OCN Networkओमकार चौधरी
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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Desk · भारत–पाकिस्तान युद्ध 1965

1965 का भारत–पाकिस्तान युद्ध, ताशकंद समझौता और लाल बहादुर शास्त्री का निधन

कच्छ और कश्मीर से पूर्ण युद्ध तक—सैन्य रणनीति, युद्धविराम और एक अनुत्तरित सार्वजनिक प्रश्न

ओमकार चौधरी / OCN Research Deskतथ्य-जाँचा शोध संस्करण · 3 अक्टूबर 2026

अध्याय का सार

1965 का भारत–पाकिस्तान युद्ध अप्रैल में कच्छ के रण की झड़पों से शुरू हुए संकट, अगस्त में कश्मीर में पाकिस्तानी घुसपैठ और सितंबर में खुले अंतरराष्ट्रीय युद्ध तक पहुँचा। पाकिस्तान की ऑपरेशन जिब्राल्टर योजना कश्मीर में विद्रोह भड़काने में सफल नहीं हुई। 1 सितंबर को छंब–अखनूर क्षेत्र में ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम शुरू हुआ; 6 सितंबर को भारतीय सेना ने अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कर लाहौर मोर्चा खोल दिया। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 211 के अनुसार युद्धविराम 22 सितंबर 1965 को 0700 GMT से लागू हुआ।

10 जनवरी 1966 को सोवियत मध्यस्थता में भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने ताशकंद घोषणा पर हस्ताक्षर किए। इसमें 25 फरवरी तक सेनाओं को 5 अगस्त 1965 से पहले की स्थिति में लौटाने और संबंध सामान्य करने पर सहमति हुई। यानी युद्धविराम सितंबर में हुआ; ताशकंद ने युद्धोत्तर वापसी और संवाद का ढाँचा बनाया। हस्ताक्षर के कुछ घंटों बाद, 11 जनवरी की सुबह ताशकंद में शास्त्रीजी का निधन हुआ। आधिकारिक संयुक्त चिकित्सकीय निष्कर्ष तीव्र हृदयाघात था। पोस्टमॉर्टम नहीं हुआ; इस कारण संदेह और सवाल बने रहे, लेकिन सार्वजनिक रिकॉर्ड में विषप्रयोग सिद्ध करने वाला निर्णायक प्रमाण नहीं है।

युद्ध को केवल एक पक्ष की पूर्ण विजय कहना इसकी जटिलता घटाता है। पाकिस्तान की कश्मीर-केंद्रित रणनीतिक पहल अपने घोषित लक्ष्य तक नहीं पहुँची, जबकि भारत ने अपनी स्थिति बनाए रखी और पश्चिमी मोर्चे पर जवाबी क्षमता दिखाई। फिर भी दोनों पक्षों को भारी सैन्य और आर्थिक लागत उठानी पड़ी, युद्धविराम के बाद कब्जे वाले क्षेत्र लौटे और कश्मीर का राजनीतिक विवाद अनसुलझा रहा।

प्रस्तावना

1965 का युद्ध स्वतंत्र भारत और पाकिस्तान के बीच पहला पूर्ण पैमाने का युद्ध नहीं था—1947–48 में भी कश्मीर को लेकर लड़ाई हो चुकी थी—लेकिन इसने दोनों देशों को फिर व्यापक सैन्य टकराव में पहुँचा दिया। इसमें थलसेना और वायुसेना की कार्रवाई, संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता, शीतयुद्ध के हथियार-संबंध और युद्ध के बाद की कूटनीति एक साथ जुड़े। युद्ध के परिणाम और दोनों पक्षों के हताहतों के आँकड़ों पर अलग-अलग राष्ट्रीय विवरण मिलते हैं; जहाँ स्रोतों में मतभेद है, वहाँ उन्हें एक निर्विवाद संख्या या फैसला बनाकर पेश करना उचित नहीं है।

1. पृष्ठभूमि: कश्मीर, 1962 के बाद का सैन्य संतुलन और कच्छ

1947 के विभाजन के बाद जम्मू-कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच मुख्य विवाद बना रहा। 1947–48 के युद्ध और संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता के बाद क्षेत्र विभाजित नियंत्रण में रहा; दोनों देशों ने इसकी वैध स्थिति और भविष्य पर अलग दावे बनाए रखे। 1962 में चीन से युद्ध के बाद भारत ने रक्षा बलों और तैयारी का विस्तार किया। पाकिस्तान के नीति-निर्माताओं के एक हिस्से ने इसके बावजूद अनुमान लगाया कि भारत कश्मीर में सीमित कार्रवाई का जवाब व्यापक युद्ध से नहीं देगा और स्थानीय असंतोष को सशस्त्र विद्रोह में बदला जा सकता है। ये अनुमान बाद की रणनीति समझने में उपयोगी हैं, लेकिन उन्हें पूरे पाकिस्तानी नेतृत्व की एकमत सोच नहीं मानना चाहिए।

अप्रैल 1965 में कच्छ के रण के सीमावर्ती क्षेत्र में भारत और पाकिस्तान की सेनाओं के बीच झड़पें हुईं। ब्रिटेन की मध्यस्थता के बाद 30 जून को युद्धविराम और विवादित सीमा को बाध्यकारी पंचाट के लिए भेजने पर सहमति हुई। यह अप्रैल का सीमित संघर्ष था; सितंबर में शुरू हुआ भारत–पाकिस्तान युद्ध अलग, अधिक व्यापक चरण था। पंचाट ने 1968 में विवादित क्षेत्र का लगभग दसवाँ हिस्सा पाकिस्तान को दिया।

रन ऑफ कच्छ: सीमित संघर्ष से व्यापक संकट तक

कच्छ का रण गुजरात और सिंध के बीच नमकीन, दलदली और विरल आबादी वाला इलाका है। सीमा-निर्धारण को लेकर दोनों देशों के दावे अलग थे। अप्रैल 1965 में यहाँ सैनिक झड़पें बढ़ीं और पाकिस्तान ने कुछ सीमावर्ती स्थानों पर दबाव बनाया। ब्रिटेन की मध्यस्थता से 30 जून की सहमति ने तत्काल लड़ाई रोकी और सीमा विवाद को पंचाट के सुपुर्द किया; इसका अर्थ यह नहीं था कि कश्मीर या भारत–पाकिस्तान के अन्य विवादों पर समझौता हो गया।

कच्छ प्रकरण का सितंबर के युद्ध से संबंध मुख्यतः रणनीतिक आकलन में था। पाकिस्तान के कुछ निर्णयकर्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला कि भारत संघर्ष को सीमित रखेगा। लेकिन कच्छ का भूगोल, स्थानीय सैन्य संतुलन और कश्मीर की स्थिति अलग थीं। सितंबर में भारत ने अंतरराष्ट्रीय सीमा पार की; इसने दिखाया कि अप्रैल की सीमित प्रतिक्रिया को पूरे युद्ध की नीति मान लेना गलत आकलन था।

