26 जनवरी 1950 — संविधान लागू हुआ, भारत गणतंत्र बना
संविधान सभा की बैठकों, बहसों और अंतिम निर्णयों की यात्रा
अध्याय का सार
26 जनवरी 1950 की सुबह दिल्ली में हल्की ठंड थी। सरकारी भवन (आज का राष्ट्रपति भवन) के दरबार हॉल में सुबह 10 बजकर 18 मिनट पर भारत को “संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य” घोषित किया गया। कुछ ही मिनट बाद, 10 बजकर 24 मिनट पर, डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भारत के पहले राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। गवर्नर-जनरल सी. राजगोपालाचारी, जो अंतिम गवर्नर-जनरल थे, ने गणराज्य की घोषणा पढ़ी। इसके साथ ही ब्रिटिश ताज से भारत का अंतिम औपचारिक संवैधानिक संबंध समाप्त हो गया। भारत अब “डोमिनियन” नहीं रहा; वह अपने नागरिकों द्वारा, अपने नागरिकों के लिए बनाए गए संविधान से शासित एक गणराज्य बन गया।
संविधान सभा ने 11 सत्रों में कुल 165 दिन बैठकें कीं; इनमें 114 दिन प्रारूप संविधान पर विचार हुआ। सभा में 7,635 संशोधन पेश किए गए, जिनमें से 2,473 वास्तव में सदन में आगे बढ़ाए गए। इसलिए ‘चर्चा और मतदान’ का संयुक्त आँकड़ा देने के बजाय इन दोनों प्रक्रियात्मक आँकड़ों को अलग रखना चाहिए। 9 दिसंबर 1946 से 26 नवंबर 1949 तक की अवधि को प्रचलित गणना में 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन कहा जाता है।
यह अध्याय उसी यात्रा की कहानी है—कैसे संविधान सभा बनी, किन परिस्थितियों में उसकी बैठकें हुईं, किन प्रश्नों पर तीखे वाद-विवाद हुए, किन सदस्यों ने कौन-से तर्क दिए, और अंततः कौन-से निर्णय लिए गए जिन्होंने आधुनिक भारत की नींव रखी। और फिर, अंत में, कि 26 जनवरी की तिथि ही क्यों चुनी गई और उस दिन देश में क्या हुआ।
अध्याय का दायरा और स्रोत-पद्धति
संविधान सभा की संपूर्ण कार्यवाही—“कॉन्स्टिट्यूएंट असेंबली डिबेट्स”—12 खंडों में प्रकाशित है और आज constitutionofindia.net के डिजिटल अभिलेखागार तथा लोकसभा सचिवालय के प्रकाशनों में उपलब्ध है। इस अध्याय के तथ्य, उद्धरण और तिथियाँ मुख्यतः इन्हीं अभिलेखों तथा एनसीईआरटी कक्षा 12 के अध्याय “संविधान का निर्माण” जैसे मानक स्रोतों पर आधारित हैं। (उद्धरणों का हिंदी रूपांतरण भावानुवाद है।)
भाग 1: पृष्ठभूमि — संविधान सभा की माँग कैसे उठी
1.1 स्वशासन का विचार: शुरुआती पड़ाव
भारत के लिए भारतीयों द्वारा बनाया गया संविधान—यह विचार बीसवीं सदी के आरंभ से ही राष्ट्रीय आंदोलन में मौजूद था। 1895 में “स्वराज विधेयक” (जिसे प्रायः बाल गंगाधर तिलक की प्रेरणा से जोड़ा जाता है) में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, कानून के समक्ष समानता जैसे अधिकारों की कल्पना की गई थी। 1922 में महात्मा गांधी ने लिखा कि भारत का राजनीतिक भविष्य भारतीयों की स्वतंत्र इच्छा से तय होना चाहिए, न कि ब्रिटिश संसद के उपहार से।
1925 में एनी बेसेंट के नेतृत्व में “कॉमनवेल्थ ऑफ इंडिया बिल” तैयार हुआ। फिर 1928 में मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में बनी समिति ने “नेहरू रिपोर्ट” प्रस्तुत की। यह भारतीयों द्वारा तैयार संविधान का पहला व्यापक प्रारूप था, जिसमें मौलिक अधिकारों की सूची, संयुक्त निर्वाचन, वयस्क मताधिकार और डोमिनियन स्टेटस की माँग थी। यह रिपोर्ट साइमन कमीशन—जिसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था—के जवाब में थी।
1931 के कराची अधिवेशन में कांग्रेस ने “मौलिक अधिकार और आर्थिक नीति” पर प्रस्ताव पारित किया। इसमें वाक्-स्वतंत्रता, सभा की स्वतंत्रता, धर्म की स्वतंत्रता, अस्पृश्यता का अंत, वयस्क मताधिकार, न्यूनतम मजदूरी, प्रमुख उद्योगों पर राज्य नियंत्रण जैसे विचार थे। बाद में संविधान के मौलिक अधिकारों और नीति-निदेशक तत्वों में इसकी स्पष्ट छाप दिखाई देती है।
1.2 1934: संविधान सभा की औपचारिक माँग
संविधान सभा का विचार एम. एन. रॉय ने 1934 में रखा। उसी वर्ष जून में कांग्रेस कार्यसमिति ने भारतीयों द्वारा संविधान सभा के माध्यम से संविधान बनाने की मांग का प्रस्ताव पारित किया; कांग्रेस ने इसे 1935 में अपने औपचारिक राजनीतिक लक्ष्य के रूप में अपनाया। 1936 के लखनऊ और 1937 के फैजपुर अधिवेशनों में यह मांग दोहराई गई। जवाहरलाल नेहरू ने 1938 में लिखा कि स्वतंत्र भारत का संविधान “बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के” संविधान सभा द्वारा बनाया जाएगा।
1.3 भारत सरकार अधिनियम 1935: एक अनचाहा आधार
ब्रिटिश संसद ने 1935 में “भारत सरकार अधिनियम” पारित किया। यह अब तक का सबसे लंबा ब्रिटिश संसदीय अधिनियम था—321 धाराएँ और 10 अनुसूचियाँ। इसमें प्रांतीय स्वायत्तता, संघीय ढाँचा, तीन सूचियों (संघ, प्रांत, समवर्ती) में विषयों का विभाजन, संघीय न्यायालय और लोक सेवा आयोग जैसी संस्थाओं का प्रावधान था। राष्ट्रीय नेताओं ने इसकी कड़ी आलोचना की—नेहरू ने इसे “दासता का चार्टर” और “ऐसी मशीन जिसमें ब्रेक बहुत हैं पर इंजन नहीं” कहा।
विडंबना यह है कि बाद में संविधान सभा ने प्रशासनिक ढाँचे के बहुत से अंश इसी अधिनियम से लिए। डॉ. आंबेडकर ने सभा में स्वीकार किया कि संविधान का बड़ा हिस्सा 1935 के अधिनियम से लिया गया है, और इसका बचाव करते हुए कहा कि प्रशासनिक विवरणों को उधार लेने में कोई शर्म नहीं, क्योंकि कोई भी संविधान शून्य से नहीं बनता।
1.4 द्वितीय विश्वयुद्ध और बदलती परिस्थितियाँ
1939 में ब्रिटेन ने भारत को भारतीय नेताओं से पूछे बिना युद्ध में शामिल कर दिया। विरोध में कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने इस्तीफा दे दिया। 1940 के “अगस्त प्रस्ताव” में पहली बार ब्रिटिश सरकार ने सिद्धांततः माना कि भारत का संविधान मुख्यतः भारतीयों द्वारा बनाया जाएगा। 1942 में क्रिप्स मिशन ने युद्ध के बाद संविधान-निर्मात्री निकाय का प्रस्ताव रखा, पर प्रांतों को अलग होने का अधिकार देने के कारण इसे कांग्रेस ने अस्वीकार कर दिया। गांधीजी ने इसे “डूबते बैंक के नाम आगे की तारीख का चेक” कहा। फिर अगस्त 1942 में “भारत छोड़ो आंदोलन” शुरू हुआ।
युद्ध के बाद ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार बनी, जिसके प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली भारत की स्वतंत्रता के पक्षधर थे। 1946 की शुरुआत में नौसेना विद्रोह, आज़ाद हिंद फौज के मुकदमों पर जनाक्रोश और व्यापक असंतोष ने स्पष्ट कर दिया कि ब्रिटिश राज अधिक दिन नहीं टिक सकता।
1.5 कैबिनेट मिशन योजना (16 मई 1946)
मार्च 1946 में ब्रिटिश कैबिनेट के तीन सदस्य—लॉर्ड पेथिक-लॉरेंस, सर स्टैफर्ड क्रिप्स और ए. वी. अलेक्जेंडर—भारत आए। 16 मई 1946 को घोषित उनकी योजना ने संविधान सभा के गठन का ढाँचा तय किया:
- सभा में कुल 389 सदस्य होंगे: 292 ब्रिटिश प्रांतों से, 4 चीफ कमिश्नर क्षेत्रों से और 93 देसी रियासतों से।
- लगभग 10 लाख जनसंख्या पर एक सीट।
- प्रांतों की सीटें तीन समुदायों—सामान्य, मुस्लिम और सिख—में जनसंख्या के अनुपात में बाँटी जाएँगी।
- प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्य आनुपातिक प्रतिनिधित्व की एकल संक्रमणीय मत प्रणाली से संविधान सभा के सदस्य चुनेंगे।
- रियासतों के प्रतिनिधि रियासतों के शासकों के परामर्श से तय होंगे।
- प्रांतों को तीन समूहों (A, B, C) में बाँटने की विवादास्पद व्यवस्था, जिसमें समूह B (पंजाब, पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत, सिंध) और समूह C (बंगाल, असम) मुस्लिम-बहुल थे।
इसका अर्थ यह था कि संविधान सभा प्रत्यक्ष वयस्क मताधिकार से नहीं, बल्कि 1946 में सीमित मताधिकार से चुनी गई प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से चुनी गई। बाद में आलोचकों ने इसे सभा की “प्रतिनिधिकता” पर प्रश्नचिह्न के रूप में उठाया, जिसका उत्तर सभा के भीतर और बाहर दोनों जगह दिया गया।
1.6 जुलाई 1946 के चुनाव
जुलाई-अगस्त 1946 में ब्रिटिश भारत के लिए निर्धारित 296 सीटों पर चुनाव हुए—292 प्रांतीय विधानसभाओं से और चार चीफ कमिश्नर प्रांतों से। कांग्रेस ने 208, मुस्लिम लीग ने 73 और अन्य दलों तथा निर्दलीयों ने शेष सीटें जीतीं। डॉ. बी. आर. आंबेडकर पहली बार बंगाल से संविधान सभा में पहुँचे; उनका यह चुनाव कांग्रेस टिकट पर नहीं था। विभाजन के बाद उनकी बंगाल सीट पाकिस्तान में चली गई और वे बाद में बंबई से कांग्रेस के समर्थन से फिर चुने गए। अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर, एन. गोपालस्वामी आयंगर, के. एम. मुंशी और एच. वी. कामत जैसे विधिवेत्ता तथा अनेक महिला, अल्पसंख्यक और अन्य प्रतिनिधि भी सभा में शामिल थे।
चुनाव परिणामों के बाद मुस्लिम लीग ने 29 जुलाई 1946 को कैबिनेट मिशन योजना की स्वीकृति वापस ले ली और “सीधी कार्रवाई” का आह्वान किया। 16 अगस्त 1946 को कलकत्ता में भीषण दंगे हुए (“ग्रेट कलकत्ता किलिंग्स”), जो नोआखाली, बिहार और गढ़मुक्तेश्वर तक फैल गए। इसी हिंसक, अनिश्चित और भयावह वातावरण में संविधान सभा की पहली बैठक बुलाई गई।
भाग 2: पहली बैठक — 9 दिसंबर 1946
2.1 संविधान भवन का दृश्य
9 दिसंबर 1946, सोमवार, सुबह 11 बजे। नई दिल्ली के काउंसिल हाउस (आज का संसद भवन) का “कॉन्स्टिट्यूशन हॉल” (आज का केंद्रीय कक्ष, सेंट्रल हॉल)। गुंबद के नीचे ऊँची छत से लटकते झाड़-फानूस, सदस्यों के बैठने के लिए अर्धवृत्ताकार पंक्तियाँ, और ऊपर दीर्घाओं में पत्रकार, राजनयिक और आमंत्रित अतिथि।
इस पहली बैठक में 207 सदस्य उपस्थित हुए। मुस्लिम लीग के सदस्यों ने बहिष्कार किया। सभा में नौ महिलाएँ उपस्थित थीं (कुल मिलाकर सभा में 15 महिला सदस्य रहीं), जिनमें सरोजिनी नायडू, विजयलक्ष्मी पंडित, हंसा मेहता, सुचेता कृपलानी, दुर्गाबाई देशमुख, अम्मू स्वामीनाथन, राजकुमारी अमृत कौर आदि प्रमुख थीं।
2.2 अस्थायी अध्यक्ष: डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा
फ्रांसीसी परंपरा का अनुसरण करते हुए सभा के सबसे वरिष्ठ सदस्य—बिहार के डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा (आयु लगभग 75 वर्ष)—को अस्थायी अध्यक्ष बनाया गया। आचार्य जे. बी. कृपलानी ने उनके नाम का प्रस्ताव रखा। डॉ. सिन्हा ने अपने उद्घाटन भाषण में अमेरिकी, कनाडाई, ऑस्ट्रेलियाई, दक्षिण अफ्रीकी और स्विस संविधानों के निर्माण का उल्लेख किया और विशेष रूप से अमेरिकी संविधान निर्माताओं की सराहना की। उन्होंने अमेरिकी संविधान सभा का स्मरण करते हुए आशा जताई कि भारतीय सभा भी वैसी ही दूरदर्शिता दिखाएगी।
उन्होंने विश्व के कई नेताओं के शुभकामना संदेश पढ़े—अमेरिका, चीन, ऑस्ट्रेलिया आदि से। पहला दिन मुख्यतः औपचारिकताओं, परिचय-पत्रों की प्रस्तुति और रजिस्टर पर हस्ताक्षर में बीता।
2.3 स्थायी अध्यक्ष: डॉ. राजेंद्र प्रसाद (11 दिसंबर 1946)
11 दिसंबर 1946 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद सर्वसम्मति से सभा के स्थायी अध्यक्ष चुने गए। उनके नाम का प्रस्ताव जवाहरलाल नेहरू आदि ने रखा। बाद में एच. सी. मुखर्जी (ईसाई नेता) उपाध्यक्ष चुने गए; दूसरे उपाध्यक्ष वी. टी. कृष्णमाचारी बने। सर बेनेगल नरसिंग राव (बी. एन. राव) को संवैधानिक सलाहकार नियुक्त किया गया। एच. वी. आर. आयंगर सभा के सचिव बने।
राजेंद्र प्रसाद का स्वभाव शांत, संयमी और निष्पक्ष था। पूरे तीन वर्षों में उन्होंने कठोर मतभेदों के बीच भी सदन की गरिमा बनाए रखी। सरोजिनी नायडू ने उनके चुनाव पर अपनी चिर-परिचित काव्यात्मक शैली में कहा कि वे “स्वर्ण-हृदय” वाले व्यक्ति हैं।
2.4 कार्य-संचालन के नियम और समितियाँ
प्रारंभिक दिनों में सभा ने अपनी प्रक्रिया के नियम बनाए और कई समितियों का गठन किया। ये समितियाँ ही संविधान निर्माण की असली “कार्यशालाएँ” बनीं। प्रमुख समितियाँ थीं:
कुल मिलाकर 22 के आसपास समितियाँ और उप-समितियाँ बनीं, जिनमें 8 प्रमुख थीं।
भाग 3: उद्देश्य प्रस्ताव — संविधान की आत्मा (13 दिसंबर 1946 – 22 जनवरी 1947)
3.1 नेहरू का प्रस्ताव
13 दिसंबर 1946 को जवाहरलाल नेहरू ने सभा में “उद्देश्य प्रस्ताव” (Objectives Resolution) प्रस्तुत किया। नेहरू से संबंधित अभिलेखों और constitutionofindia.net के अनुसार इस प्रस्ताव में आठ मुख्य बिंदु थे। इसका सार इस प्रकार था:
- यह संविधान सभा भारत को एक स्वतंत्र, संप्रभु गणराज्य घोषित करने और उसके भावी शासन के लिए संविधान बनाने का दृढ़ और गंभीर संकल्प करती है।
- ब्रिटिश भारत के क्षेत्र, रियासतें और भारत के बाहर के वे क्षेत्र जो स्वतंत्र संप्रभु भारत में शामिल होना चाहें, उन सबका एक संघ होगा।
- इन इकाइयों के पास संघ को सौंपी गई शक्तियों को छोड़कर शेष (अवशिष्ट) शक्तियाँ होंगी।
- संप्रभु स्वतंत्र भारत, उसके अंगों और सरकार की समस्त शक्ति और प्राधिकार का स्रोत जनता होगी।
- भारत के सभी लोगों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय; पद, अवसर और कानून के समक्ष समानता; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म, उपासना, व्यवसाय, संगठन और कार्य की स्वतंत्रता की गारंटी दी जाएगी।
- अल्पसंख्यकों, पिछड़े और जनजातीय क्षेत्रों तथा दलित और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय होंगे।
- गणराज्य की क्षेत्रीय अखंडता और भूमि, समुद्र और आकाश पर उसके संप्रभु अधिकार न्याय और सभ्य राष्ट्रों के कानून के अनुसार बनाए रखे जाएँगे।
- यह प्राचीन भूमि विश्व में अपना उचित और सम्मानित स्थान प्राप्त करेगी और विश्व शांति तथा मानव कल्याण में अपना पूर्ण योगदान देगी।
नेहरू ने इसे “एक घोषणा, एक दृढ़ संकल्प, एक प्रतिज्ञा और हम सबके लिए एक समर्पण” कहा। उन्होंने सभा से कहा कि यह प्रस्ताव कोई कानून नहीं है, बल्कि वह भावना है जिससे भविष्य का संविधान बनेगा। उन्होंने अमेरिकी स्वतंत्रता घोषणा, फ्रांसीसी क्रांति और रूसी क्रांति का उल्लेख किया और कहा कि भारत किसी की नकल नहीं करेगा, बल्कि अपनी परिस्थितियों के अनुरूप अपना रास्ता बनाएगा।
3.2 “गणराज्य” शब्द और रियासतों का प्रश्न
नेहरू ने स्पष्ट किया कि “गणराज्य” शब्द का प्रयोग इसलिए किया गया है क्योंकि स्वतंत्र भारत में राजशाही का कोई स्थान नहीं हो सकता—न ब्रिटिश ताज के रूप में, न किसी अन्य रूप में। रियासतों के बारे में उन्होंने कहा कि उनकी आंतरिक व्यवस्था पर कोई दबाव नहीं डाला जा रहा, पर वे विश्वास रखते हैं कि अंततः वहाँ की जनता भी स्वतंत्रता और लोकतंत्र में भागीदार बनेगी।
उन्होंने “लोकतांत्रिक” शब्द जानबूझकर प्रस्ताव में नहीं डाला था, यह तर्क देते हुए कि “गणराज्य” में लोकतंत्र स्वतः निहित है, और प्रस्ताव का पूरा पाठ लोकतंत्र की भावना से भरा है। बाद में यही बात कुछ सदस्यों की आपत्ति का विषय बनी।
3.3 बहस: स्थगन का प्रस्ताव — डॉ. एम. आर. जयकर
16 दिसंबर 1946 को डॉ. एम. आर. जयकर ने संशोधन प्रस्ताव रखा कि उद्देश्य प्रस्ताव पर निर्णय तब तक स्थगित किया जाए जब तक मुस्लिम लीग और रियासतों के प्रतिनिधि सभा में शामिल न हो जाएँ। उनका तर्क था कि कैबिनेट मिशन योजना के तहत सभा की शक्तियाँ सीमित हैं; यदि बहुसंख्यक दल अकेले मूल सिद्धांत तय कर देगा तो लीग के लिए सभा में आने का कोई कारण नहीं रहेगा, और यह विभाजन को और निकट ला देगा।
जयकर के प्रस्ताव पर सदन में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। कई सदस्यों ने इसे सभा की संप्रभुता के अपमान के रूप में देखा।
3.4 डॉ. आंबेडकर का पहला बड़ा भाषण (17 दिसंबर 1946)
17 दिसंबर 1946 को डॉ. आंबेडकर, जिन्हें अचानक बोलने के लिए बुलाया गया, ने एक ऐसा भाषण दिया जिसने सभा का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने प्रस्ताव के कुछ अंशों की आलोचना की—कि इसमें अधिकारों की घोषणा तो है पर उपचार (remedies) नहीं; कि सामाजिक-आर्थिक न्याय की बात है पर उसे साकार करने वाली नीतियों (जैसे उद्योगों और भूमि का राष्ट्रीयकरण) का उल्लेख नहीं।
पर साथ ही उन्होंने भारत की एकता पर अपना अटूट विश्वास व्यक्त किया। उन्होंने कहा (भावार्थ): “मुझे इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि समय आने पर और परिस्थितियाँ बनने पर इस विशाल देश को एक होने से संसार की कोई शक्ति नहीं रोक सकती। जातियों और पंथों के होते हुए भी, मुझे संदेह नहीं कि हम किसी न किसी रूप में एक संगठित जनता होंगे।”
उन्होंने जयकर के स्थगन प्रस्ताव का समर्थन करते हुए कहा कि मुस्लिम लीग को साथ लाने का एक और प्रयास होना चाहिए, क्योंकि बल प्रयोग से बनाया गया संविधान गृहयुद्ध का कारण बन सकता है। उन्होंने चेताया कि बहुमत को विवेक दिखाना चाहिए। यह भाषण इतना प्रभावशाली था कि कांग्रेस नेतृत्व ने आंबेडकर की प्रतिभा को और गंभीरता से लेना शुरू किया।
