मुगल काल में मंदिरों का विध्वंस
दस्तावेजी प्रमाण, शाही आदेश और ऐतिहासिक विवाद
मुगल शासन में हिंदू मंदिरों के विध्वंस और संरक्षण—दोनों के दस्तावेज मिलते हैं, लेकिन उनकी प्रकृति, मात्रा और उद्देश्य हर शासक तथा हर काल में समान नहीं थे। यह अध्याय प्रशंसात्मक उपाधियों और राजनीतिक सफाई से अलग होकर शाही फरमानों, दरबारी इतिहासों, भूमि-अभिलेखों और प्रमाणित घटनाओं को क्रमवार रखता है।
दावों की नहीं, दस्तावेजों की कसौटी
मुगल काल में मंदिरों की स्थिति पर विमर्श प्रायः दो विपरीत दावों में फँस जाता है। एक ओर पूरे शासनकाल को केवल मंदिर-विनाश का अभियान बताया जाता है; दूसरी ओर शाही अभिलेखों में दर्ज विध्वंस को भी केवल राजनीतिक कार्रवाई कहकर उसका धार्मिक पक्ष दबा दिया जाता है। दोनों दृष्टियाँ उपलब्ध प्रमाणों की पूरी तस्वीर प्रस्तुत नहीं करतीं।
अलग-अलग मुगल शासकों की नीतियाँ समान नहीं थीं। एक ही शासन में भी समय, स्थान, युद्ध, विद्रोह, धार्मिक आग्रह और राजस्व-प्रशासन के अनुसार नीति बदलती रही। इसलिए इस विषय में किसी शासक की प्रशंसा या सफाई देना उद्देश्य नहीं है। प्रश्न केवल यह है कि समकालीन शाही आदेश, फारसी दरबारी इतिहास, राजस्व अभिलेख, शिलालेख और संरक्षित दस्तावेज क्या बताते हैं।
सबसे मजबूत प्रमाण मूल शाही फरमान, समकालीन इतिहास, मंदिर या मठ में सुरक्षित दस्तावेज, राजस्व अभिलेख और पुरातात्विक सामग्री हैं। बाद की प्रतियाँ, स्थानीय इतिहास, वंशावलियाँ और मौखिक परंपराएँ भी उपयोगी हो सकती हैं, किंतु उनका प्रमाण-मूल्य मूल समकालीन दस्तावेज के बराबर नहीं रखा जा सकता।
किसी स्थान पर अधिकार-सुरक्षा का आदेश, दूसरे स्थान पर हुए मंदिर-विध्वंस को निरस्त नहीं करता; दोनों प्रमाण अपनी-अपनी प्रकृति में पढ़े जाने चाहिए।
कुल संख्या का निश्चित दावा क्यों कठिन है
मुगल काल में कुल कितने मंदिर तोड़े गए, इसकी कोई सर्वमान्य अंतिम संख्या उपलब्ध नहीं है। अभिलेख अधूरे हैं, प्रत्येक स्थानीय घटना शाही इतिहास में दर्ज नहीं हुई, अनेक मंदिरों का पुनर्निर्माण हुआ और कई स्थलों की पहचान बाद की स्मृति या विवादित परंपरा पर आधारित है।
हजारों या दसियों हजार की कोई निश्चित संख्या तभी ऐतिहासिक निष्कर्ष बन सकती है जब उसके साथ स्थानवार स्वतंत्र प्रमाण-सूची हो। इतिहासकार रिचर्ड ईटन ने प्रमाणित घटनाओं की सीमित सूची बनाने का प्रयास किया, किंतु उन्होंने भी कुल संख्या निश्चित कर सकने का दावा नहीं किया। संख्या की यह सावधानी काशी, मथुरा और अन्य प्रमाणित घटनाओं का महत्व कम नहीं करती।
उत्तरदायी निष्कर्ष यह है कि मंदिर-विध्वंस हुआ और अनेक मामलों के दस्तावेज उपलब्ध हैं; साथ ही प्रत्येक स्थानीय कथा को बिना स्रोत-परीक्षण शाही आदेश घोषित नहीं किया जा सकता।
बाबर और हुमायूँ: सीमित तथा विवादित प्रमाण
बाबर का शासन 1526 से 1530 तक रहा। उसके समय मंदिर-विध्वंस की चर्चा सबसे अधिक अयोध्या से जुड़ती है। बाबरनामा के उपलब्ध पाठ में बाबर द्वारा अयोध्या में राम मंदिर तोड़ने का स्पष्ट प्रत्यक्ष आदेश नहीं मिलता। इससे अयोध्या संबंधी पूरा ऐतिहासिक प्रश्न समाप्त नहीं होता, क्योंकि बाद के फारसी स्रोत, स्थानीय परंपराएँ, अभिलेख, पुरातात्विक सामग्री और न्यायिक परीक्षण अलग साक्ष्य-समूह बनाते हैं।