1947–48 का युद्ध और कश्मीर का अनसुलझा प्रश्न

ब्रिटिश भारत के विभाजन के समय जम्मू-कश्मीर एक रियासत थी। अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान की ओर से आए कबायली लड़ाकों और अन्य सशस्त्र समूहों के आक्रमण के बाद महाराजा हरि सिंह ने भारत से सैन्य सहायता माँगी और भारत के साथ विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किए। भारतीय सेना के उतरने के बाद युद्ध 1948 के अंत तक चला। संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से युद्धविराम हुआ, पर क्षेत्र विभाजित नियंत्रण में रहा।

भारत का आधिकारिक पक्ष विलय-पत्र की वैधता पर आधारित था; पाकिस्तान ने कश्मीर के भविष्य को विवादित माना और मुस्लिम बहुलता के आधार पर पाकिस्तान से जुड़ाव की माँग की। दोनों पक्षों के दावे और संयुक्त राष्ट्र की भूमिका बाद के दशकों में बदलती कूटनीति और युद्धों का हिस्सा बने। 1965 में इन दावों का समाधान नहीं हुआ; सैन्य कार्रवाई ने विवाद को और तीखा किया।

1962 के बाद का सैन्य और राजनीतिक संदर्भ

1962 में चीन के साथ युद्ध में भारत को मिली पराजय ने रक्षा-तैयारी की कमियाँ उजागर कीं। इसके बाद सेना का विस्तार, पर्वतीय तैनाती, हथियारों और संचार में निवेश तथा रक्षा-संगठन में सुधार हुए। ये बदलाव 1965 तक पूर्ण नहीं हुए थे, लेकिन भारत 1962 वाली स्थिति में स्थिर नहीं था। युद्ध के अनुभव को इस रूप में पढ़ना चाहिए कि सुधार जारी थे और उनका असर अलग-अलग मोर्चों पर अलग था।

पाकिस्तान ने पश्चिमी देशों से मिले आधुनिक हथियारों, विशेषकर पैटन टैंकों, पर भरोसा किया। पाकिस्तान को अमेरिका-नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधनों के संदर्भ में सहायता मिली थी; भारत ने आशंका जताई कि ये हथियार भारत के विरुद्ध भी इस्तेमाल हो सकते हैं। 1965 में टैंक और विमान महत्वपूर्ण रहे, पर परिणाम केवल हथियारों की गुणवत्ता से तय नहीं हुआ—भूगोल, रसद, कमान, प्रशिक्षण और रणनीतिक अनुमान भी निर्णायक थे।

अयूब खान का पाकिस्तान और युद्ध संबंधी अनुमान

1965 में पाकिस्तान पर राष्ट्रपति अयूब खान का शासन था। कश्मीर उनकी सरकार की घरेलू राजनीति और राष्ट्रीय पहचान में केंद्रीय प्रश्न था। पाकिस्तानी नेतृत्व के कुछ हिस्सों ने यह अनुमान लगाया कि कश्मीर में असंतोष को सीमापार से भेजे गए सशस्त्र लोगों के जरिए विद्रोह में बदला जा सकता है; भारत प्रतिक्रिया को सीमित रखेगा; और चीन या महाशक्तियों का दबाव भारत को व्यापक युद्ध से रोक देगा। इन धारणाओं के सभी विवरण और निर्णय-प्रक्रिया पर स्रोतों में मतभेद हैं। इतना स्पष्ट है कि जिब्राल्टर की योजना अपेक्षित जनसमर्थन नहीं जुटा सकी और भारत ने युद्ध का दायरा बढ़ा दिया।

2. लाल बहादुर शास्त्री का नेतृत्व और देश की तैयारी

जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद लाल बहादुर शास्त्री 9 जून 1964 को प्रधानमंत्री बने। वे उत्तर प्रदेश की राजनीति और कांग्रेस संगठन से लेकर रेल, परिवहन तथा गृह मंत्रालय तक विभिन्न जिम्मेदारियाँ निभा चुके थे। सार्वजनिक छवि सादगी और संयम की थी। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्हें उत्तराधिकार-संतुलन, खाद्यान्न संकट और चीन के बाद पाकिस्तान के साथ बढ़ते तनाव का सामना करना पड़ा। 1965 का संकट उनके नेतृत्व की पहली बड़ी युद्धकालीन परीक्षा बना।

युद्ध के समय शास्त्री ने दृढ़ता और संयम दोनों का परिचय दिया। उन्होंने कश्मीर में घुसपैठ को सीमित स्थानीय घटना मानकर छोड़ने के बजाय सैन्य प्रतिकार का समर्थन किया। 6 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कर लाहौर की दिशा में मोर्चा खोलना राजनीतिक रूप से बड़ा निर्णय था: इससे स्पष्ट हुआ कि युद्ध को केवल जम्मू-कश्मीर तक सीमित रखने की पाकिस्तान की अपेक्षा भारत स्वीकार नहीं करेगा। इस निर्णय का सैन्य प्रभाव अलग-अलग मोर्चों पर देखा जाना चाहिए; इसे अकेले युद्ध की जीत का कारण कहना सरलीकरण होगा।

‘जय जवान, जय किसान’ का संदर्भ

भारत उस समय खाद्यान्न की कमी, सूखे और आयात पर निर्भरता से जूझ रहा था। शास्त्री ने जनता से संयम और उत्पादन बढ़ाने का आग्रह किया। ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा राष्ट्रीय सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा को एक साथ रखता था: सीमा की रक्षा करने वाला सैनिक और अन्न पैदा करने वाला किसान—दोनों देश की क्षमता के आधार हैं। युद्धकाल में यह संदेश जनसमर्थन और राष्ट्रीय मनोबल का प्रतीक बना। इसे किसी एक भाषण या तत्काल युद्ध-प्रचार तक सीमित न समझकर शास्त्री की व्यापक सार्वजनिक अपील के रूप में देखना उचित है।

3. ऑपरेशन जिब्राल्टर: कश्मीर में घुसपैठ

5 अगस्त 1965 से पाकिस्तान ने ऑपरेशन जिब्राल्टर के तहत सशस्त्र घुसपैठियों को भारतीय प्रशासन वाले जम्मू-कश्मीर में भेजा। योजना का उद्देश्य स्थानीय विद्रोह भड़काना और भारत की स्थिति को अस्थिर करना था। लेकिन अपेक्षित जनसमर्थन नहीं मिला; कई स्थानीय लोगों ने अधिकारियों को घुसपैठ की सूचना दी। भारतीय सुरक्षा बलों ने घुसपैठियों से लड़ाई की और नियंत्रण रेखा के पार उनके मार्गों पर दबाव बनाया।