3.5 अन्य स्वर
- पुरुषोत्तम दास टंडन ने कहा कि सभा को किसी की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए; जनता की आकांक्षा तत्काल घोषणा चाहती है।
- डॉ. एस. राधाकृष्णन ने 20 जनवरी 1947 को एक दार्शनिक भाषण दिया। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव केवल राजनीतिक दस्तावेज नहीं, बल्कि भारत की आत्मा की अभिव्यक्ति है। उन्होंने “स्वराज” को आत्म-अनुशासन से जोड़ा और कहा कि सत्ता का हस्तांतरण केवल ब्रिटिश हाथों से भारतीय हाथों में नहीं, बल्कि जनता के हाथों में होना चाहिए।
- एन. जी. रंगा ने किसानों और ग्रामीण जनता की बात रखी और कहा कि अल्पसंख्यकों में सबसे बड़ा अल्पसंख्यक—गरीब किसान और मजदूर—है, जिसके पास वास्तविक अधिकार नहीं हैं।
- जयपाल सिंह मुंडा, आदिवासी नेता, ने 19 दिसंबर 1946 को ऐतिहासिक भाषण दिया। उन्होंने कहा (भावार्थ): “मैं उन लाखों अज्ञात योद्धाओं की ओर से बोल रहा हूँ, जो भारत के मूल निवासी हैं… मेरे लोगों का पूरा इतिहास गैर-आदिवासियों द्वारा निरंतर शोषण और बेदखली का इतिहास है… किंतु मैं पंडित नेहरू के शब्दों पर विश्वास करता हूँ कि अब एक नया अध्याय शुरू होगा, जिसमें कोई उपेक्षित नहीं रहेगा।” उन्होंने यह भी ध्यान दिलाया कि आदिवासी समाज लोकतांत्रिक है और उसे लोकतंत्र सिखाने की आवश्यकता नहीं।
- सोमनाथ लाहिड़ी (कम्युनिस्ट सदस्य) ने कहा कि सभा ब्रिटिश योजना की सीमाओं में बंधी है और वास्तविक संप्रभुता नहीं रखती। उन्होंने ब्रिटिश सैनिकों की उपस्थिति में “स्वतंत्र” संविधान बनाने पर संदेह व्यक्त किया।
3.6 “जय” या “पराजय” नहीं—नेहरू का उत्तर
नेहरू ने 22 जनवरी 1947 को बहस का उत्तर दिया। उन्होंने कहा कि सभा ने लीग को आने के लिए पर्याप्त समय और अवसर दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि संविधान सभा किसी बाहरी सत्ता से शक्ति नहीं लेती; उसकी शक्ति भारत की जनता की इच्छा से आती है, और “हम किसी बाहरी प्राधिकार की स्वीकृति नहीं चाहते।”
3.7 अंतिम निर्णय: 22 जनवरी 1947
22 जनवरी 1947 को उद्देश्य प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ। सभी सदस्य खड़े होकर इसका समर्थन करते दिखे। (जयकर का स्थगन प्रस्ताव पहले ही वापस ले लिया गया था/अस्वीकृत हो चुका था, क्योंकि कुछ हफ्तों का समय लीग को देने के बाद भी लीग नहीं आई।)
यही उद्देश्य प्रस्ताव आगे चलकर संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) का आधार बना। सुप्रीम कोर्ट ने भी कई निर्णयों में—विशेषकर केशवानंद भारती (1973) में—उद्देश्य प्रस्ताव को संविधान की मूल भावना समझने के लिए संदर्भित किया।
भाग 4: अनिश्चितता के महीने — 1947 का पूर्वार्ध
4.1 सत्रों का क्रम
संविधान सभा के 11 सत्रों का संक्षिप्त कालक्रम इस प्रकार है:
अंतिम बैठक 24 जनवरी 1950 को हुई, जिसमें सदस्यों ने हस्ताक्षर किए।
4.2 तीसरा सत्र: मौलिक अधिकारों पर पहली रिपोर्ट
अप्रैल 1947 में सरदार पटेल ने सलाहकार समिति की मौलिक अधिकारों पर अंतरिम रिपोर्ट प्रस्तुत की। इसमें “न्यायोचित” (justiciable) अधिकार—जिन्हें अदालत में लागू कराया जा सकता है—और “गैर-न्यायोचित” सिद्धांत—जिन्हें बाद में नीति-निदेशक तत्व कहा गया—के बीच विभाजन किया गया था। यह विभाजन आयरलैंड के 1937 के संविधान से प्रेरित था और बी. एन. राव की सलाह पर अपनाया गया।
इसी सत्र में अस्पृश्यता उन्मूलन का प्रावधान स्वीकृत हुआ। 29 अप्रैल 1947 को जब यह प्रस्ताव पारित हुआ कि “अस्पृश्यता किसी भी रूप में समाप्त की जाती है और उससे उत्पन्न किसी अक्षमता को लागू करना अपराध होगा”, तो सदन “महात्मा गांधी की जय” के नारों से गूँज उठा।
4.3 3 जून 1947: विभाजन की घोषणा और सभा पर प्रभाव
3 जून 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन ने विभाजन योजना घोषित की। इससे संविधान सभा की स्थिति मूलतः बदल गई:
- कैबिनेट मिशन योजना की समूह व्यवस्था और कमजोर केंद्र की मजबूरी समाप्त हो गई।
- पाकिस्तान के लिए अलग संविधान सभा बनी।
- भारत की संविधान सभा अब एक सशक्त केंद्र वाला संविधान बनाने के लिए स्वतंत्र थी।
विभाजन के बाद सभा की सदस्य संख्या 389 से घटकर 299 रह गई (229 प्रांतों से और 70 रियासतों से)। पूर्वी बंगाल और पश्चिमी पंजाब से चुने गए सदस्य (जिनमें डॉ. आंबेडकर भी थे, क्योंकि उनका जैसोर-खुलना क्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान में चला गया) की सदस्यता समाप्त हो गई। आंबेडकर को बंबई से एम. आर. जयकर के रिक्त स्थान पर पुनः चुना गया—कांग्रेस के समर्थन से।
4.4 संघ शक्ति समिति: मजबूत केंद्र की ओर
विभाजन के तुरंत बाद संघ शक्ति समिति ने अपनी दूसरी रिपोर्ट में उल्लेख किया कि अब परिस्थितियाँ बदल गई हैं; अब एक मजबूत केंद्र आवश्यक है, जिसके पास अवशिष्ट शक्तियाँ हों। समिति ने कहा कि “कमजोर केंद्रीय सत्ता देश के हितों के लिए हानिकारक होगी, क्योंकि वह शांति सुनिश्चित करने, महत्वपूर्ण साझा मामलों के समन्वय और अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में देश की आवाज़ बनने में असमर्थ होगी।”
इस निर्णय के पीछे विभाजन की हिंसा, रियासतों के विलय की अनिश्चितता, और कश्मीर, हैदराबाद, जूनागढ़ जैसी समस्याएँ थीं।
भाग 5: राष्ट्रीय ध्वज और स्वतंत्रता की मध्यरात्रि
5.1 22 जुलाई 1947: तिरंगा अपनाया गया
22 जुलाई 1947 को जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय ध्वज संबंधी प्रस्ताव प्रस्तुत किया: “भारत का राष्ट्रीय ध्वज केसरिया, श्वेत और गहरे हरे रंग की तीन बराबर क्षैतिज पट्टियों वाला तिरंगा होगा। श्वेत पट्टी के केंद्र में गहरे नीले रंग का चक्र होगा, जो सारनाथ के अशोक स्तंभ के सिंहशीर्ष पर बने चक्र के अनुरूप होगा।”
कांग्रेस के पुराने ध्वज में चरखा था। उसकी जगह अशोक चक्र रखने पर कुछ गांधीवादियों में असहमति थी, पर तर्क दिया गया कि राष्ट्रीय ध्वज किसी दल का प्रतीक नहीं हो सकता, और चक्र धर्म, गति और निरंतरता का प्रतीक है। डॉ. राधाकृष्णन ने रंगों की व्याख्या की: केसरिया त्याग और वैराग्य का, श्वेत प्रकाश और सत्य का, हरा भूमि और वनस्पति से हमारे संबंध का, और चक्र धर्म के नियम का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि “भारत अब परिवर्तन का विरोध नहीं करेगा, उसे गतिमान होना है।”
सरोजिनी नायडू ने कहा कि यह ध्वज किसी के अधीन नहीं, यह सबकी रक्षा करेगा। प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ।
5.2 14-15 अगस्त 1947: “नियति से साक्षात्कार”
14 अगस्त 1947 की रात 11 बजे संविधान सभा का विशेष सत्र शुरू हुआ। सुचेता कृपलानी ने “वंदे मातरम्” का पहला अंश गाया। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अध्यक्षीय भाषण दिया और विभाजन के दर्द का उल्लेख किया।
फिर नेहरू ने वह प्रसिद्ध भाषण दिया: “बहुत वर्ष पहले हमने नियति से एक वादा किया था, और अब समय आ गया है कि हम अपनी प्रतिज्ञा पूरी करें… आधी रात के इस घंटे पर, जब दुनिया सो रही है, भारत जीवन और स्वतंत्रता के लिए जागेगा।”
मध्यरात्रि के घंटे के साथ सभा के सदस्यों ने शपथ ली कि वे भारत और उसकी जनता की सेवा में स्वयं को समर्पित करेंगे। चौधरी खलीकुज्ज़मां ने मुस्लिम सदस्यों की ओर से समर्थन व्यक्त किया, और डॉ. राधाकृष्णन ने भी भाषण दिया। सत्र “सारे जहाँ से अच्छा” और “जन गण मन” के गायन के साथ समाप्त हुआ।
15 अगस्त 1947 से संविधान सभा की दोहरी भूमिका बन गई: संविधान निर्माण के समय यह “संविधान सभा” थी, और सामान्य विधायी कार्य के समय “डोमिनियन संसद” (Constituent Assembly (Legislative))। विधायी भूमिका में इसके अध्यक्ष जी. वी. मावलंकर होते थे। भारत अभी “डोमिनियन” था—ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज VI राष्ट्राध्यक्ष थे और लॉर्ड माउंटबेटन, फिर सी. राजगोपालाचारी, गवर्नर-जनरल।
5.3 29 अगस्त 1947: प्रारूप समिति का गठन
29 अगस्त 1947 को सभा ने संविधान का प्रारूप तैयार करने के लिए “प्रारूप समिति” बनाई। सदस्य थे:
- डॉ. बी. आर. आंबेडकर (अध्यक्ष)
- एन. गोपालस्वामी आयंगर
- अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर
- के. एम. मुंशी
- सैयद मोहम्मद सादुल्ला
- बी. एल. मित्तर (बाद में स्वास्थ्य कारणों से हटे; उनकी जगह एन. माधव राव)
- डी. पी. खेतान (1948 में मृत्यु; उनकी जगह टी. टी. कृष्णमाचारी)
30 अगस्त को समिति की पहली बैठक हुई और आंबेडकर अध्यक्ष चुने गए। समिति ने बी. एन. राव द्वारा तैयार प्रारंभिक प्रारूप (अक्टूबर 1947), विभिन्न समितियों की रिपोर्टों और सभा के निर्णयों के आधार पर काम किया।
बाद में (5 नवंबर 1948) टी. टी. कृष्णमाचारी ने सभा में कहा था कि समिति के सात सदस्यों में से एक ने इस्तीफा दे दिया, एक की मृत्यु हो गई, एक अमेरिका में रहे, एक रियासतों के कार्यों में व्यस्त रहे, एक-दो दिल्ली से दूर रहे और स्वास्थ्य कारणों से भाग नहीं ले सके, “और अंततः संविधान का प्रारूप तैयार करने का भार डॉ. आंबेडकर पर आ पड़ा।”
भाग 6: बी. एन. राव का प्रारंभिक प्रारूप और प्रारूप समिति का कार्य
6.1 बी. एन. राव की भूमिका
सर बेनेगल नरसिंग राव भारतीय सिविल सेवा के अधिकारी, विधिवेत्ता और बाद में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीश बने। संवैधानिक सलाहकार के रूप में उन्होंने 1947 में अमेरिका, कनाडा, आयरलैंड और ब्रिटेन की यात्रा की। अमेरिका में उनकी भेंट अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश फेलिक्स फ्रैंकफर्टर से हुई। फ्रैंकफर्टर ने उन्हें सलाह दी कि “विधि की सम्यक प्रक्रिया” (due process of law) जैसा अस्पष्ट उपबंध न्यायपालिका को लोकतांत्रिक विधायिका के सामाजिक-आर्थिक कानूनों को रद्द करने की असीमित शक्ति देता है, और यह अनुचित है। इसी सलाह के प्रभाव में बाद में अनुच्छेद 21 में “विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया” (procedure established by law) अपनाई गई—जो जापानी संविधान से भी मेल खाती थी।
अक्टूबर 1947 में राव ने 243 अनुच्छेदों और 13 अनुसूचियों वाला प्रारंभिक प्रारूप प्रस्तुत किया। प्रारूप समिति ने इसी को आधार बनाकर 141 बैठकों में अपना प्रारूप तैयार किया।
6.2 प्रारूप संविधान का प्रकाशन (फरवरी 1948)
21 फरवरी 1948 को प्रारूप समिति ने अपना प्रारूप संविधान सभा के अध्यक्ष को सौंपा। इसमें 315 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियाँ थीं। इसे जनता की टिप्पणियों के लिए प्रकाशित किया गया। देशभर से लोगों, संगठनों, प्रांतीय सरकारों, विधानसभाओं, उच्च न्यायालयों और विशेषज्ञों से सुझाव आए। आठ महीनों तक इस प्रारूप पर सार्वजनिक चर्चा हुई—यह भारतीय संविधान निर्माण की लोकतांत्रिक प्रकृति का एक महत्वपूर्ण पक्ष है, जिसे प्रायः अनदेखा कर दिया जाता है।
सुझावों पर विचार के लिए एक विशेष समिति बनी, और प्रारूप समिति ने अक्टूबर 1948 में संशोधित पुनर्मुद्रण प्रस्तुत किया।
भाग 7: प्रथम वाचन — 4 नवंबर 1948
7.1 आंबेडकर का प्रस्तुतीकरण भाषण
4 नवंबर 1948 को डॉ. आंबेडकर ने प्रारूप संविधान सभा में प्रस्तुत किया। यह भाषण संविधान सभा के सबसे महत्वपूर्ण भाषणों में गिना जाता है। उन्होंने प्रारूप की मुख्य विशेषताएँ समझाईं:
संसदीय बनाम अध्यक्षीय प्रणाली: आंबेडकर ने कहा कि लोकतांत्रिक कार्यपालिका को दो शर्तें पूरी करनी चाहिए—स्थिरता और उत्तरदायित्व। अमेरिकी अध्यक्षीय प्रणाली में स्थिरता अधिक है पर उत्तरदायित्व कम; ब्रिटिश संसदीय प्रणाली में उत्तरदायित्व अधिक है पर स्थिरता कम। प्रारूप समिति ने संसदीय प्रणाली को चुना है, क्योंकि भारत में उत्तरदायित्व अधिक आवश्यक है—और संसद में प्रश्न, प्रस्ताव, अविश्वास प्रस्ताव, बहस के माध्यम से सरकार का दैनिक मूल्यांकन होता है, जबकि अमेरिका में यह मूल्यांकन हर चार वर्ष में चुनाव पर ही होता है।
संघ, किंतु लचीला: उन्होंने कहा कि यह संविधान संघात्मक है, पर इसे “संघ” (Federation) न कहकर “राज्यों का संघ” (Union of States) कहा गया है। इसके दो कारण हैं—पहला, भारतीय संघ इकाइयों के बीच किसी समझौते का परिणाम नहीं है; दूसरा, किसी भी राज्य को इससे अलग होने का अधिकार नहीं है। “संघ अविनाशी है।” उन्होंने यह भी कहा कि यह संविधान सामान्य समय में संघात्मक और युद्ध या आपात स्थिति में एकात्मक रूप ले सकता है—यह लचीलापन इसकी विशेषता है।
एकल नागरिकता, एकीकृत न्यायपालिका, अखिल भारतीय सेवाएँ: अमेरिका की दोहरी नागरिकता के विपरीत भारत में एक ही नागरिकता होगी; एकीकृत न्यायपालिका होगी जिसके शीर्ष पर सुप्रीम कोर्ट होगा; और अखिल भारतीय सेवाएँ प्रशासनिक एकरूपता सुनिश्चित करेंगी।
लंबाई का बचाव: संविधान की लंबाई की आलोचना का उत्तर देते हुए उन्होंने एक प्रसिद्ध विचार रखा, जिसे उन्होंने ग्रोट (यूनानी इतिहासकार) से उद्धृत किया: संवैधानिक नैतिकता (constitutional morality) कोई स्वाभाविक भावना नहीं है, इसे विकसित करना पड़ता है। “हमें यह समझना होगा कि हमारे लोगों को अभी इसे सीखना है। भारत में लोकतंत्र भारतीय भूमि पर केवल एक ऊपरी परत है, जो मूलतः अलोकतांत्रिक है।” इसलिए प्रशासन के ढाँचे को भी संविधान में लिखना आवश्यक है, ताकि विधायिका साधारण कानून से संविधान की भावना को विकृत न कर सके।
गाँव पर विवादित टिप्पणी: इसी भाषण में आंबेडकर ने गाँवों के आदर्शीकरण की आलोचना की: “ये ग्राम गणराज्य भारत के विनाश का कारण रहे हैं… गाँव क्या है—स्थानीयता का गड्ढा, अज्ञान, संकीर्णता और सांप्रदायिकता का अड्डा? मुझे प्रसन्नता है कि प्रारूप संविधान ने गाँव को त्याग दिया है और व्यक्ति को अपनी इकाई माना है।”
7.2 गाँव पर तीखी प्रतिक्रिया
इस टिप्पणी ने गांधीवादी सदस्यों में भारी असंतोष पैदा किया। अगले कुछ दिनों में अनेक सदस्यों ने इसका प्रतिवाद किया:
- एच. वी. कामत ने कहा कि आंबेडकर का दृष्टिकोण शहरी और पश्चिमी है; भारत की आत्मा गाँवों में है।
- दामोदर स्वरूप सेठ ने कहा कि ग्राम पंचायत आधारित, नीचे से ऊपर की ओर बनी संरचना होनी चाहिए।
- टी. प्रकाशम् ने कहा कि संविधान गांधीजी के आदर्शों का प्रतिबिंब नहीं है।
- के. संथानम ने कहा कि पंचायतों को कम से कम नीति-निदेशक तत्वों में स्थान मिलना चाहिए।
- अरुण चंद्र गुहा ने कहा कि कांग्रेस ने दशकों तक ग्राम स्वराज का स्वप्न देखा है, और यह संविधान उसे अनदेखा करता है।
अंतिम निर्णय: 22 नवंबर 1948 को के. संथानम द्वारा प्रस्तुत संशोधन स्वीकृत हुआ, जिसके तहत नीति-निदेशक तत्वों में अनुच्छेद 40 जोड़ा गया: “राज्य ग्राम पंचायतों का संगठन करने के लिए कदम उठाएगा और उन्हें ऐसी शक्तियाँ और अधिकार देगा जो उन्हें स्वशासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने योग्य बनाने के लिए आवश्यक हों।” आंबेडकर ने यह संशोधन स्वीकार किया। (चार दशक बाद 73वें संविधान संशोधन, 1992 ने पंचायतों को संवैधानिक दर्जा दिया।)
7.3 प्रथम वाचन की अन्य आलोचनाएँ
4 से 9 नवंबर 1948 तक चले प्रथम वाचन में अन्य प्रमुख आलोचनाएँ थीं:
- “उधार का थैला”: कई सदस्यों—जैसे लोकनाथ मिश्र, के. हनुमंतैया—ने कहा कि यह संविधान विदेशी संविधानों का “पैबंद” है, इसमें भारतीयता नहीं है। हनुमंतैया ने कहा, “हम वीणा और सितार का संगीत चाहते थे, पर यहाँ हमें अंग्रेजी बैंड का संगीत मिल रहा है।”
- अत्यधिक केंद्रीकरण: कुछ सदस्यों ने कहा कि राज्यों को नगरपालिकाओं जैसी स्थिति में धकेला जा रहा है।
- मौलिक अधिकारों पर अत्यधिक प्रतिबंध: सोमनाथ लाहिड़ी, के. टी. शाह, हसरत मोहानी आदि ने कहा कि अधिकार एक हाथ से दिए गए और दूसरे हाथ से छीन लिए गए।
आंबेडकर ने उत्तर दिया कि उधार लेने में कोई लज्जा नहीं; संविधान के मूल सिद्धांत किसी का पेटेंट नहीं हैं। “संविधान के मौलिक विचारों में कोई नवीनता नहीं हो सकती… नवीनता केवल उनकी कमियों को दूर करने और देश की आवश्यकताओं के अनुरूप ढालने में हो सकती है।”
9 नवंबर 1948 को सभा ने प्रारूप पर खंडवार विचार (द्वितीय वाचन) आरंभ करने का निर्णय लिया।
भाग 8: द्वितीय वाचन — अनुच्छेद-दर-अनुच्छेद संघर्ष (15 नवंबर 1948 – 17 अक्टूबर 1949)
द्वितीय वाचन संविधान सभा का सबसे लंबा, सबसे विस्तृत और सबसे विवादास्पद चरण था। लगभग एक वर्ष तक हर अनुच्छेद पर बहस हुई, संशोधन प्रस्तुत हुए, मतदान हुआ। इस भाग में प्रमुख विषयों को विषयवार प्रस्तुत किया गया है।
8.1 देश का नाम: “भारत, अर्थात इंडिया” (17-18 सितंबर 1949)
अनुच्छेद 1 पर बहस द्वितीय वाचन में सबसे अंत में, सितंबर 1949 में हुई। प्रारूप में लिखा था: “India shall be a Union of States.” आंबेडकर ने संशोधन प्रस्तुत किया: “India, that is, Bharat, shall be a Union of States.”