बाबर द्वारा पूरे भारत में मंदिर-विध्वंस की सर्वव्यापक नीति सिद्ध करने वाला पर्याप्त शाही दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। जहाँ किसी विशिष्ट अभियान या स्थान का प्रमाण हो, उसे उसी सीमा में रखा जाना चाहिए। अनुमान को आदेश और परंपरा को समकालीन अभिलेख नहीं बनाया जा सकता।
हुमायूँ का शासन 1530–1540 और 1555–1556 के दो चरणों में रहा। उसका अधिकांश राजनीतिक जीवन अफगान संघर्ष, निर्वासन और सत्ता पुनः प्राप्त करने में बीता। उसके शासन की व्यापक मंदिर-नीति का स्पष्ट दस्तावेजी आधार बहुत कम है। यह अभिलेखीय मौन न तो सार्वभौमिक सहिष्णुता सिद्ध करता है, न व्यापक विध्वंस-नीति।
अकबर: कर-नीति, भूमि-अनुदान और मंदिर निर्माण
अकबर ने 1563 में तीर्थ-कर और 1564 में जजिया हटाया। उसने राजपूत शासकों को साम्राज्य की उच्च राजनीति और सैन्य ढाँचे में स्थान दिया तथा अनेक हिंदू धार्मिक प्रतिष्ठानों को भूमि या राजस्व संबंधी अधिकार प्रदान किए। ये प्रशासनिक तथ्य हैं; इनसे किसी महिमामंडनकारी उपाधि का औचित्य सिद्ध नहीं होता।
अकबर के शासनकाल में वृंदावन वैष्णव भक्ति का प्रमुख केंद्र बन रहा था। गोविंददेव, मदनमोहन और अन्य प्रतिष्ठानों से जुड़े भूमि तथा राजस्व-अनुदानों के उल्लेख मिलते हैं। राजस्व-मुक्त भूमि धार्मिक संस्था को आर्थिक आधार देती थी और उसके पुजारियों, सेवाओं तथा संपत्ति को प्रशासनिक स्थिरता प्रदान करती थी।
राजा मानसिंह और अन्य राजपूत सरदारों ने इसी काल में बड़े मंदिर बनवाए। वृंदावन का गोविंददेव मंदिर प्रमुख उदाहरण है। ऐसे निर्माण बताते हैं कि साम्राज्य के अनेक क्षेत्रों में मंदिर निर्माण को शाही सत्ता का प्रतिरोध नहीं झेलना पड़ा। इसका अर्थ यह नहीं कि पूरे शासन को आधुनिक धार्मिक समानता के आदर्श में बदल दिया जाए; यह केवल उपलब्ध नीति और निर्माण का तथ्य है।
अकबर की नीतियों को केवल उपलब्ध कर-अभिलेखों, भूमि-अनुदानों और निर्माण संबंधी प्रमाणों की सीमा में रखा गया है।
जहांगीर का 1621 का मूल फरमान
जहांगीर ने अनेक मामलों में अकबर के समय दिए गए पुराने अनुदान जारी रखे। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में सुरक्षित उसके सोलहवें शासन-वर्ष—1621—का मूल फारसी फरमान है। इसमें अंकपद स्थित मंदिर के पुजारियों को 50 बीघा भूमि का अधिकार जारी रखने का आदेश है।
फरमान बताता है कि यह भूमि पहले अकबर ने दी थी। स्थानीय चौधरियों, कानूनगो और मुकद्दमों को पुजारियों को परेशान न करने तथा उन्हें शांतिपूर्वक रहने देने का आदेश दिया गया। यहाँ मंदिर, पुजारी, भूमि, पूर्व अनुदान और बाद के शासक द्वारा पुष्टि—सभी एक ही मूल दस्तावेज में दर्ज हैं।
इसे जहांगीर के पूरे शासन का नैतिक प्रमाण नहीं बनाया जा सकता। गुरु अर्जन देव की मृत्यु और धार्मिक-राजनीतिक नेतृत्व के साथ टकराव उसकी कठोरता भी दिखाते हैं। उचित निष्कर्ष केवल इतना है कि कठोर कार्रवाइयों के साथ मंदिर-पुजारियों के पुराने अधिकार जारी रखने के शाही आदेश भी मौजूद थे।
