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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–007Evidence Before Opinion · Verified Edition

भारत में सांप्रदायिक दंगे

1946 से 2020 तक—प्रमुख घटनाओं का व्यापक, स्रोत-आधारित इतिहास

यह अध्ययन मृत्यु-संख्या की प्रतियोगिता या किसी समुदाय पर सामूहिक दोषारोपण नहीं है। इसका उद्देश्य यह समझना है कि अफवाह, धार्मिक–राजनीतिक लामबंदी, प्रशासनिक विफलता और कमजोर न्यायिक परिणाम किस प्रकार स्थानीय सांप्रदायिक तनाव को व्यापक हिंसा में बदलते हैं।

प्रस्तुति Omkar Chaudhary / OCN Research Deskअवधि 1946–2020दायरा-संशोधित संस्करण 25 जुलाई 2026
दायरा और पद्धति

केवल सांप्रदायिक दंगे—तथ्य और स्रोत सहित

आधुनिक भारत और उपमहाद्वीप में स्वतंत्रता से पहले तथा उसके बाद हजारों छोटे-बड़े सांप्रदायिक तनाव दर्ज हुए हैं। इस पृष्ठ में राष्ट्रीय या क्षेत्रीय इतिहास पर स्थायी प्रभाव डालने वाली प्रमुख सांप्रदायिक घटनाएँ, उनके प्रभावित स्थान और उपलब्ध आयोगीय, न्यायिक, संसदीय, सरकारी तथा शोध-स्रोत शामिल किए गए हैं। जातीय, भाषायी, जनजातीय या जाति-आधारित संघर्ष इस अध्याय के दायरे से बाहर हैं। जहाँ किसी सांप्रदायिक दंगे के भीतर लक्षित हत्या या हिरासत-अपराध की स्वतंत्र न्यायिक स्थिति है, उसे उसी घटनाक्रम में स्पष्ट रूप से अलग बताया गया है।

01प्रमाणित तथ्य

सरकार और न्यायालय

संसदीय उत्तर, आयोग रिपोर्ट, न्यायिक निर्णय और राज्य के आधिकारिक दस्तावेज प्राथमिक आधार हैं।

02स्रोत-भेद

आँकड़ों में मतभेद

आधिकारिक संख्या, शोध-अनुमान और मानवाधिकार रिपोर्ट को एक-दूसरे में नहीं मिलाया गया है।

03तटस्थ भाषा

आरोप बनाम निष्कर्ष

राजनीतिक आरोप, आयोगीय निष्कर्ष और अंतिम न्यायिक निर्णय अलग-अलग स्तर पर प्रस्तुत हैं।

महत्वपूर्ण संपादकीय टिप्पणी

“दंगा”, “नरसंहार”, “पोग्रोम” और “लक्षित हिंसा” समानार्थी कानूनी शब्द नहीं हैं। अध्याय का विषय सांप्रदायिक हिंसा है; किसी घटना के लिए अधिक विशिष्ट शब्द केवल आयोगीय, न्यायिक या पर्याप्त ऐतिहासिक आधार होने पर ही प्रयुक्त किया गया है।

क्रमबद्ध अध्ययन

प्रमुख घटनाएँ, स्थान, प्रमाणित तथ्य और स्रोत-सीमाएँ

हर प्रविष्टि में प्रभावित शहरों, जिलों या गाँवों के नाम, घटना का संक्षिप्त पुनर्निर्माण, आयोगीय या न्यायिक स्थिति और वह तथ्य दिया गया है जिसे इतिहास लेखन में अलग से याद रखना आवश्यक है।

01 · कलकत्ता · बंगाल

ग्रेट कलकत्ता किलिंग

मुस्लिम लीग द्वारा 16 अगस्त 1946 को घोषित ‘प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस’ और आम हड़ताल के बीच कलकत्ता में हिंदू–मुस्लिम झड़पें कुछ ही घंटों में व्यापक हत्या, लूट और आगजनी में बदल गईं। बड़ाबाजार, हैरिसन रोड, सीलदह, मानिकतला, पार्क सर्कस और शहर के दूसरे हिस्से हिंसा से प्रभावित हुए। दोनों समुदायों के नागरिक मारे गए और बेघर हुए।

ब्रिटिश सैन्य अभिलेख बताते हैं कि उत्तर कलकत्ता में सुबह से ही पथराव और झड़पें फैल चुकी थीं तथा नागरिक प्रशासन तेजी से नियंत्रण खो रहा था। मृतकों की संख्या पर अलग-अलग अनुमान हैं—लगभग चार हजार से दस हजार तक—इसलिए इसे निर्विवाद आधिकारिक संख्या के रूप में नहीं लिखा जा सकता।

मुख्य तथ्य

कलकत्ता की हिंसा ने संवैधानिक सत्ता-साझेदारी के विवाद को जन-स्तर के भय और प्रतिशोध में बदल दिया तथा 1946–47 की हिंसक शृंखला का निर्णायक आरंभ बनी।

02 · पूर्वी बंगाल · वर्तमान बांग्लादेश

नोआखाली–टिप्पेरा हिंसा

कोजागरी लक्ष्मी पूजा के समय नोआखाली जिले के रामगंज क्षेत्र से शुरू हुई मुस्लिम भीड़ों की हिंसा रायपुर, लक्ष्मीपुर, बेगमगंज और संद्वीप तक फैल गई। निकटवर्ती टिप्पेरा जिले के हाजीगंज, फरीदगंज, चाँदपुर, लाकसाम और चौद्दग्राम भी प्रभावित हुए। हिंदू परिवारों की हत्या, लूट, घरों में आग, महिलाओं के अपहरण और जबरन धर्मांतरण की घटनाएँ दर्ज हुईं।