इस पर तीव्र बहस हुई:
- एच. वी. कामत ने प्रस्ताव रखा कि लिखा जाए “भारत, या अंग्रेज़ी में इंडिया”। उन्होंने आयरलैंड के संविधान का उदाहरण दिया, जिसमें “Éire, or in the English language, Ireland” लिखा है।
- सेठ गोविंद दास ने कहा कि “भारत” नाम वेदों, पुराणों, महाभारत और चीनी यात्री ह्वेनसांग तक के ग्रंथों में मिलता है; “इंडिया” विदेशियों का दिया नाम है। उन्होंने “भारत, जिसे विदेशों में इंडिया भी कहते हैं” का सुझाव दिया।
- कमलापति त्रिपाठी ने कहा कि “भारत” नाम हमारी हज़ारों वर्षों की सांस्कृतिक स्मृति से जुड़ा है, जिसे दासता ने मिटाने का प्रयास किया।
- हरगोविंद पंत ने उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों की ओर से “भारतवर्ष” नाम का समर्थन किया और कहा कि “इंडिया” से उन्हें कोई लगाव नहीं।
- कल्लूर सुब्बा राव ने ऋग्वेद में “सिंधु” शब्द का उल्लेख करते हुए “इंडिया” की व्युत्पत्ति भी भारतीय मूल से जोड़ी।
बहस के दौरान आंबेडकर ने कुछ अधीरता दिखाई और कहा कि यह विषय भावनात्मक अधिक है, और बहुत कार्य शेष है।
अंतिम निर्णय: कामत का संशोधन 38 के मुकाबले 51 मतों से गिर गया। आंबेडकर का मूल संशोधन—“India, that is Bharat, shall be a Union of States” (हिंदी पाठ में: “भारत, अर्थात इंडिया, राज्यों का संघ होगा”)—स्वीकृत हुआ।
8.2 नागरिकता (अगस्त 1949)
नागरिकता के अनुच्छेद (वर्तमान 5 से 11) संविधान के सबसे कठिन प्रावधानों में थे, क्योंकि विभाजन के कारण लाखों लोग सीमा के आर-पार आ-जा रहे थे। आंबेडकर ने स्वयं कहा कि नागरिकता के अनुच्छेद पर जितना सिर खपाना पड़ा, उतना शायद किसी और पर नहीं।
मुख्य प्रश्न: 1. पाकिस्तान से आए हिंदू-सिख शरणार्थियों को नागरिकता कैसे दी जाए? 2. जो मुसलमान पाकिस्तान चले गए और फिर “पुनर्वास परमिट” लेकर लौट आए, उनकी स्थिति क्या हो? 3. नागरिकता जन्म (jus soli) पर आधारित हो या वंश/धर्म (jus sanguinis) पर?
वाद-विवाद: - डॉ. पंजाबराव देशमुख ने संशोधन रखा कि विश्व के किसी भी हिस्से में रहने वाला हिंदू या सिख, जो किसी अन्य देश का नागरिक न हो, भारत की नागरिकता का अधिकारी हो। इसे सभा ने अस्वीकार किया, क्योंकि यह धर्मनिरपेक्ष सिद्धांत के विपरीत था। - पी. एस. देशमुख और कुछ अन्य सदस्यों ने इसका समर्थन किया, किंतु जवाहरलाल नेहरू और अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर ने कहा कि भारत की नागरिकता धर्म पर नहीं, जन्म और निवास पर आधारित होगी। - शिब्बन लाल सक्सेना, ठाकुर दास भार्गव आदि ने पुनर्वास परमिट से लौटे मुसलमानों को नागरिकता देने पर आपत्ति की। नेहरू ने इसका उत्तर देते हुए कहा कि भारत अपने वादों से पीछे नहीं हट सकता; परमिट एक निर्धारित प्रक्रिया के तहत, जाँच के बाद दिए गए थे। - अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर ने कहा कि जन्म-आधारित नागरिकता “आधुनिक, प्रबुद्ध और सभ्य” सिद्धांत है।
अंतिम निर्णय (12 अगस्त 1949): नागरिकता के अनुच्छेद स्वीकृत हुए। संविधान ने केवल 26 जनवरी 1950 को नागरिकता की स्थिति तय की (अनुच्छेद 5-8), जिसमें पाकिस्तान से आए लोगों (19 जुलाई 1948 से पहले/बाद) के लिए अलग प्रावधान थे, और आगे का विषय संसद पर छोड़ा (अनुच्छेद 11)। नागरिकता के ये अनुच्छेद 26 नवंबर 1949 से ही लागू हो गए।
8.3 मौलिक अधिकार
(क) अनुच्छेद 13 और “विधि” की परिभाषा
संविधान से पहले के और बाद के, दोनों तरह के कानून जो मौलिक अधिकारों के विरुद्ध हों, शून्य होंगे। यह न्यायिक समीक्षा का आधार बना।
(ख) समानता (अनुच्छेद 14-18)
- अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध): कुएँ, तालाब, स्नानघाट, सड़कें और सार्वजनिक स्थानों तक पहुँच पर भेदभाव निषिद्ध किया गया। यह आंबेडकर के महाड सत्याग्रह (1927) के संघर्ष की प्रतिध्वनि थी।
- अनुच्छेद 16 (लोक नियोजन में अवसर की समानता): इस पर 30 नवंबर 1948 को महत्वपूर्ण बहस हुई। प्रारूप में “पिछड़े वर्गों” के लिए आरक्षण की बात थी। कई सदस्यों ने “पिछड़े” शब्द की अस्पष्टता पर प्रश्न उठाया। आंबेडकर ने उत्तर दिया कि तीन सिद्धांतों में संतुलन चाहिए—(1) सबके लिए समान अवसर, (2) कुछ वर्गों के लिए आरक्षण, जो अब तक प्रशासन से बाहर रहे, और (3) आरक्षण “अल्पसंख्यक” सीटों तक सीमित रहे, ताकि मूल समानता का सिद्धांत नष्ट न हो। उन्होंने कहा कि “पिछड़े” शब्द को जानबूझकर रखा गया है, ताकि राज्य परिस्थितियों के अनुसार निर्णय ले सके।
- अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का अंत): 29 नवंबर 1948 को यह अनुच्छेद स्वीकृत हुआ। प्रोफेसर के. टी. शाह और नज़ीरुद्दीन अहमद ने “अस्पृश्यता” की परिभाषा पर प्रश्न उठाए, पर आंबेडकर ने इसे बिना परिभाषा के स्वीकार कराया। मतदान के बाद “महात्मा गांधी की जय” के नारे लगे।
- अनुच्छेद 18 (उपाधियों का अंत): ब्रिटिश उपाधियाँ—“राय बहादुर”, “सर” आदि—समाप्त की गईं। सैन्य और शैक्षिक विशिष्टताओं को छूट दी गई।
(ग) स्वतंत्रता के अधिकार (अनुच्छेद 19)
प्रारूप अनुच्छेद 13 (वर्तमान 19) में सात स्वतंत्रताएँ थीं—वाक् और अभिव्यक्ति, शांतिपूर्ण सम्मेलन, संगठन, आवागमन, निवास, संपत्ति अर्जित करने, और व्यवसाय की। हर स्वतंत्रता पर “युक्तियुक्त प्रतिबंध” लगाने का अधिकार राज्य को दिया गया।
इस पर बहस (1-2 दिसंबर 1948) में: - सोमनाथ लाहिड़ी ने कहा कि ये अधिकार “पुलिस कांस्टेबल के दृष्टिकोण” से लिखे गए हैं। - दामोदर स्वरूप सेठ और के. टी. शाह ने प्रेस की स्वतंत्रता का अलग उल्लेख करने की माँग की। आंबेडकर ने कहा कि प्रेस की स्वतंत्रता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में निहित है, प्रेस का अधिकार किसी नागरिक से अधिक नहीं। - ठाकुर दास भार्गव का संशोधन—प्रतिबंधों के आगे “युक्तियुक्त” (reasonable) शब्द जोड़ने का—स्वीकृत हुआ। यह अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय था, क्योंकि इससे प्रतिबंधों की युक्तियुक्तता की जाँच अदालतों के हाथ में आ गई।
(घ) अनुच्छेद 21: “विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया” बनाम “सम्यक प्रक्रिया”
यह संविधान सभा की सबसे महत्वपूर्ण बौद्धिक बहसों में से एक थी। प्रारूप अनुच्छेद 15 (वर्तमान 21): “किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं।”
6 और 13 दिसंबर 1948 को बहस हुई। काज़ी सैयद करीमुद्दीन, के. एम. मुंशी, ठाकुर दास भार्गव, पंडित एच. एन. कुंजरू आदि ने अमेरिकी “due process of law” को अपनाने की माँग की, ताकि न्यायपालिका कानूनों की निष्पक्षता की जाँच कर सके।
अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका में “सम्यक प्रक्रिया” के नाम पर सुप्रीम कोर्ट ने दशकों तक श्रम कानूनों और सामाजिक सुधारों को रद्द किया (लॉकनर युग)। भारत जैसे देश में, जहाँ बड़े सामाजिक-आर्थिक सुधार आवश्यक हैं, न्यायाधीशों को विधायिका के ऊपर “तीसरा सदन” नहीं बनाया जा सकता।
डॉ. आंबेडकर ने 13 दिसंबर 1948 को स्वीकार किया कि वे दुविधा में हैं: “एक ओर विधायिका की सर्वोच्चता है, दूसरी ओर न्यायपालिका पर विश्वास। मैं स्वयं निश्चित नहीं कि कौन-सा मार्ग सही है।” उन्होंने निर्णय सदन पर छोड़ दिया।
अंतिम निर्णय: “विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया” ही रखी गई। इस कमी को आंशिक रूप से भरने के लिए सितंबर 1949 में आंबेडकर ने अनुच्छेद 22 (वर्तमान) प्रस्तुत किया, जिसमें गिरफ्तारी के कारण बताने, वकील से परामर्श, 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने के अधिकार दिए गए—साथ ही निवारक निरोध (preventive detention) की अनुमति भी दी गई, जिसकी तीखी आलोचना हुई। आंबेडकर ने इसे “बुराइयों में से कम बुरा” कहा। (1978 में मेनका गांधी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 21 की व्याख्या करते हुए व्यावहारिक रूप से “सम्यक प्रक्रिया” का तत्व उसमें पढ़ लिया।)
(ङ) धर्म की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25-28)
प्रारूप अनुच्छेद 19 (वर्तमान 25) में धर्म को “मानने, आचरण करने और प्रचार करने” (profess, practise and propagate) की स्वतंत्रता थी। 6 दिसंबर 1948 को बहस हुई:
- लोकनाथ मिश्र ने “प्रचार” शब्द का विरोध करते हुए कहा कि यह धर्मांतरण को बढ़ावा देगा, और भारत में धर्मांतरण के ऐतिहासिक अनुभव कटु रहे हैं।
- तजामुल हुसैन ने कहा कि धर्म एक व्यक्तिगत विषय है; इसका सार्वजनिक प्रदर्शन—जैसे विशेष वस्त्र या चिह्न—निजी होना चाहिए।
- के. एम. मुंशी ने कहा कि “प्रचार” शब्द रखना ईसाई समुदाय के साथ हुए समझौते का भाग है, और अल्पसंख्यक समिति में इसे सहमति से स्वीकार किया गया है। उन्होंने तर्क दिया कि “प्रचार” का अधिकार वैसे भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में शामिल होता।
- टी. टी. कृष्णमाचारी ने भी “प्रचार” का समर्थन किया।
- रेवरेंड जेरोम डिसूज़ा ने ईसाई समुदाय की ओर से कहा कि धर्म-प्रचार उनके विश्वास का अनिवार्य अंग है।
अंतिम निर्णय: “प्रचार” शब्द रखा गया, पर यह अधिकार लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के अधीन रखा गया। साथ ही सिखों के लिए कृपाण धारण को धर्म के अंग के रूप में मान्यता दी गई, और हिंदू धार्मिक संस्थाओं को सभी वर्गों के लिए खोलने का अधिकार राज्य को दिया गया (अनुच्छेद 25(2)(ख))।
(च) धर्मनिरपेक्षता: प्रस्तावना में “धर्मनिरपेक्ष” और “समाजवादी” क्यों नहीं
15 नवंबर 1948 को प्रो. के. टी. शाह ने अनुच्छेद 1 में संशोधन रखा कि भारत को “धर्मनिरपेक्ष, संघीय, समाजवादी राज्यों का संघ” कहा जाए। आंबेडकर ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि राज्य की नीति क्या होगी, समाज का आर्थिक-सामाजिक संगठन कैसा होगा—यह जनता को समय और परिस्थिति के अनुसार स्वयं तय करना है। इसे संविधान में बाँध देना लोकतंत्र को नष्ट करना है। उन्होंने यह भी कहा कि नीति-निदेशक तत्वों में समाजवादी भावना पहले से ही निहित है। शाह का संशोधन अस्वीकृत हुआ।
संविधान में धर्मनिरपेक्षता शब्द नहीं, किंतु उसकी भावना अनुच्छेद 14, 15, 16, 25-30 में स्पष्ट है। (ये दोनों शब्द 1976 में 42वें संशोधन से प्रस्तावना में जोड़े गए।)
हुसैन इमाम और एच. वी. कामत ने 7 दिसंबर 1948 को राज्य द्वारा किसी धर्म को संरक्षण न देने का प्रस्ताव भी रखा। राज्य द्वारा पूर्णतः वित्तपोषित शिक्षण संस्थानों में धार्मिक शिक्षा का निषेध (अनुच्छेद 28) स्वीकृत हुआ।
(छ) अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार (अनुच्छेद 29-30)
भाषाई और धार्मिक अल्पसंख्यकों को अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति को बनाए रखने का अधिकार और अपनी पसंद के शिक्षण संस्थान स्थापित करने का अधिकार दिया गया। 8 दिसंबर 1948 को इस पर बहस हुई; यह अपेक्षाकृत कम विवाद के साथ स्वीकृत हुआ।
(ज) संवैधानिक उपचार का अधिकार (अनुच्छेद 32)
9 दिसंबर 1948 को बहस में आंबेडकर ने प्रसिद्ध वाक्य कहा: “यदि मुझसे पूछा जाए कि इस संविधान में सबसे महत्वपूर्ण अनुच्छेद कौन-सा है—ऐसा अनुच्छेद जिसके बिना यह संविधान शून्य हो जाएगा—तो मैं इस अनुच्छेद के अलावा किसी और का उल्लेख नहीं कर सकता। यह संविधान की आत्मा है और उसका हृदय है।”
अनुच्छेद 32 ने नागरिकों को सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने और बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण और अधिकार-पृच्छा जैसी रिट जारी करवाने का अधिकार दिया।
8.4 संपत्ति का अधिकार और ज़मींदारी उन्मूलन (सितंबर 1949)
यह संविधान सभा की सबसे राजनीतिक बहसों में से एक थी। कांग्रेस ज़मींदारी उन्मूलन के लिए प्रतिबद्ध थी; उत्तर प्रदेश, बिहार और मद्रास में ज़मींदारी उन्मूलन विधेयक तैयार थे। प्रश्न था—क्या ज़मींदारों को “बाज़ार मूल्य” पर मुआवज़ा देना होगा? यदि ऐसा होता, तो राज्य सरकारें दिवालिया हो जातीं।
प्रारूप अनुच्छेद 24 (बाद में अनुच्छेद 31) पर नेहरू, पटेल और पंत के बीच भी मतभेद थे। नेहरू कहते थे कि अदालतें मुआवज़े की पर्याप्तता की जाँच नहीं कर सकतीं; पटेल अधिक सतर्क थे। अंततः के. एम. मुंशी, अल्लादि और नेहरू के बीच समझौते से एक सूत्र बना:
- संपत्ति का अधिग्रहण केवल विधि के प्राधिकार से होगा, और मुआवज़ा उस कानून में तय होगा या उसके सिद्धांत तय होंगे।
- अनुच्छेद 31(4) और 31(6) के तहत लंबित और हाल के ज़मींदारी कानूनों को अदालतों में चुनौती से संरक्षण।
10 सितंबर 1949 को नेहरू ने भाषण में कहा कि “कोई भी सर्वोच्च न्यायालय, कोई भी न्यायपालिका संसद की संप्रभु इच्छा के ऊपर न्याय करने नहीं बैठ सकती… यदि हम गलती करते हैं तो जनता के समक्ष उत्तरदायी हैं।” ज़मींदारों और रियासती प्रतिनिधियों ने इसका विरोध किया; दरभंगा के महाराजा आदि ने उचित मुआवज़े की माँग की। प्रो. शिब्बन लाल सक्सेना और दामोदर स्वरूप सेठ ने इसे पर्याप्त क्रांतिकारी नहीं माना।
अंतिम निर्णय: समझौता सूत्र स्वीकृत हुआ। (1951 में प्रथम संशोधन से अनुच्छेद 31A, 31B और नौवीं अनुसूची जोड़ी गई; 1978 में 44वें संशोधन से संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं रहा।)
8.5 नीति-निदेशक तत्व (नवंबर 1948)
19 नवंबर 1948 को आंबेडकर ने नीति-निदेशक तत्वों पर बहस में कहा कि ये “निर्देशों के साधन” (instruments of instructions) हैं, जैसे 1935 के अधिनियम में गवर्नर-जनरल और गवर्नरों को दिए जाते थे। ये अदालत में लागू नहीं होंगे, पर “देश के शासन में मौलिक” होंगे। उन्होंने कहा कि जो सरकार इनकी अवहेलना करेगी, उसे चुनाव के समय जनता को उत्तर देना होगा।
कुछ सदस्यों (जैसे नज़ीरुद्दीन अहमद) ने कहा कि ये “नववर्ष के संकल्पों” जैसे हैं जो जनवरी की दूसरी तारीख को टूट जाते हैं। के. टी. शाह ने इन्हें बाध्यकारी बनाने का संशोधन रखा, जो अस्वीकृत हुआ।
गोवध निषेध (अनुच्छेद 48)
24 नवंबर 1948 को पंडित ठाकुर दास भार्गव ने संशोधन रखा, जिसमें कृषि और पशुपालन को आधुनिक वैज्ञानिक ढंग से संगठित करने और गायों, बछड़ों तथा अन्य दुधारू और भारवाही पशुओं की नस्लों के संरक्षण और सुधार तथा उनके वध को रोकने के लिए कदम उठाने की बात थी। सेठ गोविंद दास और शिब्बन लाल सक्सेना चाहते थे कि गोवध निषेध मौलिक अधिकारों में रखा जाए। ज़ेड. एच. लारी ने कहा कि यदि हिंदू सदस्य इसे धार्मिक आधार पर चाहते हैं तो स्पष्ट कहें, आर्थिक आवरण में नहीं। सैयद मोहम्मद सादुल्ला ने भी संतुलित आपत्ति रखी। अंततः भार्गव का संशोधन—आर्थिक-वैज्ञानिक भाषा में—निदेशक तत्वों में स्वीकृत हुआ।
समान नागरिक संहिता (अनुच्छेद 44)
23 नवंबर 1948 को प्रारूप अनुच्छेद 35 (वर्तमान 44)—“राज्य भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा”—पर तीखी बहस हुई।
- मोहम्मद इस्माइल साहिब (मद्रास), नज़ीरुद्दीन अहमद, महबूब अली बेग, बी. पोकर साहिब और हुसैन इमाम ने संशोधन रखे कि किसी समुदाय को उसके व्यक्तिगत कानून (पर्सनल लॉ) छोड़ने के लिए बाध्य न किया जाए। पोकर साहिब ने कहा कि यह अनुच्छेद धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है।
- के. एम. मुंशी ने उत्तर दिया कि तुर्की और मिस्र जैसे मुस्लिम देशों ने भी अपने पर्सनल लॉ में सुधार किए हैं; व्यक्तिगत कानून को धर्म से अलग करना राष्ट्रीय एकता और महिलाओं के अधिकारों के लिए आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदुओं में भी अनेक लोग इसके विरोधी हैं, पर समाज सुधार आवश्यक है।
- अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर ने कहा कि ब्रिटिश शासन ने भी आपराधिक कानून और संविदा कानून में एकरूपता लाई है, तो सिविल कानून में क्यों नहीं।
- आंबेडकर ने कहा कि भारत में पहले से ही लगभग सभी क्षेत्रों में समान कानून हैं, केवल विवाह और उत्तराधिकार शेष हैं। उन्होंने उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत और मालाबार का उदाहरण दिया, जहाँ 1937 तक मुसलमानों पर भी हिंदू उत्तराधिकार कानून या मातृवंशीय कानून लागू थे। उन्होंने आश्वासन दिया कि प्रारंभ में यह संहिता स्वैच्छिक हो सकती है।
अंतिम निर्णय: सभी संशोधन अस्वीकृत; अनुच्छेद 44 नीति-निदेशक तत्वों में स्वीकृत।
8.6 संसद, कार्यपालिका और राष्ट्रपति
(क) राष्ट्रपति की स्थिति
प्रारूप में राष्ट्रपति को संवैधानिक प्रमुख माना गया, जो मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करेगा। आंबेडकर ने कहा कि राष्ट्रपति की स्थिति ब्रिटिश सम्राट जैसी है—“वह राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है, पर राष्ट्र पर शासन नहीं करता।” कुछ सदस्यों (जैसे के. टी. शाह) ने अध्यक्षीय प्रणाली का प्रस्ताव दिया, जो अस्वीकृत हुआ।
राष्ट्रपति के चुनाव के लिए संसद और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों से बने निर्वाचक मंडल (अनुच्छेद 54) की व्यवस्था की गई। प्रत्यक्ष चुनाव का सुझाव भी आया था, पर अस्वीकार किया गया, क्योंकि प्रत्यक्ष रूप से चुना गया राष्ट्रपति प्रधानमंत्री के साथ सत्ता-संघर्ष का केंद्र बन सकता था।
राष्ट्रपति पर महाभियोग की प्रक्रिया (अनुच्छेद 61) तय हुई।
मंत्रिपरिषद की सलाह मानने की बाध्यता: प्रारूप में इसे स्पष्ट रूप से “बाध्यकारी” नहीं लिखा गया था। इसके लिए “निर्देश पत्र” (Instrument of Instructions) की अनुसूची प्रस्तावित थी, जिसे बाद में हटा दिया गया। (1976 में 42वें संशोधन ने सलाह को बाध्यकारी बनाया।)
(ख) राज्यपाल: चुनाव या नियुक्ति?
