई।

4.4 मृत्यु के बाद का विस्फोट

श्रीरामुलु की मृत्यु की खबर फैलते ही पूरे आंध्र क्षेत्र में व्यापक हिंसा और उपद्रव हुए। मद्रास, विशाखापत्तनम, विजयवाड़ा, राजमुंदरी, नेल्लोर, अनंतपुर आदि शहरों में सरकारी इमारतों, रेलवे स्टेशनों और ट्रेनों पर हमले हुए। पुलिस गोलीबारी में कई लोग मारे गए। कई दिनों तक आंध्र क्षेत्र में प्रशासन लगभग ठप रहा।

4.5 नेहरू की घोषणा (19 दिसंबर 1952)

19 दिसंबर 1952 को नेहरू ने संसद में घोषणा की कि मद्रास राज्य के तेलुगु भाषी क्षेत्रों को मिलाकर आंध्र राज्य बनाया जाएगा, किंतु मद्रास शहर उसमें शामिल नहीं होगा। विवादित क्षेत्रों पर विचार के लिए न्यायमूर्ति के. एन. वांचू को नियुक्त किया गया। नेहरू ने निजी पत्रों में स्वीकार किया कि उन्होंने “मधुमक्खियों के छत्ते” में हाथ डाल दिया है और अब अन्य क्षेत्रों से भी ऐसी माँगें उठेंगी।

4.6 आंध्र राज्य अधिनियम और 1 अक्टूबर 1953

संसद ने आंध्र राज्य अधिनियम, 1953 पारित किया। द ट्रिब्यून के विश्लेषण के अनुसार यह भारत में भाषाई पुनर्गठन की शुरुआत थी। 1 अक्टूबर 1953 को आंध्र राज्य अस्तित्व में आया:

राजधानी: कुर्नूल (अस्थायी);

उच्च न्यायालय: गुंटूर;

पहले मुख्यमंत्री: टी. प्रकाशम् (“आंध्र केसरी”);

क्षेत्र: मद्रास राज्य के 11 तेलुगु भाषी ज़िले (तटीय आंध्र और रायलसीमा);

बेल्लारी का प्रश्न: आंध्र राज्य अधिनियम, 1953 ने बेल्लारी ज़िले के अलूर, अदोनी और रायादुर्ग तालुका आंध्र में शामिल किए; बेल्लारी का शेष क्षेत्र मैसूर में गया। इसलिए इसे केवल “बेल्लारी तालुक मैसूर को दिया गया” कहना अधूरा है। सीमा-निर्धारण पर आंध्र में असंतोष रहा।

आंध्र राज्य के उद्घाटन के समय नेहरू कुर्नूल गए और कहा कि यह “भारत के इतिहास में एक नया अध्याय” है, साथ ही चेताया कि भाषाई गर्व राष्ट्रीय एकता की कीमत पर नहीं होना चाहिए।

भाग 5: राज्य पुनर्गठन आयोग (1953-1955)

5.1 आयोग का गठन (22 दिसंबर 1953)

आंध्र के गठन के बाद देशभर में—कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, हिमाचल, विदर्भ, झारखंड आदि क्षेत्रों से—ऐसी ही माँगें तेज़ हो गईं। बढ़ते दबाव में 22 दिसंबर 1953 को नेहरू ने संसद में राज्य पुनर्गठन आयोग (States Reorganisation Commission) के गठन की घोषणा की। आयोग के सदस्य थे:

न्यायमूर्ति सैयद फ़ज़ल अली (अध्यक्ष) — सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश, तब उड़ीसा के राज्यपाल;

हृदयनाथ कुंजरू — संविधान सभा के प्रख्यात सदस्य, सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी के अध्यक्ष, राज्यसभा सदस्य;

के. एम. पणिक्कर — इतिहासकार, राजनयिक (चीन और मिस्र में भारत के राजदूत रह चुके)।

इसलिए इसे प्रायः “फ़ज़ल अली आयोग” कहा जाता है।

5.2 आयोग का कार्यक्षेत्र

गृह मंत्रालय के प्रस्ताव में आयोग को निर्देश दिया गया कि वह “निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ” ढंग से भारतीय संघ के राज्यों के पुनर्गठन के प्रश्न की जाँच करे, ताकि “भारत की एकता और सुरक्षा को बनाए रखते हुए और उसे बढ़ावा देते हुए” जनता का कल्याण सुनिश्चित हो। आयोग से अपेक्षा थी कि वह केवल भाषा नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, भौगोलिक, आर्थिक, वित्तीय और प्रशासनिक पहलुओं पर भी विचार करे।

5.3 आयोग का कार्य

लगभग दो वर्ष के कार्यकाल में आयोग ने:

आयोग को कुल लगभग 1,52,250 दस्तावेज़ प्राप्त हुए; इनमें लगभग 2,000 सुविचारित ज्ञापन थे।

104 स्थानों की यात्रा की, लगभग 38,000 मील की दूरी तय की;

9,000 से अधिक लोगों से भेंट/साक्षात्कार किए—राजनीतिक दलों, विधायकों, व्यापारिक संगठनों, विश्वविद्यालयों, भाषाई संगठनों और आम नागरिकों से।

104 स्थानों का दौरा, लगभग 38,000 मील की यात्रा, 9,000 से अधिक लोगों से साक्षात्कार और दस्तावेज़ों की संख्या आयोग की रिपोर्ट में दिए गए विवरण हैं। “दस्तावेज़” और “सुविचारित ज्ञापन” अलग श्रेणियाँ हैं।

5.4 रिपोर्ट (30 सितंबर 1955; प्रकाशित 10 अक्टूबर 1955)

आयोग ने 30 सितंबर 1955 को अपनी रिपोर्ट सौंपी, जो 10 अक्टूबर 1955 को सार्वजनिक हुई। आयोग की मूल रिपोर्ट चार भागों में विभाजित थी: (1) समस्या का स्वरूप और पृष्ठभूमि, (2) पुनर्गठन के आधारभूत सिद्धांत, (3) विशिष्ट राज्यों के प्रस्ताव, (4) सुरक्षा उपाय और प्रशासनिक मामले।

(क) मूल दार्शनिक दृष्टिकोण

आयोग ने एक संतुलित, बीच का रास्ता अपनाया। उसने कहा कि:

भाषा और संस्कृति को पुनर्गठन का एक महत्वपूर्ण कारक माना जा सकता है, क्योंकि जनता की भाषा में प्रशासन लोकतंत्र को सार्थक बनाता है।

किंतु आयोग ने “एक भाषा, एक राज्य” के सिद्धांत को स्पष्ट रूप से अस्वीकार किया। भाषा एकमात्र कसौटी नहीं हो सकती।

यह भी स्वीकार किया कि भारत के अधिकांश क्षेत्रों में भाषाई एकरूपता पहले से ही प्रशासनिक इकाइयों का आधार है, इसलिए भाषा को अनदेखा भी नहीं किया जा सकता।

(ख) पुनर्गठन के चार प्रमुख आधार

आयोग ने चार मूल कसौटियाँ बताईं:

भारत की एकता और सुरक्षा का संरक्षण और सुदृढ़ीकरण;

भाषाई और सांस्कृतिक एकरूपता;

वित्तीय, आर्थिक और प्रशासनिक विचार;