शाहजहाँ: नए मंदिरों के प्रति बढ़ती कठोरता
शाहजहाँ के शासन में अकबर और जहांगीर की तुलना में धार्मिक नीति अधिक रूढ़िवादी हुई। दरबारी इतिहासों में नए या निर्माणाधीन मंदिरों पर कार्रवाई के उल्लेख हैं। विशेष रूप से बनारस क्षेत्र की घटनाएँ इस परिवर्तन को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
बादशाहनामा के आधार पर बनारस में बड़ी संख्या में निर्माणाधीन मंदिर गिराने का विवरण मिलता है। अलग अनुवादों और अध्ययनों में 70 से अधिक, प्रायः 76 मंदिरों की संख्या दी जाती है। प्रत्येक मंदिर की स्वतंत्र पुरातात्विक पहचान उपलब्ध नहीं है और संख्या के संस्करण भिन्न हैं, पर निर्माणाधीन मंदिरों पर कठोर शाही कार्रवाई का स्रोतगत आधार स्पष्ट है।
शाहजहाँ की सेना और दरबार में जय सिंह, जसवंत सिंह तथा अन्य हिंदू-राजपूत अधिकारी उच्च पदों पर थे। इससे मंदिर-विरोधी आदेश समाप्त नहीं हो जाते। मध्यकालीन साम्राज्य में किसी समुदाय के अभिजातों की राजनीतिक भागीदारी और उसी समुदाय की धार्मिक संस्थाओं पर भेदभावपूर्ण कार्रवाई साथ-साथ हो सकती थी।
औरंगज़ेब: सर्वाधिक स्पष्ट शाही अभिलेख
मंदिर-विध्वंस के सबसे अधिक और स्पष्ट दस्तावेज औरंगज़ेब के शासन से जुड़े हैं। उसके शासन का इतिहास मआसिर-ए-आलमगीरी साकी मुस्तअद खान ने शाही अभिलेखों और शासन-समाचारों के आधार पर तैयार किया। ग्रंथ औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद संकलित हुआ, लेकिन वह समकालीन प्रशासनिक सूचनाओं के निकट होने के कारण महत्वपूर्ण प्राथमिक-समीप स्रोत है।
इस ग्रंथ में मंदिरों और धार्मिक शिक्षण संस्थानों को नष्ट करने के आदेश, काशी विश्वनाथ तथा मथुरा के केशवदेव मंदिर के ध्वंस और राजपूत क्षेत्रों में मूर्तियाँ तथा मंदिर गिराए जाने के विवरण मिलते हैं। इसलिए औरंगज़ेब ने मंदिरों के विरुद्ध कोई सामान्य आदेश कभी नहीं दिया—यह दावा उपलब्ध शाही स्रोत से मेल नहीं खाता।
इसी शासन में कुछ पुराने अधिकारों की पुष्टि और स्थानीय अधिकारियों को धार्मिक व्यक्तियों को परेशान न करने के आदेश भी मिले हैं। उन प्रशासनिक आदेशों को दर्ज करना आवश्यक है, किंतु उनके सहारे व्यापक विध्वंस आदेशों को कमतर करना स्रोतों का चयनात्मक उपयोग होगा।
अप्रैल 1669 का मंदिर और धार्मिक शिक्षण संबंधी आदेश
मआसिर-ए-आलमगीरी में अप्रैल 1669 की प्रविष्टि बताती है कि ठट्टा, मुल्तान और विशेष रूप से बनारस में ब्राह्मण अपने धार्मिक ग्रंथों की शिक्षा दे रहे थे तथा हिंदू और मुस्लिम विद्यार्थी उनके पास आते थे। इसके बाद प्रांतीय अधिकारियों को ऐसे शिक्षण केंद्रों और मंदिरों को नष्ट करने तथा सार्वजनिक धार्मिक अभ्यास रोकने का आदेश दिया गया।
आदेश की भाषा केवल किसी विद्रोही किले, राजस्व विवाद या युद्धक्षेत्र तक सीमित नहीं थी। उसमें गैर-इस्लामी धार्मिक शिक्षा और सार्वजनिक आचरण को दबाने का स्पष्ट तत्व था। इसलिए इसे केवल राजनीतिक प्रशासनिक कार्रवाई बताना दस्तावेज की धार्मिक भाषा को छिपाना होगा।