प्रारंभ में प्रांतीय संविधान समिति ने राज्यपाल के प्रत्यक्ष चुनाव की सिफारिश की थी। प्रारूप में भी चुने हुए या चार नामों की सूची में से नियुक्ति के विकल्प थे। 31 मई और 1 जून 1949 को बहस में ब्रजेश्वर प्रसाद, के. एम. मुंशी, अल्लादि आदि ने तर्क दिया कि चुना हुआ राज्यपाल और चुना हुआ मुख्यमंत्री—दो सत्ता केंद्र—टकराव पैदा करेंगे; और राज्यपाल केंद्र और राज्य के बीच कड़ी का काम करेगा। नेहरू ने भी कहा कि राज्यपाल ऐसा व्यक्ति हो जो स्थानीय राजनीति से ऊपर हो।
अंतिम निर्णय: राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति करेंगे (अनुच्छेद 155) और वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करेगा (अनुच्छेद 156)।
(ग) द्विसदनीय संसद
लोकसभा (House of the People) और राज्यसभा (Council of States) की व्यवस्था हुई। एम. अनंतशयनम आयंगर ने राज्यसभा का बचाव किया कि यह जल्दबाज़ी में बने कानूनों पर पुनर्विचार का मंच होगा। प्रो. शिब्बन लाल सक्सेना आदि ने इसे अनावश्यक और खर्चीला बताया। राज्यसभा में 12 मनोनीत सदस्यों—साहित्य, विज्ञान, कला, समाज सेवा से—की व्यवस्था स्वीकृत हुई।
8.7 वयस्क मताधिकार और निर्वाचन आयोग
संविधान सभा का एक अत्यंत क्रांतिकारी निर्णय था—सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (तब 21 वर्ष)। 1946 में केवल लगभग 14-15 प्रतिशत भारतीयों को मताधिकार था। 1949 में भारत की साक्षरता दर 20 प्रतिशत से भी कम थी।
कुछ सदस्यों ने साक्षरता या संपत्ति की शर्त की बात की, किंतु अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर ने कहा: “सभा ने वयस्क मताधिकार को सामान्य जनता की बुद्धिमत्ता और व्यावहारिक समझ में अटूट विश्वास के साथ अपनाया है।” आंबेडकर ने इसे राजनीतिक लोकतंत्र की नींव बताया।
निर्वाचन आयोग (अनुच्छेद 324): 15-16 जून 1949 को बहस में आंबेडकर ने चुनावों को कार्यपालिका से स्वतंत्र एक केंद्रीय आयोग के अधीन रखने का प्रस्ताव दिया। प्रारंभ में राज्यों के लिए अलग आयोग की व्यवस्था थी, पर इसे हटाकर एकल केंद्रीय आयोग बनाया गया—ताकि राज्यों में अल्पसंख्यकों और प्रवासियों को मतदाता सूची से बाहर न किया जा सके। पंडित एच. एन. कुंजरू और शिब्बन लाल सक्सेना ने आयोग की स्वतंत्रता के लिए और कठोर प्रावधानों की माँग की। मुख्य निर्वाचन आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जैसी पद-सुरक्षा दी गई।
अनुच्छेद 326 के तहत वयस्क मताधिकार और अनुच्छेद 325 के तहत धर्म, जाति, लिंग के आधार पर मतदाता सूची से बहिष्कार का निषेध स्वीकृत हुआ।
8.8 न्यायपालिका
सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों के प्रावधानों पर 23-27 मई 1949 को बहस हुई। मुख्य प्रश्न थे:
- न्यायाधीशों की नियुक्ति: प्रारूप में राष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीश के “परामर्श” से नियुक्ति की व्यवस्था थी। कुछ सदस्यों ने मुख्य न्यायाधीश की “सहमति” आवश्यक करने का प्रस्ताव दिया। आंबेडकर ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश भी मनुष्य हैं, उनमें भी पूर्वाग्रह हो सकते हैं; उन्हें “वीटो” देना ठीक नहीं। “परामर्श” ही रखा गया। (बाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों से कॉलेजियम प्रणाली विकसित हुई।)
- सेवानिवृत्ति आयु: सुप्रीम कोर्ट के लिए 65 वर्ष।
- महाभियोग: सिद्ध कदाचार या अक्षमता के आधार पर संसद के विशेष बहुमत से।
- न्यायिक स्वतंत्रता: वेतन की सुरक्षा, आचरण पर संसद में चर्चा का निषेध (महाभियोग को छोड़कर)।
8.9 केंद्र-राज्य संबंध
तीन सूचियाँ—संघ सूची (97 विषय), राज्य सूची (66 विषय) और समवर्ती सूची (47 विषय)—अपनाई गईं। अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र को दी गईं (कनाडा मॉडल)। संसद को राज्य सूची के विषयों पर राष्ट्रीय हित में कानून बनाने का अधिकार (अनुच्छेद 249, राज्यसभा के दो-तिहाई बहुमत से) दिया गया।
राज्यों का पुनर्गठन (अनुच्छेद 3): संसद को साधारण बहुमत से राज्यों की सीमाएँ, नाम बदलने और नए राज्य बनाने का अधिकार दिया गया। इस पर कुछ सदस्यों ने आपत्ति की कि राज्यों की सहमति आवश्यक हो, पर स्वीकृत प्रावधान में केवल राज्य विधानमंडल की “राय” लेने की बात रखी गई।
भाषाई प्रांतों का प्रश्न: जून 1948 में एस. के. धर की अध्यक्षता में भाषाई प्रांत आयोग बना, जिसने दिसंबर 1948 में भाषाई आधार पर प्रांतों के तत्काल पुनर्गठन के विरुद्ध राय दी। फिर कांग्रेस की “जेवीपी समिति” (जवाहरलाल, वल्लभभाई, पट्टाभि सीतारमैया) ने भी अप्रैल 1949 में इसे टालने की सलाह दी। संविधान सभा ने इस विषय को भविष्य पर छोड़ दिया। (1953 में आंध्र, 1956 में राज्य पुनर्गठन।)
वित्त आयोग (अनुच्छेद 280), अंतरराज्यीय परिषद (अनुच्छेद 263), और नियंत्रक-महालेखा परीक्षक (अनुच्छेद 148) जैसी संस्थाएँ बनीं। आंबेडकर ने CAG को “संविधान का सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी” कहा।
8.10 आपातकालीन प्रावधान (अगस्त 1949)
प्रारूप अनुच्छेद 275-280 (वर्तमान 352-360) पर 2-4 अगस्त 1949 और 19-20 अगस्त 1949 को अत्यंत तीखी बहस हुई। तीन प्रकार की आपात स्थितियाँ प्रस्तावित थीं:
- राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352): युद्ध, बाहरी आक्रमण या आंतरिक अशांति (1978 से “सशस्त्र विद्रोह”) की स्थिति में।
- राज्यों में संवैधानिक तंत्र की विफलता (अनुच्छेद 356): “राष्ट्रपति शासन”।
- वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360)।
आलोचना: - एच. वी. कामत ने कहा: “मुझे डर है कि इस एक अध्याय के द्वारा हम उस सबका आधार नष्ट कर रहे हैं जिसकी आशा में लोग जीवित रहे और जिसके लिए उन्होंने बलिदान दिए… यह जर्मन वाइमर संविधान के अनुच्छेद 48 की तरह है, जिसका प्रयोग हिटलर ने तानाशाही स्थापित करने के लिए किया।” उन्होंने इसे “शर्म और दुःख का दिन” कहा। - के. टी. शाह ने कहा कि ये प्रावधान राष्ट्रपति को तानाशाह बना सकते हैं। - एच. एन. कुंजरू ने कहा कि “आंतरिक अशांति” जैसा अस्पष्ट शब्द दुरुपयोग का मार्ग खोलेगा। - शिब्बन लाल सक्सेना और सरदार हुकम सिंह ने कहा कि आपातकाल में मौलिक अधिकारों का निलंबन (अनुच्छेद 358-359) नागरिक स्वतंत्रता पर सबसे बड़ा प्रहार है। - एच. वी. पाटस्कर ने तर्क दिया कि ये प्रावधान राज्यों की स्वायत्तता को समाप्त कर देंगे।
बचाव: - टी. टी. कृष्णमाचारी, अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर और के. एम. मुंशी ने कहा कि विभाजन की पृष्ठभूमि, सांप्रदायिक हिंसा, कश्मीर में युद्ध और तेलंगाना में सशस्त्र विद्रोह को देखते हुए ये शक्तियाँ अनिवार्य हैं। - डॉ. आंबेडकर ने 3 अगस्त 1949 को प्रसिद्ध आश्वासन दिया: “मैं इन टिप्पणियों से सहमत हूँ कि ऐसे अनुच्छेदों का कभी प्रयोग न हो और वे मृत पत्र (dead letter) बने रहें। यदि उनका प्रयोग करना भी पड़े, तो मैं आशा करता हूँ कि राष्ट्रपति, जिसे ये शक्तियाँ दी गई हैं, प्रांतों के प्रशासन को निलंबित करने से पहले उचित सावधानी बरतेगा।” उन्होंने सुझाव दिया कि पहले राज्य को चेतावनी दी जाए, फिर चुनाव कराए जाएँ, और अंतिम उपाय के रूप में ही यह अनुच्छेद लागू हो।
अंतिम निर्णय: आपातकालीन प्रावधान स्वीकृत हुए। (इतिहास ने दिखाया कि अनुच्छेद 356 “मृत पत्र” नहीं रहा; 1950-1994 के बीच सौ से अधिक बार इसका प्रयोग हुआ। 1975 का आंतरिक आपातकाल अनुच्छेद 352 के तहत लगा। 1978 के 44वें संशोधन और 1994 के एस. आर. बोम्मई निर्णय से इन पर अंकुश लगे।)
8.11 राजभाषा का प्रश्न — सबसे भावनात्मक बहस (12-14 सितंबर 1949)
संविधान सभा में किसी विषय ने उतना तनाव पैदा नहीं किया जितना राजभाषा ने। सभा का कामकाज मुख्यतः अंग्रेज़ी में होता था, हालाँकि नियमों में हिंदुस्तानी में बोलने की अनुमति थी। विभाजन के बाद “हिंदुस्तानी” (गांधीजी का प्रस्ताव, जो हिंदी और उर्दू दोनों लिपियों में हो) का समर्थन कमज़ोर पड़ गया।
(क) तीन पक्ष
- हिंदी समर्थक (उत्तर भारत): पुरुषोत्तम दास टंडन, सेठ गोविंद दास, रविशंकर शुक्ल, कमलापति त्रिपाठी, संपूर्णानंद, अलगू राय शास्त्री, आर. वी. धुलेकर आदि—देवनागरी में हिंदी को तत्काल राष्ट्रभाषा और राजभाषा बनाने के पक्ष में; अंग्रेज़ी को शीघ्र हटाने और अंकों को भी देवनागरी में रखने के पक्षधर।
- हिंदुस्तानी समर्थक: मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, और प्रारंभ में नेहरू—जिन्होंने गांधीजी की “हिंदुस्तानी” की कल्पना का समर्थन किया।
- दक्षिण भारत और गैर-हिंदी क्षेत्र: टी. टी. कृष्णमाचारी, एन. गोपालस्वामी आयंगर, टी. ए. रामलिंगम चेट्टियार, एस. वी. कृष्णमूर्ति राव, जी. दुर्गाबाई, फ्रैंक एंथनी, काज़ी सैयद करीमुद्दीन, नज़ीरुद्दीन अहमद (बंगाल) आदि—हिंदी को धीरे-धीरे अपनाने, अंग्रेज़ी को लंबे समय तक जारी रखने के पक्ष में।
(ख) आर. वी. धुलेकर का प्रसंग
इससे पहले, 10 दिसंबर 1946 को ही (पहले सत्र में), आर. वी. धुलेकर ने हिंदुस्तानी में बोलना शुरू किया था। जब अध्यक्ष ने कहा कि कई सदस्य हिंदुस्तानी नहीं समझते, तो धुलेकर ने कहा कि जो लोग हिंदुस्तानी नहीं जानते, उन्हें भारत में रहने का अधिकार नहीं है; जो लोग भारत का संविधान बनाने के लिए सदन में उपस्थित हैं और हिंदुस्तानी नहीं जानते, वे इस सभा के सदस्य होने योग्य नहीं हैं। इस पर तीव्र प्रतिक्रिया हुई, और नेहरू ने उन्हें शांत रहने को कहा। यह घटना भाषा प्रश्न की संवेदनशीलता का प्रारंभिक संकेत थी।
(ग) मुंशी-आयंगर सूत्र
दो वर्ष तक कांग्रेस संसदीय दल में गहन विचार-विमर्श के बाद के. एम. मुंशी और एन. गोपालस्वामी आयंगर ने एक समझौता सूत्र तैयार किया, जिसे 12 सितंबर 1949 को सभा में प्रस्तुत किया गया। कांग्रेस संसदीय दल में अंकों के प्रश्न पर मतदान बराबरी पर हुआ था (कहा जाता है कि 77-77), और अध्यक्ष के निर्णायक मत से अंतरराष्ट्रीय अंक स्वीकृत हुए।
(घ) बहस के प्रमुख स्वर
- एन. गोपालस्वामी आयंगर ने प्रस्ताव प्रस्तुत करते हुए कहा कि हिंदी को राजभाषा बनाना एक बड़ा परिवर्तन है, किंतु इसे 15 वर्षों के संक्रमण काल में धीरे-धीरे लाया जाना चाहिए, ताकि गैर-हिंदी भाषी लोगों को कठिनाई न हो।
- सेठ गोविंद दास ने कहा कि एक भाषा, एक लिपि राष्ट्र की एकता के लिए अनिवार्य है; अंग्रेज़ी दासता का प्रतीक है। उन्होंने देवनागरी अंकों की माँग की।
- पुरुषोत्तम दास टंडन ने अंतरराष्ट्रीय अंकों का विरोध करते हुए कहा कि यह “हिंदी के साथ अन्याय” है, पर अंततः दल के अनुशासन में समझौते को स्वीकार किया।
- टी. ए. रामलिंगम चेट्टियार ने चेतावनी दी कि यदि हिंदी थोपी गई तो दक्षिण में उसका विरोध होगा और “राष्ट्र की एकता” ही खतरे में पड़ जाएगी। उन्होंने कहा कि दक्षिण भारत के लोग हिंदी सीखने को तैयार हैं, पर उन पर दबाव न डाला जाए।
- टी. टी. कृष्णमाचारी ने कहा: “मैं उत्तर प्रदेश के अपने मित्रों को चेतावनी देना चाहता हूँ… यदि वे हिंदी साम्राज्यवाद चाहते हैं तो यह उनका निर्णय है, पर ऐसे में वे इस संयुक्त भारत को खो सकते हैं। दक्षिण में पहले से ही अलगाव की आवाज़ें उठ रही हैं।”
- काज़ी सैयद करीमुद्दीन ने हिंदुस्तानी के पक्ष में बोलते हुए कहा कि यह गांधीजी की इच्छा थी।
- मौलाना हसरत मोहानी ने हिंदुस्तानी या उर्दू को स्थान न मिलने पर तीव्र विरोध किया।
- मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने कहा कि हिंदुस्तानी वह भाषा है जो उत्तर भारत में आम लोग बोलते हैं; उसे छोड़कर संस्कृतनिष्ठ हिंदी अपनाना उत्तर भारत की साझी संस्कृति को नकारना है।
- फ्रैंक एंथनी (एंग्लो-इंडियन) ने अंग्रेज़ी को राष्ट्रीय एकता और विज्ञान-प्रौद्योगिकी की भाषा बताते हुए उसके निरंतर प्रयोग का समर्थन किया।
- नज़ीरुद्दीन अहमद ने कहा कि बंगाली हिंदी से अधिक समृद्ध साहित्यिक भाषा है; किसी एक भाषा को श्रेष्ठ मानना उचित नहीं।
- डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने हिंदी का समर्थन किया पर कहा कि इसे धीरे-धीरे और सहमति से विकसित होना चाहिए; उन्होंने बंगाली जैसी भाषाओं के सम्मान पर बल दिया।
- जवाहरलाल नेहरू ने 13 सितंबर 1949 को कहा कि कोई भाषा थोपकर नहीं फैलाई जा सकती; अंग्रेज़ी पर निर्भरता घटानी चाहिए, पर हिंदी को “सामासिक संस्कृति” का माध्यम बनना होगा, जो हिंदुस्तानी और अन्य भारतीय भाषाओं से शब्द ग्रहण करे।
(ङ) अंतिम निर्णय (14 सितंबर 1949)
14 सितंबर 1949 को—संयोग से उस दिन राजेंद्र सिंह (व्यौहार राजेंद्र सिंह) का 50वाँ जन्मदिन था, जिन्होंने हिंदी के लिए अथक प्रयास किए थे—संविधान का भाग 17 (अनुच्छेद 343-351) स्वीकृत हुआ:
- अनुच्छेद 343: संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी; शासकीय प्रयोजनों के लिए अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतरराष्ट्रीय रूप होगा। संविधान लागू होने से 15 वर्ष तक (1965 तक) अंग्रेज़ी का प्रयोग जारी रहेगा, और संसद कानून बनाकर इसके बाद भी अंग्रेज़ी का प्रयोग जारी रख सकती है।
- अनुच्छेद 344: राजभाषा आयोग और संसदीय समिति।
- अनुच्छेद 345-347: राज्यों की भाषाएँ।
- अनुच्छेद 348: सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों और अधिनियमों की भाषा अंग्रेज़ी रहेगी (जब तक संसद अन्यथा न करे)।
- अनुच्छेद 351: हिंदी के विकास का निर्देश—हिंदुस्तानी और आठवीं अनुसूची की भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए, भारत की सामासिक संस्कृति के माध्यम के रूप में।
- आठवीं अनुसूची: 14 भाषाएँ (असमिया, बंगाली, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, मलयालम, मराठी, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, तमिल, तेलुगु, उर्दू)।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि संविधान में “राष्ट्रभाषा” शब्द नहीं, “राजभाषा” शब्द है। इसी स्मृति में 14 सितंबर “हिंदी दिवस” के रूप में मनाया जाता है।
अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने निर्णय के बाद कहा कि यह सभा ने एक कठिन प्रश्न को सद्भावना से हल किया है, और यदि यह निर्णय सबको स्वीकार्य रहा तो भविष्य में देश में भाषाई सद्भाव बना रहेगा।
8.12 अल्पसंख्यक और पृथक निर्वाचन का अंत
(क) पृष्ठभूमि
ब्रिटिश शासन में 1909 से मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल थे, जो बाद में सिखों, ईसाइयों, एंग्लो-इंडियनों तक फैले। 1932 के “सांप्रदायिक पंचाट” में दलितों के लिए भी पृथक निर्वाचन दिया गया, जिसके विरोध में गांधीजी के अनशन के बाद “पूना पैक्ट” हुआ—संयुक्त निर्वाचन, पर आरक्षित सीटें।
(ख) सलाहकार समिति की रिपोर्ट
अगस्त 1947 में पटेल की अध्यक्षता वाली सलाहकार समिति ने पृथक निर्वाचन समाप्त करने और अल्पसंख्यकों के लिए संयुक्त निर्वाचन के भीतर आरक्षित सीटें देने की सिफारिश की। 27-28 अगस्त 1947 को बहस हुई:
- बी. पोकर साहिब ने पृथक निर्वाचन बनाए रखने का संशोधन रखा, यह कहते हुए कि संयुक्त निर्वाचन में मुसलमानों के सच्चे प्रतिनिधि नहीं चुने जा सकेंगे; केवल वही मुसलमान जीतेंगे जो बहुसंख्यकों को स्वीकार्य हों।
- चौधरी खलीकुज्ज़मां, महबूब अली बेग आदि ने भी इसका समर्थन किया।
- गोविंद बल्लभ पंत ने कहा: “पृथक निर्वाचन अल्पसंख्यकों के लिए आत्मघाती होगा… यह उन्हें स्थायी रूप से अलग-थलग कर देगा।”
- सरदार पटेल ने तीखे स्वर में कहा कि जिन लोगों ने पृथक निर्वाचन और द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के बल पर देश का विभाजन कराया, वे अब भी वही माँग कर रहे हैं। “क्या आप चाहते हैं कि इतिहास दोहराया जाए?”
