इंदिरा से संजय और राजीव — परिवार और सत्ता का केंद्रीकरण
1969 में कांग्रेस के विभाजन के बाद भारतीय राजनीति और नेहरू–गांधी परिवार, दोनों एक नए चरण में प्रवेश कर चुके थे। अब इंदिरा गांधी केवल जवाहरलाल नेहरू की पुत्री और कांग्रेस संगठन द्वारा चुनी गई प्रधानमंत्री नहीं थीं। उन्होंने पुराने संगठनात्मक नेतृत्व को चुनौती देकर अपना स्वतंत्र सत्ता-केंद्र स्थापित कर लिया था। 1971 की प्रचंड चुनावी विजय और उसी वर्ष बांग्लादेश के निर्माण के बाद उनकी राजनीतिक प्रतिष्ठा चरम पर पहुंची।
लेकिन इसी दौर में कांग्रेस के भीतर एक दूसरा परिवर्तन भी शुरू हुआ। पार्टी की संस्थागत शक्ति कमजोर और प्रधानमंत्री-केंद्रित राजनीति मजबूत होती गई। इसी सत्ता-संरचना के भीतर इंदिरा गांधी के छोटे पुत्र संजय गांधी का उदय हुआ—ऐसे व्यक्ति के रूप में, जिनके पास लंबे जनसंघर्ष, निर्वाचित पद या संवैधानिक अधिकार का अनुभव नहीं था, लेकिन प्रधानमंत्री के पुत्र होने के कारण सत्ता के केंद्र तक असाधारण पहुंच थी। 1975–77 के आपातकाल ने इस प्रश्न को सबसे तीखे रूप में सामने रखा। संजय गांधी का प्रभाव इतना बढ़ा कि भारतीय राजनीतिक वंशवाद के इतिहास में पहली बार औपचारिक पद के बिना पारिवारिक सत्ता राष्ट्रीय विवाद का विषय बनी।
लेकिन इतिहास ने अचानक दिशा बदली। 1980 में विमान दुर्घटना में संजय की मृत्यु हो गई। इसके बाद उनके बड़े भाई राजीव गांधी—जो लंबे समय तक राजनीति से बाहर रहे थे—परिवार और कांग्रेस की नई आशा बनकर राजनीति में आए। 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या के कुछ ही घंटों के भीतर राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने। इस प्रकार 1969 से 1984 का काल भारतीय राजनीतिक वंशवाद के इतिहास में निर्णायक है। इसी अवधि में नेहरू–गांधी परिवार के भीतर सत्ता का प्रश्न राजनीतिक विरासत → पारिवारिक प्रभाव → संभावित उत्तराधिकारी → वास्तविक सत्ता हस्तांतरण की दिशा में आगे बढ़ा।
6.1 1969 के बाद नई कांग्रेस
1969 में कांग्रेस के विभाजन ने पार्टी की पुरानी संरचना को बदल दिया। कांग्रेस (ओ) के साथ संगठन के कई पुराने दिग्गज अलग हो गए। इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस (आर) ने स्वयं को अधिक जनोन्मुखी और प्रगतिशील राजनीति के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत किया। बैंक राष्ट्रीयकरण और पूर्व रियासतों के प्रिवी पर्स समाप्त करने का मुद्दा इंदिरा की नई राजनीतिक पहचान से जुड़ गया। अब कांग्रेस की चुनावी अपील धीरे-धीरे पार्टी संगठन के बजाय नेता के व्यक्तित्व पर केंद्रित होने लगी। यह परिवर्तन आगे परिवारवाद के लिए महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ। जब किसी पार्टी की संस्थागत पहचान नेता से अलग कमजोर होने लगे, तो नेता के परिवार की राजनीतिक उपयोगिता स्वाभाविक रूप से बढ़ सकती है।
6.2 1971 — 'गरीबी हटाओ' और इंदिरा का अपना जनादेश
1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी ने 'गरीबी हटाओ' के नारे के साथ चुनाव लड़ा। विपक्षी गठबंधन का नारा था—'इंदिरा हटाओ'। इंदिरा ने इस मुकाबले को लगभग व्यक्तिगत जनमत-संग्रह में बदल दिया। उनकी कांग्रेस ने भारी जीत हासिल की। यह परिणाम राजनीतिक वंशवाद के अध्ययन में अत्यंत महत्वपूर्ण है। 1966 में प्रधानमंत्री बनने के समय इंदिरा की शक्ति नेहरू नाम और कांग्रेस संगठन दोनों से जुड़ी थी। 1971 के बाद वे स्वयं एक विशाल जनादेश वाली नेता थीं। अब उनकी राजनीतिक पूंजी केवल पिता से प्राप्त विरासत नहीं थी। उन्होंने अपना स्वतंत्र राष्ट्रीय जनाधार स्थापित कर लिया था।
6.3 1971 का युद्ध और बांग्लादेश
1971 में पूर्वी पाकिस्तान का संकट भारत की सबसे बड़ी विदेश और सुरक्षा नीति चुनौतियों में बदल गया। लाखों शरणार्थी भारत आए। दिसंबर 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध हुआ और 16 दिसंबर को ढाका में पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण किया। बांग्लादेश अस्तित्व में आया। इस विजय ने इंदिरा गांधी की राष्ट्रीय प्रतिष्ठा असाधारण रूप से बढ़ा दी। विपक्षी नेता अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा इंदिरा के लिए 'दुर्गा' शब्द प्रयोग किए जाने की लोकप्रिय कथा लंबे समय से दोहराई जाती रही है, लेकिन इसके स्रोत और वास्तविक कथन को लेकर विवाद है। इसलिए इसे निर्विवाद ऐतिहासिक उद्धरण के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं। निर्विवाद तथ्य यह है कि युद्ध के बाद इंदिरा की लोकप्रियता चरम पर थी।
6.4 1972 — कांग्रेस का व्यापक प्रभुत्व
1972 के विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस ने अनेक राज्यों में बड़ी सफलता प्राप्त की। अब केंद्र और राज्यों दोनों में इंदिरा गांधी का राजनीतिक प्रभाव अत्यंत मजबूत था। लेकिन इसी सफलता में कांग्रेस के संस्थागत परिवर्तन का बीज भी मौजूद था। राज्य नेतृत्व की स्वतंत्रता कम होने लगी। मुख्यमंत्रियों के चयन में केंद्रीय नेतृत्व का प्रभाव बढ़ा। पार्टी में व्यक्तिगत निष्ठा का महत्व बढ़ा। यह परिवर्तन आगे चलकर 'हाई कमांड संस्कृति' कहलाने वाली व्यवस्था की पृष्ठभूमि बना।
6.5 संजय गांधी कौन थे?