यह आदेश पूरे साम्राज्य के हर मंदिर के पूर्ण विनाश का प्रमाण नहीं है, पर मंदिरों और ब्राह्मण धार्मिक शिक्षा के विरुद्ध व्यापक शाही निर्देश अवश्य था। दोनों बातों का अंतर बनाए रखना ही तथ्यपरक इतिहास है।
1669 का आदेश आधुनिक राजनीतिक आरोप नहीं, मुगलकालीन शाही इतिहास में दर्ज समकालीन नीति-साक्ष्य है।
काशी विश्वनाथ मंदिर का विध्वंस और ज्ञानवापी
मआसिर-ए-आलमगीरी में बनारस के विश्वनाथ मंदिर को शाही आदेश के अनुसार ध्वस्त किए जाने की सूचना दर्ज है। घटना 1669 से संबंधित है। इसलिए काशी विश्वनाथ का विध्वंस केवल बाद की धार्मिक स्मृति या स्थानीय किंवदंती पर आधारित दावा नहीं है; मुगल शाही कालक्रम स्वयं इसकी पुष्टि करता है।
मंदिर के ध्वंस के बाद उसी परिसर से जुड़ी ज्ञानवापी मस्जिद बनी। स्थल की स्थापत्य संरचना, पुराने मंदिर के अवयव और बाद के निर्माण का संबंध आधुनिक न्यायिक तथा पुरातात्विक विमर्श का भी विषय है। इस अध्याय की सीमा में निर्विवाद बिंदु यह है कि विश्वनाथ मंदिर के ध्वंस का समकालीन मुगल स्रोत मौजूद है।
काशी धार्मिक शिक्षा, तीर्थ और ब्राह्मण परंपरा का प्रमुख केंद्र था। 1669 के व्यापक आदेश और विश्वनाथ मंदिर पर कार्रवाई को एक-दूसरे से अलग करके देखने पर नीति का धार्मिक आयाम अधूरा रह जाता है।
मथुरा का केशवदेव मंदिर और शाही ईदगाह
औरंगज़ेब काल का दूसरा प्रमुख प्रमाण मथुरा के केशवदेव अथवा केशवराय मंदिर का ध्वंस है। लगभग 1670 की इस घटना का स्पष्ट उल्लेख मआसिर-ए-आलमगीरी में मिलता है। बाद में उसी स्थल से संबद्ध शाही ईदगाह का निर्माण हुआ।
समकालीन विवरण इस कार्रवाई को धार्मिक विजय की भाषा में प्रस्तुत करता है और कुछ शाही अभिलेखों में मथुरा के लिए ‘इस्लामाबाद’ नाम भी प्रयुक्त हुआ। इसलिए केशवदेव के विध्वंस को केवल स्थानीय प्रशासन या सामान्य युद्ध की घटना मानना पर्याप्त नहीं है।
मथुरा कृष्ण जन्मभूमि और वैष्णव परंपरा का प्रमुख केंद्र था। ऐसे स्थल पर शाही कार्रवाई धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक—तीनों स्तरों पर संदेश देती थी।
मेवाड़, मारवाड़ और राजपूत क्षेत्रों में विध्वंस
औरंगज़ेब के शासन में मंदिर-विध्वंस केवल काशी और मथुरा तक सीमित नहीं था। मआसिर-ए-आलमगीरी राजस्थान में मेवाड़ और मारवाड़ के संघर्षों के दौरान मंदिर गिराने, जोधपुर क्षेत्र से मूर्तियाँ लाने और उन्हें अपमानित ढंग से प्रदर्शित करने की घटनाएँ दर्ज करता है।
राजपूत राज्य का प्रमुख मंदिर केवल पूजा-स्थल नहीं था। वह राजवंश की वैधता, दान, भूमि, स्थानीय कुलीनता और सामुदायिक प्रतिष्ठा का केंद्र भी था। इसलिए विद्रोही अथवा प्रतिरोधी राजसत्ता के मंदिर पर हमला राजनीतिक प्रभुत्व का प्रदर्शन बन सकता था।
पर राजनीतिक उद्देश्य बताने से धार्मिक विध्वंस का तथ्य समाप्त नहीं होता। मंदिर अपनी धार्मिक प्रतिष्ठा के कारण ही राजकीय प्रतीक भी था; उस पर हमला राजनीतिक और धार्मिक दोनों अर्थ रखता था। इसे केवल ‘राजनीतिक दंड’ कहकर धार्मिक अपमान को गायब करना अधूरा निष्कर्ष है।
क्या औरंगज़ेब ने प्रत्येक मंदिर तुड़वा दिया था?