ग्रामीण इलाका विस्तृत और संचार-व्यवस्था कमजोर होने के कारण मृत्यु-संख्या पर गहरा मतभेद है। आधिकारिक अभिलेखों और बाद के अध्ययनों के आँकड़े एक समान नहीं हैं। महात्मा गांधी नवंबर 1946 में क्षेत्र पहुँचे और मार्च 1947 तक गाँवों में रहकर सुरक्षा, वापसी और सांप्रदायिक विश्वास बहाली का प्रयास करते रहे।

मुख्य तथ्य

नोआखाली केवल एक शहर का दंगा नहीं था; यह दूर-दराज के गाँवों में फैली लक्षित हिंसा, विस्थापन और सामाजिक दबाव का संकट था।

03 · सारण · पटना · मुंगेर · भागलपुर

बिहार की व्यापक ग्रामीण हिंसा

नोआखाली के समाचार और बढ़ा-चढ़ाकर फैली अफवाहों के बाद छपरा तथा सारण के ग्रामीण क्षेत्रों में मुसलमानों पर हमले शुरू हुए। हिंसा शीघ्र ही पटना, मुंगेर और भागलपुर जिलों के अनेक गाँवों तक फैल गई। बस्तियों को जलाया गया, ग्रामीणों की हत्या हुई और हजारों लोगों को सुरक्षा शिविरों या दूसरे क्षेत्रों में जाना पड़ा।

बिहार के मृतकों को लेकर समकालीन सरकारी वक्तव्यों, कांग्रेस, मुस्लिम लीग और समाचार-पत्रों के अनुमान बहुत अलग थे। ब्रिटिश संसद में बाद में लगभग पाँच हजार मृत्यु का आँकड़ा दिया गया, जबकि अन्य अनुमान इससे कम और अधिक दोनों हैं; इस मतभेद को छिपाकर किसी एक संख्या को अंतिम मानना उचित नहीं है।

मुख्य तथ्य

बिहार की हिंसा बताती है कि दूसरे प्रांत की घटना से जुड़ी अफवाह और प्रतिशोध की भाषा किस प्रकार दूर-दूर बसे ग्रामीण समुदायों को निशाना बना सकती है।

04 · गढ़मुक्तेश्वर · तत्कालीन संयुक्त प्रांत

गढ़मुक्तेश्वर का कार्तिक मेला और हिंसा

गंगा तट पर लगने वाले विशाल कार्तिक मेले में बिहार और नोआखाली की हिंसा से जुड़ी उत्तेजक खबरें तथा अफवाहें पहुँच चुकी थीं। स्थानीय विवाद के बाद मेले में आए समूहों ने मुस्लिम दुकानदारों, यात्रियों और आसपास के निवासियों पर हमले किए। हिंसा केवल मेला-क्षेत्र तक सीमित नहीं रही; गढ़मुक्तेश्वर कस्बे और आसपास की मुस्लिम बस्तियाँ भी प्रभावित हुईं।

हताहतों की संख्या पर समकालीन रिपोर्टें एकमत नहीं हैं और बाद के अध्ययनों में भी अलग अनुमान मिलते हैं। पुलिस और प्रशासन पर हिंसा की आशंका के बावजूद पर्याप्त तैयारी न करने तथा निर्णायक समय पर भीड़ को रोकने में विफल रहने के आरोप लगे।

मुख्य तथ्य

गढ़मुक्तेश्वर 1946 विभाजन-पूर्व हिंसा की शृंखला की अनिवार्य कड़ी है—यह दिखाता है कि तीर्थ-मेला, दूरस्थ घटनाओं की अफवाह और प्रतिशोधी लामबंदी व्यापक सामूहिक हिंसा की स्थिति बना सकते हैं।

05 · रावलपिंडी · अटक · झेलम

रावलपिंडी डिवीजन के गाँव

पंजाब में खिजर हयात तिवाना मंत्रालय के पतन और लाहौर–अमृतसर के तनाव के बाद रावलपिंडी डिवीजन के ग्रामीण क्षेत्रों में हिंदू और विशेषकर सिख आबादी पर बड़े हमले हुए। थोआ खालसा, चोआ खालसा, धमाली और आसपास के अनेक गाँवों में हत्या, आगजनी, लूट, अपहरण और यौन हिंसा दर्ज हुई; कई गाँवों की आबादी को सैन्य सुरक्षा में निकालना पड़ा।

थोआ खालसा में घिरी सिख महिलाओं और बच्चों के कुएँ में कूदने की घटना विभाजन-स्मृति का प्रमुख प्रतीक बनी। आधिकारिक और समुदाय-आधारित मृत्यु-अनुमान अलग हैं; इसलिए पूरे डिवीजन के लिए किसी एक संख्या को अंतिम नहीं माना गया है।

मुख्य तथ्य

रावलपिंडी की ग्रामीण हिंसा ने पूर्वी पंजाब में सिख और हिंदू समुदायों के भय तथा बाद की प्रतिशोधी लामबंदी को गहरा किया।

06 · पश्चिमी और पूर्वी पंजाब

लाहौर, अमृतसर और विभाजित पंजाब

मार्च 1947 में लाहौर, अमृतसर और मुल्तान में टकराव के बाद हिंसा दोनों ओर के शहरों और गाँवों में फैलती गई। अगस्त में सत्ता हस्तांतरण और रैडक्लिफ सीमा की घोषणा के आसपास लाहौर, अमृतसर, शेखुपुरा, गुजरांवाला, सियालकोट, लायलपुर, जालंधर और गुरदासपुर सहित व्यापक क्षेत्र में हिंदू, मुस्लिम और सिख आबादी अलग-अलग स्थानों पर हमलों तथा प्रतिशोध की शिकार बनी।