संजय गांधी का जन्म 14 दिसंबर 1946 को हुआ। वे इंदिरा और फिरोज गांधी के छोटे पुत्र थे। उन्होंने विश्वविद्यालय की परंपरागत उच्च शिक्षा पूरी नहीं की। मोटर वाहन और मशीनों में उनकी विशेष रुचि थी और ब्रिटेन में Rolls-Royce से जुड़ी apprenticeship का अनुभव लिया। उनकी महत्वाकांक्षा भारत में छोटी और सस्ती कार बनाने की थी। यहीं से 'मारुति' परियोजना शुरू हुई। शुरुआत में यह औद्योगिक परियोजना थी। लेकिन शीघ्र ही यह राजनीतिक विवाद का विषय बन गई।
6.6 मारुति परियोजना — व्यवसाय, परिवार और सरकार
1970 में संजय गांधी की कंपनी को छोटी कार बनाने के लिए औद्योगिक लाइसेंस मिला। समस्या केवल यह नहीं थी कि प्रधानमंत्री का पुत्र व्यवसाय कर रहा था। विवाद इस बात पर था कि क्या उसे सरकारी निर्णयों, लाइसेंस, भूमि और प्रशासनिक सहायता में असाधारण सुविधा मिली। हरियाणा में परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण और सरकारी सहायता को लेकर प्रश्न उठे। विपक्ष ने इसे सत्ता और परिवार के बीच हितों के टकराव का उदाहरण बताया। यह भारतीय राजनीतिक वंशवाद के इतिहास में महत्वपूर्ण बदलाव था। अब पारिवारिक संबंध केवल राजनीति में प्रवेश का लाभ नहीं दे रहे थे; आरोप यह था कि वे राज्य संसाधनों तक विशेष पहुंच का स्रोत भी बन रहे हैं।
6.7 संजय के पास कौन-सा संवैधानिक पद था?
यही इस पूरे प्रसंग का केंद्रीय प्रश्न है। आपातकाल के दौरान संजय गांधी— न प्रधानमंत्री थे, न केंद्रीय मंत्री, न मुख्यमंत्री, न सांसद। फिर भी उनके प्रभाव के अनेक समकालीन विवरण मिलते हैं। यही कारण है कि संजय गांधी का उदाहरण भारत में Extra-Constitutional Authority — संविधानेतर प्रभाव की बहस का प्रमुख मामला बना। उनका प्रभाव किसी संवैधानिक पद से नहीं बल्कि प्रधानमंत्री के पुत्र होने, युवा कांग्रेस पर प्रभाव और सत्ता के शीर्ष तक सीधी पहुंच से निकलता था।
6.8 1973–74 — इंदिरा सरकार पर संकट
1971 की लोकप्रियता स्थायी नहीं रही। 1973 के तेल संकट, महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक कठिनाइयों ने सरकार पर दबाव बढ़ाया। गुजरात में नवनिर्माण आंदोलन हुआ। बिहार में छात्र आंदोलन शुरू हुआ। जयप्रकाश नारायण धीरे-धीरे सरकार-विरोधी आंदोलन के केंद्रीय नेता बने। रेलवे कर्मचारियों की 1974 की विशाल हड़ताल ने भी सरकार को चुनौती दी। देश में राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ रहा था। इसी संकट के बीच संजय गांधी की राजनीतिक भूमिका बढ़ने लगी।
6.9 जेपी आंदोलन और 'संपूर्ण क्रांति'
जयप्रकाश नारायण ने 'संपूर्ण क्रांति' का आह्वान किया। उनकी मांग केवल सरकार बदलने की नहीं बल्कि राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन की थी। विपक्षी दल इस आंदोलन से जुड़ने लगे। इंदिरा सरकार ने इसे निर्वाचित सरकार को अस्थिर करने का प्रयास माना। जेपी आंदोलन के समर्थकों ने सरकार पर भ्रष्टाचार, अधिनायकवाद और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने के आरोप लगाए। यह संघर्ष 1975 में निर्णायक टकराव तक पहुंच गया।
6.10 राज नारायण बनाम इंदिरा गांधी
1971 के रायबरेली लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी ने समाजवादी नेता राज नारायण को पराजित किया था। राज नारायण ने उनके चुनाव को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी। 12 जून 1975 को न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी को चुनावी कदाचार के कुछ आरोपों में दोषी ठहराते हुए उनका चुनाव निरस्त कर दिया और छह वर्ष के लिए चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाया। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर ने 24 जून को अंतरिम राहत दी, लेकिन वह पूर्ण स्थगन नहीं था। राजनीतिक संकट चरम पर पहुंच गया।
6.11 25–26 जून 1975 — आपातकाल