बेगम एज़ाज़ रसूल, जो संविधान सभा की एकमात्र मुस्लिम महिला सदस्य थीं, ने आरक्षण का भी विरोध किया और कहा कि आरक्षण अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों से अलग कर देता है; अल्पसंख्यकों की वास्तविक सुरक्षा धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में है।
(ग) मई 1949: धार्मिक अल्पसंख्यकों का आरक्षण भी समाप्त
मई 1949 में सलाहकार समिति ने धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए विधायिका में आरक्षण समाप्त करने की सिफारिश की। सरदार पटेल ने इस रिपोर्ट पर विचार का प्रस्ताव 25 मई को रखा; बहस के बाद सभा ने इसे 26 मई 1949 को स्वीकार किया। निर्णय के साथ पृथक निर्वाचन और धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए विधायी आरक्षण का ढाँचा समाप्त हुआ।
अंतिम निर्णय: केवल अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए लोकसभा और विधानसभाओं में जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण (अनुच्छेद 330, 332) 10 वर्ष के लिए; एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए मनोनयन (अनुच्छेद 331, 333)। सिखों के लिए आरक्षण की माँग को भी अस्वीकार किया गया, हालाँकि सिख दलितों (मज़हबी, रामदासिया, कबीरपंथी, सिकलीगर) को अनुसूचित जातियों में शामिल किया गया।
सरदार हुकम सिंह (अकाली) ने अंतिम रूप से असंतोष जताया और कहा कि सिख इस संविधान को स्वीकार नहीं करते—इसी कारण उन्होंने और भूपिंदर सिंह मान ने संविधान पर हस्ताक्षर करते समय इसे अपनी सहमति नहीं माना। (उल्लेखनीय है कि कुछ विवरणों में कहा जाता है कि अकाली प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर नहीं किए।)
8.13 जनजातीय क्षेत्र: पाँचवीं और छठी अनुसूची
ए. वी. ठक्कर (ठक्कर बापा) की अध्यक्षता में बनी उप-समिति और गोपीनाथ बारदोलोई की अध्यक्षता में बनी उत्तर-पूर्व सीमांत (असम) जनजातीय क्षेत्र उप-समिति की रिपोर्टों के आधार पर पाँचवीं अनुसूची (मध्य भारत के अनुसूचित क्षेत्र) और छठी अनुसूची (असम के जनजातीय क्षेत्र—स्वायत्त ज़िला परिषदें) बनीं।
5-7 सितंबर 1949 को इस पर बहस हुई। कुलधर चालिहा ने छठी अनुसूची का विरोध करते हुए कहा कि इससे “जनजातीय अलगाव” स्थायी होगा। रेवरेंड जे. जे. एम. निकल्स-रॉय (खासी) ने इसका समर्थन किया। जयपाल सिंह मुंडा ने कहा कि आदिवासियों को संरक्षण की नहीं, अधिकार और सम्मान की आवश्यकता है, और कहा कि आदिवासी शब्द ही उचित है, “वनवासी” या “जनजाति” जैसे नाम उन पर थोपे गए हैं। आंबेडकर ने कहा कि असम के जनजातीय समुदायों की स्थिति अमेरिका के रेड इंडियनों जैसी है, जिनकी अपनी परंपराएँ और संस्थाएँ हैं, जिन्हें संरक्षित करना आवश्यक है।
8.14 रियासतों का एकीकरण और संविधान
स्वतंत्रता के समय 562 के आसपास रियासतें थीं। सरदार पटेल और वी. पी. मेनन के नेतृत्व में “विलय पत्र” (Instrument of Accession) और फिर “विलय समझौतों” के माध्यम से इनका एकीकरण हुआ। संविधान में राज्यों को चार श्रेणियों में बाँटा गया:
- भाग क: पूर्व ब्रिटिश प्रांत (9 राज्य—असम, बिहार, बंबई, मध्य प्रदेश, मद्रास, उड़ीसा, पंजाब, संयुक्त प्रांत/उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल)।
- भाग ख: बड़ी रियासतें या रियासती संघ (9—हैदराबाद, जम्मू-कश्मीर, मध्य भारत, मैसूर, पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्य संघ (पेप्सू), राजस्थान, सौराष्ट्र, त्रावणकोर-कोचीन और विंध्य प्रदेश), जिनके प्रमुख ‘राजप्रमुख’ थे।
- भाग ग: दस राज्य—अजमेर, भोपाल, बिलासपुर, कूच-बिहार, कुर्ग, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, कच्छ, मणिपुर और त्रिपुरा। विंध्य प्रदेश भाग ख में था।
- भाग घ: अंडमान और निकोबार द्वीप समूह।
12 अक्टूबर 1949 को पटेल ने सभा में रियासतों के एकीकरण पर विस्तृत वक्तव्य दिया, और राजाओं के “प्रिवी पर्स” (अनुच्छेद 291) और विशेषाधिकारों (अनुच्छेद 362) के संवैधानिक संरक्षण का बचाव किया। उन्होंने कहा कि यह उस शांतिपूर्ण क्रांति की कीमत है, जिसमें राजाओं ने अपने राज्य बिना रक्तपात के राष्ट्र को सौंपे। (1971 में 26वें संशोधन से प्रिवी पर्स समाप्त हुए।)
रियासतों के प्रतिनिधि धीरे-धीरे संविधान सभा में आए—बड़ौदा, बीकानेर, कोचीन, ग्वालियर, जयपुर, जोधपुर, पटियाला, रीवा आदि के प्रतिनिधि अप्रैल 1947 में आ गए। मैसूर, त्रावणकोर आदि बाद में। हैदराबाद का प्रतिनिधित्व “ऑपरेशन पोलो” (सितंबर 1948) के बाद ही हो पाया।
8.15 जम्मू और कश्मीर: अनुच्छेद 306-A (वर्तमान 370) — 17 अक्टूबर 1949
26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह ने पाकिस्तानी कबायली आक्रमण के बीच विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए, जिसे गवर्नर-जनरल माउंटबेटन ने 27 अक्टूबर को स्वीकार किया। विलय पत्र में केवल रक्षा, विदेश मामले और संचार भारत सरकार को सौंपे गए।
जून 1949 में शेख अब्दुल्ला, मिर्ज़ा मोहम्मद अफ़ज़ल बेग, मौलाना मसूदी और मोती राम बैगरा संविधान सभा के सदस्य बने।
अनुच्छेद 370 का प्रारूप शेख अब्दुल्ला और भारत सरकार के बीच लंबी बातचीत के बाद तैयार हुआ। इसमें एन. गोपालस्वामी आयंगर की प्रमुख भूमिका थी (वे पहले जम्मू-कश्मीर के दीवान रह चुके थे)। कहा जाता है कि आंबेडकर इसके प्रारूपण के पक्ष में नहीं थे।
17 अक्टूबर 1949 को आयंगर ने प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर की स्थिति विशेष है—वहाँ युद्ध चल रहा है, राज्य का कुछ भाग शत्रु के कब्ज़े में है, मामला संयुक्त राष्ट्र में है, और राज्य की अपनी संविधान सभा बननी है। इसलिए इस समय जम्मू-कश्मीर के लिए “अस्थायी” व्यवस्था की जा रही है।
मौलाना हसरत मोहानी ने पूछा कि केवल एक राज्य के साथ यह भेदभाव क्यों। आयंगर ने उत्तर दिया कि परिस्थितियाँ विशेष हैं, और आशा है कि समय आने पर जम्मू-कश्मीर भी अन्य राज्यों की तरह पूर्ण रूप से एकीकृत हो जाएगा।
इस अनुच्छेद पर बहुत लंबी बहस नहीं हुई; यह उसी दिन स्वीकृत हो गया। कांग्रेस संसदीय दल में इस पर पहले ही गहन मतभेद हुए थे, जिन्हें पटेल ने नेहरू की अनुपस्थिति में (नेहरू अमेरिका यात्रा पर थे) सुलझाया।
अंतिम निर्णय: अनुच्छेद 370—“जम्मू-कश्मीर राज्य के संबंध में अस्थायी उपबंध”—संविधान के भाग 21 (“अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष उपबंध”) में रखा गया। (5 अगस्त 2019 को राष्ट्रपति आदेश और संसद के प्रस्ताव से इसे प्रभावहीन किया गया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2023 में वैध ठहराया।)
8.16 संविधान संशोधन की प्रक्रिया (अनुच्छेद 368)
17 सितंबर 1949 को इस पर बहस हुई। आंबेडकर ने कहा कि संविधान को न तो अमेरिकी संविधान जितना कठोर बनाया गया है, न ब्रिटिश संविधान जितना लचीला। उन्होंने तीन प्रकार की प्रक्रियाएँ रखीं—साधारण बहुमत (कुछ अनुच्छेदों के लिए), विशेष बहुमत (दो-तिहाई उपस्थित और मतदान करने वाले, तथा सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत), और विशेष बहुमत के साथ आधे राज्यों का अनुसमर्थन (संघीय प्रावधानों के लिए)।
उन्होंने थॉमस जेफरसन को उद्धृत किया: “हर पीढ़ी को एक अलग राष्ट्र मानना चाहिए”, और कहा कि कोई पीढ़ी आने वाली पीढ़ियों को बाँध नहीं सकती।
नेहरू ने भी कहा था कि संविधान को कठोर नहीं, जीवंत और विकासशील होना चाहिए, “यदि आप संविधान को कठोर और स्थायी बनाते हैं तो आप राष्ट्र के विकास को रोकते हैं।”
के. हनुमंतैया, ब्रजेश्वर प्रसाद आदि ने आसान संशोधन प्रक्रिया की माँग की, जबकि कुछ ने मौलिक अधिकारों को संशोधन से परे रखने का सुझाव दिया।
अंतिम निर्णय: अनुच्छेद 368 स्वीकृत। (1973 में केशवानंद भारती मामले में सुप्रीम कोर्ट ने “मूल ढाँचा सिद्धांत” प्रतिपादित किया, जिसके अनुसार संसद संविधान के मूल ढाँचे को संशोधन से नहीं बदल सकती।)
8.17 प्रस्तावना पर अंतिम बहस (17 अक्टूबर 1949)
द्वितीय वाचन के अंतिम दिन 17 अक्टूबर 1949 को प्रस्तावना पर बहस हुई। यह सबसे अंत में इसलिए ली गई ताकि वह संपूर्ण संविधान के अनुरूप हो।
प्रस्तावना का अंतिम पाठ (मूल 1949):
“हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को: सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए, दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर 1949 ई० (मिति मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमी, संवत् दो हज़ार छह विक्रमी) को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।”
प्रमुख संशोधन और उनका भाग्य:
- ईश्वर का नाम: एच. वी. कामत ने संशोधन रखा कि प्रस्तावना “ईश्वर के नाम पर” (In the name of God) शुरू हो। उन्होंने आयरलैंड के संविधान का उदाहरण दिया। पंडित हृदयनाथ कुंजरू ने इसका विरोध करते हुए कहा कि यह धार्मिक स्वतंत्रता के विरुद्ध है—ईश्वर को मतदान का विषय बनाना ईश्वर का अपमान है, और यह उन लोगों पर दबाव है जो ईश्वर में विश्वास नहीं करते। ए. थानु पिल्लै ने कहा कि यह अनावश्यक है। मतदान में यह संशोधन 41 के मुकाबले 68 मतों से अस्वीकृत हुआ।
- महात्मा गांधी का नाम: शिब्बन लाल सक्सेना ने सुझाव दिया कि प्रस्तावना में गांधीजी का उल्लेख हो (राष्ट्रपिता के रूप में)। इसे अस्वीकार कर दिया गया, क्योंकि संविधान किसी व्यक्ति पर केंद्रित नहीं होना चाहिए—और गांधीजी स्वयं इसे पसंद नहीं करते।
- “संप्रभु स्वतंत्र समाजवादी गणराज्य”: मौलाना हसरत मोहानी ने संशोधन रखा कि भारत को “स्वतंत्र भारतीय गणराज्यों का संघ” (Union of Indian Socialist Republics—USSR की तर्ज़ पर) कहा जाए। अस्वीकृत।
- “बंधुता” शब्द: आंबेडकर के आग्रह पर प्रारूप में “व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता सुनिश्चित करने वाली बंधुता” जोड़ी गई थी। आंबेडकर कहते थे कि बंधुता के बिना स्वतंत्रता और समानता “रंग की एक परत” से अधिक नहीं।
प्रस्तावना को स्वीकार किए जाने के साथ ही द्वितीय वाचन पूरा हुआ।
भाग 9: तृतीय वाचन — 14-26 नवंबर 1949
9.1 अंतिम प्रस्ताव
14 नवंबर 1949 को ग्यारहवाँ सत्र शुरू हुआ। 17 नवंबर 1949 को आंबेडकर ने तृतीय वाचन का प्रस्ताव रखा: “सभा द्वारा तय किया गया संविधान पारित किया जाए।” संविधान का यह प्रारूप अब 395 अनुच्छेदों और 8 अनुसूचियों के साथ अपने अंतिम रूप में था।
तृतीय वाचन में अनुच्छेदों पर संशोधन नहीं, बल्कि समग्र संविधान पर विचार रखे गए। लगभग 10 दिनों तक दर्जनों सदस्यों ने अपने समापन विचार रखे।
9.2 समापन बहस के स्वर
- दामोदर स्वरूप सेठ ने कहा कि यह संविधान “गरीब जनता की आकांक्षाओं” को पूरा नहीं करता।
- महावीर त्यागी ने कहा कि वे इसे स्वीकार तो करते हैं, किंतु यह गांधीजी के सपनों का संविधान नहीं।
- अरुण चंद्र गुहा ने विकेंद्रीकरण के अभाव पर दुःख व्यक्त किया।
- मौलाना हसरत मोहानी ने संविधान को “ब्रिटिश संविधान की नकल” कहा और उसका विरोध करते हुए कहा कि वे इस पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे।
- सरदार हुकम सिंह ने कहा कि अल्पसंख्यकों, विशेषकर सिखों, के हितों की उपेक्षा हुई है।
- के. हनुमंतैया ने फिर कहा कि यह संविधान “भारतीय आत्मा” से रहित है।
- एच. वी. कामत ने आपातकालीन प्रावधानों पर अपनी आपत्तियाँ दोहराईं।
- प्रो. एन. जी. रंगा ने संविधान की प्रशंसा की, पर कहा कि किसानों के लिए बहुत कुछ करना शेष है।
- टी. टी. कृष्णमाचारी ने प्रारूप समिति और विशेष रूप से आंबेडकर के योगदान की सराहना की।
- पंडित ठाकुर दास भार्गव, जी. दुर्गाबाई, रेणुका रे, पूर्णिमा बनर्जी आदि ने समापन बहस में भाग लिया।
- अम्मू स्वामीनाथन ने 24 नवंबर 1949 को कहा: “बाहर के लोग कहते रहे हैं कि भारत ने अपनी महिलाओं को बराबरी का अधिकार नहीं दिया। अब हम कह सकते हैं कि जब भारतीय जनता ने स्वयं अपना संविधान बनाया, तो उसने महिलाओं को देश के हर नागरिक के समान अधिकार दिए।”
9.3 25 नवंबर 1949: आंबेडकर का ऐतिहासिक समापन भाषण
25 नवंबर 1949 को डॉ. आंबेडकर ने वह भाषण दिया, जिसे भारतीय संवैधानिक इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण भाषण माना जाता है। इसका मूल पाठ भारत के सर्वोच्च न्यायालय की वेबसाइट पर उपलब्ध है। इस भाषण के प्रमुख अंश इस प्रकार हैं (भावानुवाद):
(क) श्रेय का विभाजन: “जो श्रेय मुझे दिया जा रहा है, वह वास्तव में मेरा नहीं है। यह आंशिक रूप से संवैधानिक सलाहकार सर बी. एन. राव का है, जिन्होंने प्रारूप समिति के विचारार्थ संविधान का प्रारंभिक प्रारूप तैयार किया। श्रेय का एक भाग प्रारूप समिति के सदस्यों का है… और इससे भी अधिक श्रेय संविधान के मुख्य प्रारूपकार श्री एस. एन. मुखर्जी को है।” उन्होंने कांग्रेस पार्टी के अनुशासन की प्रशंसा की, जिसके कारण सभा में व्यवस्था बनी रही, और उन सदस्यों—जैसे कामत, के. टी. शाह, सक्सेना, कुंजरू—को भी धन्यवाद दिया जिन्होंने आलोचना से संविधान को समृद्ध किया।
(ख) संविधान अच्छा हो या बुरा: “मैं महसूस करता हूँ कि संविधान चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे लागू करने वाले लोग बुरे हों तो वह बुरा सिद्ध होगा। संविधान चाहे कितना भी बुरा हो, यदि उसे लागू करने वाले अच्छे हों तो वह अच्छा सिद्ध होगा।”
(ग) तीन चेतावनियाँ:
- संवैधानिक साधनों का पालन: “यदि हमें लोकतंत्र को केवल रूप में नहीं, बल्कि वास्तव में बनाए रखना है, तो हमें अपने सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए संवैधानिक तरीकों को दृढ़ता से अपनाना होगा। इसका अर्थ है कि हमें क्रांति के खूनी तरीकों को त्यागना होगा। इसका अर्थ है सविनय अवज्ञा, असहयोग और सत्याग्रह के तरीकों को भी त्यागना होगा… ये तरीके अराजकता के व्याकरण के सिवा कुछ नहीं हैं।”
- व्यक्ति-पूजा से सावधान: उन्होंने जॉन स्टुअर्ट मिल को उद्धृत किया कि लोगों को अपनी स्वतंत्रता किसी महान व्यक्ति के चरणों में अर्पित नहीं करनी चाहिए। “धर्म में भक्ति आत्मा की मुक्ति का मार्ग हो सकती है, किंतु राजनीति में भक्ति या नायक-पूजा पतन और अंततः तानाशाही का निश्चित मार्ग है।”
- राजनीतिक लोकतंत्र को सामाजिक लोकतंत्र बनाना: “26 जनवरी 1950 को हम विरोधाभासों के जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं। राजनीति में हमारे पास समानता होगी और सामाजिक-आर्थिक जीवन में असमानता। राजनीति में हम ‘एक व्यक्ति, एक मत’ और ‘एक मत, एक मूल्य’ के सिद्धांत को मान्यता देंगे। अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में हम अपनी सामाजिक-आर्थिक संरचना के कारण ‘एक व्यक्ति, एक मूल्य’ के सिद्धांत को नकारते रहेंगे। हम कब तक इन विरोधाभासों का जीवन जीते रहेंगे? … यदि हमने इसे लंबे समय तक नकारा तो हम अपने राजनीतिक लोकतंत्र को संकट में डाल देंगे। हमें इस विरोधाभास को शीघ्र से शीघ्र दूर करना होगा, अन्यथा जो लोग असमानता से पीड़ित हैं, वे इस राजनीतिक लोकतंत्र की संरचना को उड़ा देंगे जिसे इस सभा ने इतने परिश्रम से बनाया है।”
(घ) बंधुता और राष्ट्र: “हम एक राष्ट्र हैं, यह मानकर हम एक बड़े भ्रम को पाल रहे हैं। हज़ारों जातियों में बँटे लोग एक राष्ट्र कैसे हो सकते हैं? जितनी जल्दी हम यह समझ लें कि हम अभी सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अर्थ में राष्ट्र नहीं हैं, उतना हमारे लिए अच्छा है… जातियाँ राष्ट्र-विरोधी हैं।”
(ङ) स्वतंत्रता खोने का भय: उन्होंने इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत ने पहले भी अपनी स्वतंत्रता खोई है—अपने ही लोगों के विश्वासघात से। “क्या इतिहास स्वयं को दोहराएगा? यह विचार मुझे चिंता से भर देता है… यदि दल पंथ को देश से ऊपर रखेंगे तो हमारी स्वतंत्रता दूसरी बार संकट में पड़ जाएगी और संभवतः सदा के लिए खो जाएगी।”
(च) जनता की सरकार: “स्वतंत्रता आनंद का विषय है, पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इसने हम पर बड़े उत्तरदायित्व डाल दिए हैं। अब हम किसी गलत बात के लिए अंग्रेज़ों को दोष नहीं दे सकते।”
8.18 कुछ अन्य उल्लेखनीय बहसें
(क) मृत्युदंड
3 जून 1949 को प्रो. शिब्बन लाल सक्सेना और पंडित ठाकुर दास भार्गव ने सुप्रीम कोर्ट को मृत्युदंड के मामलों में अपील का अनिवार्य अधिकार देने का प्रश्न उठाया। आंबेडकर ने कहा कि व्यक्तिगत रूप से वे मृत्युदंड समाप्त करने के पक्ष में हैं, क्योंकि यह अहिंसा के सिद्धांत के अनुरूप होगा, किंतु यह विषय संसद पर छोड़ना उचित है। राष्ट्रपति (अनुच्छेद 72) और राज्यपाल (अनुच्छेद 161) को क्षमादान की शक्ति दी गई, और सुप्रीम कोर्ट की आपराधिक अपीलीय अधिकारिता (अनुच्छेद 134) में मृत्युदंड से जुड़े कुछ मामलों में अपील का अधिकार दिया गया।
(ख) निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा
मौलिक अधिकार उप-समिति ने प्रारंभ में निःशुल्क प्राथमिक शिक्षा को मौलिक अधिकार माना था, किंतु सलाहकार समिति ने वित्तीय कठिनाइयों का हवाला देते हुए इसे निदेशक तत्वों में भेज दिया। 23 नवंबर 1948 को इस पर बहस हुई। के. टी. शाह ने कहा कि शिक्षा के बिना लोकतंत्र खोखला होगा। एम. अनंतशयनम आयंगर ने व्यावहारिक कठिनाइयाँ बताईं। अंततः अनुच्छेद 45 बना—“राज्य इस संविधान के प्रारंभ से दस वर्ष की अवधि के भीतर सभी बालकों के लिए, चौदह वर्ष की आयु पूरी करने तक, निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने का प्रयास करेगा।” (2002 के 86वें संशोधन से अनुच्छेद 21A के रूप में शिक्षा मौलिक अधिकार बनी।)