सशस्त्र जत्थों ने गाँवों, शरणार्थी काफिलों और रेल यात्रियों को निशाना बनाया। हत्या, आगजनी, अपहरण और यौन हिंसा के साथ पश्चिमी पंजाब से हिंदू–सिख और पूर्वी पंजाब से मुस्लिम आबादी का लगभग पूर्ण सामुदायिक निष्कासन हुआ। अलग-अलग इलाकों में पीड़ित और हमलावर समुदाय बदलते रहे।

मुख्य तथ्य

पंजाब 1947 को एक घटना या एकतरफा अपराध के रूप में नहीं, बल्कि प्रशासनिक विघटन, सीमा-निर्धारण, संगठित जत्थों और दोतरफा सामूहिक निष्कासन की क्षेत्रीय प्रक्रिया के रूप में पढ़ना चाहिए।

07 · पुरानी दिल्ली · करोल बाग · पहाड़गंज · सब्जी मंडी

दिल्ली: हिंसा, शरणार्थी और पलायन

पश्चिमी पंजाब से हिंदू और सिख शरणार्थियों के विशाल आगमन, वहाँ की हिंसा के प्रत्यक्ष अनुभव और लगातार अफवाहों के बीच सितंबर 1947 में दिल्ली के मुसलमानों पर हमले तेज हुए। पुरानी दिल्ली, करोल बाग, पहाड़गंज, सब्जी मंडी और आसपास के क्षेत्रों में हत्या, लूट तथा मकानों और धार्मिक स्थलों पर कब्जे की घटनाएँ हुईं।

हजारों मुस्लिम नागरिकों ने पुराना किला, हुमायूँ का मकबरा और अन्य शिविरों में शरण ली; बड़ी संख्या में लोग पाकिस्तान चले गए। इसी समय दिल्ली पंजाब से आए विस्थापित परिवारों के पुनर्वास का सबसे बड़ा केंद्र बनी। गांधी ने जनवरी 1948 में उपवास के दौरान दिल्ली में मुसलमानों की सुरक्षा, धार्मिक स्थलों की वापसी और सांप्रदायिक शांति पर जोर दिया।

मुख्य तथ्य

दिल्ली में हिंसा और पुनर्वास साथ-साथ चले: एक समुदाय का आगमन और दूसरे का बड़े पैमाने पर प्रस्थान शहर की आबादी, संपत्ति और मुहल्लों की संरचना को स्थायी रूप से बदल गया।

08 · भारतीय उपमहाद्वीप

विभाजन की हिंसा: आँकड़े और स्रोत-सीमाएँ

कलकत्ता, नोआखाली–टिप्पेरा, बिहार और गढ़मुक्तेश्वर से शुरू हुई हिंसक शृंखला 1947 में रावलपिंडी, लाहौर, अमृतसर, पंजाब के गाँवों, शरणार्थी काफिलों, रेल मार्गों और दिल्ली तक पहुँची। घटनाओं के कारण, स्थानीय सत्ता-संबंध और पीड़ित समुदाय हर क्षेत्र में एक जैसे नहीं थे।

विभाजन की कुल मृत्यु-संख्या का कोई निर्विवाद आधिकारिक आँकड़ा उपलब्ध नहीं है। अलग-अलग अध्ययनों में लगभग दो लाख से बीस लाख तक के अनुमान मिलते हैं; करीब डेढ़ करोड़ लोगों के विस्थापन पर अधिक व्यापक सहमति है। इसलिए किसी एक अनुमान को अंतिम तथ्य मानना उचित नहीं है।

मुख्य तथ्य

1946–48 को दंगों की असंबद्ध सूची नहीं, बल्कि सत्ता हस्तांतरण, सीमा-निर्धारण, प्रशासनिक विघटन, प्रतिशोध और दोतरफा सामूहिक विस्थापन से जुड़ी उपमहाद्वीपीय प्रक्रिया के रूप में पढ़ना चाहिए।

09 · हैदराबाद रियासत · बीदर · गुलबर्गा · उस्मानाबाद · नांदेड़

हैदराबाद राज्य का सैन्य एकीकरण और उसके बाद की हिंसा

भारतीय सेना की ‘पुलिस कार्रवाई’ के पहले रज़ाकारों और निजाम-विरोधी समूहों के बीच हिंसा, दमन और ग्रामीण संघर्ष चल रहे थे। सितंबर 1948 में सैन्य कार्रवाई के बाद बीदर, गुलबर्गा, उस्मानाबाद और नांदेड़ सहित रियासत के कुछ जिलों में मुसलमानों के विरुद्ध बड़े प्रतिशोधी हमले हुए।

पंडित सुंदरलाल के नेतृत्व वाले तथ्य-अन्वेषण दल ने व्यापक हत्याओं का अनुमान दिया, लेकिन रिपोर्ट लंबे समय तक सार्वजनिक सरकारी प्रकाशन नहीं बनी। मृत्यु-संख्या पर आज भी मतभेद है; इसलिए इसे निश्चित आधिकारिक आँकड़े की तरह प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।

मुख्य तथ्य

हैदराबाद 1948 में रज़ाकार हिंसा, राज्य-दमन, सैन्य एकीकरण और कार्रवाई के बाद की प्रतिशोधी हिंसा—चारों परतों को अलग-अलग दर्ज करना आवश्यक है।