योजना और उसके पीछे की धारणा

जिब्राल्टर के तहत भेजे गए दलों को अलग-अलग क्षेत्रों में कार्रवाई करनी थी। उनका लक्ष्य संचार और प्रशासन में बाधा डालना, हथियार जुटाना, स्थानीय समर्थन पाना और ऐसी परिस्थिति बनाना था जिसे पाकिस्तान कश्मीर में जनविद्रोह के रूप में प्रस्तुत कर सके। यह योजना इस अपेक्षा पर टिकी थी कि स्थानीय जनता बड़ी संख्या में साथ देगी। बाहरी घुसपैठ को जन-आंदोलन में बदलने के लिए आवश्यक स्थानीय संगठन और समर्थन नहीं था।

भारतीय अधिकारियों और सैन्य स्रोतों के विवरण में स्थानीय लोगों द्वारा घुसपैठियों की सूचना देना तथा सुरक्षा बलों को सहयोग करना योजना की विफलता के कारणों में गिना गया है। पाकिस्तान के अपने सैन्य इतिहास और बाद की चर्चाओं में भी अभियान की तैयारी, स्थानीय समर्थन के अनुमान और आगे के निर्णयों पर आलोचना हुई है। किस इकाई ने किस स्थान पर क्या किया, इसके विवरण स्रोतों में अलग हो सकते हैं; इसलिए पूरे कश्मीर में एक समान प्रतिक्रिया का दावा नहीं करना चाहिए।

हाजी पीर और संघर्षविराम रेखा के पार कार्रवाई

भारत ने घुसपैठ को रोकने के लिए नियंत्रण रेखा के आसपास और उसके पार सैन्य कार्रवाई की। अगस्त में भारतीय बलों ने हाजी पीर दर्रे पर नियंत्रण स्थापित किया। उड़ी–पुंछ क्षेत्र के बीच स्थित इस दर्रे को घुसपैठ और आवाजाही के मार्गों के संदर्भ में सामरिक महत्व प्राप्त था। इसे हासिल करने के लिए पहाड़ी भूभाग में कठिन अभियान चलाया गया। हाजी पीर पर नियंत्रण ने पाकिस्तान के लिए घुसपैठ मार्गों को बनाए रखना कठिन किया, लेकिन युद्ध के बाद इसका भविष्य ताशकंद की वापसी शर्त से तय हुआ।

जिब्राल्टर के विफल होने के बाद पाकिस्तान ने छंब क्षेत्र में अधिक परंपरागत सैन्य आक्रमण किया। इस क्रम को अलग-अलग चरणों में समझना चाहिए: पहले सीमापार घुसपैठ और छापामार अभियान, फिर ग्रैंड स्लैम, और उसके बाद दोनों देशों की सेनाओं के बीच अंतरराष्ट्रीय सीमा तक फैला खुला युद्ध।

भारत ने हाजी पीर दर्रे सहित कुछ सामरिक स्थानों पर कब्जा किया। इस दर्रे का महत्व उड़ी और पुंछ क्षेत्रों के बीच आवाजाही तथा घुसपैठ के मार्गों के संदर्भ में था। युद्ध के दौरान इसका कब्जा सैन्य सफलता था; लेकिन इसके स्थायी नियंत्रण का प्रश्न बाद में ताशकंद की वापसी शर्तों से जुड़ गया।

4. ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम और अखनूर संकट

1 सितंबर को पाकिस्तान ने छंब क्षेत्र में ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम शुरू किया। उसका लक्ष्य अखनूर की ओर बढ़ना और जम्मू-कश्मीर में भारतीय संपर्क तथा रसद पर दबाव बनाना था। पाकिस्तानी सेना ने शुरुआत में छंब क्षेत्र में बढ़त हासिल की। भारतीय बलों ने जवाब दिया; युद्ध का दबाव बढ़ने के साथ पाकिस्तान की कमान में बदलाव भी हुआ। अखनूर तक पहुँचने का उद्देश्य पूरा नहीं हुआ।

छंब से अखनूर तक का सैन्य महत्व

छंब का भूभाग मैदानी और बख्तरबंद कार्रवाई के अनुकूल था। अखनूर जम्मू क्षेत्र के संचार नेटवर्क और नदी-पार मार्गों के लिए महत्वपूर्ण था। पाकिस्तान की तेज प्रगति भारतीय सेनाओं और प्रशासन के लिए चिंता का विषय बनी, क्योंकि अखनूर पर दबाव से राजौरी–पुंछ क्षेत्र में भारतीय सैनिकों की आपूर्ति प्रभावित हो सकती थी। इसीलिए ग्रैंड स्लैम को केवल एक सीमावर्ती झड़प नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर में भारत की सैन्य स्थिति पर दबाव डालने वाली योजना के रूप में देखा जाता है।

कमान में बदलाव और अभियान की गति

ग्रैंड स्लैम के बीच पाकिस्तानी कमान में बदलाव हुआ और अभियान की गति प्रभावित हुई। इस बदलाव की वजह तथा उसके निर्णायक प्रभाव के बारे में सैन्य इतिहासों में अलग-अलग व्याख्याएँ हैं। इसे अकेले पाकिस्तान की विफलता का कारण बताना सटीक नहीं होगा: भारतीय प्रतिरोध, भूभाग, रसद, समय और युद्ध के अन्य मोर्चों पर बने दबाव को भी साथ देखना चाहिए। परिणाम यह रहा कि अखनूर पर निर्णायक कब्जा नहीं हुआ।

भारत का निर्णय: युद्ध का दायरा बढ़ाना

6 सितंबर को भारतीय सेना ने पंजाब क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कर लाहौर की दिशा में अभियान शुरू किया। यह निर्णय इस संकेत के रूप में सामने आया कि भारत युद्ध को केवल कश्मीर में सीमित नहीं रखेगा। पाकिस्तान को लाहौर और सियालकोट की रक्षा के लिए बल लगाने पड़े; इससे छंब–अखनूर पर उसका दबाव बँटा। यह कहना अधिक सटीक है कि सीमा पार करने से पाकिस्तान की रणनीति पर नया दबाव बना, न कि इससे अकेले युद्ध का फैसला हो गया।

5. लाहौर मोर्चा: डोगराई और इच्छोगिल नहर

लाहौर मोर्चे पर भारतीय सेना का उद्देश्य शहर पर कब्जा करना नहीं था। सीमा पार करने का सैन्य उद्देश्य पाकिस्तानी बलों का ध्यान बाँटना, लाहौर के निकट दबाव बनाना और युद्ध को कश्मीर तक सीमित रहने से रोकना था। भारतीय अग्रिम टुकड़ियाँ इच्छोगिल नहर—जिसे पाकिस्तान में बीआरबी नहर कहा जाता है—तक पहुँचीं। नहर को लाहौर की पूर्वी रक्षा-पंक्ति के रूप में तैयार किया गया था।