25 जून की रात राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आंतरिक आपातकाल की घोषणा पर हस्ताक्षर किए। 26 जून को देश को इसकी जानकारी दी गई। सरकार ने तर्क दिया कि आंतरिक अशांति और राजनीतिक अस्थिरता से देश की सुरक्षा खतरे में थी। विपक्ष ने इसे इंदिरा गांधी की सत्ता बचाने का कदम बताया। जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और अनेक विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया। MISA सहित कानूनों के तहत बड़ी संख्या में राजनीतिक कार्यकर्ता हिरासत में लिए गए। प्रेस पर सेंसरशिप लागू हुई। नागरिक स्वतंत्रताओं पर गंभीर प्रतिबंध लगे। यह स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का सबसे विवादास्पद अध्याय बन गया।
6.12 आपातकाल और राजनीतिक वंशवाद का नया चरण
आपातकाल का अध्ययन सामान्यतः नागरिक अधिकारों, संविधान, प्रेस सेंसरशिप और विपक्ष के दमन के संदर्भ में किया जाता है। लेकिन राजनीतिक वंशवाद के इतिहास में इसका एक अलग महत्व है। इसी अवधि में संजय गांधी का प्रभाव अत्यधिक बढ़ा। प्रधानमंत्री की औपचारिक सत्ता के समानांतर परिवार के एक गैर-निर्वाचित सदस्य की शक्ति पर प्रश्न उठने लगे। यह स्थिति मोतीलाल–जवाहरलाल या जवाहरलाल–इंदिरा संबंध से मूल रूप से अलग थी। संजय के पास न लंबा स्वतंत्रता आंदोलन था, न कांग्रेस संगठन में दशकों का अनुभव और न निर्वाचित पद। उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक संपत्ति थी—
प्रधानमंत्री तक सीधी पारिवारिक पहुंच।
6.13 संजय गांधी का पांच सूत्री कार्यक्रम
संजय गांधी ने पांच सूत्री कार्यक्रम को बढ़ावा दिया। इसके विभिन्न समकालीन विवरणों में सामान्यतः परिवार नियोजन, वृक्षारोपण, निरक्षरता उन्मूलन, दहेज-विरोध और जातिवाद समाप्त करने जैसे लक्ष्य शामिल किए जाते हैं। इन उद्देश्यों में कई अपने आप में सामाजिक सुधार से जुड़े थे। समस्या उनके क्रियान्वयन के तरीके को लेकर पैदा हुई। विशेष रूप से परिवार नियोजन कार्यक्रम बाद में जबरन नसबंदी के आरोपों से जुड़ गया। यहीं नीति और सत्ता के बीच गंभीर अंतर पैदा हुआ।
6.14 नसबंदी अभियान
भारत में परिवार नियोजन कार्यक्रम आपातकाल से पहले भी मौजूद था। लेकिन 1976–77 में नसबंदी अभियानों की गति अत्यधिक बढ़ी। राज्यों और प्रशासन पर लक्ष्य पूरा करने का दबाव बढ़ा। कई स्थानों पर गरीबों और कमजोर वर्गों पर दबाव, प्रलोभन अथवा coercion की शिकायतें सामने आईं। संजय गांधी को इस आक्रामक अभियान का प्रमुख राजनीतिक प्रेरक माना गया। यह महत्वपूर्ण है कि नसबंदी का प्रत्येक प्रशासनिक निर्णय व्यक्तिगत रूप से संजय द्वारा नहीं लिया गया था। केंद्र और राज्य सरकारों, नौकरशाही और स्थानीय प्रशासन की अपनी भूमिकाएं थीं। फिर भी अभियान की राजनीतिक पहचान संजय गांधी से इतनी गहराई से जुड़ गई कि 1977 के चुनाव में यह कांग्रेस के विरुद्ध सबसे प्रभावी मुद्दों में शामिल हुआ।
6.15 तुर्कमान गेट और झुग्गी हटाओ अभियान
दिल्ली में आपातकाल के दौरान शहरी 'सौंदर्यीकरण' के नाम पर झुग्गियों और बस्तियों को हटाने की कार्रवाई हुई। अप्रैल 1976 का तुर्कमान गेट प्रकरण सबसे विवादास्पद घटनाओं में शामिल हुआ। विस्थापन के विरोध में टकराव हुआ और पुलिस गोलीबारी में लोगों की मृत्यु हुई। इस अभियान से संजय गांधी और दिल्ली प्रशासन के कुछ प्रभावशाली अधिकारियों का नाम जोड़ा गया। आपातकाल समाप्त होने के बाद गठित शाह आयोग ने इस अवधि की अनेक प्रशासनिक कार्रवाइयों की जांच की। यह आयोग इस अध्याय के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण प्राथमिक दस्तावेजी स्रोत है।
6.16 युवा कांग्रेस और संजय का नेटवर्क
संजय गांधी का प्रभाव केवल प्रधानमंत्री निवास तक सीमित नहीं रहा। युवा कांग्रेस के भीतर उनके समर्थकों का नेटवर्क विकसित हुआ। कई युवा नेता उनके आसपास उभरे। इनमें से कुछ बाद में भारतीय राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहे। संजय के राजनीतिक मॉडल में वैचारिक बहस की तुलना में कार्रवाई, प्रशासनिक गति और नेतृत्व के प्रति निष्ठा पर अधिक जोर दिखाई देता था। इससे कांग्रेस की संगठनात्मक संस्कृति पर भी प्रभाव पड़ा।
6.17 क्या संजय गांधी इंदिरा के घोषित उत्तराधिकारी थे?