उपलब्ध प्रमाण यह नहीं बताते कि औरंगज़ेब ने अपने विशाल साम्राज्य के प्रत्येक मंदिर को नष्ट कर दिया। उसका शासन लगभग पचास वर्ष चला और अनेक प्राचीन मंदिर पूरी अवधि में अस्तित्व में रहे। हजारों स्थानीय मंदिर और धार्मिक प्रतिष्ठान प्रशासनिक व्यवस्था के भीतर काम करते रहे।
इस तथ्य से 1669 का आदेश, काशी विश्वनाथ, केशवदेव या राजपूत क्षेत्रों के विध्वंस रद्द नहीं होते। सही कथन यह है कि उसने अनेक मंदिरों को नष्ट कराने और कुछ धार्मिक शिक्षण केंद्रों को बंद कराने के आदेश दिए; यह कहना कि उसने कोई मंदिर नहीं तोड़ा और यह कहना कि उसने प्रत्येक मंदिर नष्ट कर दिया—दोनों दस्तावेजी प्रमाण से बाहर हैं।
इतिहास में अतिरंजना प्रमाणित अपराधों को मजबूत नहीं करती; उलटे विरोधी पक्ष को पूरे तथ्य पर संदेह उठाने का अवसर देती है। स्पष्ट घटनाओं को उनके मूल आदेश और तिथि के साथ रखना अधिक प्रभावी है।
1659 का बनारस आदेश: पुराने अधिकारों की सुरक्षा
औरंगज़ेब के आरंभिक शासनकाल से 1659 का एक आदेश उद्धृत किया जाता है, जिसमें बनारस के ब्राह्मणों और प्राचीन मंदिरों को हटाने या परेशान करने से रोकने की बात है। पुराने मंदिरों और नए निर्माणों के बीच प्रशासनिक भेद का संकेत भी मिलता है।
इसका अर्थ यह है कि शासन के आरंभिक चरण में पुराने प्रतिष्ठानों के अधिकार सुरक्षित रखने का निर्देश दिया जा सकता था। दस वर्ष बाद 1669 का व्यापक कठोर आदेश सामने आता है। दोनों दस्तावेज साथ पढ़ने पर नीति में समय के साथ परिवर्तन दिखाई देता है।
1659 के आदेश को औरंगज़ेब की सर्वकालिक मंदिर-सुरक्षा का प्रमाण और 1669 के आदेश को अपवाद कहना उचित नहीं होगा। बाद का व्यापक निर्देश और उसके बाद काशी-मथुरा की कार्रवाई राज्य की दिशा में महत्वपूर्ण कठोर परिवर्तन बताते हैं।
जंगमबाड़ी मठ: पुराने अधिकार और संपत्ति-विवाद
बनारस का जंगमबाड़ी शैव मठ औरंगज़ेब काल के प्रशासनिक आदेशों में आता है। 1667 में मठ की 178 बीघा भूमि के पुराने अधिकार की पुष्टि और स्थानीय अधिकारियों को हस्तक्षेप न करने का निर्देश दिए जाने का उल्लेख मिलता है। लगभग 1672 की एक शिकायत में मठ से जुड़ी हवेलियों पर अवैध कब्जा होने पर अधिकार सिद्ध होने की दशा में संपत्ति लौटाने का आदेश बताया गया है।
इन आदेशों की भाषा को सावधानी से समझना चाहिए। नया धार्मिक अनुदान देना, पूर्व अधिकार जारी रखना और अवैध कब्जे से संपत्ति बचाना तीन अलग कार्य हैं। पुराने अधिकार की प्रशासनिक पुष्टि को व्यापक धार्मिक उदारता के रूप में प्रस्तुत करना तकनीकी रूप से भ्रामक होगा।
फिर भी ये अभिलेख बताते हैं कि किसी हिंदू मठ का संपत्ति-अधिकार शाही प्रशासन से सुरक्षा पा सकता था। इसी समय अन्य स्थानों पर मंदिर-विध्वंस के आदेश लागू होना मुगल प्रशासन की असमान और प्रयोजन-आधारित नीति को सामने लाता है।
भगवंत गोसाईं और जैन संस्थानों से जुड़े आदेश