डोगराई के आसपास लड़ाई में भारतीय इकाइयाँ नहर पार कर शहर के निकट पहुँचीं, लेकिन आगे की स्थिति, सहायता और आपूर्ति बनाए रखना कठिन रहा। शुरुआती बढ़त टिकाऊ नहीं रही और बल पीछे हटे। बाद में सितंबर के अंतिम दिनों में डोगराई क्षेत्र में फिर लड़ाई हुई। युद्धविराम के समय तक भारत लाहौर पर कब्जा किए बिना सीमा के निकट लड़ रहा था। इस मोर्चे को “लाहौर पर कब्जे का असफल प्रयास” कह देना उद्देश्य और वास्तविक सैन्य स्थिति दोनों को गलत ढंग से सरल करेगा।

डोगराई की लड़ाई भारतीय सैनिकों की आक्रामक क्षमता और युद्धभूमि की कठिनाइयों का उदाहरण है। नहर, पुलों, गोलाबारी और रसद ने किसी भी अग्रिम को टिकाए रखना चुनौतीपूर्ण बनाया। मोर्चे के स्थानीय सामरिक परिणाम और पूरे युद्ध के राजनीतिक नतीजे अलग प्रश्न हैं।

6. खेमकरण और असल उत्तर: टैंक युद्ध

पंजाब के खेमकरण क्षेत्र में पाकिस्तान ने बख्तरबंद शक्ति के साथ हमला किया। इस दिशा में सफलता से भारतीय रक्षा पंक्ति टूट सकती थी और अमृतसर की ओर दबाव बढ़ता। भारतीय बलों ने इलाके के भूभाग, जलभराव और अपनी तैनाती का उपयोग कर आगे बढ़ते पाकिस्तानी टैंकों को रोकने की कोशिश की। असल उत्तर के आसपास सितंबर के दूसरे सप्ताह में निर्णायक टकराव हुआ।

भारत की 4 माउंटेन डिवीजन और अन्य इकाइयों ने रक्षात्मक मोर्चे बनाए; भारतीय टैंक तथा तोपखाने भी मुकाबले में शामिल हुए। लड़ाई के बाद बड़ी संख्या में पाकिस्तानी टैंकों के नष्ट या छोड़ दिए जाने की भारतीय स्मृति के कारण क्षेत्र को ‘पैटन नगर’ कहा जाने लगा। यह लोकप्रिय नाम एक युद्ध-स्मृति है; टैंक क्षति की सटीक संख्या के लिए दोनों पक्षों के दावों और आधिकारिक युद्ध-इतिहासों को अलग-अलग देखना चाहिए।

असल उत्तर की सफलता को एकतरफा चमत्कार या केवल टैंकों की विफलता बताना उचित नहीं है। रक्षा-स्थिति, दलदली और जलमग्न भूभाग, टैंक-विरोधी हथियारों, इकाइयों की तैनाती और कमान के निर्णय ने परिणाम बनाया। इस लड़ाई ने पाकिस्तान की बख्तरबंद श्रेष्ठता की धारणा को चुनौती दी, पर युद्ध अन्य मोर्चों पर जारी रहा।

7. सियालकोट, फिल्लौरा और चविंडा

सियालकोट क्षेत्र में भारत ने दूसरा बड़ा आक्रमण किया। उद्देश्य पाकिस्तानी सेना पर दबाव बढ़ाना और उसे अलग-अलग मोर्चों पर संसाधन बाँटने को मजबूर करना था। फिल्लौरा और चविंडा के आसपास बड़े बख्तरबंद बल भिड़े। दोनों पक्षों के टैंक, पैदल सेना और तोपखाने ने व्यापक कार्रवाई की; कई दिनों तक स्थिति बदलती रही।

चविंडा के निकट संघर्ष युद्ध के सबसे बड़े टैंक अभियानों में गिना जाता है। भारतीय बलों को पाकिस्तानी प्रतिरोध और भूभाग के कारण आगे बढ़ने में कठिनाई हुई; पाकिस्तान ने भी अपने क्षेत्र की रक्षा की। युद्धविराम तक कोई पक्ष ऐसा निर्णायक लाभ कायम नहीं कर सका जिससे सियालकोट मोर्चे का स्थायी राजनीतिक परिणाम निकलता। सैन्य हताहत और उपकरण-हानि की संख्या को स्रोत के साथ देना आवश्यक है, क्योंकि दोनों देशों के आधिकारिक आँकड़े समान नहीं हैं।

6 सितंबर को भारत ने अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कर लाहौर की दिशा में मोर्चा खोला। इससे लड़ाई कश्मीर तक सीमित न रही और पाकिस्तान को पश्चिमी मोर्चे पर भी सेना लगानी पड़ी। सियालकोट–फिल्लौरा क्षेत्र तथा पंजाब के अन्य मोर्चों पर बड़े बख्तरबंद और पैदल सेना अभियान हुए। खेमकरण–असल उत्तर की लड़ाई में भारतीय बलों ने पाकिस्तानी टैंक हमले को रोका; फिल्लौरा के आसपास दोनों पक्षों ने भारी कवच-बल लगाए। अलग-अलग लड़ाइयों के परिणाम को पूरे युद्ध का अकेला फैसला नहीं माना जाना चाहिए।

8. वायुसेना, नौसेना और युद्ध का फैलाव

1965 में भारतीय वायुसेना और पाकिस्तान वायुसेना दोनों ने थलसेना के अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाई। वायुसेना ने सैनिकों को निकट हवाई सहायता दी, विरोधी विमानों को रोकने का प्रयास किया, सैन्य ठिकानों और परिवहन मार्गों पर हमले किए और अपने हवाई अड्डों की रक्षा की। वायु अभियान 1 सितंबर के बाद तेज हुआ और 6 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय सीमा पर युद्ध फैलने के बाद पश्चिमी मोर्चे के कई हिस्सों में जारी रहा।

दोनों वायुसेनाओं ने लड़ाकू विमानों, बमवर्षकों और जमीनी नियंत्रण प्रणालियों का उपयोग किया। पाकिस्तानी वायुसेना के पास अमेरिकी निर्मित विमान थे; भारतीय वायुसेना के बेड़े में ब्रिटिश और सोवियत मूल के विमान शामिल थे। दोनों पक्षों ने अपने विमानों के नुकसान, मार गिराए गए विमानों और सफल अभियानों के अलग-अलग आँकड़े दिए। स्वतंत्र रूप से सत्यापित तुलनात्मक गणना कठिन है, इसलिए इस अध्याय में कोई एक पक्षीय संख्या निर्णायक तथ्य की तरह नहीं दी गई।

1962 के भारत–चीन युद्ध के दौरान भारत ने लड़ाकू वायुसेना को आक्रामक भूमिका में नहीं लगाया था। 1965 में वायुसेना सक्रिय युद्ध-प्रयास का हिस्सा बनी। इसके बावजूद थलसेना और वायुसेना के समन्वय, लक्ष्य-चयन, संचार और निकट हवाई सहायता की सीमाएँ सामने आईं। युद्ध के बाद इन अनुभवों ने संयुक्त योजना और वायु-रक्षा के महत्व पर ध्यान बढ़ाया।