10 · कलकत्ता · हावड़ा · 24-परगना · असम–पूर्वी पाकिस्तान सीमा

बंगाल संकट, सीमापार पलायन और नेहरू–लियाकत समझौता

पूर्वी पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर हमलों और उसके बाद बड़े पैमाने पर सीमा-पार पलायन ने पश्चिम बंगाल और असम में भय तथा प्रतिशोध का वातावरण बनाया। कलकत्ता–हावड़ा, 24-परगना और सीमावर्ती क्षेत्रों में सांप्रदायिक हिंसा, लूट, आगजनी और आबादी के विस्थापन की घटनाएँ हुईं; दूसरी ओर भारत से भी मुस्लिम परिवार पूर्वी पाकिस्तान गए। अलग-अलग क्षेत्रों की मृत्यु-संख्या और पलायन के आँकड़े स्रोतों में एक समान नहीं हैं।

8 अप्रैल 1950 के नेहरू–लियाकत समझौते में भारत और पाकिस्तान ने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, नागरिक अधिकार, संपत्ति की वापसी, अपहृत महिलाओं की बरामदगी और शरणार्थियों की वापसी के लिए संस्थागत उपाय स्वीकार किए। इसलिए 1950 का संकट केवल स्थानीय दंगों की सूची नहीं, बल्कि विभाजन के बाद भी जारी अल्पसंख्यक असुरक्षा और दोनों देशों के बीच औपचारिक संरक्षण-व्यवस्था की पृष्ठभूमि है।

मुख्य तथ्य

1950 की हिंसा और पलायन ने दिखाया कि 1947 में सीमा बनने के बाद भी बंगाल में विभाजन की मानवीय प्रक्रिया समाप्त नहीं हुई थी।

11 · मध्य प्रदेश

जबलपुर और आसपास के जिले

एक युवती की मृत्यु और उससे जुड़ी सनसनीखेज खबर के बाद छात्र जुलूस, अफवाह, प्रतिद्वंद्वी भीड़ों और स्थानीय झड़पों ने हिंसा को सांप्रदायिक रूप दिया। जबलपुर से तनाव सागर, दमोह और नरसिंहपुर तक पहुँचा।

न्यायमूर्ति शिवदयाल श्रीवास्तव आयोग ने सनसनीखेज समाचार-प्रस्तुति, अफवाह रोकने में विफलता, पुलिस बल की कमी और शांति समितियों की निष्क्रियता को महत्वपूर्ण कारक माना। आयोग के अनुसार अलग-अलग जिलों में हताहत और संपत्ति-क्षति का स्वरूप भिन्न था।

मुख्य तथ्य

जबलपुर प्रकरण दिखाता है कि किसी आपराधिक आरोप की अपुष्ट या उत्तेजक प्रस्तुति कैसे पहले से मौजूद अविश्वास को सामूहिक हिंसा में बदल सकती है।

12 · कलकत्ता · 24-परगना · नदिया · राउरकेला · जमशेदपुर

पूर्वी भारत की परस्पर जुड़ी हिंसा

हजरतबल से पवित्र अवशेष गायब होने और पूर्वी पाकिस्तान में हुई हिंसा की खबरों के बाद जनवरी 1964 में कलकत्ता, 24-परगना और नदिया में हत्या, आगजनी और लूट की घटनाएँ हुईं। मार्च में पूर्वी पाकिस्तान से आने वाली ट्रेनों और शरणार्थियों के प्रत्यक्ष विवरणों तथा अफवाहों ने बिहार, ओडिशा और मध्य प्रदेश के औद्योगिक क्षेत्रों में तनाव बढ़ाया।

केंद्रीय गृह मंत्रालय की 1964–65 वार्षिक रिपोर्ट ने राउरकेला और जमशेदपुर को गंभीर रूप से प्रभावित औद्योगिक क्षेत्र बताया। राउरकेला के आसपास के इलाकों, जमशेदपुर और रेल मार्गों से जुड़े कस्बों में हिंसा तथा विस्थापन हुआ। अलग-अलग अध्ययनों में मृतकों के आँकड़े बहुत भिन्न हैं; आधिकारिक वार्षिक रिपोर्ट कारण-श्रृंखला और प्रभावित क्षेत्रों की पुष्टि करती है, पर एक अंतिम समेकित मृत्यु-संख्या नहीं देती।

मुख्य तथ्य

1964 की घटनाएँ एक शहर का दंगा नहीं थीं; सीमापार समाचार, शरणार्थी रेल-मार्ग और औद्योगिक नगरों की असुरक्षा ने कई राज्यों को जोड़ने वाली हिंसक शृंखला बनाई।

13 · तत्कालीन बिहार · वर्तमान झारखंड

रांची–हटिया सांप्रदायिक हिंसा

रघुबर दयाल आयोग ने विभाजन और 1965 के भारत–पाक युद्ध के बाद गहरे हुए अविश्वास, स्थानीय आपराधिक गुटों, छात्र–टैक्सी विवादों और परस्पर विरोधी अफवाहों को हिंसा की पृष्ठभूमि माना।

आयोग ने पाया कि पुलिस ने समय रहते निवारक कार्रवाई नहीं की और राज्य स्तर पर कानून-व्यवस्था में गिरावट की चेतावनियों को पर्याप्त गंभीरता नहीं मिली। उसने स्थायी शांति समितियों, जिम्मेदार सार्वजनिक भाषा और संवेदनशील अवसरों पर अग्रिम प्रशासनिक तैयारी की सिफारिश की।

मुख्य तथ्य

आयोगीय निष्कर्ष राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि आधिकारिक जाँच का सार हैं; इन्हें घटना के तात्कालिक कारणों से अलग पढ़ना चाहिए।