राष्ट्रीय विकास योजनाओं (पंचवर्षीय योजनाओं) का सफल कार्यान्वयन और प्रत्येक राज्य की जनता का कल्याण।

(ग) चार-श्रेणी व्यवस्था का अंत

आयोग ने भाग क, ख, ग, घ की असमान व्यवस्था समाप्त करने की सिफारिश की। उसने कहा कि भाग ख के राज्यों पर विशेष नियंत्रण, राजप्रमुख का पद, और भाग ग के छोटे, अव्यवहार्य राज्य—ये सब संघीय समानता के विपरीत हैं। आयोग ने अधिकांश भाग ग राज्यों को पड़ोसी राज्यों में मिलाने और कुछ को केंद्रशासित प्रदेश बनाने का सुझाव दिया।

(घ) प्रस्तावित नक्शा

आयोग ने 16 राज्यों और 3 केंद्रशासित प्रदेशों की सिफारिश की। प्रमुख प्रस्ताव:

(ङ) बंबई पर आयोग का तर्क

बंबई आयोग के सामने सबसे कठिन प्रश्न था। बंबई शहर देश का वित्तीय और औद्योगिक केंद्र था; यहाँ मराठी भाषी बहुसंख्यक थे (लगभग 43-48 प्रतिशत), पर गुजराती व्यापारी वर्ग का आर्थिक प्रभुत्व था, और देशभर के लोग यहाँ रहते थे। आयोग ने कहा कि बंबई शहर को किसी एक भाषाई समूह को देना अन्य समूहों में असुरक्षा पैदा करेगा; इसलिए द्विभाषी बंबई राज्य “एकता का प्रयोग” हो सकता है। इसी सिफारिश ने बाद में सबसे बड़े आंदोलन को जन्म दिया।

(च) पंजाब पर आयोग का तर्क

आयोग ने अकाली दल की “पंजाबी सूबा” की माँग को अस्वीकार किया। उसका कहना था कि पंजाबी और हिंदी के बीच का भेद भाषा से अधिक लिपि (गुरमुखी बनाम देवनागरी) का है, और यह माँग वास्तव में धार्मिक आधार पर है। आयोग ने कहा कि पंजाब में भाषाई सीमाएँ स्पष्ट नहीं हैं, और यह माँग “पंजाब के दोनों समुदायों के बीच तनाव” बढ़ाएगी।

(छ) भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए सुरक्षा उपाय

आयोग ने भाषाई अल्पसंख्यकों के संरक्षण के लिए कई सिफारिशें कीं:

प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा;

किसी ज़िले में 70 प्रतिशत या अधिक अल्पसंख्यक भाषी हों तो उस भाषा को ज़िले की आधिकारिक भाषा मानना;

भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए एक विशेष अधिकारी (आयुक्त) की नियुक्ति;

अखिल भारतीय सेवाओं में कम से कम 50 प्रतिशत नई भर्तियाँ राज्य के बाहर से हों, ताकि क्षेत्रवाद कम हो;

उच्च न्यायालयों के एक-तिहाई न्यायाधीश बाहर के राज्यों से हों;

हिंदी और अंग्रेज़ी के अध्ययन को प्रोत्साहन।

(ज) भाषाई राज्यों के ख़तरों की चेतावनी

आयोग ने चेतावनी दी कि भाषाई गर्व यदि संकीर्ण क्षेत्रवाद में बदला तो वह राष्ट्रीय एकता के लिए घातक होगा। उसने कहा कि “भाषाई निष्ठा” को “राष्ट्रीय निष्ठा” के अधीन रहना चाहिए। पणिक्कर ने एक अलग नोट में उत्तर प्रदेश के विभाजन की सिफारिश की।

(झ) के. एम. पणिक्कर का असहमति नोट: उत्तर प्रदेश

पणिक्कर ने कहा कि उत्तर प्रदेश जैसा विशाल राज्य (6 करोड़ से अधिक जनसंख्या) संघीय संतुलन बिगाड़ता है—संसद में उसकी बहुत अधिक सीटें हैं, जिससे अन्य राज्यों में असंतोष होगा। उन्होंने उत्तर प्रदेश के पश्चिमी ज़िलों और मध्य भारत/विंध्य के कुछ हिस्सों को मिलाकर “आगरा राज्य” बनाने का सुझाव दिया। अन्य दो सदस्य सहमत नहीं हुए, और सरकार ने इसे स्वीकार नहीं किया। (यह बहस आज भी “बड़े राज्यों” के प्रश्न पर प्रासंगिक है।)

भाग 6: रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया और जनांदोलन (अक्टूबर 1955 – 1956)

6.1 सामान्य प्रतिक्रिया

रिपोर्ट को केरल, कर्नाटक और आंध्र में व्यापक रूप से स्वागत मिला, क्योंकि उनकी मुख्य माँगें स्वीकार की गई थीं। किंतु महाराष्ट्र, पंजाब, विदर्भ, तेलंगाना, उड़ीसा, बिहार और बंगाल में प्रतिक्रिया तीव्र और कहीं-कहीं हिंसक रही।

6.2 संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन

(क) माँग

“संयुक्त महाराष्ट्र” का अर्थ था—बंबई शहर सहित सभी मराठी भाषी क्षेत्रों (पश्चिमी महाराष्ट्र, कोंकण, मराठवाड़ा, विदर्भ) का एक राज्य। 1946 में बेलगाम में हुए मराठी साहित्य सम्मेलन में इस माँग को औपचारिक रूप दिया गया था; इसकी अध्यक्षता ग. त्र्यं. माडखोलकर ने की थी। 1946 में “संयुक्त महाराष्ट्र परिषद” बनी।

(ख) सरकार का तीन-इकाई फार्मूला (नवंबर 1955)

9 नवंबर 1955 की कांग्रेस कार्यसमिति के प्रस्ताव ने तीन इकाइयों—महाराष्ट्र, गुजरात और बंबई प्रांतीय कांग्रेस समिति के क्षेत्र पर आधारित बंबई इकाई—की बात की। इसे केंद्र सरकार की बाद की योजना के साथ न मिलाएँ: बंबई शहर को केंद्रशासित प्रदेश बनाने का प्रस्ताव अलग चरण में आया। दोनों प्रस्तावों के विरोध ने महाराष्ट्र और गुजरात के आंदोलनों को तीखा किया।

(ग) फ़्लोरा फाउंटेन और गोलीबारी (नवंबर 1955 – जनवरी 1956)

21 नवंबर 1955 को बंबई के फ़्लोरा फाउंटेन के पास प्रदर्शन पर पुलिस ने गोली चलाई। उस दिन की घटना और 1955–56 के पूरे आंदोलन में पुलिस गोलीबारी से हुई मौतों के आँकड़े अलग दायरों के हैं। 105–106 का प्रचलित आँकड़ा आंदोलन के दौरान कुल मौतों के रूप में उद्धृत होता है; इसे 21 नवंबर की एक घटना की संख्या न समझें। मोरारजी देसाई उस समय मुख्यमंत्री थे; उनके व्यक्तिगत आदेश का दावा तभी किया जाना चाहिए जब उसके लिए अलग प्राथमिक स्रोत दिया जाए। मृतकों की स्मृति में फ़्लोरा फाउंटेन का नाम बदलकर हुतात्मा चौक रखा गया।