नौसैनिक कार्रवाई और द्वारका

युद्ध का केंद्र थल और वायु मोर्चे रहे; नौसेना की भूमिका अपेक्षाकृत सीमित थी। 7 सितंबर की रात पाकिस्तान नौसेना ने द्वारका पर गोलाबारी की। इस कार्रवाई का सैन्य असर सीमित रहा, लेकिन भारत की पश्चिमी तट सुरक्षा और नौसैनिक तैयारी पर बहस हुई। युद्ध के समग्र परिणाम को द्वारका पर हमले से जोड़ना उचित नहीं है। बाद में 1971 में समुद्री मोर्चे की भूमिका कहीं अधिक निर्णायक हुई।

9. अंतरराष्ट्रीय दबाव और युद्धविराम

महाशक्तियों की कूटनीति

सितंबर तक लड़ाई जम्मू-कश्मीर से पंजाब और सियालकोट तक फैल गई थी। संयुक्त राष्ट्र महासचिव और सुरक्षा परिषद ने युद्ध रोकने के लिए दबाव बनाया। अमेरिका तथा ब्रिटेन ने भारत और पाकिस्तान को सैन्य उपकरणों की आपूर्ति रोक दी। इसका असर दोनों देशों पर पड़ा, पर पाकिस्तान के पश्चिमी हथियार-स्रोतों पर निर्भर होने के कारण यह उसके लिए विशेष चुनौती थी। यह निर्णय हथियार आपूर्ति और कूटनीतिक दबाव का कदम था, प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप नहीं।

सोवियत संघ ने भी युद्धविराम और बाद की वार्ता का समर्थन किया। चीन ने पाकिस्तान का राजनीतिक समर्थन किया और सितंबर में भारत को सीमा संबंधी चेतावनी दी, लेकिन 1965 में भारत–चीन सीमा पर नया पूर्ण युद्ध नहीं खुला। शीतयुद्ध की राजनीति ने दोनों पक्षों की कूटनीतिक गणना प्रभावित की, पर युद्ध के स्थानीय सैन्य निर्णय भारत और पाकिस्तान की सेनाओं ने लिए।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव 211

युद्ध के विस्तार और हताहतों के बीच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने 20 सितंबर 1965 को प्रस्ताव 211 सर्वसम्मति से स्वीकार किया। प्रस्ताव ने तत्काल युद्धविराम की मांग की और उसे 22 सितंबर को 0700 GMT से प्रभावी करने का समय दिया। उसने दोनों पक्षों से 5 अगस्त से पहले की सैन्य स्थिति पर लौटने की भी मांग की। यह समय भारतीय मानक समय में दोपहर 12:30 बजे था। दोनों देशों ने युद्धविराम स्वीकार किया; सीमांत उल्लंघन और तनाव के बावजूद बड़े पैमाने की लड़ाई रुक गई।

सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 211 को पहले के प्रस्तावों से अलग समझना चाहिए: सितंबर के शुरुआती प्रस्तावों में युद्ध रोकने और संयुक्त राष्ट्र पर्यवेक्षण पर जोर था; 20 सितंबर के प्रस्ताव ने दोनों सरकारों से युद्धविराम की माँग की, उसका निश्चित समय तय किया और 5 अगस्त से पहले की स्थिति में वापसी को बाद का कदम बनाया। भारत और पाकिस्तान ने इसे स्वीकार किया। संघर्षविराम के बाद भी सीमा पर कुछ घटनाएँ और आरोप जारी रहे, इसलिए युद्धविराम का अर्थ विवादों का समाधान नहीं था।

प्रस्ताव में युद्धविराम 22 सितंबर 1965 को 0700 GMT पर प्रभावी होना था—भारतीय मानक समयानुसार दोपहर 12:30 बजे। इस समय को ताशकंद समझौते की तारीख से न मिलाएँ: सितंबर का प्रस्ताव लड़ाई रोकने से जुड़ा था; जनवरी 1966 की ताशकंद घोषणा ने सैनिकों की वापसी और सामान्य संबंधों का ढाँचा बनाया।

10. ताशकंद वार्ता और घोषणा

सोवियत मध्यस्थता और वार्ता के उद्देश्य

सोवियत प्रधानमंत्री अलेक्सी कोसिगिन की मध्यस्थता में भारत और पाकिस्तान के नेता जनवरी 1966 में ताशकंद में मिले। सोवियत संघ दोनों देशों से संबंध बनाए रखना और दक्षिण एशिया में स्थिरता स्थापित करना चाहता था। वार्ता में भारत ने युद्धविराम को स्थिर करने, सैनिक वापसी और बल-प्रयोग रोकने की प्रतिबद्धता पर जोर दिया। पाकिस्तान कब्जे वाले क्षेत्रों की वापसी चाहता था और कश्मीर के प्रश्न को वार्ता में प्रमुख बनाए रखना चाहता था। इन प्राथमिकताओं पर सहमति कठिन थी।

10 जनवरी को शास्त्री और अयूब खान ने ताशकंद घोषणा पर हस्ताक्षर किए। यह कश्मीर का अंतिम समाधान नहीं था; इसका उद्देश्य युद्ध के बाद सेनाएँ हटाना, राजनयिक संपर्क बहाल करना और सामान्य संबंधों की दिशा में बढ़ना था। घोषणा को आधिकारिक रूप से ‘ताशकंद घोषणा’ कहा जाता है; लोकप्रिय लेखन में इसे समझौता भी कहा जाता है।

घोषणा की प्रमुख शर्तें

  • दोनों देशों की सेनाएँ 25 फरवरी 1966 तक 5 अगस्त 1965 से पहले की स्थिति पर लौटेंगी और युद्धविराम की शर्तों का पालन करेंगी।
  • दोनों देश बल-प्रयोग से बचेंगे, एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे और विवादों को शांतिपूर्ण तरीकों से सुलझाने का प्रयास करेंगे।
  • उच्चायुक्तों की वापसी तथा राजनयिक संबंध सामान्य करने की प्रक्रिया शुरू होगी। व्यापार, संचार, सांस्कृतिक संपर्क, शरणार्थियों और युद्धबंदियों से जुड़े प्रश्नों पर काम किया जाएगा।

घोषणा ने संयुक्त राष्ट्र चार्टर और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धांतों का उल्लेख किया। दोनों सरकारों ने प्रचार और शत्रुतापूर्ण वक्तव्य कम करने, सामान्य राजनयिक कार्य बहाल करने तथा आर्थिक और सांस्कृतिक संपर्कों को फिर से शुरू करने की दिशा में कदम उठाने पर सहमति दी। इसमें कश्मीर के राजनीतिक भविष्य पर कोई विस्तृत फार्मूला नहीं था; न ही सीमा-पार घुसपैठ या उसके आरोपों की निगरानी के लिए कोई नया प्रवर्तन तंत्र बना।