1680 के एक आदेश में बनारस में राजा राम सिंह द्वारा बनवाए गए भवन में रहने वाले भगवंत गोसाईं को परेशान न करने और शांतिपूर्वक धार्मिक जीवन जारी रखने देने का निर्देश मिलता है। यह 1669 के बाद भी किसी विशिष्ट हिंदू धार्मिक व्यक्ति को प्रशासनिक सुरक्षा मिलने का उदाहरण है।
पालिताना, गिरनार और आबू के जैन धार्मिक अधिकारों से जुड़े कुछ फरमान भी औरंगज़ेब के नाम से उद्धृत किए जाते हैं। लगभग 1660 के दस्तावेजों में शांतिदास से जुड़े पुराने अधिकारों की पुष्टि का उल्लेख मिलता है। हर दस्तावेज के साथ यह जाँचना आवश्यक है कि वह नया अनुदान था, पूर्व अधिकार की पुष्टि, संपत्ति विवाद का समाधान या राजस्व व्यवस्था।
राष्ट्रीय संग्रहालय में 1701 का एक मूल फारसी फरमान भी सुरक्षित है, जिसमें मालवा के शाहजहाँपुर परगने में शेख लाल मुहम्मद और अन्य व्यक्तियों के निर्वाह के लिए कर-मुक्त बाग दिया गया। यह हिंदू मंदिर का अनुदान नहीं है। इसे मंदिर-संरक्षण बताना गलत होगा; इसका महत्व केवल औरंगज़ेबी फरमानों की प्रशासनिक प्रकृति समझने में है।
धर्म और राजनीति: परस्पर जुड़े कारण
मंदिर-विध्वंस का प्रत्येक मामला एक ही कारण से उत्पन्न नहीं हुआ। 1669 के आदेश में गैर-इस्लामी धार्मिक शिक्षा तथा पूजा दबाने की भाषा स्पष्ट है। काशी और मथुरा के विध्वंस को शाही इतिहास धार्मिक उपलब्धि की भाषा में रखता है। इन घटनाओं को केवल राजनीति कहना स्रोत के शब्दों से मेल नहीं खाता।
दूसरी ओर कुछ घटनाओं में विद्रोह, राजपूत युद्ध, स्थानीय सत्ता, राजस्व विवाद और साम्राज्य-विरोधी प्रतीक भी निर्णायक थे। मध्यकालीन राजसत्ता में धर्म और राजनीति आधुनिक अर्थ में अलग क्षेत्र नहीं थे। राजा की धार्मिक प्रतिष्ठा उसकी राजनीतिक वैधता से जुड़ती थी।
बड़ा मंदिर भूमि रखता, दान पाता, व्यापार तथा स्थानीय कुलीनों से जुड़ता और वंशीय देवता का केंद्र हो सकता था। इसलिए मंदिर पर हमला एक साथ धार्मिक अपमान, राजनीतिक दंड और प्रतीकात्मक विजय बन सकता था। राजनीतिक कारण की उपस्थिति धार्मिक लक्ष्य को समाप्त नहीं करती।
अकबर, जहांगीर, शाहजहाँ और औरंगज़ेब: नीति का अंतर
अकबर ने जजिया और तीर्थ-कर हटाए, राजपूत गठबंधन बनाए और हिंदू धार्मिक प्रतिष्ठानों के भूमि-अनुदान स्वीकार किए। जहांगीर ने कुछ पुराने अधिकार जारी रखे, जिसका 1621 का मूल फरमान प्रत्यक्ष उदाहरण है। इन तथ्यों को उनके प्रशासनिक संदर्भ में दर्ज किया गया है; उनसे प्रशंसात्मक मूल्यांकन नहीं निकाला गया है।
शाहजहाँ के समय नए तथा निर्माणाधीन मंदिरों के प्रति नीति कठोर हुई। बनारस की कार्रवाई इसका प्रमुख स्रोतगत उदाहरण है। औरंगज़ेब ने जजिया पुनः लगाया, 1669 का व्यापक आदेश दिया, काशी विश्वनाथ और केशवदेव मंदिर ध्वस्त कराए तथा राजपूत संघर्षों में मंदिर-विनाश को शक्ति-प्रदर्शन बनाया।
औरंगज़ेब के कुछ प्रशासनिक आदेश पुराने मठों या धार्मिक व्यक्तियों के अधिकार सुरक्षित करते हैं, लेकिन वे उसकी व्यापक नीति को अकबर या जहांगीर की सीधी निरंतरता नहीं बनाते। शासक-दर-शासक और काल-दर-काल वास्तविक अंतर स्पष्ट है।