औपचारिक रूप से नहीं। इंदिरा गांधी ने कोई संवैधानिक घोषणा नहीं की थी कि संजय उनके बाद प्रधानमंत्री होंगे। लेकिन 1975–77 में उनके प्रभाव और सत्ता तक पहुंच ने व्यापक धारणा पैदा कर दी कि वे परिवार के राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में उभर रहे हैं। राजनीतिक वंशवाद में यही महत्वपूर्ण है। उत्तराधिकार हमेशा किसी लिखित घोषणा से शुरू नहीं होता। कई बार वह— सत्ता तक पहुंच, पार्टी नेटवर्क, युवा संगठन, प्रशासनिक प्रभाव और नेता के निकटतम राजनीतिक सहयोगी की भूमिका से धीरे-धीरे बनता है।
6.18 संविधान और आपातकाल — संस्थागत प्रभाव
आपातकाल के दौरान 38वां, 39वां, 40वां और विशेष रूप से 42वां संविधान संशोधन महत्वपूर्ण रहे। 42वें संशोधन ने केंद्र और संसद की शक्ति बढ़ाने तथा न्यायिक समीक्षा सहित कई संवैधानिक प्रश्नों पर गहरा प्रभाव डाला। राजनीतिक वंशवाद के अध्ययन में इसका महत्व इसलिए है कि परिवार-केंद्रित सत्ता का प्रश्न अब केवल पार्टी संगठन तक सीमित नहीं था। सत्ता का केंद्रीकरण संवैधानिक संस्थाओं और नागरिक अधिकारों तक प्रभाव डाल रहा था। यही वह बिंदु है जहां वंशवाद और संस्थागत केंद्रीकरण एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई देते हैं।
6.19 जनवरी 1977 — चुनाव कराने का निर्णय
जनवरी 1977 में इंदिरा गांधी ने लोकसभा चुनाव कराने की घोषणा की। यह निर्णय महत्वपूर्ण था क्योंकि लगभग 19 महीने के आपातकाल के बाद जनता को सरकार पर फैसला देने का अवसर मिला। विपक्षी दल एकजुट होकर जनता पार्टी के रूप में सामने आए। जयप्रकाश नारायण इस विपक्षी एकता के नैतिक प्रतीक बने। अब मतदाता के सामने केवल इंदिरा सरकार की आर्थिक नीतियां नहीं थीं। आपातकाल, गिरफ्तारियां, प्रेस सेंसरशिप, नसबंदी, तुर्कमान गेट और संजय गांधी का प्रभाव भी चुनावी मुद्दे थे।
6.20 1977 — मतदाता ने सत्ता से बाहर किया
मार्च 1977 के चुनाव में कांग्रेस को ऐतिहासिक पराजय मिली। विशेष रूप से उत्तर भारत में पार्टी लगभग साफ हो गई। इंदिरा गांधी रायबरेली से राज नारायण से हार गईं। संजय गांधी अमेठी से पराजित हुए। जनता पार्टी सत्ता में आई और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। भारतीय राजनीतिक वंशवाद के इतिहास में इसका महत्व असाधारण है। देश के सबसे शक्तिशाली परिवार को मतदाता ने सत्ता से बाहर कर दिया। यह प्रमाण था कि—
राजनीतिक विरासत चुनावी पराजय से सुरक्षा नहीं देती।
6.21 शाह आयोग — आपातकाल की जांच
जनता सरकार ने 1977 में न्यायमूर्ति जे.सी. शाह की अध्यक्षता में आयोग गठित किया। शाह आयोग ने आपातकाल के दौरान सत्ता के दुरुपयोग, गिरफ्तारियों, प्रशासनिक दबाव और अन्य कार्रवाइयों की जांच की। उसकी रिपोर्टों में सत्ता के केंद्रीकरण और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के उल्लंघन के गंभीर विवरण सामने आए। संजय गांधी और उनके आसपास सक्रिय व्यक्तियों की भूमिका भी जांच का विषय बनी। राजनीतिक वंशवाद के शोध में शाह आयोग इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह समकालीन सरकारी जांच का दस्तावेज है—सिर्फ बाद की राजनीतिक आलोचना नहीं।
6.22 1977 के बाद कांग्रेस में संघर्ष
सत्ता से बाहर होने के बाद कांग्रेस के भीतर इंदिरा गांधी के नेतृत्व पर प्रश्न उठे। लेकिन जनता सरकार के भीतर अंतर्विरोध तेजी से बढ़े। इंदिरा ने स्वयं को राजनीतिक रूप से पुनर्गठित किया। कांग्रेस फिर विभाजित हुई और 1978 में उनके नेतृत्व वाली कांग्रेस (आई) अस्तित्व में आई। यहां 'आई' का अर्थ Indira था। इस नामकरण का प्रतीकात्मक महत्व बहुत बड़ा था। अब कांग्रेस का एक प्रमुख धड़ा औपचारिक रूप से नेता की व्यक्तिगत पहचान से पहचाना जा रहा था।
6.23 चिकमगलूर और इंदिरा की वापसी
1978 में इंदिरा गांधी कर्नाटक के चिकमगलूर लोकसभा उपचुनाव से संसद लौटीं। उनकी वापसी ने संकेत दिया कि 1977 की पराजय से उनका जनाधार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था। जनता पार्टी सरकार के आंतरिक संघर्षों ने उन्हें राजनीतिक पुनरुत्थान का अवसर दिया। यहां एक बार फिर भारतीय मतदाता की भूमिका महत्वपूर्ण थी। वंशवादी नाम ने उन्हें दृश्यता दी, लेकिन सत्ता में वापसी के लिए चुनावी स्वीकृति फिर आवश्यक थी।
6.24 संजय गांधी की वापसी
1977 में अमेठी से पराजित संजय गांधी ने भी अपनी राजनीतिक सक्रियता जारी रखी। 1980 के आम चुनाव में वे अमेठी से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए। अब पहली बार उनके पास औपचारिक लोकतांत्रिक जनादेश था। यह आपातकाल के समय की स्थिति से अलग था। वे अब केवल प्रधानमंत्री के पुत्र अथवा अनौपचारिक सत्ता केंद्र नहीं थे; वे निर्वाचित सांसद भी बन गए।
6.25 1980 — इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी
जनता पार्टी की सरकार आंतरिक संघर्षों से कमजोर हुई। 1979 में मोरारजी देसाई सरकार गिर गई। चरण सिंह अल्पकाल के लिए प्रधानमंत्री बने। जनवरी 1980 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस (आई) ने भारी जीत हासिल की। इंदिरा फिर प्रधानमंत्री बनीं। 1977 की पराजय के केवल तीन वर्ष बाद उनकी वापसी भारतीय राजनीति की सबसे उल्लेखनीय राजनीतिक वापसी में गिनी जाती है। अब संजय गांधी भी सांसद थे। परिवार का सत्ता-केंद्र फिर स्थापित हो चुका था।
6.26 संजय गांधी — उत्तराधिकारी बनने की दिशा
1980 तक संजय गांधी की स्थिति 1975 से अलग थी। अब उनके पास— परिवार की विरासत, प्रधानमंत्री तक सीधी पहुंच, युवा कांग्रेस नेटवर्क, राजनीतिक समर्थक, और लोकसभा सदस्यता सब मौजूद थे। कांग्रेस में उनकी भूमिका तेजी से बढ़ रही थी। इसीलिए यह व्यापक धारणा मजबूत हुई कि वे इंदिरा के संभावित राजनीतिक उत्तराधिकारी हैं। लेकिन 23 जून 1980 को एक घटना ने पूरी राजनीतिक दिशा बदल दी।