हाजी पीर की वापसी और भारत में आलोचना

हाजी पीर और अन्य कब्जे वाले क्षेत्रों को लौटाने की शर्त भारत में विवाद का विषय बनी। आलोचकों ने कहा कि दर्रे का नियंत्रण घुसपैठ के मार्गों पर दबाव बनाए रखने में उपयोगी था और सैन्य सफलता के बाद इसे छोड़ना नुकसान था। पक्ष में तर्क था कि संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव 211 पहले ही 5 अगस्त से पहले की स्थिति में वापसी की माँग कर चुका था; लंबे युद्ध की मानवीय, आर्थिक और सैन्य लागत बढ़ रही थी; और क्षेत्र को स्थायी रूप से रखने के लिए केवल युद्धकालीन कब्जा पर्याप्त आधार नहीं था। निर्णय का मूल्यांकन इन्हीं प्रतिस्पर्धी तर्कों और उस समय की कूटनीतिक परिस्थिति के संदर्भ में होना चाहिए।

ताशकंद न पूर्ण कूटनीतिक विजय था, न सीधे सैन्य पराजय का दस्तावेज। उसने युद्ध के बाद संबंध बहाल करने का औपचारिक रास्ता बनाया, पर कश्मीर और परस्पर अविश्वास के मूल प्रश्न हल नहीं किए। पाकिस्तान में भी घोषणा को लेकर राजनीतिक असंतोष था।

11. युद्ध का सैन्य और रणनीतिक आकलन

दोनों देशों ने युद्ध के बाद अपनी-अपनी विजय-कथाएँ प्रस्तुत कीं। रणनीतिक दृष्टि से पाकिस्तान की जिब्राल्टर योजना कश्मीर में अपेक्षित जनविद्रोह नहीं करा सकी और ग्रैंड स्लैम अखनूर तक नहीं पहुँचा। भारत ने अपने नियंत्रण वाले कश्मीर की रक्षा की और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर कार्रवाई कर युद्ध का दबाव व्यापक किया। पाकिस्तान ने छंब में शुरुआती बढ़त ली और लाहौर तथा सियालकोट के निकट भारतीय प्रगति को रोका। किसी पक्ष ने स्थायी राजनीतिक समाधान या निर्णायक क्षेत्रीय विजय हासिल नहीं की।

हताहतों, युद्धबंदियों, टैंकों और विमानों के नुकसान के आँकड़े राष्ट्रीय स्रोतों में अलग हैं। अंतर का कारण गिनती की परिभाषा, युद्ध के बाद जारी दावे और सैन्य रिकॉर्ड तक सीमित सार्वजनिक पहुँच है। अतः एक संख्या को निर्विवाद बताने के बजाय, आधिकारिक दावों को उनके स्रोत के साथ लिखना चाहिए। युद्ध ने यह भी दिखाया कि आधुनिक हथियार अपने-आप निर्णायक परिणाम नहीं देते; योजना, रसद, खुफिया आकलन और राजनीतिक उद्देश्य उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

दोनों देशों के घोषित और प्राप्त लक्ष्य

पाकिस्तान का प्रमुख लक्ष्य कश्मीर में राजनीतिक विद्रोह को जन्म देना और भारत की स्थिति को कमजोर करना था। जिब्राल्टर ऐसा नहीं कर पाया। ग्रैंड स्लैम ने छंब में शुरुआती दबाव बनाया, लेकिन अखनूर पर कब्जा नहीं हुआ। भारत का लक्ष्य अपने नियंत्रण वाले क्षेत्र की रक्षा और घुसपैठ को रोकना था; उसने लाहौर और सियालकोट मोर्चे खोलकर पाकिस्तान पर व्यापक सैन्य दबाव बनाया। पाकिस्तान ने छंब में क्षेत्रीय बढ़त ली और भारतीय अग्रिमों को अपने मुख्य शहरों तक पहुँचने से रोका।

इसलिए युद्ध का आकलन इस पर निर्भर करता है कि ‘जीत’ से क्या अभिप्राय है—युद्धभूमि की स्थानीय बढ़त, घोषित राजनीतिक लक्ष्य, कब्जे का क्षेत्र, या युद्ध के बाद की स्थिति। पाकिस्तान अपने कश्मीर लक्ष्य तक नहीं पहुँचा; भारत ने अपनी स्थिति कायम रखी, लेकिन कश्मीर समस्या का समाधान नहीं हुआ और युद्ध के अंत में दोनों पक्षों ने कब्जे वाले क्षेत्र लौटाने पर सहमति दी। इसे रणनीतिक रूप से भारत के पक्ष में परिणाम कहने के तर्क हैं, मगर पूर्ण और निर्णायक सैन्य विजय कहना अतिशयोक्ति होगी।

सैन्य सबक और सीमाएँ

  • सीमित घुसपैठ से शुरू हुआ संघर्ष अंतरराष्ट्रीय सीमा तक फैल सकता है; सैन्य योजना में संभावित विस्तार का अनुमान जरूरी है।
  • बख्तरबंद बलों की सफलता भूभाग, रसद, पैदल सेना, तोपखाने और वायु समर्थन के समन्वय पर निर्भर करती है।
  • स्थानीय जनसमर्थन के बारे में गलत अनुमान किसी गुप्त अभियान को राजनीतिक विद्रोह में बदलने से रोक सकता है।
  • हवाई शक्ति का प्रभाव तभी बढ़ता है जब लक्ष्य-चयन, संचार और थलसेना के साथ समन्वय स्पष्ट हो।
  • युद्धविराम लड़ाई रोकता है; यदि मूल राजनीतिक प्रश्न अनसुलझे रहें तो वह स्थायी शांति की गारंटी नहीं देता।

1965 और 1971 के बीच संबंध

1965 के युद्ध ने भारत और पाकिस्तान दोनों को सैन्य तैयारी तथा राजनीतिक रणनीति पर पुनर्विचार करने को मजबूर किया। पाकिस्तान के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों के बीच राजनीतिक असमानता तथा पूर्वी पाकिस्तान का संकट अलग कारणों से विकसित हुआ; उसे सीधे 1965 का परिणाम नहीं कहा जा सकता। फिर भी 1965 के बाद पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति में अयूब शासन और ताशकंद के फैसले पर असंतोष बढ़ा, जबकि भारत ने अपनी सैन्य तैयारी जारी रखी। 1971 का युद्ध अपने अलग चुनावी, संवैधानिक और मानवीय कारणों से हुआ। 1965 को उसकी पृष्ठभूमि का एक हिस्सा कहा जा सकता है, अकेला कारण नहीं।