(ग) मद्यनिषेध (अनुच्छेद 47)
गांधीवादी सदस्यों ने मद्यनिषेध को निदेशक तत्वों में रखने का आग्रह किया। 24 नवंबर 1948 को जयपाल सिंह मुंडा ने इसका कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि आदिवासियों के लिए चावल से बनी पारंपरिक मदिरा (हड़िया) उनके धार्मिक और सामाजिक जीवन का अंग है; उसे बंद करना उनकी संस्कृति पर आक्रमण होगा। उन्होंने व्यंग्य किया कि शहरी सदस्य स्वयं विदेशी शराब पीते हैं और आदिवासियों की परंपरा छीनना चाहते हैं। अंततः अनुच्छेद 47 में “स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मादक पेयों और औषधियों” के सेवन के निषेध का प्रयास, “औषधीय प्रयोजनों को छोड़कर”, रखा गया।
(घ) बलात् श्रम और मानव दुर्व्यापार (अनुच्छेद 23-24)
बेगार, देवदासी प्रथा, मानव दुर्व्यापार और 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखानों और खतरनाक कामों में लगाने पर रोक के प्रावधान अपेक्षाकृत सहजता से स्वीकृत हुए। कुछ सदस्यों ने “अनिवार्य सामाजिक सेवा” (जैसे राष्ट्रीय सेवा) को अपवाद बनाने पर प्रश्न उठाए, जिसे अनुच्छेद 23(2) में शामिल किया गया।
(ङ) निवारक निरोध (अनुच्छेद 22)
15-16 सितंबर 1949 को आंबेडकर ने संशोधित अनुच्छेद 22 प्रस्तुत किया। इसमें एक ओर गिरफ्तार व्यक्ति को कारण बताने, वकील से परामर्श, और 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने का अधिकार था, तो दूसरी ओर निवारक निरोध की अनुमति—तीन महीने तक बिना सलाहकार बोर्ड की राय के।
एच. वी. कामत, पंडित हृदयनाथ कुंजरू, ठाकुर दास भार्गव, नज़ीरुद्दीन अहमद ने कड़ी आपत्ति की। कुंजरू ने कहा कि “शांतिकाल में किसी लोकतांत्रिक संविधान में ऐसा प्रावधान विश्व में कहीं नहीं मिलता।” कामत ने कहा कि ब्रिटिश राज के “रौलट एक्ट” की आत्मा संविधान में लौट आई है। आंबेडकर ने उत्तर दिया कि देश की मौजूदा परिस्थितियों में—जहाँ सांप्रदायिक हिंसा, तोड़फोड़ और सशस्त्र विद्रोह के खतरे हैं—राज्य को यह शक्ति देनी होगी; पर उन्होंने इसे अदालती समीक्षा और सलाहकार बोर्ड के अधीन रखकर संतुलित करने का प्रयास किया है। प्रावधान स्वीकृत हुआ, और फरवरी 1950 में ही संसद ने “निवारक निरोध अधिनियम, 1950” पारित किया।
(च) अखिल भारतीय सेवाएँ (अनुच्छेद 311-312)
10 अक्टूबर 1949 को सेवाओं से जुड़े प्रावधानों पर बहस हुई। कई सदस्यों—जैसे महावीर त्यागी, शिब्बन लाल सक्सेना—ने ICS अधिकारियों की गारंटियों का विरोध करते हुए कहा कि ये वही अधिकारी हैं जिन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों पर अत्याचार किए। इस पर पटेल ने अपना प्रसिद्ध भाषण दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि इन अधिकारियों ने विभाजन, शरणार्थी संकट और रियासतों के विलय के समय देश की असाधारण सेवा की है। “उन्हें हटाइए तो मुझे देश भर में अव्यवस्था के सिवा कुछ नहीं दिखता।” अंततः ICS अधिकारियों की सेवा-शर्तों को संविधान में संरक्षण (अनुच्छेद 314) और अखिल भारतीय सेवाओं के लिए अनुच्छेद 312 स्वीकृत हुआ।
(छ) वित्तीय प्रावधान
कर लगाने की शक्तियों का विभाजन, आयकर का केंद्र-राज्य बँटवारा, अनुदान (अनुच्छेद 275) और वित्त आयोग पर अगस्त 1949 में चर्चा हुई। टी. टी. कृष्णमाचारी, बी. दास (उड़ीसा) और पश्चिम बंगाल के सदस्यों ने कहा कि जूट निर्यात शुल्क में बंगाल, असम, बिहार और उड़ीसा का हिस्सा कम है। अंततः अनुच्छेद 273 के तहत इन राज्यों को जूट शुल्क के बदले अनुदान का संक्रमणकालीन प्रावधान बना। विशेषज्ञ समिति (नलिनी रंजन सरकार की अध्यक्षता में) की सिफारिशों का भी उपयोग हुआ।
(ज) उपराष्ट्रपति और राज्यसभा
उपराष्ट्रपति को राज्यसभा का पदेन सभापति बनाने का प्रावधान (अनुच्छेद 64) अमेरिकी मॉडल से लिया गया। कुछ सदस्यों ने इस पद को अनावश्यक कहा, पर आंबेडकर ने कहा कि राष्ट्रपति के पद की रिक्ति या अनुपस्थिति में निरंतरता के लिए यह आवश्यक है।
(झ) संसद सदस्यों के विशेषाधिकार
अनुच्छेद 105 में यह प्रावधान रखा गया कि जब तक संसद कानून नहीं बनाती, तब तक सदस्यों के विशेषाधिकार ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स के समान होंगे। इस पर एच. वी. कामत और नज़ीरुद्दीन अहमद ने आपत्ति की कि स्वतंत्र भारत के संविधान में ब्रिटिश संसद का उल्लेख अपमानजनक है। अल्लादि ने उत्तर दिया कि यह व्यावहारिक कारण से है, क्योंकि हाउस ऑफ कॉमन्स के विशेषाधिकार सदियों में विकसित और भलीभाँति परिभाषित हैं। (1978 के 44वें संशोधन से यह उल्लेख हटाया गया।)
(ञ) सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों की भाषा
भाषा बहस के दौरान यह प्रश्न भी उठा कि क्या उच्च न्यायालयों में हिंदी या क्षेत्रीय भाषाओं का प्रयोग हो सकता है। अनुच्छेद 348(2) में राज्यपाल को राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से उच्च न्यायालय की कार्यवाही में हिंदी या राज्य की राजभाषा के प्रयोग की अनुमति देने की शक्ति दी गई, किंतु निर्णय, डिक्री और आदेश अंग्रेज़ी में ही रहेंगे।
भाग 8-क: बहसों के बाहर की घटनाएँ, जिन्होंने सभा को प्रभावित किया
8-क.1 विभाजन की हिंसा और शरणार्थी
अगस्त 1947 से 1948 के मध्य तक पंजाब, बंगाल, दिल्ली और अन्य क्षेत्रों में अभूतपूर्व सांप्रदायिक हिंसा हुई। अनुमानतः 5 लाख से 10 लाख लोग मारे गए और 1 करोड़ से अधिक लोग विस्थापित हुए। संविधान सभा के कई सदस्यों के परिवार भी इससे प्रभावित हुए। इसका सीधा प्रभाव सभा के निर्णयों पर पड़ा—मज़बूत केंद्र, आपातकालीन प्रावधान, पृथक निर्वाचन का अंत, नागरिकता के जटिल अनुच्छेद, और निवारक निरोध—ये सभी इसी पृष्ठभूमि में समझे जा सकते हैं।
8-क.2 महात्मा गांधी की हत्या (30 जनवरी 1948)
30 जनवरी 1948 को गांधीजी की हत्या ने राष्ट्र को झकझोर दिया। संविधान सभा (विधायी) ने शोक प्रस्ताव पारित किया। नेहरू ने कहा: “हमारे जीवन से प्रकाश चला गया है।” इस घटना ने सांप्रदायिकता के विरुद्ध राष्ट्रीय भावना को तीव्र किया और धर्मनिरपेक्ष राज्य के प्रति सभा की प्रतिबद्धता को और दृढ़ बनाया। कई सदस्यों ने बाद की बहसों में—अस्पृश्यता, पंचायत, मद्यनिषेध, गोरक्षा, कुटीर उद्योग—गांधीजी के आदर्शों का बार-बार उल्लेख किया।
संविधान सभा के भीतर एक प्रश्न यह भी उठा था कि क्या गांधीजी की सलाह संविधान निर्माण में ली गई। गांधीजी ने संविधान सभा की कार्यवाही में औपचारिक भाग नहीं लिया था, किंतु उन्होंने आंबेडकर को सभा में लाने, और अस्पृश्यता उन्मूलन तथा हिंदुस्तानी भाषा के पक्ष में अपने विचार सार्वजनिक रूप से रखे थे। 1946 में गांधीजी के सचिव और विचारक श्रीमन्नारायण अग्रवाल ने “गांधीवादी संविधान” (Gandhian Constitution for Free India) प्रकाशित किया था, जिसमें ग्राम पंचायतों पर आधारित ढाँचे की रूपरेखा थी।
8-क.3 कश्मीर युद्ध और संयुक्त राष्ट्र
अक्टूबर 1947 से दिसंबर 1948 तक भारत-पाकिस्तान के बीच कश्मीर में युद्ध हुआ। 1 जनवरी 1948 को भारत ने मामला संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उठाया। 1 जनवरी 1949 को युद्धविराम हुआ। यह स्थिति अनुच्छेद 370 के प्रारूपण में निर्णायक रही।
8-क.4 हैदराबाद और जूनागढ़
जूनागढ़ के नवाब ने पाकिस्तान में विलय की घोषणा की थी, किंतु जनता के विरोध और भारत की कार्रवाई के बाद फरवरी 1948 में जनमत संग्रह हुआ, जिसमें भारी बहुमत ने भारत के पक्ष में मत दिया। हैदराबाद के निज़ाम ने स्वतंत्र रहने का प्रयास किया; रज़ाकारों की हिंसा के बाद 13-17 सितंबर 1948 को “ऑपरेशन पोलो” के माध्यम से हैदराबाद भारत में शामिल हुआ। इसके बाद हैदराबाद से संविधान सभा में प्रतिनिधि आए।
8-क.5 तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष और कम्युनिस्ट विद्रोह
1946 से 1951 तक तेलंगाना में किसानों का सशस्त्र संघर्ष चला, जिसे कम्युनिस्ट पार्टी का समर्थन था। 1948 में कम्युनिस्ट पार्टी ने “रणदिवे लाइन” के तहत सशस्त्र क्रांति का आह्वान किया। इन घटनाओं ने आपातकालीन और निवारक निरोध प्रावधानों के पक्ष में तर्क को मज़बूत किया।
8-क.6 पहली अंतरिम सरकार और नेहरू मंत्रिमंडल
2 सितंबर 1946 को नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। अक्टूबर 1946 में मुस्लिम लीग इसमें शामिल हुई (लियाकत अली खान वित्त सदस्य बने), किंतु संविधान सभा का बहिष्कार जारी रखा। 15 अगस्त 1947 को नेहरू मंत्रिमंडल बना, जिसमें आंबेडकर (विधि), श्यामा प्रसाद मुखर्जी (उद्योग), जॉन मथाई (वित्त/रेलवे), षण्मुखम चेट्टी (वित्त), सी. एच. भाभा, राजकुमारी अमृत कौर (स्वास्थ्य), बलदेव सिंह (रक्षा), जगजीवन राम (श्रम), रफ़ी अहमद किदवई (संचार), मौलाना आज़ाद (शिक्षा), पटेल (गृह, सूचना, रियासत) आदि थे। यह “राष्ट्रीय सरकार” की अवधारणा का प्रतीक था, जिसमें गैर-कांग्रेसी भी शामिल थे। इस सहयोग का प्रभाव संविधान सभा के वातावरण पर भी पड़ा।
भाग 8-ख: संविधान सभा की कार्य-पद्धति — कैसे होती थी बहस
8-ख.1 एक सामान्य दिन
संविधान सभा की बैठक आमतौर पर सुबह 10 बजे शुरू होती थी। अध्यक्ष के आसन ग्रहण करने के बाद संबंधित अनुच्छेद पढ़ा जाता था। फिर प्रारूप समिति की ओर से (प्रायः आंबेडकर या टी. टी. कृष्णमाचारी) प्रस्ताव आता—“अनुच्छेद अमुक संविधान का भाग बने।” इसके बाद जिन सदस्यों ने पहले से संशोधनों की सूचना दी होती थी, उन्हें क्रम से बुलाया जाता था। हर संशोधन पर सदस्य बोलते, फिर आंबेडकर उत्तर देते, और अंत में संशोधनों पर एक-एक कर मतदान होता—अधिकतर ध्वनि मत से, कभी-कभी विभाजन से।
8-ख.2 कांग्रेस संसदीय दल: “पर्दे के पीछे की सभा”
बहुत से विवादास्पद प्रश्न—भाषा, संपत्ति, अल्पसंख्यक, अनुच्छेद 370, राष्ट्रमंडल—सदन में आने से पहले कांग्रेस संसदीय दल की बैठकों में तय होते थे। ग्रैनविल ऑस्टिन ने इन बैठकों को “सभा के भीतर की सभा” कहा। यहाँ खुली बहस होती थी, मतदान होते थे, और फिर सदन में दल अनुशासन से निर्णय पारित होते थे। आंबेडकर ने भी अपने समापन भाषण में कांग्रेस पार्टी के इस अनुशासन की सराहना की, क्योंकि इससे सभा अराजकता से बची रही।
8-ख.3 “सहमति” और “समायोजन” का सिद्धांत
सभा ने यथासंभव बहुमत के बल पर नहीं, सहमति से निर्णय लेने का प्रयास किया। ऑस्टिन के अनुसार सभा के दो मूल सिद्धांत थे: “सहमति द्वारा निर्णय” (decision-making by consensus) और “समायोजन” (accommodation)—अर्थात परस्पर विरोधी विचारों को एक ही प्रावधान में समेटना। उदाहरण के लिए: - संघवाद और एकात्मकता का मिश्रण; - संसदीय सर्वोच्चता और न्यायिक समीक्षा का संतुलन; - हिंदी को राजभाषा, पर अंग्रेज़ी का निरंतर प्रयोग; - राष्ट्रमंडल में रहते हुए गणराज्य; - ज़मींदारी उन्मूलन, पर मुआवज़े का सिद्धांत।
8-ख.4 सदन में हिंदी और हिंदुस्तानी
सभा के नियमों के अनुसार सदस्य हिंदुस्तानी या अंग्रेज़ी में बोल सकते थे, और अध्यक्ष की अनुमति से अपनी मातृभाषा में भी। अधिकांश बहसें अंग्रेज़ी में हुईं, किंतु सेठ गोविंद दास, आर. वी. धुलेकर, अलगू राय शास्त्री, पुरुषोत्तम दास टंडन, बालकृष्ण शर्मा “नवीन”, हसरत मोहानी आदि अक्सर हिंदी या हिंदुस्तानी में बोलते थे। संविधान का हिंदी अनुवाद तैयार करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनी, जिसका आधिकारिक हिंदी पाठ 24 जनवरी 1950 को हस्ताक्षरित हुआ।
8-ख.5 जनता और प्रेस की भागीदारी
दर्शक दीर्घाओं में आम नागरिक, छात्र और पत्रकार कार्यवाही देखने आते थे। समाचार पत्रों ने प्रतिदिन बहसों की रिपोर्ट छापी। संविधान सभा के सचिवालय को देशभर से हज़ारों पत्र, ज्ञापन और सुझाव मिले—किसान संगठनों, मज़दूर संघों, महिला संगठनों, धार्मिक संस्थाओं, भाषाई समूहों, वकीलों की परिषदों से। अखिल भारतीय महिला सम्मेलन, अखिल भारतीय अनुसूचित जाति संघ, हिंदू महासभा, अकाली दल, मुस्लिम संगठन—सबने अपने-अपने ज्ञापन भेजे। यह संविधान निर्माण की सहभागी प्रकृति का प्रमाण है।
8-ख.6 सदस्यों की उपस्थिति और भागीदारी
PRS के विश्लेषण के अनुसार बहसों में भागीदारी असमान थी—कुछ दर्जन सदस्यों ने ही बहस का बड़ा हिस्सा संभाला, जबकि अनेक सदस्य बहुत कम या कभी नहीं बोले। सबसे अधिक बोलने वालों में आंबेडकर, एच. वी. कामत, के. टी. शाह, नज़ीरुद्दीन अहमद, ठाकुर दास भार्गव, टी. टी. कृष्णमाचारी, शिब्बन लाल सक्सेना, आर. के. सिधवा, ब्रजेश्वर प्रसाद आदि थे।
भाग 8-ग: अंतरिम काल — 26 नवंबर 1949 से 26 जनवरी 1950
8-ग.1 दो महीने की तैयारी
संविधान अंगीकृत होने और लागू होने के बीच के दो महीने गहन प्रशासनिक तैयारी के थे:
- विधि और प्रक्रिया का अनुकूलन: सभी मौजूदा कानूनों को नए संविधान के अनुरूप ढालने के लिए “अनुकूलन आदेश” (Adaptation of Laws Order, 1950) तैयार किए गए।
- राष्ट्रपति का चुनाव: अनुच्छेद 380 के तहत पहले राष्ट्रपति का चुनाव संविधान सभा द्वारा ही होना था।
- नए पदनाम: “गवर्नर-जनरल” से “राष्ट्रपति”, “प्रांत” से “राज्य”, “फेडरल कोर्ट” से “सुप्रीम कोर्ट”, “प्रीमियर” से “मुख्यमंत्री” जैसे परिवर्तन।
- रियासतों द्वारा संविधान की स्वीकृति: भाग ख के राज्यों के राजप्रमुखों ने घोषणाएँ जारी कर संविधान को अपने राज्य का संविधान माना। (मैसूर, हैदराबाद, जम्मू-कश्मीर आदि ने नवंबर-दिसंबर 1949 में घोषणाएँ कीं।)
- हस्तलिखित प्रतियों का अंतिम कार्य: कैलीग्राफी और चित्रांकन का काम पूरा किया गया।
- गणतंत्र समारोह की योजना: परेड, तोपों की सलामी, समारोह, अतिथि—सबकी तैयारी।
8-ग.2 पहली लोकसभा तक की व्यवस्था
अनुच्छेद 379 के तहत संविधान सभा ही “अस्थायी संसद” बन गई, जब तक पहला आम चुनाव न हो। पहले आम चुनाव अक्टूबर 1951 से फरवरी 1952 के बीच हुए—विश्व का तब तक का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक अभ्यास, जिसमें लगभग 17.3 करोड़ मतदाता थे। सुकुमार सेन पहले मुख्य निर्वाचन आयुक्त (21 मार्च 1950 से) बने। 17 अप्रैल 1952 को पहली लोकसभा का गठन हुआ और 13 मई 1952 को उसकी पहली बैठक हुई।
भाग 8-घ: महिलाओं, दलितों और वंचितों के प्रश्न पर विशेष बहसें
8-घ.1 महिलाओं के अधिकार और आरक्षण का प्रश्न
संविधान सभा की महिला सदस्यों ने एक स्वर में महिलाओं के लिए अलग आरक्षण या पृथक प्रतिनिधित्व की माँग को अस्वीकार किया। जुलाई 1947 में प्रांतीय संविधान पर बहस के दौरान रेणुका रे ने कहा: “हम महिलाएँ हमेशा मानती आई हैं कि आरक्षण, पृथक निर्वाचन और ऐसे विशेष प्रावधान महिलाओं की प्रगति में बाधक हैं… हम योग्यता के आधार पर, पुरुषों के समान अवसर चाहते हैं।” हंसा मेहता ने कहा कि महिलाएँ विशेषाधिकार नहीं, “सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय और राजनीतिक न्याय” चाहती हैं, “हम वह समानता चाहती हैं जो पारस्परिक सम्मान और समझ का आधार बने।”
पूर्णिमा बनर्जी ने अनुच्छेद 15 और 16 पर बहस में लिंग आधारित भेदभाव के निषेध को स्पष्ट रूप से शामिल करवाने में भूमिका निभाई। अनुच्छेद 15(3) में राज्य को महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान करने की अनुमति दी गई—यह एक संतुलन था: समानता का सिद्धांत, पर सकारात्मक कार्रवाई की गुंजाइश।
अनुच्छेद 39 (निदेशक तत्व) में पुरुषों और स्त्रियों के लिए समान कार्य के लिए समान वेतन, और आजीविका के पर्याप्त साधनों का अधिकार रखा गया। अनुच्छेद 42 में काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं तथा प्रसूति सहायता का प्रावधान किया गया।
8-घ.2 हिंदू कोड बिल की छाया
संविधान सभा (विधायी) में इसी काल में आंबेडकर ने हिंदू कोड बिल प्रस्तुत किया था (अप्रैल 1947 में प्रवर समिति को भेजा गया, 1948-49 में बहस), जिसमें हिंदू महिलाओं को उत्तराधिकार, तलाक, गोद लेने और एकपत्नीत्व के अधिकार देने का प्रस्ताव था। सभा के बाहर और भीतर रूढ़िवादी सदस्यों—जैसे पंडित लक्ष्मीकांत मैत्र, नज़ीरुद्दीन अहमद (प्रक्रियात्मक आधार पर), और कई हिंदू सदस्यों—ने इसका तीखा विरोध किया। स्वयं राष्ट्रपति-निर्वाचित राजेंद्र प्रसाद ने भी इस पर आपत्तियाँ व्यक्त की थीं। यह विधेयक संविधान सभा के कार्यकाल में पारित नहीं हो सका, और 1951 में आंबेडकर के इस्तीफ़े का एक प्रमुख कारण बना। बाद में 1955-56 में इसे चार अलग कानूनों के रूप में पारित किया गया। यह प्रसंग अनुच्छेद 44 (समान नागरिक संहिता) की बहस से गहराई से जुड़ा था।
8-घ.3 दलितों के प्रश्न: आरक्षण की अवधि और स्वरूप
अनुसूचित जातियों के लिए विधायिका में आरक्षण 10 वर्ष तक (अनुच्छेद 334) रखा गया। 25 अगस्त 1949 को बहस में कुछ सदस्यों—जैसे एस. नागप्पा, पी. आर. ठाकुर, मुनिस्वामी पिल्लै—ने इसे अपर्याप्त बताया और कहा कि सदियों के अन्याय को दस वर्षों में मिटाया नहीं जा सकता। आंबेडकर ने स्वयं कहा कि वे इससे अधिक अवधि चाहते थे, किंतु सभा की सहमति इसी पर बनी; यदि आवश्यकता हुई तो संसद इसे आगे बढ़ा सकती है। (इसे हर दस वर्ष बाद संशोधन से बढ़ाया गया।)
नौकरियों में आरक्षण (अनुच्छेद 16(4)) और दावों पर विचार (अनुच्छेद 335) के लिए कोई समय-सीमा नहीं रखी गई। अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए विशेष अधिकारी (अनुच्छेद 338) और पिछड़े वर्गों की दशा की जाँच के लिए आयोग (अनुच्छेद 340) के प्रावधान भी किए गए। इसी अनुच्छेद 340 के तहत बाद में काका कालेलकर आयोग (1953) और मंडल आयोग (1979) बने।
