बिड़ला भवन में बम
मदनलाल पाहवा पकड़ा गया, लेकिन उसके साथ जुड़े षड्यंत्रकारियों तक पुलिस समय रहते नहीं पहुंच सकी।
1947–48 की साम्प्रदायिक हिंसा और गांधी की अंतिम राजनीतिक भूमिका से 20 जनवरी के असफल हमले, 30 जनवरी की हत्या, पुलिस–खुफिया चूक, लाल किले के मुकदमे, उच्च न्यायालय की अपील, कपूर आयोग, संघ और सावरकर संबंधी विवाद तथा 2018 तक उठे मिथकों की प्रमाण-आधारित जांच।
मदनलाल पाहवा पकड़ा गया, लेकिन उसके साथ जुड़े षड्यंत्रकारियों तक पुलिस समय रहते नहीं पहुंच सकी।
प्रार्थना सभा की ओर जाते गांधी पर बेरेटा पिस्तौल से गोली चलाई गई और गोडसे घटनास्थल पर पकड़ा गया।
सर्वोच्च न्यायालय ने चौथी गोली या दूसरे बंदूकधारी के दावे को उपलब्ध प्रमाणों से समर्थित नहीं माना।
गोडसे की प्रत्यक्ष भूमिका, व्यापक षड्यंत्र, संघ से उसके संबंध, सावरकर की न्यायिक बरी और कपूर आयोग के बाद के निष्कर्षों को एक ही श्रेणी में नहीं रखा गया है। प्रत्येक दावे को मुकदमे, अपील, आयोग, सरकारी अभिलेख और बाद की न्यायिक समीक्षा की अलग कसौटी पर पढ़ा गया है।
हत्या की राजनीतिक पृष्ठभूमि से अंतिम समयरेखा तक सामग्री को क्रमवार रखा गया है। संपादकीय संवाद और अनावश्यक दोहराव हटाकर मूल तथ्य, तर्क, स्रोत और भिन्न कानूनी निष्कर्ष सुरक्षित रखे गए हैं।
असहमति और हिंसा अलग · संगठनात्मक संबंध और संस्थागत दोषसिद्धि अलग · आपराधिक अदालत तथा जांच आयोग के निष्कर्ष अलग · प्रमाणित तथ्य, ऐतिहासिक संदेह और अप्रमाणित मिथक अलग।