12. शास्त्रीजी का निधन: आधिकारिक रिकॉर्ड और खुले प्रश्न

ताशकंद घोषणा पर हस्ताक्षर के कुछ घंटों बाद, 11 जनवरी 1966 की सुबह लाल बहादुर शास्त्री का ताशकंद में निधन हुआ। वे 61 वर्ष के थे और जून 1964 से प्रधानमंत्री थे। भारत सरकार की ओर से संसद में दिए गए बयान तथा संयुक्त चिकित्सकीय रिपोर्ट में मृत्यु का कारण तीव्र हृदयाघात—मायोकार्डियल इन्फार्क्शन—बताया गया। उनके निजी चिकित्सक डॉ. आर. एन. चुग और सोवियत चिकित्सकों ने रिपोर्ट पर हस्ताक्षर किए। रिपोर्ट में मृत्यु का समय 1:32 बजे दर्ज है।

उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार ताशकंद में पोस्टमॉर्टम नहीं हुआ और भारत लौटने के बाद भी ऐसा परीक्षण नहीं कराया गया। 16 फरवरी 1966 को संसद में दिए गए सरकारी वक्तव्य और संयुक्त चिकित्सकीय रिपोर्ट ने तीव्र हृदयाघात को आधिकारिक कारण बताया। रिपोर्ट में डॉ. चुग और सोवियत चिकित्सकों की भूमिका दर्ज है। आधिकारिक निदान समकालीन चिकित्सकीय निष्कर्ष है; पोस्टमॉर्टम के अभाव में उसके साथ स्वतंत्र शव-परीक्षण उपलब्ध नहीं था। इन दोनों बातों को एक साथ रखना चाहिए।

शास्त्रीजी के परिवार के कुछ सदस्यों ने बाद में शरीर के रंग और दिखाई दिए निशानों के बारे में सवाल उठाए। इन प्रश्नों को परिवार की चिंता और गवाही के रूप में दर्ज किया जा सकता है; केवल इनसे विषप्रयोग सिद्ध नहीं होता। मृत्यु अचानक हुई, वे विदेश में थे और शव-परीक्षण नहीं हुआ—इन परिस्थितियों ने संदेह के लिए जगह छोड़ी। लेकिन संदेह, अपूर्ण प्रक्रिया और हत्या का प्रमाण तीन अलग श्रेणियाँ हैं।

इतिहासकारों के लिए दो स्तर अलग रखना जरूरी है: आधिकारिक चिकित्सकीय निष्कर्ष हृदयाघात था; पोस्टमॉर्टम न होने और कुछ अभिलेखों के सीमित खुलासे ने प्रक्रियात्मक प्रश्न छोड़े। उपलब्ध सार्वजनिक चिकित्सा, फोरेंसिक या न्यायिक साक्ष्य विषप्रयोग को निर्णायक रूप से सिद्ध नहीं करते। गोपनीय या अनुपलब्ध दस्तावेज अपने-आप में षड्यंत्र का प्रमाण नहीं होते। इसलिए हत्या के आरोप को तथ्य की तरह लिखना प्रमाण से आगे जाना होगा।

राज नारायण से संबंधित बाद की जांच/समिति का उल्लेख शास्त्रीजी की मृत्यु पर हुई सार्वजनिक चर्चाओं में आता है। उपलब्ध सार्वजनिक दस्तावेज़ों के आधार पर इसे ऐसी व्यापक, स्वतंत्र फोरेंसिक जांच बताना उचित नहीं जो विवाद पर निर्णायक निष्कर्ष दे चुकी हो। इस प्रसंग का अभिलेखीय इतिहास अधूरा है; इसलिए इसे अनिश्चितता के रूप में दर्ज करना चाहिए, किसी व्यक्ति या संस्था पर सिद्ध दोषारोपण के रूप में नहीं।

सूचना के अधिकार के तहत अभिलेखों की स्थिति

2018 में केंद्रीय सूचना आयोग ने शास्त्रीजी की मृत्यु से जुड़े दस्तावेज़ों की माँग और सरकारी विभागों के उत्तरों पर विचार किया। आदेश में यह दर्ज है कि कुछ रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं बताए गए और प्रधानमंत्री कार्यालय से संबंधित एक दस्तावेज़ को विदेशी संबंधों और गोपनीयता के आधार पर सार्वजनिक न करने का प्रश्न उठा। आयोग की कार्यवाही सूचना तक पहुँच के दायरे में थी; उसने यह निष्कर्ष नहीं दिया कि गोपनीय दस्तावेज़ में हत्या का प्रमाण है। किसी रिकॉर्ड का वर्गीकृत होना न तो अपराध का प्रमाण है, न अपने-आप में पारदर्शिता का पर्याप्त विकल्प।

उपलब्ध सार्वजनिक प्रमाण का सावधान सार यह है: आधिकारिक कारण तीव्र हृदयाघात था; पोस्टमॉर्टम नहीं हुआ; परिवार और आम लोगों के प्रश्न बने रहे; और सार्वजनिक डोमेन में विषप्रयोग अथवा हत्या सिद्ध करने वाला निर्णायक फोरेंसिक या न्यायिक प्रमाण सामने नहीं है। आगे के शोध में संसद के मूल वक्तव्य, संयुक्त मेडिकल रिपोर्ट, केंद्रीय सूचना आयोग का आदेश और उपलब्ध अभिलेखों की स्थिति अलग-अलग जाँची जानी चाहिए।

13. शास्त्रीजी की विरासत और युद्धोत्तर राजनीति

शास्त्रीजी का निधन ताशकंद घोषणा के कुछ घंटों बाद हुआ। इससे भारत में शोक के साथ ही प्रधानमंत्री के उत्तराधिकार का प्रश्न भी उठा। गुलजारीलाल नंदा कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने। कांग्रेस संसदीय दल ने बाद में नया नेता चुना और इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं। यह शांतिपूर्ण सत्ता-संक्रमण उस समय भारतीय लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए महत्वपूर्ण परीक्षा थी।

शास्त्रीजी की विरासत कई स्तरों पर बनी। युद्ध के दौरान उन्होंने राजनीतिक निर्णय लेने की क्षमता दिखाई; जनता से खाद्य-संयम और उत्पादन बढ़ाने की अपील की; और ‘जय जवान, जय किसान’ के माध्यम से रक्षा और कृषि को राष्ट्रीय जिम्मेदारी के रूप में जोड़ा। उनकी व्यक्तिगत सादगी की छवि लोकप्रिय स्मृति का भाग बनी, लेकिन ऐतिहासिक मूल्यांकन में इसे उनके प्रशासनिक और रणनीतिक फैसलों से अलग करके नहीं देखना चाहिए।