6.27 23 जून 1980 — संजय गांधी की मृत्यु
23 जून 1980 को दिल्ली में विमान उड़ाते समय दुर्घटना में संजय गांधी की मृत्यु हो गई। वे केवल 33 वर्ष के थे। उनकी मृत्यु ने इंदिरा गांधी को व्यक्तिगत और राजनीतिक दोनों स्तरों पर गहरा आघात पहुंचाया। लेकिन इससे एक तत्काल राजनीतिक समस्या भी पैदा हुई। जिस पुत्र के आसपास परिवार का अगला राजनीतिक उत्तराधिकार बनता दिखाई दे रहा था, वह अचानक नहीं रहा। अब परिवार में दूसरा पुत्र था—
राजीव गांधी।
लेकिन राजीव राजनीति में नहीं थे।
6.28 राजीव गांधी — राजनीति से बाहर जीवन
राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त 1944 को हुआ। उन्होंने भारत और विदेश में शिक्षा प्राप्त की और बाद में इंडियन एयरलाइंस में पेशेवर पायलट बने। उनकी शादी 1968 में सोनिया माइनो से हुई। राजीव लंबे समय तक सक्रिय राजनीति से दूर रहे। संजय के विपरीत उन्हें राजनीति में विशेष रुचि रखने वाला व्यक्ति नहीं माना जाता था। उनका जीवन अपेक्षाकृत निजी था। यही तथ्य आगे उनके राजनीतिक प्रवेश को वंशवाद के अध्ययन में अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है।
6.29 संजय की मृत्यु के बाद राजीव पर दबाव
संजय की मृत्यु के बाद कांग्रेस के भीतर और परिवार के आसपास राजीव गांधी के राजनीति में प्रवेश की मांग बढ़ी। इंदिरा को भी भरोसेमंद पारिवारिक सहयोगी की आवश्यकता महसूस हुई। राजीव शुरू में अनिच्छुक बताए जाते हैं। लेकिन अंततः उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया। यहां एक बुनियादी प्रश्न उठता है— यदि राजीव गांधी इंदिरा गांधी के पुत्र और संजय गांधी के भाई न होते, तो क्या एक एयरलाइन पायलट सीधे राष्ट्रीय राजनीति के इतने महत्वपूर्ण स्थान पर प्रवेश कर सकता था? संभवतः नहीं। यह भारतीय राजनीतिक वंशवाद का अत्यंत स्पष्ट उदाहरण है।
6.30 1981 — राजीव गांधी का अमेठी से चुनाव
संजय गांधी की मृत्यु से अमेठी लोकसभा सीट खाली हुई। 1981 के उपचुनाव में राजीव गांधी कांग्रेस उम्मीदवार बने। उन्होंने चुनाव जीता और लोकसभा में प्रवेश किया। यहां राजनीतिक उत्तराधिकार का प्रतीक अत्यंत स्पष्ट था—
संजय की सीट → राजीव।
कानूनी रूप से यह विरासत नहीं थी। उन्हें चुनाव लड़ना और जीतना पड़ा। लेकिन उम्मीदवार चयन और निर्वाचन क्षेत्र दोनों में पारिवारिक निरंतरता स्पष्ट थी।
6.31 कांग्रेस संगठन में राजीव का तेजी से उदय
राजीव गांधी का राजनीतिक उत्थान असाधारण रूप से तेज था। 1981 में सांसद बनने के बाद कुछ ही वर्षों में वे कांग्रेस संगठन के केंद्रीय नेतृत्व में पहुंच गए। 1983 में उन्हें कांग्रेस का महासचिव बनाया गया। उनके जिम्मे संगठन और युवा नेतृत्व से जुड़े महत्वपूर्ण कार्य आए। यह गति सामान्य कांग्रेस कार्यकर्ता के राजनीतिक करियर से तुलना करने पर वंशवादी लाभ को स्पष्ट करती है। उनके पास राजनीतिक अनुभव सीमित था। लेकिन उनका नाम और प्रधानमंत्री से संबंध असाधारण था।
6.32 संजय बनाम राजीव — दो उत्तराधिकार मॉडल
दोनों भाइयों की राजनीतिक शैली अलग थी। संजय— आक्रामक, तेज निर्णय के समर्थक, युवा नेटवर्क आधारित, और आपातकाल की संविधानेतर सत्ता से जुड़े विवादों के केंद्र में रहे। राजीव— अपेक्षाकृत सौम्य, तकनीक और आधुनिकता में रुचि रखने वाले, प्रशासनिक सुधार की भाषा बोलने वाले, और औपचारिक पार्टी संगठन के भीतर आगे बढ़ाए गए। लेकिन दोनों के राजनीतिक प्रवेश में एक समान तत्व था—
परिवार।
संजय के बाद राजीव का उदय इस बात का स्पष्ट संकेत था कि कांग्रेस के भीतर नेहरू–गांधी परिवार की उत्तराधिकार भूमिका अब संस्थागत रूप ले चुकी थी।
6.33 मेनका गांधी और परिवार के भीतर संघर्ष
संजय गांधी की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी मेनका गांधी और इंदिरा गांधी के संबंध बिगड़ गए। मेनका स्वयं सार्वजनिक जीवन में सक्रिय होना चाहती थीं। अंततः वे प्रधानमंत्री निवास से अलग हुईं और बाद में स्वतंत्र राजनीतिक यात्रा शुरू की। यह संघर्ष महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे स्पष्ट हुआ कि राजनीतिक वंश के भीतर उत्तराधिकार हमेशा सरल नहीं होता। संजय की विरासत पर कम से कम प्रतीकात्मक रूप से दो संभावित दिशाएं थीं— उनकी पत्नी मेनका, या उनके भाई राजीव। कांग्रेस सत्ता संरचना ने राजीव को अपनाया। आगे मेनका और उनके पुत्र वरुण गांधी अलग राजनीतिक धारा—अंततः भाजपा—से जुड़े। इस प्रकार नेहरू–गांधी परिवार की एक अलग राजनीतिक शाखा विकसित हुई।
6.34 पंजाब संकट और इंदिरा सरकार
1980 के दशक की शुरुआत में पंजाब में उग्रवाद और अलगाववाद गंभीर चुनौती बन गया। जरनैल सिंह भिंडरांवाले और सशस्त्र उग्रवादियों की गतिविधियां बढ़ीं। राजनीतिक और धार्मिक तनाव तीव्र हुआ। जून 1984 में सरकार ने स्वर्ण मंदिर परिसर से सशस्त्र उग्रवादियों को निकालने के लिए ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया। सेना की कार्रवाई में भिंडरांवाले मारा गया, लेकिन स्वर्ण मंदिर परिसर को हुए नुकसान और जनहानि ने सिख समुदाय के बड़े हिस्से में गहरा आक्रोश पैदा किया। यह निर्णय आगे इंदिरा गांधी के जीवन के लिए भी घातक सिद्ध हुआ।
6.35 31 अक्टूबर 1984 — इंदिरा गांधी की हत्या
31 अक्टूबर 1984 की सुबह इंदिरा गांधी की उनके दो सिख अंगरक्षकों—बेअंत सिंह और सतवंत सिंह—ने गोली मारकर हत्या कर दी। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन बचाया नहीं जा सका। देश अचानक राष्ट्रीय संकट में था। प्रधानमंत्री की हत्या हो चुकी थी। कांग्रेस का सबसे शक्तिशाली नेता समाप्त हो गया था। और अब फिर वही प्रश्न सामने था—
उत्तराधिकारी कौन?