14 · अहमदाबाद · वडोदरा · मेहसाणा · गुजरात के अन्य जिले

अहमदाबाद और गुजरात के अन्य क्षेत्र

जगन्नाथ मंदिर के निकट उर्स के दौरान गायों के बिदकने, साधुओं पर हमले और उसके बाद पथराव से शुरू हुआ तनाव अहमदाबाद के बड़े हिस्से में फैल गया। धार्मिक जुलूस, उत्तेजक भाषण, अफवाह और प्रशासनिक कमजोरी ने हिंसा को बढ़ाया।

न्यायमूर्ति पी. जगनमोहन रेड्डी आयोग ने तात्कालिक घटना के साथ पुलिस और प्रशासन की तैयारियों, सांप्रदायिक प्रचार तथा स्थानीय संगठनों की भूमिका की समीक्षा की। मृत्यु-संख्या के विभिन्न प्रकाशनों में अंतर है; इस पृष्ठ पर आयोगीय कारणों को प्राथमिकता दी गई है।

मुख्य तथ्य

1969 की हिंसा स्वतंत्र भारत में बड़े शहरी सांप्रदायिक दंगों के अध्ययन का निर्णायक उदाहरण बनी।

15 · महाराष्ट्र

भिवंडी–जलगाँव–महाड

धार्मिक जुलूस के मार्ग, पहले से बढ़ते तनाव और स्थानीय टकराव ने भिवंडी में हिंसा को जन्म दिया; उसके समाचार और अतिरंजित अफवाहें जलगाँव तथा अन्य स्थानों तक पहुँचीं।

न्यायमूर्ति डी.पी. मदान आयोग ने प्रशासनिक तैयारी की कमी, महत्वपूर्ण घंटों में वरिष्ठ अधिकारियों की अनुपस्थिति, उत्तेजक प्रचार पर कार्रवाई न करने और दंगाइयों को रोकने में पुलिस की विफलता पर गंभीर टिप्पणियाँ कीं।

मुख्य तथ्य

भिवंडी–जलगाँव का आयोगीय रिकॉर्ड बताता है कि जुलूस-प्रबंधन, अफवाह-नियंत्रण और प्रारंभिक पुलिस प्रतिक्रिया हिंसा के विस्तार को रोकने में निर्णायक होते हैं।

16 · जमशेदपुर · मानगो · डिमना बस्ती

जमशेदपुर का रामनवमी जुलूस और हिंसा

डिमना बस्ती अखाड़े के रामनवमी जुलूस को मानगो थाना क्षेत्र के विवादित मार्ग से निकालने की माँग कई दिनों से तनाव का कारण थी। प्रशासन ने मार्ग की अनुमति नहीं दी थी, पर पर्चों और सार्वजनिक आह्वान के जरिए जुलूस को उसी रास्ते से ले जाने की लामबंदी हुई। 11 अप्रैल को जुलूस रुकने और बड़ी भीड़ जमा होने के बाद हिंसा, आगजनी, लूट और हत्या शहर तथा आसपास के क्षेत्रों में फैल गई।

न्यायमूर्ति जितेंद्र नारायण आयोग ने विवादित मार्ग, उत्तेजक पर्चे, स्थानीय राजनीतिक हस्तक्षेप और प्रशासन को चुनौती देने वाली लामबंदी को घटनाक्रम में महत्वपूर्ण माना। आयोग ने यह भी जाँचा कि हिंसा की आशंका पहले से थी और निवारक प्रशासनिक उपाय पर्याप्त थे या नहीं।

मुख्य तथ्य

जमशेदपुर 1979 धार्मिक जुलूस के मार्ग, राजनीतिक संरक्षण, पूर्व-प्रचार और भीड़-प्रबंधन की संयुक्त विफलता का प्रमुख आयोगीय केस है।

17 · ईदगाह · गलशहीद · असालतपुरा · मुरादाबाद

मुरादाबाद हिंसा

ईदगाह में नमाज के दौरान सूअर घुसने और उसे हटाने को लेकर पुलिस से विवाद के बाद पथराव, भगदड़ और पुलिस फायरिंग हुई। इसके बाद हिंसा शहर और जिले के दूसरे हिस्सों तक फैली।

न्यायमूर्ति एम.पी. सक्सेना आयोग की 496 पृष्ठ की रिपोर्ट 1983 में सरकार को दी गई, लेकिन अगस्त 2023 में उत्तर प्रदेश विधानसभा में रखी गई। रिपोर्ट ने 83 मौतें दर्ज कीं और आरएसएस, भाजपा तथा स्थानीय वाल्मीकि समुदाय की संस्थागत भूमिका के आरोप स्वीकार नहीं किए; उसने मुस्लिम लीग नेता डॉ. शमीम अहमद और समर्थकों को प्रमुख रूप से जिम्मेदार ठहराया। यह आयोग का निष्कर्ष है, सर्वसम्मत इतिहासलेखन नहीं।

मुख्य तथ्य

मुरादाबाद पर लंबे समय तक प्रचलित कथाओं और 2023 में सार्वजनिक हुए आयोगीय निष्कर्षों को स्पष्ट रूप से अलग रखना चाहिए।

18 · दिल्ली · कानपुर · बोकारो · चास · भारत के अन्य शहर

सिख-विरोधी सामूहिक हिंसा

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके दो सिख अंगरक्षकों द्वारा हत्या के बाद दिल्ली, कानपुर, बोकारो, चास और अनेक शहरों में सिख नागरिकों, घरों, दुकानों और गुरुद्वारों पर हमले हुए। दिल्ली में त्रिलोकपुरी, सुल्तानपुरी, मंगोलपुरी, पालम कॉलोनी और अन्य इलाकों में बड़े पैमाने पर हत्याएँ हुईं। संगठित भीड़ों, मतदाता-सूचियों के दुरुपयोग, पुलिस की निष्क्रियता और राजनीतिक व्यक्तियों की भूमिका के आरोपों की कई समितियों तथा आयोगों ने जाँच की।