8-घ.4 “हरिजन” शब्द पर आपत्ति
कुछ सदस्यों ने संविधान में “हरिजन” शब्द के प्रयोग का सुझाव दिया था, जिसका आंबेडकर और कई दलित सदस्यों ने विरोध किया। उनका कहना था कि यह शब्द दया का भाव लिए हुए है, अधिकार का नहीं। अंततः संविधान में “अनुसूचित जातियाँ” (Scheduled Castes) शब्द ही रखा गया, जो 1935 के अधिनियम से आया था और जिसके लिए राष्ट्रपति के आदेश से सूची बनती है (अनुच्छेद 341)।
8-घ.5 श्रमिक और किसान
प्रो. एन. जी. रंगा, के. टी. शाह, दामोदर स्वरूप सेठ, शिब्बन लाल सक्सेना और सोमनाथ लाहिड़ी ने श्रमिकों और किसानों के अधिकारों पर बार-बार बल दिया। काम का अधिकार, न्यूनतम मज़दूरी, निर्वाह मज़दूरी, उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी जैसे विचार उठे। इनमें से अधिकांश नीति-निदेशक तत्वों (अनुच्छेद 38, 39, 41, 43) में स्थान पा सके। अनुच्छेद 39(ख) और (ग) में यह निर्देश रखा गया कि समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण सामूहिक हित के लिए बँटे, और धन तथा उत्पादन के साधनों का अहितकारी संकेंद्रण न हो—यह संविधान का सबसे “समाजवादी” प्रावधान माना जाता है।
भाग 8-ङ: संविधान सभा के कुछ अविस्मरणीय क्षण
- 9 दिसंबर 1946: पहली बैठक में अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रूमैन के प्रतिनिधि और विभिन्न देशों के शुभकामना संदेश पढ़े गए; आचार्य कृपलानी ने डॉ. सिन्हा को आसन तक पहुँचाया।
- 17 दिसंबर 1946: अप्रत्याशित रूप से बुलाए गए आंबेडकर का भाषण, जिसने उन्हें सभा का केंद्रीय व्यक्तित्व बना दिया।
- 29 अप्रैल 1947: अस्पृश्यता उन्मूलन का सिद्धांत पारित होने पर “महात्मा गांधी की जय” के नारे।
- 22 जुलाई 1947: तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाना; महिला सदस्यों द्वारा भेंट किया गया ध्वज, जिसे हंसा मेहता ने “भारत की महिलाओं की ओर से” सभा को समर्पित किया (15 अगस्त 1947 की रात)।
- 14-15 अगस्त 1947: मध्यरात्रि की शपथ, नेहरू का “ट्रिस्ट विद डेस्टिनी” भाषण, और शंखनाद।
- 4 नवंबर 1948: प्रारूप संविधान का प्रस्तुतीकरण।
- 29 नवंबर 1948: अनुच्छेद 17 पारित।
- 14 सितंबर 1949: राजभाषा पर ऐतिहासिक समझौता।
- 17 अक्टूबर 1949: “ईश्वर के नाम पर” संशोधन पर मतदान।
- 25 नवंबर 1949: आंबेडकर का “विरोधाभासों का जीवन” भाषण।
- 26 नवंबर 1949: संविधान का अंगीकरण।
- 24 जनवरी 1950: हल्की बारिश के बीच हस्ताक्षर, “जन गण मन” और “वंदे मातरम्” को राष्ट्रीय सम्मान।
9.4 26 नवंबर 1949: राजेंद्र प्रसाद का भाषण और संविधान का अंगीकरण
26 नवंबर 1949 को अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने समापन भाषण दिया (26 नवंबर 1949 की कार्यवाही)। उनके भाषण के प्रमुख बिंदु:
(क) कार्य का विवरण: उन्होंने बताया कि सभा ने 2 वर्ष, 11 महीने और 17 दिन में यह काम पूरा किया (9 दिसंबर 1946 से 26 नवंबर 1949 तक)। 11 सत्र हुए। प्रारूप पर 114 दिन विचार हुआ। लगभग 7,635 संशोधन प्रस्तुत हुए, जिनमें से 2,473 पर सदन में चर्चा हुई। कुल खर्च लगभग ₹63,96,729 (करीब 64 लाख रुपये) रहा।
(ख) दो अधूरे स्वप्न: उन्होंने दो बातों पर खेद व्यक्त किया—पहला, विधायिका के सदस्यों के लिए कोई शैक्षिक योग्यता तय नहीं की जा सकी, जबकि कानून बनाने वालों से न्यूनतम योग्यता की अपेक्षा की जाती है। दूसरा, संविधान का मूल पाठ किसी भारतीय भाषा में नहीं बन सका—“हम अपनी भाषा में अपना संविधान नहीं बना सके।”
(ग) संविधान और मनुष्य: “यदि चुने हुए लोग योग्य, चरित्रवान और ईमानदार हों तो वे एक दोषपूर्ण संविधान से भी सर्वोत्तम परिणाम निकाल सकते हैं। यदि उनमें इन गुणों का अभाव हो तो संविधान देश की सहायता नहीं कर सकता। अंततः संविधान एक मशीन की तरह निर्जीव वस्तु है। उसमें प्राण उन लोगों के कारण आते हैं जो उसे नियंत्रित और संचालित करते हैं।”
(घ) सामासिकता: उन्होंने कहा कि भारत को आज ऐसे ईमानदार लोगों की आवश्यकता है जो देश के हित को सर्वोपरि रखें। “हमारे बीच अलग-अलग जातियाँ, भिन्न-भिन्न भाषाएँ, विभिन्न धर्म और संस्कृतियाँ हैं… इसके लिए दृढ़ चरित्र, दूरदृष्टि और ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो छोटे समूहों और क्षेत्रों के लिए बड़े हित का बलिदान न करें।”
(ङ) आंबेडकर की प्रशंसा: उन्होंने कहा: “अध्यक्ष के आसन पर बैठकर और दिन-प्रतिदिन कार्यवाही देखते हुए मैं समझता हूँ कि प्रारूप समिति के सदस्यों, विशेषकर उसके अध्यक्ष डॉ. आंबेडकर ने, अपने स्वास्थ्य की परवाह न करते हुए, जिस उत्साह और समर्पण से काम किया है, उसकी कल्पना कोई और नहीं कर सकता। हमने उन्हें प्रारूप समिति में रखकर और उसका अध्यक्ष बनाकर जो निर्णय लिया, उससे अधिक उचित निर्णय हम नहीं ले सकते थे।”
(च) अंगीकरण: इसके बाद प्रस्ताव मतदान के लिए रखा गया और “जय” के गगनभेदी स्वरों के बीच स्वीकृत हुआ। संविधान अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित हुआ। इसी स्मृति में 2015 से 26 नवंबर “संविधान दिवस” के रूप में मनाया जाता है (पहले “राष्ट्रीय विधि दिवस”)।
9.5 26 नवंबर 1949 से तुरंत लागू हुए प्रावधान
अनुच्छेद 394 के अनुसार कुछ अनुच्छेद 26 नवंबर 1949 से ही लागू हो गए: नागरिकता (5-9), निर्वाचन (324), अंतरिम संसद (379-380), अस्थायी और संक्रमणकालीन उपबंध (388, 391, 392, 393) और अनुच्छेद 60, 366, 367, 394 आदि। शेष संविधान 26 जनवरी 1950 से लागू होना था।
भाग 10: 26 जनवरी ही क्यों? — पूर्ण स्वराज की स्मृति
10.1 लाहौर अधिवेशन, 1929
31 दिसंबर 1929 की आधी रात को लाहौर में रावी नदी के किनारे कांग्रेस अधिवेशन में, अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू ने तिरंगा फहराया और “पूर्ण स्वराज” का प्रस्ताव पारित हुआ। तय हुआ कि 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में “स्वतंत्रता दिवस” मनाया जाएगा।
10.2 26 जनवरी 1930: पहला “स्वतंत्रता दिवस”
26 जनवरी 1930 को देशभर में लाखों लोगों ने “स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा” ली, जिसका पाठ गांधीजी ने तैयार किया था: “हम मानते हैं कि भारतीय जनता का, किसी भी अन्य जनता की तरह, यह अविच्छेद्य अधिकार है कि उसे स्वतंत्रता मिले… यदि कोई सरकार जनता को इन अधिकारों से वंचित करती है और उसका दमन करती है तो जनता को उस सरकार को बदलने या समाप्त करने का अधिकार है… ब्रिटिश सरकार ने भारत को आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से नष्ट कर दिया है… इसलिए हम मानते हैं कि भारत को ब्रिटिश संबंध तोड़कर पूर्ण स्वराज प्राप्त करना चाहिए।”
1930 से 1947 तक हर वर्ष 26 जनवरी स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाई जाती रही। जब 15 अगस्त 1947 को वास्तविक स्वतंत्रता मिली (माउंटबेटन ने यह तारीख इसलिए चुनी थी कि यह 1945 में जापान के आत्मसमर्पण की दूसरी वर्षगाँठ थी), तब 26 जनवरी की ऐतिहासिक स्मृति को सुरक्षित रखने के लिए संविधान सभा ने निर्णय लिया कि संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू होगा। इस प्रकार दो महीने की प्रतीक्षा जानबूझकर की गई।
10.3 संविधान की हस्तलिखित प्रतियाँ
संविधान के मूल अंग्रेज़ी और हिंदी पाठ टाइप नहीं, बल्कि हाथ से लिखे गए:
- अंग्रेज़ी प्रति: दिल्ली के प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा ने इटैलिक कैलीग्राफी में लिखी। इसमें छह महीने लगे और 432 निब का प्रयोग हुआ। उन्होंने कोई पारिश्रमिक नहीं लिया; केवल यह शर्त रखी कि हर पृष्ठ पर उनका नाम और अंतिम पृष्ठ पर उनके दादा का नाम हो।
- हिंदी प्रति: वसंत कृष्ण वैद्य ने सुलेख में लिखी।
- चित्रांकन: शांतिनिकेतन के नंदलाल बोस और उनके शिष्यों (जैसे राममनोहर सिन्हा, जिन्होंने प्रस्तावना का पृष्ठ सजाया, बेओहर राममनोहर सिन्हा) ने हर भाग की शुरुआत में चित्र बनाए—मोहनजोदड़ो की मुहर, वैदिक गुरुकुल, राम-सीता-लक्ष्मण, कृष्ण का गीता-उपदेश, बुद्ध, महावीर, अशोक, विक्रमादित्य का दरबार, नालंदा, नटराज, अकबर, शिवाजी, गुरु गोविंद सिंह, टीपू सुल्तान, रानी लक्ष्मीबाई, गांधीजी की दांडी यात्रा, नोआखाली, नेताजी सुभाष चंद्र बोस आदि। ये चित्र भारत की 5,000 वर्ष की सभ्यता यात्रा का दृश्य इतिहास हैं।
- मूल प्रतियाँ आज संसद भवन के पुस्तकालय में हीलियम-भरे विशेष संदूकों में सुरक्षित हैं।
10.4 24 जनवरी 1950: अंतिम बैठक
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा की अंतिम बैठक हुई। उस दिन तीन महत्वपूर्ण कार्य हुए:
(क) राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत: अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने वक्तव्य दिया कि ‘जन गण मन’ भारत का राष्ट्रगान है और ‘वंदे मातरम्’ को उसके बराबर सम्मान तथा दर्जा दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि औपचारिक प्रस्ताव पर निर्णय लेने के बजाय वे सदन के सामने अपना वक्तव्य रख रहे हैं। इस पर मतदान नहीं हुआ; कार्यवाही में वक्तव्य के बाद तालियों का उल्लेख है।
(ख) राष्ट्रपति का निर्वाचन: डॉ. राजेंद्र प्रसाद को निर्विरोध भारत का पहला राष्ट्रपति चुना गया। (कहा जाता है कि नेहरू चाहते थे कि सी. राजगोपालाचारी राष्ट्रपति बनें, पर कांग्रेस दल और पटेल का समर्थन राजेंद्र प्रसाद के पक्ष में था।)
(ग) हस्ताक्षर: सभा के 284 सदस्यों ने संविधान की तीन प्रतियों (हिंदी, अंग्रेज़ी हस्तलिखित और अंग्रेज़ी मुद्रित) पर हस्ताक्षर किए। सबसे पहले नेहरू ने हस्ताक्षर किए, और अंत में अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने। कहा जाता है कि उस दिन दिल्ली में हल्की बूँदा-बाँदी हो रही थी, जिसे सदस्यों ने शुभ संकेत माना।
सत्र ‘जन गण मन’ के गायन के साथ समाप्त हुआ। संविधान सभा 24 जनवरी की बैठक के बाद स्थगित हुई। संविधान लागू होने पर 26 जनवरी 1950 से अनुच्छेद 379 के तहत वही सभा अस्थायी संसद के रूप में काम करने लगी और 1952 के आम चुनावों के बाद बनी संसद की पहली बैठक तक यह व्यवस्था जारी रही।
भाग 11: 26 जनवरी 1950 — गणराज्य का जन्म
11.1 गणराज्य की घोषणा
26 जनवरी 1950 को सुबह 10:18 बजे सरकारी भवन (आज का राष्ट्रपति भवन) के दरबार हॉल में गवर्नर-जनरल सी. राजगोपालाचारी ने भारत को संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित करने वाली उद्घोषणा पढ़ी। छह मिनट बाद, 10:24 बजे, भारत के मुख्य न्यायाधीश हरिलाल जेकिसुनदास कानिया ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद को राष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई; उन्होंने शपथ हिंदी में ली। इन सटीक समयों के लिए समकालीन प्रकाशित विवरण का संदर्भ स्रोत-सूची में जोड़ा गया है।
राष्ट्रपति ने अपने पहले संबोधन में कहा कि भारत का पूरा इतिहास आज एक नए युग में प्रवेश कर रहा है। उन्होंने देश की जनता से अपील की कि वे गरीबी, बीमारी और अज्ञान के विरुद्ध संघर्ष में एकजुट हों।
इसके बाद 31 तोपों की सलामी दी गई। राष्ट्रपति ने गवर्नर-जनरल के पद को समाप्त करते हुए ब्रिटिश ताज के अंतिम प्रतिनिधि से कार्यभार ग्रहण किया।
11.2 पहली गणतंत्र दिवस परेड
दोपहर 2:30 बजे राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद 35 वर्ष पुरानी, छह ऑस्ट्रेलियाई घोड़ों द्वारा खींची जाने वाली बग्घी में सरकारी भवन से निकले। कनॉट प्लेस और आसपास के क्षेत्रों से होते हुए वे लगभग 3:45 बजे इर्विन एम्फीथिएटर (आज का मेजर ध्यानचंद राष्ट्रीय स्टेडियम) पहुँचे। वहाँ लगभग 15,000 लोगों की उपस्थिति में उन्होंने तिरंगा फहराया।
पहली गणतंत्र दिवस परेड में थल सेना, नौसेना और वायुसेना के लगभग 3,000 जवानों ने भाग लिया। 100 से अधिक विमानों ने फ्लाई-पास्ट किया। मुख्य अतिथि थे इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो। (1950 से 1954 तक परेड अलग-अलग स्थानों पर हुई—इर्विन स्टेडियम, किंग्सवे कैंप, लाल किला, रामलीला मैदान; 1955 से यह राजपथ, आज के कर्तव्य पथ, पर स्थायी रूप से होने लगी।)
11.3 भारतीय संस्थाओं का पुनर्गठन
26 जनवरी 1950 से: - संघीय न्यायालय (Federal Court) सुप्रीम कोर्ट बन गया। सुप्रीम कोर्ट का उद्घाटन 28 जनवरी 1950 को पुराने संसद भवन के “चैंबर ऑफ प्रिंसेज़” में हुआ, जिसके पहले मुख्य न्यायाधीश हरिलाल कानिया बने। - प्रिवी काउंसिल (लंदन) में अपील का अधिकार समाप्त हो गया। - राष्ट्रीय प्रतीक: सारनाथ के अशोक स्तंभ का सिंहशीर्ष, “सत्यमेव जयते” (मुंडक उपनिषद से) के साथ, 26 जनवरी 1950 को राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में अपनाया गया। - भारतीय मुद्रा, डाक टिकट और सरकारी मुहरों से ब्रिटिश सम्राट की छवि हटाने की प्रक्रिया शुरू हुई। 15 अगस्त 1950 को गणतंत्र के अवसर पर डाक टिकटों की विशेष शृंखला जारी हुई। - अधिकारियों की शपथ: सभी सरकारी पदाधिकारियों, न्यायाधीशों, मंत्रियों ने नए संविधान के प्रति शपथ ली। नेहरू मंत्रिमंडल ने भी फिर से शपथ ली। - रियासतों की स्थिति: राजप्रमुखों ने संविधान को स्वीकार किया; हैदराबाद के निज़ाम ने भी 1949 के अंत में संविधान को स्वीकार करने की घोषणा की थी।
11.4 राष्ट्रमंडल का प्रश्न: गणराज्य फिर भी कॉमनवेल्थ में
एक बड़ा प्रश्न था—क्या गणराज्य भारत ब्रिटिश राष्ट्रमंडल (कॉमनवेल्थ) में रह सकता है, जबकि उस समय कॉमनवेल्थ की सदस्यता ब्रिटिश ताज के प्रति निष्ठा से जुड़ी थी?
अप्रैल 1949 में लंदन में राष्ट्रमंडल प्रधानमंत्रियों के सम्मेलन में “लंदन घोषणा” पारित हुई, जिसमें भारत को गणराज्य बनने के बाद भी राष्ट्रमंडल का सदस्य बने रहने की अनुमति दी गई; ब्रिटिश सम्राट को “राष्ट्रमंडल का प्रमुख” (Head of the Commonwealth) माना गया—केवल स्वतंत्र सदस्य राष्ट्रों के मुक्त संघ के प्रतीक के रूप में। 16 मई 1949 को नेहरू ने संविधान सभा में यह प्रस्ताव रखा। हसरत मोहानी, शिब्बन लाल सक्सेना और कुछ समाजवादियों ने विरोध किया, पर नेहरू ने तर्क दिया कि यह संबंध पूर्णतः स्वैच्छिक है और भारत की संप्रभुता पर कोई आँच नहीं आती। सभा ने प्रस्ताव को स्वीकार किया। इस प्रकार 26 जनवरी 1950 को भारत गणराज्य बना, किंतु राष्ट्रमंडल का सदस्य बना रहा—यह आधुनिक राष्ट्रमंडल की नींव बनी।
11.5 देशभर में उत्सव
26 जनवरी 1950 को देशभर में उत्सव मनाया गया। राज्यों की राजधानियों में राज्यपालों और राजप्रमुखों ने शपथ ली, झंडे फहराए गए, स्कूलों में मिठाइयाँ बाँटी गईं, कैदियों को क्षमादान दिया गया। अखबारों ने विशेष संस्करण निकाले।
“द हिंदुस्तान टाइम्स”, “द स्टेट्समैन”, “द हिंदू”, “नवभारत टाइम्स”, “आज”, “अमृत बाज़ार पत्रिका” आदि ने इस दिन को भारत के इतिहास में “नए युग की सुबह” कहा। विदेशी अखबारों ने भी इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि एक गरीब, अशिक्षित, विभाजन से घायल देश ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार वाला लोकतांत्रिक संविधान अपनाया है।
भाग 12: संविधान सभा के प्रमुख व्यक्तित्व और उनका योगदान
12.1 डॉ. भीमराव आंबेडकर — संविधान के मुख्य शिल्पी
प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में आंबेडकर ने लगभग हर प्रमुख अनुच्छेद का बचाव किया, हर संशोधन का उत्तर दिया। मधुमेह और अन्य बीमारियों के बावजूद उन्होंने अथक कार्य किया। उनकी विद्वत्ता—अर्थशास्त्र, विधि, इतिहास, समाजशास्त्र—संविधान के हर भाग में दिखती है। मौलिक अधिकार, अस्पृश्यता उन्मूलन, आरक्षण, अनुच्छेद 32, संघीय ढाँचे की लचीली प्रकृति, और “संवैधानिक नैतिकता” का विचार—ये आंबेडकर की अमिट छाप हैं।
विरोधाभास यह है कि संविधान सभा में आने से पहले आंबेडकर कांग्रेस के कटु आलोचक थे। उनकी नियुक्ति स्वतंत्र भारत की समावेशी राजनीति का प्रतीक बनी। बाद में वे नेहरू मंत्रिमंडल में पहले विधि मंत्री बने, और हिंदू कोड बिल पर मतभेद के कारण 1951 में इस्तीफा दिया।
12.2 जवाहरलाल नेहरू — दृष्टि और दिशा
उद्देश्य प्रस्ताव, राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रमंडल, संघ शक्ति, संपत्ति का अधिकार, भाषा—हर बड़े प्रश्न पर नेहरू ने दिशा दी। उनके भाषणों में आदर्शवाद और यथार्थवाद का मिश्रण था। उन्होंने कहा था कि संविधान सभा एक “राष्ट्र की गतिमान शक्ति” है, जो अपना भविष्य स्वयं रच रही है।
12.3 सरदार वल्लभभाई पटेल — एकता के शिल्पकार
मौलिक अधिकार और अल्पसंख्यक सलाहकार समिति तथा प्रांतीय संविधान समिति के अध्यक्ष के रूप में पटेल ने पृथक निर्वाचन की समाप्ति, अखिल भारतीय सेवाओं (IAS, IPS) के संरक्षण (अनुच्छेद 312), और रियासतों के विलय में निर्णायक भूमिका निभाई। 10 अक्टूबर 1949 को उन्होंने अखिल भारतीय सेवाओं का दृढ़ बचाव करते हुए कहा: “यदि आपके पास अच्छी अखिल भारतीय सेवा नहीं होगी जिसे अपने मन की बात कहने की स्वतंत्रता हो… तो आपका संयुक्त भारत नहीं रहेगा।”
12.4 डॉ. राजेंद्र प्रसाद — गरिमापूर्ण अध्यक्ष
अध्यक्ष के रूप में उन्होंने तीन वर्षों तक निष्पक्षता से सदन चलाया। वे भाषा प्रश्न पर हिंदी के पक्षधर थे, पर अध्यक्ष के आसन से उन्होंने संतुलन बनाए रखा।
12.5 मौलाना अबुल कलाम आज़ाद
अपेक्षाकृत कम बोले, पर हिंदुस्तानी और साझी संस्कृति के पक्ष में उनका स्वर महत्वपूर्ण रहा।
12.6 बी. एन. राव