लेकिन इस बार 1964 और 1966 की तुलना में उत्तर बहुत तेजी से सामने आया।
6.36 कुछ घंटों में राजीव गांधी प्रधानमंत्री
इंदिरा गांधी की हत्या के दिन राजीव गांधी पश्चिम बंगाल में थे। वे दिल्ली लौटे। उसी शाम राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई। यह भारत के राजनीतिक वंशवाद के इतिहास की निर्णायक घटना थी। 1964 में नेहरू की मृत्यु के बाद शास्त्री प्रधानमंत्री बने थे। 1966 में शास्त्री की मृत्यु के बाद कांग्रेस संसदीय दल में इंदिरा और मोरारजी देसाई के बीच मतदान हुआ था। लेकिन 1984 में इंदिरा की मृत्यु के कुछ घंटों के भीतर उनके पुत्र प्रधानमंत्री बन गए। यह उत्तराधिकार की गति में मूलभूत परिवर्तन था।
6.37 क्या राजीव का चयन संवैधानिक था?
हां। भारत के संविधान में प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं और प्रधानमंत्री को लोकसभा में बहुमत का विश्वास प्राप्त होना आवश्यक होता है। राजीव गांधी उस समय सांसद और कांग्रेस के प्रमुख नेता थे। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने भी संकट के समय उनके नाम पर सहमति जताई। इसलिए उनकी नियुक्ति संवैधानिक प्रक्रिया के बाहर नहीं थी। लेकिन वंशवाद का प्रश्न संवैधानिक वैधता से अलग है। प्रश्न यह है—
कांग्रेस के अनेक वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं के रहते तीन वर्ष पहले राजनीति में आए राजीव गांधी ही तत्काल स्वाभाविक विकल्प क्यों बने?
इसका उत्तर नेहरू–गांधी परिवार की दशकों में जमा हुई राजनीतिक पूंजी के बिना नहीं दिया जा सकता।
6.38 1984 के सिख-विरोधी दंगे — सत्ता हस्तांतरण पर काली छाया
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली और अन्य स्थानों पर सिखों के विरुद्ध भयानक हिंसा हुई। हजारों लोग मारे गए। कांग्रेस के कुछ नेताओं पर भीड़ को उकसाने और हिंसा में भूमिका के गंभीर आरोप लगे। बाद के दशकों में जांच आयोग, न्यायिक प्रक्रियाएं और आपराधिक मुकदमे चले। राजीव गांधी की नई सरकार के सामने यह पहला बड़ा नैतिक और प्रशासनिक संकट था। उनका बाद का विवादास्पद कथन—जिसमें बड़े पेड़ के गिरने और धरती हिलने की उपमा दी गई—लंबे समय तक आलोचना का विषय बना रहा। 1984 के सिख-विरोधी नरसंहार का विस्तृत इतिहास स्वतंत्र अध्ययन की मांग करता है; यहां उसका उल्लेख केवल राजीव गांधी के सत्ता ग्रहण की तत्काल परिस्थितियों के संदर्भ में आवश्यक है।
6.39 दिसंबर 1984 — मतदाता की मुहर
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिसंबर 1984 में लोकसभा चुनाव हुए। राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने स्वतंत्र भारत के इतिहास की सबसे बड़ी लोकसभा जीतों में से एक हासिल की—543 निर्वाचित सीटों वाली लोकसभा में कांग्रेस ने 404 सीटें जीतीं। यहां राजनीतिक वंशवाद की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया पूरी हुई। 31 अक्टूबर को राजीव को सत्ता पार्टी और संवैधानिक व्यवस्था के माध्यम से मिली थी। दिसंबर में उन्हें विशाल जनादेश प्राप्त हुआ। अर्थात—
पहले उत्तराधिकार, फिर लोकतांत्रिक वैधता।
यह क्रम जवाहरलाल और इंदिरा दोनों से अलग था।
6.40 नेहरू से राजीव तक — चार पीढ़ियों का परिवर्तन
अब परिवार की राजनीतिक यात्रा को एक साथ देखें— मोतीलाल नेहरू राजनीतिक प्रतिष्ठा स्वयं अर्जित की। → जवाहरलाल नेहरू पारिवारिक अवसर + लंबा स्वतंत्र राजनीतिक संघर्ष। इंदिरा गांधी असाधारण पारिवारिक पहुंच + पार्टी संघर्ष + स्वतंत्र जनाधार। संजय गांधी पारिवारिक पहुंच के आधार पर तीव्र अनौपचारिक सत्ता। राजीव गांधी परिवार की आवश्यकता के बाद राजनीति में प्रवेश + तीव्र संगठनात्मक उत्थान + प्रधानमंत्री पद। यह क्रम दिखाता है कि प्रत्येक पीढ़ी में वंशवादी तत्व का स्वरूप बदलता गया।
6.41 संस्थागत परिवर्तन — कांग्रेस का परिवार से संबंध
1947 की कांग्रेस और 1984 की कांग्रेस में बड़ा अंतर था। 1947 में पार्टी के पास अनेक स्वतंत्र राष्ट्रीय नेता थे। 1964 में नेहरू की मृत्यु के बाद गैर-पारिवारिक उत्तराधिकारी चुना गया। 1966 में संगठन ने इंदिरा को चुना लेकिन उन्हें चुनौती भी दी। 1969 में इंदिरा ने पुराने संगठन को परास्त किया। 1970 के दशक में नेतृत्व केंद्रीकृत हुआ। संजय का प्रभाव बढ़ा। 1980 के बाद राजीव तेजी से संगठन में ऊपर आए। 1984 में इंदिरा की हत्या के कुछ घंटों के भीतर राजीव प्रधानमंत्री बने। यह क्रम कांग्रेस के institutional party से leader-family centred party बनने की प्रक्रिया को समझने के लिए केंद्रीय है।
6.42 क्या जनता ने वंशवाद को स्वीकार किया?