गृह मंत्रालय ने आहूजा समिति के आधार पर देशभर में 3,325 और दिल्ली में 2,733 मौतें दर्ज की हैं। न्यायमूर्ति नानावती आयोग ने अनेक मामलों में प्रशासनिक और पुलिस विफलता तथा कुछ राजनीतिक नेताओं के विरुद्ध विश्वसनीय साक्ष्य/जाँच की आवश्यकता पर निष्कर्ष दिए।

मुख्य तथ्य

1984 को तटस्थ शब्दावली में भी उसके लक्षित स्वरूप से अलग नहीं किया जा सकता: हिंसा मुख्यतः सिख समुदाय के विरुद्ध थी।

19 · अहमदाबाद · वडोदरा · गुजरात के अन्य नगर

आरक्षण-विरोधी आंदोलन से सांप्रदायिक हिंसा तक

गुजरात में आरक्षण-विरोधी आंदोलन के दौरान मार्च 1985 से हिंसा, बंद, पथराव और पुलिस टकराव चल रहे थे। अहमदाबाद में 18 मार्च के बंद और दुकानों के खुलने-बंद होने के विवाद के बाद संघर्ष के कई हिस्सों ने सांप्रदायिक रूप ले लिया; जुलाई में नए टकराव के साथ हत्या, आगजनी और लूट फिर बढ़ी। वडोदरा और अन्य नगर भी तनाव से प्रभावित हुए।

न्यायमूर्ति वी.एस. दवे आयोग ने पुलिस की निष्क्रियता, खुफिया जानकारी की कमी, वरिष्ठ–कनिष्ठ स्तरों में कमजोर संचार, मामलों के ठीक से दर्ज और जाँच न होने तथा प्रेस की भूमिका पर टिप्पणियाँ कीं। यह घटना दिखाती है कि किसी अन्य सामाजिक प्रश्न से शुरू आंदोलन भी पहले से मौजूद सांप्रदायिक विभाजन में प्रवेश कर सकता है।

मुख्य तथ्य

इस अध्याय में गुजरात 1985 का केवल वह चरण शामिल है जिसमें आरक्षण-विरोधी आंदोलन सांप्रदायिक हिंसा में बदल गया; मूल आरक्षण-संघर्ष इसका विषय नहीं है।

20 · मेरठ · हाशिमपुरा · मलियाना · मुरादनगर

मेरठ दंगे, हाशिमपुरा और मलियाना

मेरठ में धार्मिक और राजनीतिक तनाव, जुलूसों, अफवाहों तथा स्थानीय झड़पों के बीच अप्रैल–मई 1987 में बार-बार कर्फ्यू और हिंसा हुई। 22 मई को प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी के जवानों ने हाशिमपुरा से मुस्लिम पुरुषों को हिरासत में लिया; उनमें से कई को मुरादनगर की गंग नहर और हिंडन नहर के पास गोली मारकर शव फेंके गए। 23 मई को मलियाना में भी बड़ी संख्या में मुस्लिम नागरिक मारे गए और मकान जले; दोनों घटनाओं की न्यायिक यात्राएँ अलग हैं।

31 अक्टूबर 2018 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाशिमपुरा मामले में 16 पूर्व पीएसी कर्मियों को दोषी ठहराते हुए इसे निहत्थे और निर्दोष लोगों की हिरासत में लक्षित हत्या माना। मलियाना मुकदमे में दशकों बाद 2023 में साक्ष्य और पहचान की कमियों के कारण सभी जीवित आरोपी बरी हुए; इसलिए हाशिमपुरा की दोषसिद्धि को मलियाना का न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।

मुख्य तथ्य

मेरठ 1987 के व्यापक दंगों, हाशिमपुरा की हिरासत-हत्या और मलियाना की सामूहिक हिंसा को एक-दूसरे से जुड़ा, पर कानूनी रूप से स्वतंत्र दर्ज करना आवश्यक है।

21 · भागलपुर · नाथनगर · चंदेरी · लोगाईं · परबत्ती

भागलपुर और ग्रामीण बिहार

रामशिला जुलूस के निकट हमले, पुलिस अधीक्षक की कथित हत्या और विश्वविद्यालय के सैकड़ों छात्रों के मारे जाने जैसी झूठी अफवाहों ने हिंसा को शहर से नाथनगर, परबत्ती और ग्रामीण क्षेत्रों तक फैला दिया। चंदेरी और लोगाईं जैसे गाँवों में सामूहिक हत्याएँ हुईं; लोगाईं में शवों को खेत में दबाकर ऊपर फसल लगाए जाने का मामला बाद में सामने आया।

न्यायमूर्ति रामनंदन प्रसाद आयोग के आधिकारिक सार ने अफवाहों, मीडिया की गैर-जिम्मेदार प्रस्तुति और पुलिस–प्रशासन की विफलता को महत्वपूर्ण माना। मृत्यु-संख्या 982, 1,052 और 1,070 जैसे अलग रूपों में उद्धृत होती है; सत्यापन योग्य एकीकृत नामावली न होने से इस संस्करण में किसी एक संख्या को निर्विवाद अंतिम आँकड़ा नहीं कहा गया है।

मुख्य तथ्य

भागलपुर का प्रमाणित आयोगीय निष्कर्ष यह है कि अफवाहों और प्रशासनिक विफलता ने हिंसा को फैलाया; सटीक कुल मृत्यु-संख्या पर स्रोत-भेद बना हुआ है।