(घ) सी. डी. देशमुख का इस्तीफ़ा

केंद्रीय वित्त मंत्री चिंतामणराव देशमुख ने बंबई के प्रश्न पर और महाराष्ट्र में हुई गोलीबारी की न्यायिक जाँच न कराए जाने के विरोध में 1956 में इस्तीफ़ा दे दिया। 25 जुलाई 1956 को लोकसभा में अपने इस्तीफ़े के बयान में उन्होंने कहा कि बंबई के मामले में निर्णय “महाराष्ट्र की जनता के साथ अन्याय” है और प्रधानमंत्री ने बिना मंत्रिमंडल से परामर्श के घोषणा की।

(ङ) संयुक्त महाराष्ट्र समिति

6 फरवरी 1956 को “संयुक्त महाराष्ट्र समिति” बनी—जिसमें केशवराव जेधे, एस. एम. जोशी, श्रीपाद अमृत डांगे, आचार्य प्र. के. अत्रे, सेनापति बापट, प्रबोधनकार ठाकरे, उद्धवराव पाटिल आदि थे। समाजवादी, कम्युनिस्ट, किसान-मज़दूर पार्टी, जनसंघ, रिपब्लिकन पार्टी (आंबेडकर के अनुयायी) सब इसमें शामिल थे। आचार्य अत्रे के अख़बार “मराठा” और शाहिरों (लोक गायकों)—जैसे शाहीर अमर शेख, अण्णा भाऊ साठे, शाहीर गवाणकर—के गीतों ने आंदोलन को जन-जन तक पहुँचाया।

(च) अंतिम मोड़: द्विभाषी बंबई (अगस्त 1956)

तीन-इकाई फार्मूले के विरोध के बीच अगस्त 1956 में संसद में अंतिम क्षणों में एक संशोधन आया, जिसे लगभग 180 सांसदों के हस्ताक्षर वाले प्रस्ताव का समर्थन था—विशाल द्विभाषी बंबई राज्य, जिसमें महाराष्ट्र, गुजरात, सौराष्ट्र, कच्छ, मराठवाड़ा और विदर्भ सब शामिल हों, और बंबई शहर राजधानी हो। सरकार ने इसे स्वीकार कर लिया। 1 नवंबर 1956 को यह राज्य बना, जिसके मुख्यमंत्री यशवंतराव चव्हाण बने।

6.3 महागुजरात आंदोलन

द्विभाषी बंबई गुजरात में भी अस्वीकार्य था। 8 अगस्त 1956 को अहमदाबाद में कांग्रेस भवन के सामने छात्रों पर पुलिस गोलीबारी में कई छात्र मारे गए। इसके बाद इंदुलाल याज्ञिक (“इंदु चाचा”) के नेतृत्व में “महागुजरात जनता परिषद” बनी। अनंतम IAS के विवरण के अनुसार इस आंदोलन ने अलग गुजरात राज्य के लिए निरंतर संघर्ष किया।

6.4 1957 के चुनाव और द्विभाषी राज्य का अंत

1957 के चुनावों में संयुक्त महाराष्ट्र समिति और महागुजरात परिषद ने कांग्रेस को भारी चुनौती दी। पश्चिमी महाराष्ट्र और बंबई शहर में समिति ने अधिकांश सीटें जीतीं; कांग्रेस विदर्भ और गुजरात की सीटों के बल पर ही बहुमत बचा सकी। 1959 में इंदिरा गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बनीं और उन्होंने विभाजन के पक्ष में राय दी। अंततः बंबई पुनर्गठन अधिनियम, 1960 से 1 मई 1960 को महाराष्ट्र (बंबई सहित) और गुजरात (राजधानी अहमदाबाद, बाद में गांधीनगर) अलग राज्य बने। गल्फ़ न्यूज़ के लेख में इस संघर्ष का विवरण है। 1 मई “महाराष्ट्र दिवस” और “गुजरात दिवस” के रूप में मनाया जाता है।

6.5 पंजाबी सूबा आंदोलन

मास्टर तारा सिंह के नेतृत्व में अकाली दल ने आयोग के निर्णय का विरोध किया और “पंजाबी सूबा” के लिए मोर्चे लगाए। 1955 में “पंजाबी सूबा ज़िंदाबाद” नारे पर प्रतिबंध के विरुद्ध मोर्चे में हज़ारों लोग गिरफ्तार हुए; 4 जुलाई 1955 को पुलिस स्वर्ण मंदिर परिसर में प्रवेश कर गई, जिस पर तीव्र आक्रोश फैला। 1956 में “क्षेत्रीय फार्मूला” (Regional Formula) आया, जिसमें पंजाब को एक रखते हुए पंजाबी और हिंदी क्षेत्रों के लिए अलग क्षेत्रीय समितियाँ बनाई गईं। पेप्सू का पंजाब में विलय हुआ।

यह समाधान अस्थायी रहा। संत फ़तेह सिंह के अनशन और 1965 के युद्ध के बाद, पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 से 1 नवंबर 1966 को पंजाब (पंजाबी भाषी) और हरियाणा (हिंदी भाषी) बने, पहाड़ी क्षेत्र हिमाचल प्रदेश को दिए गए, और चंडीगढ़ दोनों की संयुक्त राजधानी तथा केंद्रशासित प्रदेश बना।

6.6 विदर्भ

आयोग ने अलग विदर्भ राज्य की सिफारिश की थी, किंतु सरकार ने इसे स्वीकार नहीं किया। 1953 का नागपुर समझौता—जो पश्चिमी महाराष्ट्र, विदर्भ और मराठवाड़ा के नेताओं के बीच हुआ था—विदर्भ को विकास में समान हिस्सेदारी, विधानसभा का एक सत्र नागपुर में और उच्च न्यायालय की पीठ जैसे आश्वासन देता था। विदर्भ द्विभाषी बंबई (1956) और फिर महाराष्ट्र (1960) का हिस्सा बना। अलग विदर्भ की माँग आज भी समय-समय पर उठती है।

6.7 तेलंगाना और विशाल आंध्र

आयोग ने तेलंगाना को फिलहाल अलग रखने की सिफारिश की थी, यह कहते हुए कि तेलंगाना के लोगों में तटीय आंध्र के प्रभुत्व का भय है। किंतु “विशाल आंध्र” आंदोलन (कम्युनिस्टों और आंध्र कांग्रेस का समर्थन) और केंद्र की राय के चलते 20 फरवरी 1956 को “सज्जन समझौता” (Gentlemen’s Agreement) हुआ। इसमें आंध्र के नेताओं (बेज़वाड़ा गोपाल रेड्डी, नीलम संजीव रेड्डी, गौथु लच्छन्ना, अल्लूरी सत्यनारायण राजू) और तेलंगाना के नेताओं (बी. रामकृष्ण राव, के. वी. रंगा रेड्डी, एम. चेन्ना रेड्डी, जे. वी. नरसिंग राव) ने हस्ताक्षर किए। इसमें तेलंगाना के लिए क्षेत्रीय परिषद, मंत्रिमंडल में 40 प्रतिशत हिस्सेदारी, मुल्की नियम (स्थानीय निवास आधारित नौकरियाँ), तेलंगाना के राजस्व का वहीं उपयोग, और मुख्यमंत्री या उप-मुख्यमंत्री में से एक तेलंगाना से होने जैसे आश्वासन थे।