उत्तर सरल नहीं है। 1977 में जनता ने इंदिरा और संजय दोनों को पराजित किया। 1980 में उसी जनता ने इंदिरा और संजय को चुनाव जिताया। 1984 में राजीव के नेतृत्व में कांग्रेस को ऐतिहासिक बहुमत मिला। इसलिए भारतीय मतदाता का व्यवहार केवल वंशवादी नाम से निर्धारित नहीं हुआ। सहानुभूति, सरकार का प्रदर्शन, विपक्ष की स्थिति, राष्ट्रीय संकट, नेतृत्व की छवि और राजनीतिक विकल्प— सभी ने भूमिका निभाई। वंश ने प्रवेश और पहचान दी। लेकिन जनादेश परिस्थितियों से निर्धारित हुआ।
6.43 प्रमुख दस्तावेज
इस काल के अध्ययन के लिए कुछ दस्तावेज विशेष महत्व रखते हैं। 1971, 1977, 1980 और 1984 के लोकसभा चुनावों के निर्वाचन आयोग के आंकड़े चुनावी परिवर्तन का प्राथमिक आधार हैं। भारत निर्वाचन आयोग — चुनावी सांख्यिकीय रिपोर्ट आपातकाल से संबंधित संसदीय कार्यवाही, संवैधानिक संशोधन और बाद की बहसें संसद के अभिलेखों में उपलब्ध हैं। संसद डिजिटल लाइब्रेरी आपातकाल की जांच के लिए शाह आयोग की रिपोर्टें सबसे महत्वपूर्ण सरकारी दस्तावेजों में हैं। इंदिरा गांधी और इस दौर के राजनीतिक अभिलेखों के लिए प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय भी महत्वपूर्ण स्रोत है। Prime Ministers Museum & Library
इसके अलावा 42वें और बाद में 44वें संविधान संशोधन को साथ पढ़ना आवश्यक है, क्योंकि पहला आपातकालीन केंद्रीकरण और दूसरा जनता सरकार द्वारा किए गए महत्वपूर्ण संवैधानिक सुधारों को समझने में मदद करता है।
6.44 इतिहासलेखन — संजय गांधी को कैसे देखा गया?
संजय गांधी की ऐतिहासिक छवि अत्यंत विवादास्पद है। एक दृष्टिकोण उन्हें निर्णायक और तेज आधुनिकतावादी युवा नेता के रूप में देखता है, जो जनसंख्या नियंत्रण, शहरी सुधार और सामाजिक परिवर्तन जैसे मुद्दों पर तेजी से कार्रवाई चाहता था। दूसरा दृष्टिकोण उन्हें आपातकाल की अधिनायकवादी राजनीति का सबसे स्पष्ट संविधानेतर चेहरा मानता है। तीसरा, अधिक संरचनात्मक दृष्टिकोण पूछता है—
ऐसी कौन-सी संस्थागत परिस्थितियां थीं जिनमें बिना निर्वाचित अथवा संवैधानिक पद के प्रधानमंत्री का पुत्र नौकरशाही और पार्टी पर इतना प्रभाव डाल सका?
हमारे शोध के लिए तीसरा प्रश्न सबसे महत्वपूर्ण है। व्यक्ति से अधिक व्यवस्था की जांच आवश्यक है।
6.45 इतिहासलेखन — राजीव गांधी का उदय
राजीव गांधी के राजनीतिक प्रवेश को लेकर भी दो विपरीत आख्यान मिलते हैं। एक उन्हें व्यक्तिगत रूप से अनिच्छुक व्यक्ति मानता है जिसे भाई की मृत्यु और पारिवारिक परिस्थितियों ने राजनीति में आने के लिए बाध्य किया। दूसरा इसे कांग्रेस के भीतर राजनीतिक उत्तराधिकार के संस्थानीकरण का स्पष्ट प्रमाण मानता है। दोनों में कुछ सत्य है। राजीव ने संजय की तरह युवावस्था से राजनीतिक शक्ति बनाने का प्रयास नहीं किया था। लेकिन जब वे राजनीति में आए, तो उनकी प्रगति इतनी तेज थी कि उसे परिवार की राजनीतिक पूंजी से अलग नहीं किया जा सकता।
6.46 दस कसौटियों पर 1969–1984 का परिवार
राजनीतिक पूंजी: इंदिरा ने विरासत में मिली पूंजी को अपने जनाधार से कई गुना बढ़ाया। पार्टी नियंत्रण: 1969 के बाद तेजी से नेतृत्व-केंद्रित। अगली पीढ़ी का प्रवेश: पहले संजय, फिर राजीव। प्रवेश की गति: दोनों को सामान्य पार्टी कार्यकर्ता की तुलना में असाधारण पहुंच। निर्वाचित वैधता: संजय 1980 और राजीव 1981 में लोकसभा पहुंचे। संविधानेतर प्रभाव: संजय गांधी का आपातकालीन दौर सबसे गंभीर उदाहरण। उत्तराधिकार: संजय की मृत्यु के बाद राजीव का प्रवेश पारिवारिक उत्तराधिकारी की आवश्यकता से स्पष्ट रूप से जुड़ा। सत्ता हस्तांतरण: 1984 में इंदिरा की हत्या के दिन राजीव प्रधानमंत्री बने। मतदाता की भूमिका: 1977 में अस्वीकृति; 1980 और 1984 में व्यापक स्वीकृति।
संस्थागत प्रभाव: कांग्रेस में स्वतंत्र संगठनात्मक शक्ति की तुलना में केंद्रीय नेता और परिवार की भूमिका लगातार बढ़ी।