22 · पुराना हैदराबाद · सिकंदराबाद · रंगा रेड्डी

हैदराबाद–सिकंदराबाद और रंगा रेड्डी हिंसा

9 अक्टूबर को एक कुख्यात अपराधी की पुलिस मुठभेड़ में मृत्यु के बाद दक्षिणी हैदराबाद, बोवेनपल्ली और सिकंदराबाद में तनाव तथा हिंसा शुरू हुई। इसी समय रामजन्मभूमि–बाबरी मस्जिद आंदोलन, लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी, प्रतिद्वंद्वी पर्चों और उत्तेजक प्रचार ने वातावरण को और बिगाड़ा। अक्टूबर के उत्तरार्ध से दिसंबर तक हत्या, चाकूबाजी, आगजनी और लूट की घटनाएँ जारी रहीं।

हीरामन सिंह आयोग ने हैदराबाद–सिकंदराबाद और रंगा रेड्डी जिले को अपने दायरे में रखा। आयोग ने अपर्याप्त पुलिस बल, पुराने हथियार, भड़काऊ भाषण, कमजोर खुफिया निगरानी और नियंत्रण-कक्ष की कमियों पर ध्यान दिया; गंभीर चरण में सेना की सहायता ली गई।

मुख्य तथ्य

हैदराबाद 1990 में स्थानीय अपराध, राष्ट्रीय धार्मिक लामबंदी और लंबे समय तक जारी मोहल्ला-आधारित प्रतिशोध एक-दूसरे से जुड़ गए।

23 · भोपाल · उज्जैन · मध्य प्रदेश के अन्य क्षेत्र

बाबरी विध्वंस के बाद मध्य भारत की हिंसा

6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद देश के अनेक नगरों में सांप्रदायिक हिंसा हुई। मध्य प्रदेश में भोपाल और उज्जैन प्रमुख प्रभावित केंद्र थे; हत्या, आगजनी, लूट, कर्फ्यू और पुलिस कार्रवाई दर्ज हुई। गुजरात, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के शहरों में भी तनाव और हिंसा हुई, जबकि मुंबई की दो-चरणीय हिंसा का अलग आयोगीय और न्यायिक इतिहास है।

न्यायमूर्ति के.के. दुबे आयोग ने भोपाल और उज्जैन की घटनाओं की जाँच की और पूर्व-निवारक कार्रवाई, धारा 144, पुलिस तैयारी, संपत्ति-सुरक्षा, राहत और पुनर्वास पर सिफारिशें दीं। अलग-अलग राज्यों की घटनाओं को एक अखिल भारतीय मृत्यु-संख्या में मिलाने के बजाय स्थानीय आधिकारिक अभिलेखों के अनुसार पढ़ना अधिक विश्वसनीय है।

मुख्य तथ्य

बाबरी विध्वंस के बाद की हिंसा केवल मुंबई तक सीमित नहीं थी; भोपाल और उज्जैन सहित अनेक शहर प्रभावित हुए, पर प्रत्येक शहर का घटनाक्रम और उत्तरदायित्व अलग था।

24 · मुंबई · धारावी · बेहरामपाड़ा · जोगेश्वरी · डोंगरी

मुंबई सांप्रदायिक हिंसा

6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद मुंबई में हिंसा दो बड़े चरणों में फैली। हत्या, आगजनी, लूट और पुलिस फायरिंग के साथ जनवरी 1993 का दूसरा चरण अधिक संगठित और घातक रहा। मार्च 1993 के श्रृंखलाबद्ध बम विस्फोट अलग आतंकवादी अपराध थे, यद्यपि उनकी पृष्ठभूमि में दंगों का प्रतिशोध भी जाँच में सामने आया।

न्यायमूर्ति बी.एन. श्रीकृष्ण आयोग ने शिवसेना नेताओं और कार्यकर्ताओं की भूमिका, भड़काऊ प्रचार तथा पुलिस के एक हिस्से में सांप्रदायिक पक्षपात पर विस्तृत निष्कर्ष दिए। आयोग ने यह भी दर्ज किया कि दोनों समुदायों के अपराधियों ने हिंसा की, पर दूसरे चरण में मुस्लिम नागरिकों को अधिक नुकसान हुआ।

मुख्य तथ्य

दंगे और मार्च 1993 के बम विस्फोट कारण-श्रृंखला में जुड़े होने पर भी कानूनी और ऐतिहासिक रूप से अलग घटनाएँ हैं।

25 · गोधरा · अहमदाबाद · वडोदरा · पंचमहल · दाहोद · साबरकांठा

गोधरा और गुजरात की सांप्रदायिक हिंसा

27 फरवरी को गोधरा के निकट साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 डिब्बे में आग से 59 लोगों की मृत्यु हुई। अगले दिन से अहमदाबाद, वडोदरा, पंचमहल, दाहोद, साबरकांठा और अन्य जिलों में बड़े पैमाने पर मुस्लिम नागरिकों, घरों, दुकानों और धार्मिक स्थलों पर हमले हुए; कुछ स्थानों पर हिंदू नागरिक भी मारे गए और मुस्लिम भीड़ों ने प्रतिशोधी हिंसा की।

नरोदा पाटिया और गुलबर्ग सोसाइटी दो अलग सामूहिक हत्या-स्थल थे; उन्हें एक घटना नहीं माना जाना चाहिए। राज्य की आधिकारिक व्यापक संख्या 1,044 मृतक—790 मुस्लिम और 254 हिंदू—के रूप में उद्धृत हुई है। नानावती–मेहता आयोग, सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी वाली एसआईटी और अलग-अलग आपराधिक मुकदमों के निष्कर्षों का दायरा अलग था; किसी एक निर्णय को पूरी हिंसा पर सार्वभौमिक निष्कर्ष नहीं बनाया जा सकता।