1 नवंबर 1956 को आंध्र प्रदेश बना, जिसकी राजधानी हैदराबाद रही; पहले मुख्यमंत्री नीलम संजीव रेड्डी बने। इन आश्वासनों के उल्लंघन की शिकायतें 1969 के “जय तेलंगाना” आंदोलन और अंततः 2014 में तेलंगाना राज्य के गठन का आधार बनीं।

6.8 बिहार-बंगाल सीमा विवाद

आयोग ने बिहार के पूर्णिया ज़िले का कुछ भाग और मानभूम का पुरुलिया क्षेत्र पश्चिम बंगाल को देने की सिफारिश की। इससे बिहार और बंगाल दोनों में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। जनवरी 1956 में दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों—डॉ. बिधान चंद्र रॉय और डॉ. श्रीकृष्ण सिंह—ने बिहार और बंगाल के विलय का अप्रत्याशित प्रस्ताव रखा, ताकि विवाद समाप्त हो सके। इस प्रस्ताव का बंगाल में भारी विरोध हुआ; कलकत्ता उत्तर-पश्चिम उपचुनाव (1956) में कांग्रेस की हार के बाद प्रस्ताव वापस लिया गया। अंततः बिहार और पश्चिम बंगाल (क्षेत्र हस्तांतरण) अधिनियम, 1956 से पुरुलिया और पूर्णिया का कुछ भाग (इस्लामपुर क्षेत्र) बंगाल को दिया गया।

6.9 उड़ीसा और सरायकेला-खरसावाँ

उड़ीसा ने सरायकेला और खरसावाँ (जो 1948 में बिहार में मिलाए गए थे) की वापसी की माँग की, जिसे आयोग ने अस्वीकार किया। उड़ीसा में इस पर विरोध हुआ।

6.10 झारखंड की माँग

जयपाल सिंह मुंडा के नेतृत्व में झारखंड पार्टी ने छोटानागपुर और संथाल परगना के आदिवासी क्षेत्रों को मिलाकर अलग झारखंड राज्य की माँग की थी। आयोग ने इसे अस्वीकार किया, यह कहते हुए कि क्षेत्र में आदिवासी बहुसंख्यक नहीं हैं, और कोई एक साझी भाषा नहीं है। (झारखंड 15 नवंबर 2000 को बना।)

6.11 बेलगाम (बेळगावी) विवाद

आयोग ने बेलगाम ज़िले को—जिसमें बेलगाम शहर मराठी-बहुल था—कर्नाटक (मैसूर) को दिया। महाराष्ट्र ने इसका विरोध किया, और यह विवाद 1956 से आज तक जारी है। 1966 में महाजन आयोग बना, जिसकी 1967 की रिपोर्ट महाराष्ट्र ने अस्वीकार कर दी। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में भी लंबित है। “महाराष्ट्र एकीकरण समिति” बेलगाम और आसपास के मराठी भाषी क्षेत्रों को महाराष्ट्र में मिलाने के लिए आंदोलन करती रही है।

6.12 दक्षिण के अन्य सीमा विवाद

कन्याकुमारी: त्रावणकोर-कोचीन के दक्षिणी तमिल तालुक (तोवलै, अगस्तीश्वरम, कल्कुलम, विलवनकोड) मद्रास को दिए गए; इसके लिए 1954 में “त्रावणकोर तमिलनाडु कांग्रेस” के आंदोलन में मार्तांडम और पुदुक्कड़ई में पुलिस गोलीबारी हुई थी। शेनकोट्टई तालुक का भी कुछ भाग मद्रास को गया।

देवीकुलम और पीरमेड: इन पर तमिलनाडु का दावा था, पर ये केरल में रहे।

कासरगोड: दक्षिण कन्नड़ से केरल को दिया गया, जिस पर कर्नाटक में असंतोष रहा।

तिरुत्तणि: यह क्षेत्र आंध्र से 1960 में मद्रास को दिया गया (म. पो. शिवज्ञानम—“मा पो सी”—के आंदोलन के बाद), बदले में कुछ क्षेत्र आंध्र को मिले।

भाग 7: संसद में बहस और अधिनियम (1955-1956)

7.1 संसदीय प्रक्रिया

दिसंबर 1955 में लोकसभा और राज्यसभा में आयोग की रिपोर्ट पर विस्तृत बहस हुई—लोकसभा में 14 से 23 दिसंबर 1955 के बीच कई दिनों तक। इसके बाद सरकार ने राज्यों की विधानसभाओं की राय ली (अनुच्छेद 3 के तहत), और मार्च 1956 में राज्य पुनर्गठन विधेयक संसद में प्रस्तुत हुआ। विधेयक संयुक्त प्रवर समिति को भेजा गया, फिर अगस्त 1956 में पारित हुआ। राष्ट्रपति की स्वीकृति 31 अगस्त 1956 को मिली।

गृह मंत्री गोविंद बल्लभ पंत ने विधेयक का संचालन किया। (पंत 1955 में गृह मंत्री बने थे।)

7.2 बहस के प्रमुख स्वर

जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि पुनर्गठन एक “ज़रूरी बुराई” नहीं, पर भावनाओं के उबाल ने देश को चिंतित कर दिया है। उन्होंने अपील की कि राज्यों की सीमाओं को “दीवारें” न माना जाए; भारत एक है, और राज्य केवल प्रशासनिक इकाइयाँ हैं। उन्होंने यह भी सुझाव दिया था कि कुछ राज्यों को मिलाकर “क्षेत्र” या “ज़ोन” बनाए जाएँ।

गोविंद बल्लभ पंत ने कहा कि सरकार ने आयोग की रिपोर्ट को आधार मानकर अधिकतम सहमति बनाने का प्रयास किया है, और जहाँ विचलन हुआ है वहाँ जनभावना और राष्ट्रीय हित दोनों का ध्यान रखा गया है।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी का निधन 1953 में हो चुका था; जनसंघ ने इस बहस में भाषाई राज्यों के बजाय एकात्मक शासन और “जनपदों” (छोटी प्रशासनिक इकाइयों) का विचार रखा।

ए. के. गोपालन और एस. ए. डांगे जैसे कम्युनिस्ट नेताओं ने भाषाई राज्यों का प्रबल समर्थन किया और बंबई महाराष्ट्र को देने की माँग की। कम्युनिस्टों के लिए भाषाई राज्य “राष्ट्रीयताओं” के लोकतांत्रिक अधिकार का प्रश्न था।

डॉ. आंबेडकर (तब राज्यसभा सदस्य) ने 1955 में “थॉट्स ऑन लिंग्विस्टिक स्टेट्स” नाम की पुस्तिका लिखी। उन्होंने “एक राज्य, एक भाषा” का समर्थन किया—“एक भाषा, एक राज्य” का नहीं। अर्थात एक भाषा बोलने वाले लोग कई राज्यों में बँट सकते हैं, पर एक राज्य की एक ही राजभाषा होनी चाहिए। उन्होंने उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे विशाल हिंदी राज्यों को विभाजित करने का सुझाव दिया—उत्तर प्रदेश को तीन, बिहार को दो, मध्य प्रदेश को दो भागों में—ताकि उत्तर का दक्षिण पर प्रभुत्व न हो। उन्होंने महाराष्ट्र को भी चार भागों में बाँटने का सुझाव दिया था, और बंबई को अलग शहर-राज्य बनाने का। उन्होंने हैदराबाद को भारत की दूसरी राजधानी बनाने का भी प्रस्ताव दिया था।