नीति की तुलना उपलब्ध आदेशों से की गई है, किसी सम्राट की प्रशंसात्मक उपाधि या व्यक्तिपूजा से नहीं।
प्रमाणों की सात अलग श्रेणियाँ
पहली—मंदिर या पुजारी को नया भूमि अथवा राजस्व अनुदान। दूसरी—पूर्व शासक के दिए अधिकार की पुष्टि। तीसरी—स्थानीय अधिकारी को धार्मिक व्यक्ति या संस्था को परेशान न करने का आदेश। इन तीनों को एक ही व्यापक ‘मंदिर संरक्षण’ कहना तथ्य का आवश्यक भेद मिटा देता है।
चौथी—नए मंदिर निर्माण पर रोक, जिसमें पुराने और नए प्रतिष्ठान के बीच प्रशासनिक अंतर किया गया। पाँचवीं—किसी विशिष्ट मंदिर का ध्वंस, जैसे विश्वनाथ या केशवदेव। छठी—मंदिरों और धार्मिक शिक्षा को लक्ष्य करने वाला व्यापक नीतिगत आदेश, जैसे 1669 का निर्देश।
सातवीं—युद्ध या विद्रोह से जुड़े मंदिर-विध्वंस, जहाँ राजकीय संघर्ष और धार्मिक प्रतीक साथ मौजूद थे। यह वर्गीकरण बताता है कि किसी फरमान की प्रकृति समझे बिना उसे उदारता अथवा उत्पीड़न के एक ही खाते में रखना इतिहास को बिगाड़ सकता है।
प्रमुख दस्तावेज और प्रमाण: एक नजर में
अकबर—वृंदावन सहित धार्मिक प्रतिष्ठानों को भूमि और राजस्व-अधिकार; प्रकृति: अनुदान तथा निर्माण के लिए अनुकूल प्रशासनिक वातावरण। जहांगीर—1621 में अंकपद मंदिर के पुजारियों की 50 बीघा भूमि की पुष्टि; प्रकृति: पुराने अनुदान और पुजारियों की सुरक्षा; प्रमाण: राष्ट्रीय संग्रहालय में मूल फरमान।
शाहजहाँ—बनारस के निर्माणाधीन मंदिरों पर कार्रवाई; प्रकृति: नए निर्माण पर रोक और विध्वंस; प्रमाण: बादशाहनामा तथा उस पर आधारित अध्ययन। औरंगज़ेब—1659 में पुराने मंदिरों और ब्राह्मणों के अधिकार संबंधी निर्देश; 1667 में जंगमबाड़ी मठ की भूमि की पुष्टि; 1680 में भगवंत गोसाईं की प्रशासनिक सुरक्षा।
औरंगज़ेब—1669 में मंदिरों और धार्मिक विद्यालयों के विनाश का व्यापक आदेश; उसी वर्ष काशी विश्वनाथ का ध्वंस; लगभग 1670 में मथुरा के केशवदेव मंदिर का ध्वंस; मेवाड़-मारवाड़ संघर्षों में मंदिर-विनाश। इनके लिए मआसिर-ए-आलमगीरी मुख्य शाही स्रोत है।
अधिकार-सुरक्षा के प्रमाण से क्या सिद्ध होता है
सुरक्षा और अनुदान के दस्तावेज बताते हैं कि अनेक हिंदू धार्मिक संस्थाएँ भूमि रखती थीं, राजस्व-अधिकार पाती थीं और स्थानीय अधिकारियों के विरुद्ध शाही प्रशासन से न्याय माँग सकती थीं। जहांगीर का 1621 का फरमान इसका स्पष्ट उदाहरण है।
औरंगज़ेब काल के जंगमबाड़ी तथा भगवंत गोसाईं संबंधी आदेश बताते हैं कि शाही प्रशासन पुराने अधिकार या किसी व्यक्ति का निवास बचा सकता था। लेकिन हर प्रशासनिक संपत्ति-सुरक्षा को नया मंदिर-अनुदान बताना गलत है।
इन प्रमाणों से केवल नीति की असमानता और प्रशासनिक व्यवहारिकता सिद्ध होती है। इनका उपयोग 1669 के आदेश या प्रमाणित मंदिर-विध्वंस से शासक को मुक्त करने के लिए नहीं किया जा सकता।
विध्वंस के प्रमाण से क्या सिद्ध होता है
शाही आदेश और दरबारी इतिहास सिद्ध करते हैं कि कुछ मुगल शासकों, विशेषकर औरंगज़ेब के शासन में, राज्य ने हिंदू धार्मिक संस्थानों के विरुद्ध जानबूझकर कार्रवाई की। 1669 का निर्देश, काशी विश्वनाथ और केशवदेव के विध्वंस आधुनिक काल की गढ़ी हुई किंवदंतियाँ नहीं हैं।