संवैधानिक सलाहकार के रूप में उन्होंने प्रारंभिक प्रारूप तैयार किया और विश्व के संविधानों का गहन अध्ययन कर “Constitutional Precedents” की शृंखला सदस्यों को उपलब्ध कराई।
12.7 अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर, एन. गोपालस्वामी आयंगर, के. एम. मुंशी, टी. टी. कृष्णमाचारी
विधिक प्रतिभा के ये चार स्तंभ प्रारूप समिति और सदन—दोनों में निर्णायक रहे। अल्लादि ने अनुच्छेद 21 और वयस्क मताधिकार पर; आयंगर ने राजभाषा और अनुच्छेद 370 पर; मुंशी ने समान नागरिक संहिता, मौलिक अधिकार और भाषा पर; और टी. टी. कृष्णमाचारी ने आपातकाल, वित्तीय प्रावधानों और दक्षिण के दृष्टिकोण पर प्रमुख योगदान दिया।
12.8 आलोचक स्वर: एच. वी. कामत, के. टी. शाह, शिब्बन लाल सक्सेना, हृदयनाथ कुंजरू, नज़ीरुद्दीन अहमद, हसरत मोहानी, सोमनाथ लाहिड़ी
इन्होंने सैकड़ों संशोधन रखे। उनके अधिकांश संशोधन गिर गए, पर उन्होंने हर प्रावधान को कसौटी पर कसा। आंबेडकर ने स्वयं स्वीकार किया कि इनके बिना संविधान सभा “हाँ में हाँ मिलाने वालों” की सभा बन जाती। PRS के विश्लेषण के अनुसार कामत, के. टी. शाह और नज़ीरुद्दीन अहमद जैसे सदस्य सबसे अधिक बोलने और संशोधन रखने वालों में थे।
12.9 महिला सदस्य
संविधान सभा में 15 महिलाएँ थीं: अम्मू स्वामीनाथन, एनी मस्कारेन, बेगम एज़ाज़ रसूल, दक्षायणी वेलायुधन (एकमात्र दलित महिला सदस्य), दुर्गाबाई देशमुख, हंसा मेहता, कमला चौधरी, लीला रॉय, मालती चौधरी, पूर्णिमा बनर्जी, राजकुमारी अमृत कौर, रेणुका रे, सरोजिनी नायडू, सुचेता कृपलानी और विजयलक्ष्मी पंडित।
- हंसा मेहता ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में “सभी मनुष्य स्वतंत्र और समान पैदा होते हैं” (All men के स्थान पर All human beings) शब्दावली बदलवाई थी, और संविधान सभा में स्त्री-पुरुष समानता पर बल दिया।
- दक्षायणी वेलायुधन ने अस्पृश्यता उन्मूलन पर कहा कि केवल कानून से नहीं, सामाजिक परिवर्तन से ही यह समाप्त होगी, और पृथक निर्वाचन तथा आरक्षण दोनों के बजाय दलितों के नैतिक और आर्थिक सशक्तिकरण पर बल दिया।
- दुर्गाबाई देशमुख ने न्यायपालिका और विधिक सहायता पर, तथा रेणुका रे ने महिलाओं के आरक्षण का विरोध करते हुए समानता पर ज़ोर दिया।
12.10 अन्य उल्लेखनीय व्यक्तित्व
- डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी — बंगाल के विभाजन, हिंदी, और राज्यों के अधिकार पर।
- जयपाल सिंह मुंडा — आदिवासी अधिकार।
- फ्रैंक एंथनी — एंग्लो-इंडियन प्रतिनिधित्व और अंग्रेज़ी।
- एच. सी. मुखर्जी — ईसाई समुदाय, अल्पसंख्यक उप-समिति।
- सर्वपल्ली राधाकृष्णन — दार्शनिक दृष्टि।
- गोविंद बल्लभ पंत, पुरुषोत्तम दास टंडन, सेठ गोविंद दास, रविशंकर शुक्ल — हिंदी और उत्तर भारत के स्वर।
- शेख अब्दुल्ला — जम्मू-कश्मीर।
- सरदार हुकम सिंह, भूपिंदर सिंह मान — सिख प्रश्न।
- आचार्य जे. बी. कृपलानी — मौलिक अधिकार उप-समिति।
- मीनू मसानी — मौलिक अधिकार उप-समिति में समान नागरिक संहिता को मौलिक अधिकार बनाने के पक्षधर (हंसा मेहता और अमृत कौर के साथ)।
भाग 13: संविधान का मूल स्वरूप (26 जनवरी 1950 को)
13.1 विदेशी संविधानों से लिए गए तत्व
भाग 14: संविधान सभा पर आलोचनाएँ और उनके उत्तर
14.1 “प्रतिनिधि सभा नहीं थी”
आलोचना: सभा सार्वभौमिक मताधिकार से नहीं चुनी गई थी।
उत्तर: एनसीईआरटी के अध्याय में भी उल्लेख है कि सभा में लगभग सभी विचारधाराओं, समुदायों और क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व था, और प्रारूप पर आठ महीने तक सार्वजनिक चर्चा हुई। बाद में 1952 के आम चुनावों में जनता ने इस संविधान के तहत भारी भागीदारी कर इसे व्यावहारिक स्वीकृति दी।
14.2 “कांग्रेस का वर्चस्व”
आलोचना: लगभग 82 प्रतिशत सदस्य कांग्रेस से थे।
उत्तर: कांग्रेस स्वयं एक व्यापक मंच थी—जिसमें समाजवादी, दक्षिणपंथी, गांधीवादी, उद्योगपति, किसान नेता सब थे। ग्रैनविल ऑस्टिन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “द इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन: कॉर्नरस्टोन ऑफ ए नेशन” (1966) में लिखा कि संविधान सभा “एकदलीय देश में एकदलीय संस्था” थी, पर “सभा कांग्रेस थी, और कांग्रेस भारत थी।” उन्होंने सभा के निर्णय लेने के तरीके को “सहमति” (consensus) और “समायोजन” (accommodation) पर आधारित बताया।
14.3 “वकीलों का स्वर्ग”
आलोचना: संविधान बहुत लंबा, जटिल और कानूनी भाषा से भरा है। सर आइवर जेनिंग्स ने इसे “वकीलों का स्वर्ग” कहा।
उत्तर: आंबेडकर ने कहा कि भारत जैसे विविध और नए लोकतंत्र में प्रशासनिक ढाँचे को लिखना आवश्यक था।
14.4 “उधार का संविधान”
उत्तर: आंबेडकर का तर्क—संविधानों के मूल विचार किसी एक देश की संपत्ति नहीं; भारत ने उन्हें अपनी आवश्यकताओं के अनुसार ढाला।
14.5 “गांधीवादी नहीं”
आलोचना: ग्राम स्वराज, विकेंद्रीकरण, कुटीर उद्योग, मद्यनिषेध जैसे गांधीवादी विचार केवल नीति-निदेशक तत्वों तक सीमित रहे।
उत्तर: अनुच्छेद 40 (पंचायत), 43 (कुटीर उद्योग), 46 (कमज़ोर वर्ग), 47 (मद्यनिषेध), 48 (गोरक्षा), 17 (अस्पृश्यता) में गांधीवादी विचार निहित हैं।
भाग 15: निष्कर्ष — एक जीवंत दस्तावेज़
26 जनवरी 1950 को भारत ने केवल एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं अपनाया, बल्कि एक सामाजिक क्रांति की प्रतिज्ञा की। ग्रैनविल ऑस्टिन ने इसे “सर्वप्रथम एक सामाजिक दस्तावेज़” कहा, जिसका उद्देश्य सामाजिक क्रांति को बढ़ावा देना है।
संविधान सभा ने जिन परिस्थितियों में काम किया, वे अत्यंत कठिन थीं—विभाजन की हिंसा जिसमें लाखों लोग मारे गए और करोड़ों विस्थापित हुए; गांधीजी की हत्या (30 जनवरी 1948); कश्मीर में युद्ध; हैदराबाद और जूनागढ़ का संकट; तेलंगाना में सशस्त्र विद्रोह; खाद्य संकट; शरणार्थियों का पुनर्वास। इन सबके बीच सभा ने धैर्य, विवेक और सहमति से एक ऐसा संविधान बनाया जिसमें:
- एक व्यक्ति, एक वोट का सिद्धांत—बिना संपत्ति, शिक्षा, लिंग या जाति की शर्त के;
- अस्पृश्यता का अंत और सामाजिक न्याय का वादा;
- धर्म की स्वतंत्रता और समान नागरिक अधिकारों पर आधारित शासन; ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द प्रस्तावना में 1976 में जोड़ा गया;
- स्वतंत्र न्यायपालिका और मौलिक अधिकारों की गारंटी;
- संघीय ढाँचा जो विविधता को स्वीकार करे पर एकता बनाए रखे;
- और संशोधन की लचीली प्रक्रिया, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इसे अपने अनुसार ढाल सकें।
संविधान सभा की बहसें आज भी अदालतों, संसद और सार्वजनिक विमर्श में बार-बार संदर्भित होती हैं। जब भी कोई संवैधानिक प्रश्न उठता है—चाहे वह अनुच्छेद 370 हो, समान नागरिक संहिता हो, आरक्षण हो, राज्यपाल की भूमिका हो, भाषा का प्रश्न हो, या आपातकाल—तो देश उन्हीं बहसों की ओर लौटता है जो 1946 से 1949 के बीच उस गुंबददार कक्ष में हुई थीं।
डॉ. आंबेडकर की चेतावनी आज भी प्रासंगिक है: राजनीतिक लोकतंत्र तभी टिकेगा जब वह सामाजिक लोकतंत्र बने—जहाँ स्वतंत्रता, समानता और बंधुता जीवन के सिद्धांत हों। और राजेंद्र प्रसाद का वाक्य भी: संविधान एक निर्जीव मशीन है, उसमें प्राण वे लोग डालते हैं जो उसे चलाते हैं।
26 जनवरी 1950 को “हम, भारत के लोग” ने अपने भविष्य की बागडोर अपने हाथों में ली। यही इस दिन का सबसे बड़ा अर्थ है।
परिशिष्ट क: महत्वपूर्ण तिथियों की समय-रेखा
परिशिष्ट ख: प्रमुख बहसें और अंतिम निर्णय एक नज़र में
स्रोत और आगे पढ़ने के लिए
स्रोत और आगे पढ़ने के लिए
Constituent Assembly Debates — constitutionofindia.net डिजिटल अभिलेखागार
- 26 नवंबर 1949 की कार्यवाही — constitutionofindia.net
- उद्देश्य प्रस्ताव का पारित होना, जनवरी 1947 — constitutionofindia.net
- नेहरू का उद्देश्य प्रस्ताव — thenehru.org
- डॉ. आंबेडकर का समापन भाषण, 25 नवंबर 1949 — भारत का सर्वोच्च न्यायालय
- Analysis of the Constituent Assembly Debates — PRS Legislative Research
- Constituent Assembly Debates (PDF) — सरकारी प्रकाशन
- एनसीईआरटी कक्षा 12, अध्याय 12: संविधान का निर्माण — SATHEE/IIT कानपुर
- Dr. Babasaheb Ambedkar Writings and Speeches, Vol. 13 — Internet Archive
- ग्रैनविल ऑस्टिन, “The Indian Constitution: Cornerstone of a Nation” (1966)
- बी. शिवा राव (सं.), “The Framing of India’s Constitution” (5 खंड)
टिप्पणी: उद्धरणों का हिंदी रूप मूल अंग्रेज़ी/हिंदुस्तानी कार्यवाही का भावानुवाद है। प्रकाशन से पहले किसी उद्धरण को शब्दशः उपयोग करना हो तो संबंधित तिथि की मूल कार्यवाही से मिलान कर लें।
परिशिष्ट: सारणियाँ और संदर्भ-सार
सारणी 1: संविधान सभा की प्रमुख समितियाँ
- संघ शक्ति समिति (Union Powers Committee) — जवाहरलाल नेहरू
- संघ संविधान समिति (Union Constitution Committee) — जवाहरलाल नेहरू
- प्रांतीय संविधान समिति — सरदार वल्लभभाई पटेल
- मौलिक अधिकार, अल्पसंख्यक, जनजाति एवं अपवर्जित क्षेत्र संबंधी सलाहकार समिति — सरदार वल्लभभाई पटेल
- मौलिक अधिकार उप-समिति — आचार्य जे. बी. कृपलानी
- अल्पसंख्यक उप-समिति — एच. सी. मुखर्जी
- प्रक्रिया नियम समिति — डॉ. राजेंद्र प्रसाद
- संचालन समिति (Steering Committee) — डॉ. राजेंद्र प्रसाद
- रियासतों से वार्ता समिति — जवाहरलाल नेहरू
- प्रारूप समिति (Drafting Committee) — डॉ. बी. आर. आंबेडकर
सारणी 2: संविधान सभा के सत्र
- पहला — 9–23 दिसंबर 1946 — अध्यक्ष चुनाव, नियम, उद्देश्य प्रस्ताव पर बहस आरंभ
- दूसरा — 20–25 जनवरी 1947 — उद्देश्य प्रस्ताव पारित, सलाहकार समिति का गठन
- तीसरा — 28 अप्रैल – 2 मई 1947 — मौलिक अधिकारों पर अंतरिम रिपोर्ट, संघ शक्तियाँ
- चौथा — 14–31 जुलाई 1947 — संघ संविधान, प्रांतीय संविधान रिपोर्टें, राष्ट्रीय ध्वज (22 जुलाई)
- पाँचवाँ — 14–30 अगस्त 1947 — स्वतंत्रता की मध्यरात्रि बैठक, प्रारूप समिति का गठन (29 अगस्त)
- छठा — 27 जनवरी 1948 — संक्षिप्त सत्र
- सातवाँ — 4 नवंबर 1948 – 8 जनवरी 1949 — प्रारूप संविधान का प्रस्तुतीकरण, प्रथम वाचन, द्वितीय वाचन आरंभ
- आठवाँ — 16 मई – 16 जून 1949 — द्वितीय वाचन जारी
- नौवाँ — 30 जुलाई – 18 सितंबर 1949 — भाषा, आपातकाल, नागरिकता, संपत्ति आदि
- दसवाँ — 6–17 अक्टूबर 1949 — अनुच्छेद 370 (तब 306A) आदि
- ग्यारहवाँ — 14–26 नवंबर 1949 — तृतीय वाचन, संविधान का अंगीकरण
सारणी 3: 26 जनवरी 1950 को लागू मूल संविधान की विशेषताएँ
- अनुच्छेद — 395
- भाग — 22
- अनुसूचियाँ — 8
- शब्द (अंग्रेज़ी मूल) — लगभग 1,45,000 (विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान)
- शासन प्रणाली — संसदीय, ब्रिटिश मॉडल पर
- संघीय ढाँचा — “राज्यों का संघ”, सशक्त केंद्र
- मौलिक अधिकार — 7 श्रेणियाँ (संपत्ति सहित)
- नीति-निदेशक तत्व — भाग 4
- मौलिक कर्तव्य — नहीं थे (1976 में जोड़े गए)
- मताधिकार — सार्वभौमिक वयस्क (21 वर्ष; 1989 से 18 वर्ष)
- राजभाषा — हिंदी (देवनागरी), अंग्रेज़ी 15 वर्ष तक
- आरक्षण — SC/ST के लिए विधायिका में 10 वर्ष
सारणी 4: भारतीय संविधान में अन्य देशों से लिए गए तत्व
- भारत सरकार अधिनियम 1935 — संघीय ढाँचा, राज्यपाल का पद, लोक सेवा आयोग, आपातकालीन प्रावधान, प्रशासनिक विवरण
- ब्रिटेन — संसदीय शासन, विधि का शासन, एकल नागरिकता, मंत्रिमंडल प्रणाली, द्विसदनीयता, रिट
- अमेरिका — मौलिक अधिकार, न्यायिक समीक्षा, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, राष्ट्रपति पर महाभियोग, उपराष्ट्रपति
- आयरलैंड — नीति-निदेशक तत्व, राज्यसभा में मनोनयन, राष्ट्रपति के चुनाव की पद्धति
- कनाडा — सशक्त केंद्र वाला संघ, अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र को, राज्यपाल की नियुक्ति
- ऑस्ट्रेलिया — समवर्ती सूची, व्यापार-वाणिज्य की स्वतंत्रता, संयुक्त बैठक
- जर्मनी (वाइमर) — आपातकाल में मौलिक अधिकारों का निलंबन
- सोवियत संघ — (बाद में) मौलिक कर्तव्य; प्रस्तावना में न्याय के आदर्श
- फ्रांस — गणराज्य, स्वतंत्रता-समानता-बंधुता का आदर्श
- दक्षिण अफ्रीका — संविधान संशोधन प्रक्रिया, राज्यसभा सदस्यों का चुनाव
- जापान — विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया
सारणी 5: संविधान-निर्माण की समयरेखा
- 1895 — स्वराज विधेयक
- 1928 — नेहरू रिपोर्ट
- 31 दिसंबर 1929 — लाहौर में पूर्ण स्वराज प्रस्ताव
- 26 जनवरी 1930 — पहला “पूर्ण स्वराज दिवस”
- 1931 — कराची प्रस्ताव (मौलिक अधिकार और आर्थिक नीति)
- 1934 — एम. एन. रॉय द्वारा संविधान सभा का विचार; कांग्रेस की औपचारिक माँग
- 1935 — भारत सरकार अधिनियम
- अगस्त 1940 — अगस्त प्रस्ताव
- मार्च 1942 — क्रिप्स मिशन
- 16 मई 1946 — कैबिनेट मिशन योजना
- जुलाई-अगस्त 1946 — संविधान सभा के चुनाव
- 9 दिसंबर 1946 — पहली बैठक; सच्चिदानंद सिन्हा अस्थायी अध्यक्ष
- 11 दिसंबर 1946 — राजेंद्र प्रसाद स्थायी अध्यक्ष
- 13 दिसंबर 1946 — नेहरू द्वारा उद्देश्य प्रस्ताव
- 22 जनवरी 1947 — उद्देश्य प्रस्ताव पारित
- 29 अप्रैल 1947 — अस्पृश्यता उन्मूलन का सिद्धांत स्वीकृत
- 3 जून 1947 — माउंटबेटन योजना (विभाजन)
- 22 जुलाई 1947 — राष्ट्रीय ध्वज अपनाया
- 14-15 अगस्त 1947 — मध्यरात्रि सत्र; स्वतंत्रता
- 29 अगस्त 1947 — प्रारूप समिति का गठन
- अक्टूबर 1947 — बी. एन. राव का प्रारंभिक प्रारूप
- 26-27 अक्टूबर 1947 — जम्मू-कश्मीर का विलय
- 30 जनवरी 1948 — गांधीजी की हत्या
- 21 फरवरी 1948 — प्रारूप संविधान प्रस्तुत/प्रकाशित
- 4 नवंबर 1948 — प्रथम वाचन; आंबेडकर का भाषण
- 15 नवंबर 1948 — द्वितीय वाचन आरंभ
- 23 नवंबर 1948 — समान नागरिक संहिता पर बहस
- 29 नवंबर 1948 — अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता) स्वीकृत
- 9 दिसंबर 1948 — अनुच्छेद 32—“संविधान का हृदय”
- 16-17 मई 1949 — राष्ट्रमंडल सदस्यता पर प्रस्ताव
- 25–26 मई 1949 — धार्मिक अल्पसंख्यक आरक्षण समाप्त करने का प्रस्ताव स्वीकृत (26 मई)
- जून 1949 — निर्वाचन आयोग; जम्मू-कश्मीर के सदस्य शामिल
- अगस्त 1949 — आपातकालीन प्रावधान; नागरिकता
- 14 सितंबर 1949 — राजभाषा पर निर्णय (हिंदी दिवस)
- 18 सितंबर 1949 — “भारत, अर्थात इंडिया”
- 17 अक्टूबर 1949 — अनुच्छेद 370 और प्रस्तावना स्वीकृत
- 17 नवंबर 1949 — तृतीय वाचन आरंभ
- 25 नवंबर 1949 — आंबेडकर का समापन भाषण
- 26 नवंबर 1949 — संविधान अंगीकृत (संविधान दिवस)
- 24 जनवरी 1950 — अंतिम बैठक; तीन प्रतियों पर हस्ताक्षर; अध्यक्ष का राष्ट्रगान संबंधी वक्तव्य; राजेंद्र प्रसाद निर्विरोध राष्ट्रपति चुने गए
- 26 जनवरी 1950 — संविधान लागू; भारत गणराज्य बना; संविधान सभा अस्थायी संसद के रूप में कार्यरत
- 28 जनवरी 1950 — सुप्रीम कोर्ट का उद्घाटन
सारणी 6: संविधान सभा की प्रमुख बहसें और निर्णय
- देश का नाम — भारत बनाम इंडिया — “भारत, अर्थात इंडिया”
- शासन प्रणाली — संसदीय बनाम अध्यक्षीय — संसदीय
- संघवाद — कमज़ोर बनाम मज़बूत केंद्र — मज़बूत केंद्र, “राज्यों का संघ”
- अनुच्छेद 21 — सम्यक प्रक्रिया बनाम विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया — विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया
- धर्म — “प्रचार” का अधिकार — “प्रचार” रखा गया
- प्रस्तावना — ईश्वर का नाम, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष शब्द — तीनों अस्वीकृत
- भाषा — हिंदी/हिंदुस्तानी/अंग्रेज़ी; अंक — हिंदी (देवनागरी), अंतरराष्ट्रीय अंक, अंग्रेज़ी 15 वर्ष
- अल्पसंख्यक — पृथक निर्वाचन, आरक्षण — पृथक निर्वाचन समाप्त; केवल SC/ST आरक्षण
- संपत्ति — मुआवज़ा और न्यायिक समीक्षा — समझौता सूत्र; ज़मींदारी कानूनों को संरक्षण
- समान नागरिक संहिता — पर्सनल लॉ का संरक्षण — नीति-निदेशक तत्व (अनुच्छेद 44)
- गोवध — मौलिक अधिकार बनाम निदेशक तत्व — निदेशक तत्व (अनुच्छेद 48)
- पंचायत — ग्राम आधारित संविधान — निदेशक तत्व (अनुच्छेद 40)
- आपातकाल — दुरुपयोग का भय — स्वीकृत (अनुच्छेद 352-360)
- राज्यपाल — चुनाव बनाम नियुक्ति — राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति
- न्यायाधीश नियुक्ति — परामर्श बनाम सहमति — परामर्श
- जम्मू-कश्मीर — विशेष स्थिति — अनुच्छेद 370 (अस्थायी)
- राष्ट्रमंडल — गणराज्य और सदस्यता — सदस्यता जारी (लंदन घोषणा)
- मताधिकार — सीमित बनाम सार्वभौमिक — सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार
तथ्य-जाँच में जोड़े गए प्राथमिक स्रोत
संविधान सभा की कार्यवाही, 24 जनवरी 1950 — राष्ट्रगान संबंधी अध्यक्षीय वक्तव्य, राष्ट्रपति का निर्विरोध निर्वाचन और संविधान की तीन प्रतियों पर हस्ताक्षर।
संविधान सभा की कार्यवाही, 25–26 मई 1949 — धार्मिक अल्पसंख्यकों के विधायी आरक्षण पर बहस और 26 मई को प्रस्ताव का पारित होना।
संविधान सभा की कार्यवाही, 25 नवंबर 1949 — 7,635 संशोधनों में से 2,473 सदन में आगे बढ़ाए जाने तथा प्रारूप पर 114 दिनों के विचार का विवरण।
भारत का मूल संविधान, अनुच्छेद 379 और 394 — अस्थायी संसद की व्यवस्था और संविधान के लागू होने की तारीख।
भारत का संविधान, 1950 की पहली अनुसूची — भाग ख और भाग ग के राज्यों का मूल वर्गीकरण।
‘First Republic Day in Delhi and First President of India’, Fauji Akhbar, 4 फरवरी 1950 का विवरण — गणराज्य उद्घोषणा के समय का समकालीन प्रकाशित विवरण।