राम मनोहर लोहिया और समाजवादियों ने भाषाई राज्यों का समर्थन किया, साथ ही अंग्रेज़ी हटाने और भारतीय भाषाओं को प्रशासन में लाने पर बल दिया।

एन. सी. चटर्जी (हिंदू महासभा) ने बंगाल के दावों का समर्थन किया।

हुकम सिंह और अकाली सांसदों ने पंजाबी सूबे की माँग दोहराई।

7.3 सातवाँ संविधान संशोधन, 1956

राज्य पुनर्गठन को संवैधानिक रूप देने के लिए संविधान (सातवाँ संशोधन) अधिनियम, 1956 पारित हुआ, जो भी 1 नवंबर 1956 से लागू हुआ। इसके प्रमुख प्रावधान:

भाग क, ख, ग, घ की श्रेणियाँ समाप्त; अब केवल “राज्य” और “केंद्रशासित प्रदेश”।

पहली अनुसूची में नए राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की सूची।

राजप्रमुख का पद समाप्त; सभी राज्यों में राज्यपाल।

अनुच्छेद 239 और 240 के तहत केंद्रशासित प्रदेशों का प्रशासन राष्ट्रपति द्वारा प्रशासक के माध्यम से।

एक ही व्यक्ति दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल हो सकता है (अनुच्छेद 153 में संशोधन)।

दो या अधिक राज्यों के लिए एक साझा उच्च न्यायालय (अनुच्छेद 231)।

उच्च न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र का केंद्रशासित प्रदेशों तक विस्तार।

अनुच्छेद 350A (प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की सुविधा) और अनुच्छेद 350B (भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी) जोड़े गए—ये आयोग की सिफारिशों से आए।

अनुच्छेद 371 में संशोधन: आंध्र प्रदेश (तेलंगाना के लिए क्षेत्रीय समिति) और बंबई (विदर्भ, मराठवाड़ा, सौराष्ट्र, कच्छ के लिए विकास बोर्ड) के लिए विशेष प्रावधान।

लोकसभा और विधानसभाओं की सीटों का पुनर्निर्धारण; लोकसभा की अधिकतम संख्या 500 (बाद में बढ़ाई गई)।

अनुच्छेद 258A: राज्यपाल, भारत सरकार की सहमति से, राज्य की कार्यकारी शक्ति से जुड़े कार्य संघ या उसके अधिकारियों को सौंप सकते हैं।

सातवीं अनुसूची में भी कुछ संशोधन।

7.4 राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 (अधिनियम संख्या 37)

इंडिया कोड पर उपलब्ध अधिनियम (तथा इंडियन कानून) में 14 भाग, 130 से अधिक धाराएँ और कई अनुसूचियाँ हैं। मुख्य विषय:

भाग II: क्षेत्रीय परिवर्तन—हर नए/परिवर्तित राज्य की सीमाएँ।

भाग III: “क्षेत्रीय परिषदें” (Zonal Councils) — देश को पाँच क्षेत्रों में बाँटा गया।

भाग IV-V: विधानमंडलों में प्रतिनिधित्व, सीटों का आवंटन, विधायकों का पुनर्वितरण।

भाग VI: उच्च न्यायालय।

भाग VII-VIII: संपत्तियों, दायित्वों, ऋणों और राजस्व का बँटवारा।

भाग IX-X: सेवाओं का बँटवारा—कर्मचारियों और अधिकारियों का आवंटन।

भाग XI: विधिक और विविध प्रावधान, जैसे कानूनों की निरंतरता।

7.5 क्षेत्रीय परिषदें (Zonal Councils)

नेहरू के सुझाव पर अधिनियम की धारा 15-22 के तहत पाँच क्षेत्रीय परिषदें बनीं—उत्तरी, मध्य, पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी। इनकी अध्यक्षता केंद्रीय गृह मंत्री करते हैं, और सदस्य संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्री तथा दो-दो मंत्री होते हैं। इनका उद्देश्य था—अंतर-राज्यीय विवादों, सीमा, भाषाई अल्पसंख्यकों, आर्थिक नियोजन, परिवहन आदि पर सहयोग। ये सलाहकारी निकाय हैं। (1971 में पूर्वोत्तर परिषद अलग से बनी।)

भाग 8: 1 नवंबर 1956 — नया भारत

8.1 नए राज्य और केंद्रशासित प्रदेश

केंद्रशासित प्रदेश (6): दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, लक्कदीव-मिनिकॉय-अमीनदीवी द्वीप (आज लक्षद्वीप)।

8.2 नए राज्यों का जन्म-दिवस

केरल: 1 नवंबर—“केरल पिरवी”। पहले मुख्यमंत्री 1957 में चुने गए ई. एम. एस. नंबूदिरिपाद—विश्व की पहली लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई कम्युनिस्ट सरकारों में से एक। (1956-57 में केरल में राष्ट्रपति शासन रहा।)

मैसूर: 1 नवंबर—“कन्नड़ राज्योत्सव”। पहले मुख्यमंत्री एस. निजलिंगप्पा। “कर्नाटक एकीकरण” आंदोलन—आलूरु वेंकटराव, जिन्हें “कर्नाटक कुलपुरोहित” कहा जाता है—का स्वप्न पूरा हुआ। राज्य का नाम 1 नवंबर 1973 को “कर्नाटक” हुआ।

मध्य प्रदेश: 1 नवंबर—“मध्य प्रदेश स्थापना दिवस”। पहले मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल (31 दिसंबर 1956 को उनका निधन)। भोपाल को राजधानी बनाया गया—जबलपुर, ग्वालियर, इंदौर की दावेदारी के बीच।

आंध्र प्रदेश: 1 नवंबर—पहले मुख्यमंत्री नीलम संजीव रेड्डी।

हैदराबाद राज्य का अंत—निज़ाम की पुरानी रियासत तीन भाषाई हिस्सों में बँट गई।

8.3 राजप्रमुखों का युग समाप्त

भाग ख राज्यों के राजप्रमुख (जैसे हैदराबाद के निज़ाम, मैसूर के महाराजा जयचामराजेंद्र वाडियार, त्रावणकोर के महाराजा, ग्वालियर के जीवाजीराव सिंधिया आदि) के पद समाप्त हुए। मैसूर के महाराजा नए मैसूर राज्य के पहले राज्यपाल बने (1956-64)।

भाग 9: 1956 के बाद — पुनर्गठन की अगली लहरें

ध्यान देने योग्य है कि 2000 के बाद के पुनर्गठन मुख्यतः भाषा नहीं, बल्कि क्षेत्रीय विकास, आदिवासी पहचान और प्रशासनिक सुविधा के आधार पर हुए। छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड तीनों हिंदी भाषी राज्यों से बने।

द्वितीय राज्य पुनर्गठन आयोग की माँग समय-समय पर उठती रही है—विदर्भ, गोरखालैंड, बुंदेलखंड, पूर्वांचल, हरित प्रदेश, बोडोलैंड, कूर्ग आदि के संदर्भ में। 2011 में उत्तर प्रदेश विधानसभा ने राज्य को चार भागों (पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश, पश्चिम प्रदेश) में बाँटने का प्रस्ताव पारित किया था, पर केंद्र ने इस पर कार्रवाई नहीं की।

भाग 10: विश्लेषण — भाषाई पुनर्गठन ने भारत को तोड़ा या जोड़ा?