राजस्थान में युद्ध-संबंधी विध्वंस भी केवल सैनिक इमारतों पर हमला नहीं था; मंदिर की धार्मिक तथा राजकीय प्रतिष्ठा को लक्ष्य किया गया। राजनीतिक संदर्भ बताना आवश्यक है, पर वही संदर्भ कार्रवाई के धार्मिक अर्थ को और स्पष्ट भी कर सकता है।
इन घटनाओं को असुविधाजनक मानकर शाही स्रोतों की भाषा बदल देना इतिहासलेखन नहीं है। तिथि, स्थान, आदेश और परिणाम जितने स्पष्ट हों, निष्कर्ष उतना ही स्पष्ट लिखा जाना चाहिए।
इतिहासलेखन की दो बड़ी त्रुटियाँ
पहली त्रुटि हर अप्रमाणित स्थानीय कथा को सीधे मुगल सम्राट के आदेश से हुआ मंदिर-विध्वंस मान लेना है। इससे प्रमाणित घटनाओं और लोकस्मृति का अंतर मिट जाता है तथा अतिरंजना मूल तथ्य की विश्वसनीयता को हानि पहुँचाती है।
दूसरी त्रुटि स्पष्ट शाही आदेशों को केवल राजनीति, प्रशासन या विद्रोह-दमन बताकर उनमें मौजूद धार्मिक भाषा और उद्देश्य को गायब करना है। 1669 का आदेश इस प्रवृत्ति की सीमा साफ करता है।
सही पद्धति प्राथमिक स्रोत के शब्द, तारीख, स्थान और प्रशासनिक परिस्थिति को पहले रखना है। व्याख्या उसके बाद आनी चाहिए; आज की सुविधा के अनुसार प्रमाण चुनना या हटाना नहीं चाहिए।
प्राथमिक और सहायक स्रोत-आधार
इस अध्ययन का प्रमुख आधार बाबरनामा, बादशाहनामा, साकी मुस्तअद खान का मआसिर-ए-आलमगीरी और राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित जहांगीर तथा औरंगज़ेब कालीन मूल फारसी फरमान हैं। वृंदावन, बनारस, जंगमबाड़ी और जैन संस्थानों से जुड़े भूमि-अधिकारों के लिए फरमानों तथा राजस्व-अभिलेखों पर आधारित शोधों का उपयोग किया गया है।
मंदिर-विध्वंस की संख्या और राजनीतिक प्रतीकवाद पर रिचर्ड एम. ईटन सहित आधुनिक इतिहासकारों के अध्ययनों को सहायक सामग्री की तरह पढ़ा गया है। जहाँ उनकी व्याख्या शाही स्रोत की धार्मिक भाषा को पर्याप्त महत्व नहीं देती, वहाँ मूल फारसी कालक्रम और आदेश को प्राथमिकता दी गई है।
हर स्रोत का प्रमाण-मूल्य समान नहीं है। राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित मूल फरमान, शाही कालक्रम, बाद की प्रति, आधुनिक लेख और स्थानीय परंपरा को अलग-अलग श्रेणी में रखा गया है।
मुगल काल में मंदिर-विध्वंस हुआ और उसके स्पष्ट शाही प्रमाण मौजूद हैं। अकबर तथा जहांगीर के समय कुछ मंदिरों, पुजारियों और धार्मिक प्रतिष्ठानों को भूमि या राजस्व-अधिकार मिलने के अभिलेख भी मौजूद हैं; उन्हें उनकी प्रशासनिक सीमा में ही समझा जाना चाहिए। शाहजहाँ के समय नए मंदिरों पर कठोरता बढ़ी। औरंगज़ेब के शासन में 1669 का व्यापक आदेश, काशी विश्वनाथ, मथुरा के केशवदेव और राजपूत क्षेत्रों के मंदिर-विध्वंस प्रमाणित हैं। उसी शासन में कुछ पुराने अधिकारों और संपत्तियों की प्रशासनिक सुरक्षा के आदेश मिलते हैं, लेकिन उनसे व्यापक विध्वंस-नीति रद्द नहीं होती। कारण कहीं धार्मिक, कहीं राजनीतिक और अनेक मामलों में दोनों थे।