14. युद्ध के बाद भारत–पाकिस्तान संबंध और दीर्घकालिक परिणाम

ताशकंद के बाद दोनों देशों ने राजनयिक संपर्क बहाल करने और सेनाएँ हटाने की प्रक्रिया शुरू की, लेकिन आपसी अविश्वास कायम रहा। कश्मीर का प्रश्न अनसुलझा था; दोनों देशों ने सैन्य तैयारी जारी रखी। ताशकंद घोषणा ने युद्ध को रोकने का ढाँचा बनाया, पर भविष्य के संघर्ष को रोकने के लिए पर्याप्त राजनीतिक विश्वास या निगरानी व्यवस्था नहीं बनाई।

पाकिस्तान में ताशकंद घोषणा और युद्ध के परिणाम पर घरेलू आलोचना हुई। विदेश मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो सहित कुछ नेताओं ने समझौते की आलोचना की; अयूब खान के शासन और युद्ध-लक्ष्यों को लेकर राजनीतिक बहस तेज हुई। इस आलोचना को पाकिस्तान की पूरी जनता की एक जैसी राय नहीं समझना चाहिए। भारत में भी हाजी पीर लौटाने पर असंतोष सामने आया। दोनों देशों में युद्ध की स्मृति अलग-अलग राष्ट्रीय आख्यानों में ढली।

सैन्य दृष्टि से भारत और पाकिस्तान दोनों ने टैंक युद्ध, वायुसेना सहयोग, रसद, खुफिया सूचना, संचार और युद्धकालीन कमान से सबक लिए। युद्ध ने दिखाया कि सीमा पर सीमित कार्रवाई को रोकने के लिए राजनीतिक नेतृत्व को संभावित विस्तार और महाशक्तियों के दबाव दोनों का अनुमान लगाना पड़ता है। फिर भी सैन्य सबक अपने-आप स्थायी राजनीतिक समाधान नहीं बनाते।

प्रमुख समयरेखा

  • अप्रैल 1965 — कच्छ के रण में भारत–पाकिस्तान झड़पें।
  • 30 जून 1965 — ब्रिटिश मध्यस्थता के बाद कच्छ में युद्धविराम और पंचाट पर सहमति।
  • 5 अगस्त 1965 — जम्मू-कश्मीर में ऑपरेशन जिब्राल्टर के तहत घुसपैठ शुरू।
  • 1 सितंबर 1965 — छंब क्षेत्र में ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम शुरू।
  • 6 सितंबर 1965 — भारत ने अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कर लाहौर मोर्चा खोला।
  • 20 सितंबर 1965 — संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव 211 पारित किया।
  • 22 सितंबर 1965 — प्रस्ताव में निर्धारित समय से युद्धविराम लागू।
  • 10 जनवरी 1966 — शास्त्री और अयूब खान ने ताशकंद घोषणा पर हस्ताक्षर किए।
  • 11 जनवरी 1966 — ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री का निधन।
  • 25 फरवरी 1966 — ताशकंद घोषणा के अनुसार सेनाओं की पूर्व-युद्ध स्थिति में वापसी की समय-सीमा।

स्रोत और संदर्भ

नीचे दिए गए स्रोतों को उनके स्वरूप के साथ पढ़ें। सरकारी युद्ध-इतिहास और आधिकारिक वक्तव्य संस्थागत विवरण देते हैं; वे स्वयं निष्पक्षता की गारंटी नहीं हैं। संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव और मूल ताशकंद पाठ शर्तों की पुष्टि करते हैं। शास्त्रीजी की मृत्यु पर केंद्रीय सूचना आयोग का आदेश आरटीआई रिकॉर्ड समझने में सहायक है, लेकिन चिकित्सकीय जांच का विकल्प नहीं।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, प्रस्ताव 211 (1965), 20 सितंबर 1965) — युद्धविराम का समय और 5 अगस्त से पहले की स्थिति में वापसी की मांग।

संयुक्त राष्ट्र भारत–पाकिस्तान पर्यवेक्षण मिशन, 1965 के युद्ध और प्रस्ताव 211 की पृष्ठभूमि — कच्छ की झड़पों, अगस्त में कश्मीर में लड़ाई, सुरक्षा परिषद और युद्धविराम पर्यवेक्षण का संयुक्त राष्ट्र विवरण।

भारत का विदेश मंत्रालय, ताशकंद घोषणा, 10 जनवरी 1966 — सेनाओं की वापसी और संबंध सामान्य करने की मूल शर्तें।

भारत का रक्षा मंत्रालय, History Division, The India-Pakistan War of 1965: A History (1992) — आधिकारिक भारतीय युद्ध-इतिहास का संग्रह विवरण। इसे भारत सरकार का संस्थागत इतिहास मानें; तुलनात्मक अध्ययन के लिए अन्य पक्षों और स्वतंत्र इतिहासकारों को भी देखें।

अमेरिकी विदेश विभाग, Foreign Relations of the United States, 1964–1968, खंड XXV, भारत-पाकिस्तान संकट — अमेरिकी कूटनीतिक दस्तावेजों का संपादित संकलन; आधिकारिक अमेरिकी दृष्टिकोण।

अमेरिकी विदेश विभाग, 1965 कच्छ समझौते पर ऐतिहासिक विवरण — ब्रिटिश मध्यस्थता, जून 1965 की सहमति और बाद के पंचाट का विवरण।

रुद्र चौधरी, ‘Just Another Border Incident: The Rann of Kutch and the 1965 India–Pakistan War,’ War and Peace in Contemporary India (Routledge) — कच्छ प्रकरण और 1965 के युद्ध-निर्णयों पर अभिलेख-आधारित अकादमिक अध्ययन।

भारत सरकार, प्रेस सूचना ब्यूरो, 1965 युद्ध की स्वर्ण-जयंती पर वक्तव्य — ऑपरेशन जिब्राल्टर और युद्ध की भारतीय सरकारी व्याख्या।

पाकिस्तान आर्मी इंस्टीट्यूट ऑफ मिलिट्री हिस्ट्री, ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम पर विवरण — पाकिस्तानी सैन्य संस्थान का विवरण; इसके दावों को भारतीय आधिकारिक इतिहास और स्वतंत्र अध्ययनों के साथ तुलनात्मक रूप से पढ़ें।

प्रधानमंत्री कार्यालय, लाल बहादुर शास्त्री का आधिकारिक जीवन-वृत्त — प्रधानमंत्री के कार्यकाल और सार्वजनिक जीवन की जानकारी।

लोकसभा, 16 फरवरी 1966: ‘Statement Re: Circumstances of Shri Lal Bahadur Shastri’s Death’ — प्रधानमंत्री की मृत्यु पर संसद में दिए गए मंत्री-वक्तव्य का अभिलेख।

केंद्रीय सूचना आयोग का आदेश, Navdeep Gupta बनाम National Archives of India (24 सितंबर 2018) — आरटीआई और मृत्यु-संबंधी सरकारी उत्तरों का संदर्भ; यह सूचना-प्रकटीकरण का मामला था, हत्या पर न्यायिक निष्कर्ष नहीं।