10.1 1950 के दशक की आशंकाएँ

नेहरू, पटेल, धर आयोग और जेवीपी समिति—सभी को डर था कि भाषाई राज्य “उप-राष्ट्रवाद” को जन्म देंगे, जो अंततः अलगाववाद में बदल सकता है। सेलिग हैरिसन ने अपनी पुस्तक “इंडिया: द मोस्ट डेंजरस डिकेड्स” (1960) में आशंका जताई कि भाषाई राज्यों से भारत बाल्कन प्रायद्वीप की तरह बिखर सकता है।

10.2 वास्तविक परिणाम

इतिहासकारों का बड़ा वर्ग—जैसे रामचंद्र गुहा (“इंडिया आफ़्टर गांधी”), बिपन चंद्र, मृदुला मुखर्जी और आदित्य मुखर्जी (“इंडिया सिंस इंडिपेंडेंस”)—मानता है कि भाषाई पुनर्गठन ने अंततः भारत को मज़बूत किया:

लोकतंत्र का गहराना: राज्यों का प्रशासन, शिक्षा और न्याय जनता की भाषा में होने लगा। नया, गैर-अंग्रेज़ी-भाषी राजनीतिक नेतृत्व उभरा—किसान, मध्यम वर्ग, पिछड़ी जातियों से।

अलगाववाद का शमन: भाषाई आकांक्षाओं को व्यवस्था के भीतर स्थान मिलने से वे अलगाव की ओर नहीं गईं। 1960 के दशक में तमिलनाडु में डीएमके की अलगाववादी माँग थी, जिसे पार्टी ने 1963 में छोड़ दिया—यह भारतीय संघ की लचीलेपन की सफलता मानी जाती है।

संघवाद को स्थिरता: विविधता को स्वीकार करने वाला संघ अधिक टिकाऊ सिद्ध हुआ। भाषा “विभाजन” का नहीं, “भागीदारी” का आधार बनी।

क्षेत्रीय साहित्य और संस्कृति को बढ़ावा: राज्य सरकारों ने भाषाओं, साहित्य अकादमियों, विश्वविद्यालयों को संरक्षण दिया।

बिपन चंद्र और उनके सहयोगियों ने लिखा कि भाषाई राज्यों के गठन ने राष्ट्रीय एकता को कमज़ोर करने के बजाय उसे “सुदृढ़” किया, क्योंकि इसने एक बड़े असंतोष के स्रोत को दूर किया।

10.3 सीमाएँ और अनसुलझे प्रश्न

अंतर-राज्यीय सीमा विवाद: बेलगाम, कासरगोड, चंडीगढ़, असम-मेघालय/नागालैंड/मिज़ोरम सीमा विवाद आज भी हैं।

नदी जल विवाद: कावेरी (कर्नाटक-तमिलनाडु), कृष्णा, सतलुज-यमुना लिंक नहर (पंजाब-हरियाणा) आदि विवादों में भाषाई-क्षेत्रीय पहचान ने तीव्रता जोड़ी।

भाषाई अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार: हर राज्य में भाषाई अल्पसंख्यक हैं; अनुच्छेद 350A और 350B के बावजूद उनकी शिकायतें बनी रहती हैं।

“धरती पुत्र” (sons of the soil) राजनीति: 1960 के दशक में शिवसेना का दक्षिण भारतीयों के विरुद्ध आंदोलन, असम आंदोलन (1979-85), आदि भाषाई-क्षेत्रीय पहचान के उग्र रूप थे।

हिंदी पट्टी का असंतुलन: हिंदी भाषी क्षेत्रों को भाषाई आधार पर कई राज्यों में बाँटा गया, जबकि अन्य भाषाओं के लिए एक-एक राज्य बना। इससे “एक भाषा, अनेक राज्य” का मॉडल भी सामने आया—जैसा आंबेडकर ने सुझाया था।

राज्यों के भीतर क्षेत्रीय असंतुलन: तेलंगाना, विदर्भ, मराठवाड़ा, सौराष्ट्र, बुंदेलखंड, उत्तर कर्नाटक जैसे क्षेत्रों में विकास के असंतुलन ने नई माँगों को जन्म दिया। तेलंगाना का अलग होना (2014) दिखाता है कि एक भाषा भी एकता की गारंटी नहीं।

10.4 फ़ज़ल अली आयोग की दूरदर्शिता

आयोग की सबसे बड़ी अंतर्दृष्टि यह थी कि भाषा “एकमात्र” कसौटी नहीं होनी चाहिए। बाद के अनुभव—तेलंगाना, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड—ने दिखाया कि आर्थिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक कारक भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। आयोग की भाषाई अल्पसंख्यकों के संरक्षण संबंधी सिफारिशें आंशिक रूप से ही लागू हुईं; अखिल भारतीय सेवाओं और न्यायपालिका में बाहरी भर्ती का सुझाव आंशिक रूप से अपनाया गया।

भाग 11: प्रमुख व्यक्तित्व

पोट्टि श्रीरामुलु — “अमरजीवी”, जिनके बलिदान ने भाषाई पुनर्गठन का रास्ता खोला।

सैयद फ़ज़ल अली — आयोग के अध्यक्ष; न्यायिक संतुलन के प्रतीक।

हृदयनाथ कुंजरू — उदारवादी, संविधानविद; हिमाचल के विलय पर असहमत।

के. एम. पणिक्कर — इतिहासकार; उत्तर प्रदेश के विभाजन पर असहमति नोट।

जवाहरलाल नेहरू — प्रारंभिक अनिच्छा से लेकर अंततः स्वीकृति तक; क्षेत्रीय परिषदों के प्रवर्तक।

गोविंद बल्लभ पंत — गृह मंत्री; अधिनियम के संचालक।

सी. डी. देशमुख — बंबई प्रश्न पर इस्तीफ़ा देने वाले वित्त मंत्री।

मोरारजी देसाई — बंबई के मुख्यमंत्री; गोलीबारी के लिए आलोचना के केंद्र।

यशवंतराव चव्हाण — द्विभाषी बंबई और फिर महाराष्ट्र के पहले मुख्यमंत्री।

एस. एम. जोशी, एस. ए. डांगे, आचार्य अत्रे, सेनापति बापट, प्रबोधनकार ठाकरे — संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन।