6.47 प्रभाव — भारतीय राजनीति के लिए व्यापक परिणाम
1969–1984 का दौर केवल कांग्रेस की आंतरिक कहानी नहीं था। इसने पूरे भारतीय राजनीतिक तंत्र को प्रभावित किया। जब देश की सबसे बड़ी पार्टी में परिवार-केंद्रित नेतृत्व स्थापित हुआ तो अन्य दलों में भी परिवार आधारित उत्तराधिकार राजनीतिक रूप से असामान्य नहीं रहा। हालांकि यह कहना गलत होगा कि भारत के सभी राजनीतिक वंश कांग्रेस की नकल से पैदा हुए। चरण सिंह, देवीलाल, करुणानिधि, शेख अब्दुल्ला और अन्य नेताओं की अपनी स्वतंत्र ऐतिहासिक पृष्ठभूमियां थीं। लेकिन नेहरू–गांधी परिवार ने राष्ट्रीय स्तर पर यह उदाहरण अवश्य स्थापित किया कि लोकतांत्रिक चुनाव और पारिवारिक राजनीतिक उत्तराधिकार साथ-साथ चल सकते हैं।
6.48 सबसे महत्वपूर्ण संस्थागत प्रश्न
इस पूरे दौर से एक प्रश्न उभरता है जो आगे हर राजनीतिक परिवार पर लागू किया जाना चाहिए—
यदि परिवार का सदस्य उपलब्ध न होता, तो पार्टी में नेतृत्व चयन किस प्रक्रिया से होता?
संजय गांधी के स्थान पर क्या युवा कांग्रेस से कोई अन्य नेता समान शक्ति प्राप्त कर सकता था? संजय की मृत्यु के बाद क्या किसी सामान्य सांसद को उतनी तेजी से महासचिव बनाया जाता जितनी तेजी से राजीव गांधी को? इंदिरा की हत्या के बाद क्या किसी तीन वर्ष पुराने सांसद को प्रधानमंत्री पद का स्वाभाविक उम्मीदवार माना जाता यदि उसका उपनाम गांधी न होता? इन प्रश्नों का उत्तर राजनीतिक वंशवाद की संरचना को समझने के लिए पदों की सूची से कहीं अधिक उपयोगी है।
6.49 निष्कर्ष — परिवार अब सत्ता के बाहर नहीं, सत्ता के भीतर था
मोतीलाल नेहरू से शुरू हुई राजनीतिक यात्रा में 1984 तक मूलभूत परिवर्तन हो चुका था। मोतीलाल ने राजनीतिक प्रतिष्ठा अर्जित की। जवाहरलाल ने उस विरासत को राष्ट्रीय आंदोलन और प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाया। इंदिरा ने विरासत को व्यक्तिगत जनाधार और केंद्रीकृत पार्टी सत्ता में बदला। लेकिन संजय गांधी के साथ पहली बार परिवार का ऐसा सदस्य सत्ता के केंद्र में आया जिसके प्रभाव और औपचारिक संवैधानिक उत्तरदायित्व के बीच बड़ा अंतर था। आपातकाल ने इसका सबसे चरम रूप दिखाया। 1977 में मतदाता ने इसे कठोरता से अस्वीकार किया। लेकिन इंदिरा की 1980 में वापसी के साथ परिवार फिर सत्ता के केंद्र में लौट आया। संजय की अचानक मृत्यु ने उत्तराधिकार की दिशा बदल दी।
राजनीति से बाहर रहने वाले राजीव गांधी को परिवार की राजनीतिक संरचना ने तेजी से अपने भीतर खींच लिया। 1981 में सांसद। 1983 में कांग्रेस महासचिव। 1984 में प्रधानमंत्री। यहीं राजनीतिक वंशवाद का सबसे स्पष्ट संस्थागत संकेत दिखाई देता है।
मोतीलाल से जवाहरलाल को पद विरासत में नहीं मिला था।
जवाहरलाल की मृत्यु पर इंदिरा तत्काल प्रधानमंत्री नहीं बनी थीं।
लेकिन इंदिरा की मृत्यु के दिन उनके पुत्र राजीव गांधी कुछ ही घंटों में प्रधानमंत्री बन गए।
फिर भी भारतीय लोकतंत्र ने इस उत्तराधिकार को अंतिम वैधता स्वतः नहीं दी। दिसंबर 1984 में राजीव को मतदाताओं के सामने जाना पड़ा—और कांग्रेस को 404 सीटों का ऐतिहासिक जनादेश मिला। इसलिए 1984 तक नेहरू–गांधी परिवार का मॉडल एक विशिष्ट लोकतांत्रिक विरोधाभास बन चुका था—
राजनीति में प्रवेश परिवार से, संगठन में गति परिवार से, सत्ता तक पहुंच परिवार से प्रभावित, लेकिन शासन की अंतिम वैधता चुनाव से।
अगला चरण इस परिवार के लिए बिल्कुल अलग था। राजीव गांधी अब केवल शोक और सहानुभूति के बीच बने प्रधानमंत्री नहीं रहने वाले थे। उन्हें स्वयं शासन करना था। आधुनिक भारत, कंप्यूटरीकरण, दूरसंचार और प्रशासनिक सुधार की उनकी परियोजना सामने आने वाली थी; साथ ही शाहबानो, बोफोर्स, श्रीलंका और कांग्रेस की गिरती राजनीतिक शक्ति जैसे विवाद भी। और फिर 1991 में उनकी हत्या ने नेहरू–गांधी परिवार के सामने एक बार फिर वही प्रश्न खड़ा कर दिया—
अब उत्तराधिकारी कौन?