इंदुलाल याज्ञिक — महागुजरात आंदोलन।

मास्टर तारा सिंह, संत फ़तेह सिंह — पंजाबी सूबा आंदोलन।

टी. प्रकाशम्, नीलम संजीव रेड्डी — आंध्र।

आलूरु वेंकटराव, एस. निजलिंगप्पा — कर्नाटक एकीकरण।

ई. एम. एस. नंबूदिरिपाद, के. केलप्पन — “ऐक्य केरलम्” आंदोलन।

जयपाल सिंह मुंडा — झारखंड की माँग।

डॉ. बी. आर. आंबेडकर — “थॉट्स ऑन लिंग्विस्टिक स्टेट्स”।

म. पो. शिवज्ञानम — तमिल सीमा आंदोलन।

भाग 12: निष्कर्ष

1956 का राज्य पुनर्गठन स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े राजनीतिक-प्रशासनिक प्रयोगों में से एक था। यह उस राष्ट्रीय आंदोलन के वादे की पूर्ति थी, जिसने 1920 में ही भाषा को जन-राजनीति का आधार माना था; पर यह पूर्ति सहज नहीं थी—इसके लिए एक गांधीवादी को प्राण देने पड़े, सैकड़ों लोग गोलीबारी में मारे गए, और देश ने महीनों तक हिंसा और अनिश्चितता देखी।

नेतृत्व की प्रारंभिक हिचक विभाजन की पृष्ठभूमि में समझी जा सकती है। किंतु अंततः भारत ने जो रास्ता चुना—भाषा को महत्वपूर्ण पर एकमात्र नहीं, कसौटी मानना; संसद को सीमाएँ बदलने की लचीली शक्ति देना; भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए संवैधानिक सुरक्षा; क्षेत्रीय परिषदों के माध्यम से सहयोग—उसने भारत को “विविधता में एकता” का एक व्यावहारिक संघीय मॉडल दिया।

1 नवंबर 1956 के बाद भारत का मानचित्र बार-बार बदला है, और शायद आगे भी बदलेगा। पर फ़ज़ल अली आयोग का मूल संदेश—कि राज्यों की सीमाएँ प्रशासनिक रेखाएँ हैं, राष्ट्र की दीवारें नहीं—आज भी भारतीय संघवाद की आधारशिला है।

परिशिष्ट क: समय-रेखा

  • 1903 — उत्कल सम्मिलनी की स्थापना
  • 1905 / 1911 — बंगाल विभाजन / रद्द; बिहार-उड़ीसा अलग
  • 1913 — पहली आंध्र महासभा, बापटला
  • 1917 — आंध्र प्रांतीय कांग्रेस समिति
  • दिसंबर 1920 — नागपुर कांग्रेस: भाषाई आधार पर प्रदेश कांग्रेस समितियाँ
  • 1928 — नेहरू रिपोर्ट द्वारा भाषाई प्रांतों का समर्थन
  • 1 अप्रैल 1936 — उड़ीसा प्रांत
  • 1946 — संयुक्त महाराष्ट्र परिषद; बेलगाम मराठी साहित्य सम्मेलन
  • जून 1948 — धर आयोग गठित
  • 10 दिसंबर 1948 — धर आयोग रिपोर्ट
  • 1 अप्रैल 1949 — जेवीपी समिति रिपोर्ट
  • 26 जनवरी 1950 — संविधान लागू; अनुच्छेद 3
  • 19 अक्टूबर 1952 — पोट्टि श्रीरामुलु का अनशन आरंभ
  • 15 दिसंबर 1952 — श्रीरामुलु की मृत्यु
  • 19 दिसंबर 1952 — नेहरू द्वारा आंध्र की घोषणा
  • 1 अक्टूबर 1953 — आंध्र राज्य
  • 22 दिसंबर 1953 — राज्य पुनर्गठन आयोग की घोषणा
  • 30 सितंबर 1955 — आयोग की रिपोर्ट सौंपी गई
  • 10 अक्टूबर 1955 — रिपोर्ट प्रकाशित
  • 21 नवंबर 1955 — बंबई में फ़्लोरा फाउंटेन गोलीबारी
  • दिसंबर 1955 — संसद में रिपोर्ट पर बहस
  • जनवरी 1956 — बंबई में फिर गोलीबारी; बिहार-बंगाल विलय प्रस्ताव
  • 6 फरवरी 1956 — संयुक्त महाराष्ट्र समिति
  • 20 फरवरी 1956 — आंध्र-तेलंगाना सज्जन समझौता
  • 8 अगस्त 1956 — अहमदाबाद में छात्रों पर गोलीबारी; महागुजरात आंदोलन
  • अगस्त 1956 — राज्य पुनर्गठन विधेयक पारित; द्विभाषी बंबई
  • 31 अगस्त 1956 — राष्ट्रपति की स्वीकृति
  • 1 नवंबर 1956 — राज्य पुनर्गठन अधिनियम और सातवाँ संशोधन लागू
  • 1 मई 1960 — महाराष्ट्र और गुजरात
  • 1 नवंबर 1966 — पंजाब, हरियाणा

परिशिष्ट ख: आयोग की सिफारिश बनाम सरकार का अंतिम निर्णय

1950 की मूल संवैधानिक राज्य-श्रेणियां

  • भाग क (9) — पूर्व ब्रिटिश प्रांत; राज्यपाल — असम, बिहार, बंबई, मध्य प्रदेश, मद्रास, उड़ीसा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल
  • भाग ख (9) — पूर्व रियासतें/संघ; राजप्रमुख — हैदराबाद, जम्मू-कश्मीर, मध्य भारत, मैसूर, पेप्सू, राजस्थान, सौराष्ट्र, त्रावणकोर-कोचीन, विंध्य प्रदेश
  • भाग ग (10) — चीफ कमिश्नर/उपराज्यपाल — अजमेर, भोपाल, बिलासपुर, कूच-बिहार (पश्चिम बंगाल में विलय 1 जनवरी 1950 से प्रभावी), कुर्ग, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, कच्छ, मणिपुर, त्रिपुरा
  • भाग घ (1) — केंद्र प्रशासित — अंडमान और निकोबार द्वीप समूह

राज्य पुनर्गठन आयोग की प्रमुख सिफारिशें

  • केरल — त्रावणकोर-कोचीन (दक्षिणी तमिल तालुकों को छोड़कर) + मद्रास का मालाबार ज़िला + कासरगोड
  • कर्नाटक (मैसूर) — मैसूर + बंबई के कन्नड़ ज़िले + हैदराबाद के कन्नड़ ज़िले + मद्रास का दक्षिण कन्नड़ (कासरगोड छोड़कर) + कुर्ग + बेल्लारी
  • आंध्र — मौजूदा आंध्र; तेलंगाना को फिलहाल अलग “हैदराबाद राज्य” के रूप में रखा जाए, 1961 के चुनावों के बाद विधानसभा के दो-तिहाई बहुमत से विलय का निर्णय
  • हैदराबाद — तेलंगाना क्षेत्र का अलग राज्य; मराठवाड़ा बंबई को, कन्नड़ ज़िले कर्नाटक को
  • बंबई — द्विभाषी बंबई राज्य (महाराष्ट्र + गुजरात + सौराष्ट्र + कच्छ + मराठवाड़ा), किंतु विदर्भ अलग
  • विदर्भ — मध्य प्रदेश के मराठी भाषी ज़िलों से अलग विदर्भ राज्य (राजधानी नागपुर)
  • मध्य प्रदेश — पुराने मध्य प्रदेश के हिंदी भाषी ज़िले + मध्य भारत + विंध्य प्रदेश + भोपाल (+ राजस्थान का सिरोंज)
  • राजस्थान — राजस्थान + अजमेर + आबू (बंबई से) + मध्य भारत का सुनेल टप्पा
  • पंजाब — पंजाब + पेप्सू + हिमाचल प्रदेश (कुंजरू हिमाचल के विलय से असहमत थे)
  • असम, उड़ीसा, बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल — अपेक्षाकृत छोटे परिवर्तन; बिहार का कुछ क्षेत्र पश्चिम बंगाल को
  • जम्मू-कश्मीर — यथावत
  • केंद्रशासित प्रदेश — दिल्ली, मणिपुर, अंडमान-निकोबार

1 नवंबर 1956 को बने 14 राज्य

  • 1 — आंध्र प्रदेश — आंध्र + हैदराबाद का तेलंगाना क्षेत्र — हैदराबाद
  • 2 — असम — लगभग यथावत — शिलांग
  • 3 — बिहार — कुछ क्षेत्र पश्चिम बंगाल को — पटना
  • 4 — बंबई — बंबई + सौराष्ट्र + कच्छ + मराठवाड़ा + विदर्भ (द्विभाषी); कन्नड़ ज़िले मैसूर को, आबू राजस्थान को — बंबई
  • 5 — जम्मू और कश्मीर — यथावत — श्रीनगर/जम्मू
  • 6 — केरल — त्रावणकोर-कोचीन (दक्षिणी तालुकों के बिना) + मालाबार + कासरगोड — त्रिवेंद्रम
  • 7 — मध्य प्रदेश — पुराने म.प्र. के हिंदी ज़िले + मध्य भारत + विंध्य प्रदेश + भोपाल — भोपाल
  • 8 — मद्रास — मालाबार और दक्षिण कन्नड़ के बिना; कन्याकुमारी और शेनकोट्टई जुड़े — मद्रास
  • 9 — मैसूर — मैसूर + कुर्ग + बंबई, हैदराबाद और मद्रास के कन्नड़ क्षेत्र + बेल्लारी का शेष क्षेत्र (अलूर, अदोनी और रायादुर्ग 1953 में आंध्र में) — बंगलौर
  • 10 — उड़ीसा — यथावत — भुवनेश्वर
  • 11 — पंजाब — पंजाब + पेप्सू — चंडीगढ़
  • 12 — राजस्थान — राजस्थान + अजमेर + आबू + सुनेल टप्पा; सिरोंज म.प्र. को — जयपुर
  • 13 — उत्तर प्रदेश — यथावत — लखनऊ
  • 14 — पश्चिम बंगाल — पुरुलिया और पूर्णिया का कुछ भाग जुड़ा — कलकत्ता

आयोग की सिफारिश और अंतिम निर्णय: प्रमुख अंतर

  • राज्यों की संख्या — 16 राज्य, 3 केंद्रशासित — 14 राज्य, 6 केंद्रशासित
  • बंबई — द्विभाषी, विदर्भ अलग — विशाल द्विभाषी, विदर्भ सहित
  • विदर्भ — अलग राज्य — बंबई में शामिल
  • हैदराबाद/तेलंगाना — 1961 तक अलग — आंध्र प्रदेश में विलय
  • हिमाचल प्रदेश — पंजाब में विलय — केंद्रशासित प्रदेश
  • मणिपुर, त्रिपुरा — मणिपुर केंद्रशासित, त्रिपुरा असम में — दोनों केंद्रशासित
  • पंजाबी सूबा — अस्वीकृत — अस्वीकृत (क्षेत्रीय फार्मूला)
  • उत्तर प्रदेश विभाजन — पणिक्कर का असहमति नोट — अस्वीकृत
  • झारखंड — अस्वीकृत — अस्वीकृत

1956 के बाद भारत के मानचित्र में अगली बड़ी तब्दीलियां

  • 1960 — बंबई का विभाजन: महाराष्ट्र और गुजरात
  • 1961 — दादरा-नगर हवेली केंद्रशासित प्रदेश
  • 1962 — गोवा, दमन-दीव (1961 में मुक्ति); पुदुच्चेरी (1962 वास्तविक हस्तांतरण, 1963 केंद्रशासित)
  • 1963 — नागालैंड राज्य (16वाँ राज्य)
  • 1966 — पंजाब का विभाजन: पंजाब, हरियाणा; चंडीगढ़ केंद्रशासित
  • 1969 — मद्रास का नाम “तमिलनाडु” (1969 से प्रभावी)
  • 1971 — हिमाचल प्रदेश राज्य
  • 1972 — मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा राज्य; मिज़ोरम और अरुणाचल केंद्रशासित
  • 1973 — मैसूर का नाम “कर्नाटक”
  • 1975 — सिक्किम भारत का 22वाँ राज्य
  • 1987 — मिज़ोरम, अरुणाचल प्रदेश, गोवा राज्य
  • 2000 — छत्तीसगढ़, उत्तरांचल (उत्तराखंड), झारखंड
  • 2014 — तेलंगाना
  • 2019 — जम्मू-कश्मीर और लद्दाख केंद्रशासित प्रदेश
  • 2020 — दादरा-नगर हवेली और दमन-दीव का विलय

स्रोत और आगे पढ़ने के लिए

भारत का संविधान, 1950 — मूल प्रथम अनुसूची तथा अनुच्छेद 3, 4 और 258A।

आंध्र राज्य अधिनियम, 1953 — अधिनियम संख्या 30, भारत का राजपत्र / इंडिया कोड।

कांग्रेस कार्यसमिति का बंबई संबंधी प्रस्ताव, 9 नवंबर 1955 — जवाहरलाल नेहरू अभिलेखागार।

राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 — अधिनियम संख्या 37; 31 अगस्त 1956 को राष्ट्रपति की स्वीकृति, 1 नवंबर 1956 से प्रभावी।

राज्य पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट, 1955 — गृह मंत्रालय

Report of the States Reorganisation Commission — इंटरनेट आर्काइव

राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 — इंडिया कोड

राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 — गृह मंत्रालय

The States Reorganisation Act, 1956 — इंडियन कानून

Andhra State, 1953: The Beginning of Linguistic Reorganisation — द ट्रिब्यून

Maharashtra Got Bombay After 106 Died in Firing — द क्विंट

Remembering how Maharashtra was created — गल्फ़ न्यूज़

The Mahagujarat Movement — अनंतम IAS

बी. आर. आंबेडकर, “Thoughts on Linguistic States” (1955)

रामचंद्र गुहा, “India After Gandhi” (2007), अध्याय “Redrawing the Map”

बिपन चंद्र, मृदुला मुखर्जी, आदित्य मुखर्जी, “India Since Independence”

सेलिग हैरिसन, “India: The Most Dangerous Decades” (1960)

स्रोत-पद्धति: इस अध्याय में जहाँ प्राथमिक दस्तावेज़ उपलब्ध हैं, वहाँ संविधान, अधिनियम, आयोग की रिपोर्ट और संसदीय अभिलेख को प्राथमिकता दी गई है। अनुमानित मृतक-संख्या और आंदोलन-व्यापी कुल आँकड़ों को घटना-विशेष की संख्या से अलग रखा गया है।