मुख्य तथ्य

गोधरा ट्रेन अग्निकांड और उसके बाद की राज्यव्यापी हिंसा अलग अपराध-समूह हैं; दोनों के पीड़ितों और न्यायिक प्रक्रियाओं को स्वतंत्र रूप से दर्ज करना जरूरी है।

26 · मराड बीच · कोझिकोड · केरल

मराड समुद्रतट की लक्षित सामूहिक हत्या

कोझिकोड के मराड समुद्रतट पर 2 मई 2003 की शाम हथियारबंद समूह ने मछुआरों पर हमला किया। नौ लोग मारे गए—आठ हिंदू मछुआरे और हमलावर पक्ष का एक व्यक्ति—तथा कई लोग घायल हुए। यह घटना जनवरी 2002 में उसी क्षेत्र में हुई सांप्रदायिक हिंसा और स्थानीय प्रतिशोध की पृष्ठभूमि में हुई थी।

थॉमस पी. जोसेफ आयोग ने घटना की तैयारी, हथियारों के संग्रह, स्थानीय संगठनों, पुलिस–खुफिया विफलता और हमले के बाद जाँच की समीक्षा की। मराड को सामान्य दोतरफा दंगे के बजाय पूर्ववर्ती तनाव से जुड़ी लक्षित सामूहिक हत्या के रूप में अलग दर्ज करना अधिक सटीक है।

मुख्य तथ्य

मराड 2003 दिखाता है कि असमाधित स्थानीय हिंसा और प्रतिशोध की तैयारी दो समुदायों के बीच सामान्य तनाव से अलग, योजनाबद्ध हमले में बदल सकती है।

27 · कंधमाल · रायकिया · जी. उदयगिरि · टिकाबाली · के. नुआगाँव

कंधमाल हिंसा

23 अगस्त 2008 को स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती और उनके सहयोगियों की हत्या के बाद ईसाई समुदाय के विरुद्ध व्यापक हिंसा फैली। माओवादी संगठन ने हत्या की जिम्मेदारी लेने का दावा किया, पर स्थानीय स्तर पर आरोप ईसाइयों पर डाले गए। घर, चर्च और संस्थाएँ जलाई गईं तथा बड़ी संख्या में लोगों को राहत शिविरों में जाना पड़ा।

सर्वोच्च न्यायालय ने Archbishop Raphael Cheenath प्रकरण में मुआवजा, क्षतिग्रस्त धार्मिक संस्थाओं और आपराधिक मामलों की प्रगति की समीक्षा की। न्यायालय ने मृत्यु, घायल व्यक्तियों और संपत्ति-हानि के लिए दी गई राशि को अपर्याप्त मानते हुए अतिरिक्त भुगतान के निर्देश दिए।

मुख्य तथ्य

कंधमाल में धार्मिक पहचान के साथ भूमि, अनुसूचित जनजाति/जाति स्थिति, धर्मांतरण-विवाद और स्थानीय राजनीतिक लामबंदी एक-दूसरे से जुड़े थे।

28 · कवाल · फुगाना · कुटबा–कुटबी · लिसाढ़ · मुजफ्फरनगर–शामली

मुजफ्फरनगर–शामली हिंसा

27 अगस्त को कवाल गाँव में शाहनवाज, सचिन और गौरव की हत्या के बाद सभाएँ, विवादित कथाएँ और एक पुराना विदेशी वीडियो स्थानीय घटना बताकर फैलाया गया। 7 सितंबर की महापंचायत और लौटते लोगों पर हमलों के बाद हिंसा ग्रामीण क्षेत्रों में फैल गई।

सर्वोच्च न्यायालय ने मार्च 2014 में उत्तर प्रदेश सरकार को प्रारंभिक स्तर पर हिंसा रोकने में प्रथमदृष्टया लापरवाह माना और राजनीतिक संबद्धता की परवाह किए बिना गिरफ्तारी, जाँच, राहत तथा पुनर्वास का निर्देश दिया। व्यापक रूप से उद्धृत आधिकारिक आँकड़ा 62 मृतक—42 मुस्लिम और 20 हिंदू—है; केंद्रीय आँकड़ों के अनुसार 50,955 लोगों ने 58 राहत शिविरों में शरण ली।

मुख्य तथ्य

मुजफ्फरनगर हिंसा का सबसे दीर्घकालीन प्रभाव हजारों परिवारों का स्थायी विस्थापन और जाट–मुस्लिम ग्रामीण सामाजिक गठबंधन का टूटना था।

29 · जाफराबाद · मौजपुर · चाँदबाग · शिव विहार · मुस्तफाबाद

उत्तर-पूर्वी दिल्ली हिंसा

नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरोध और समर्थन में प्रतिद्वंद्वी लामबंदी, जाफराबाद सड़क-अवरोध, राजनीतिक भाषण और पथराव के बाद मौजपुर, चाँदबाग, शिव विहार, मुस्तफाबाद तथा आसपास के क्षेत्रों में हिंसा फैली। हिंदू और मुस्लिम—दोनों समुदायों के लोग मारे गए; मुस्लिम नागरिकों, संपत्तियों और धार्मिक स्थलों की क्षति अनुपाततः अधिक थी।

दिल्ली पुलिस के अनुसार 53 लोगों की मृत्यु और 581 लोग घायल हुए। फरवरी 2026 तक पुलिस ने 758 मामले दर्ज होने, 416 आरोपपत्र दाखिल होने और 2,639 गिरफ्तारियों की जानकारी दी; अनेक मुकदमे अभी लंबित थे। पुलिस की भूमिका पर लगे आरोप, अलग-अलग आपराधिक मामले और ‘व्यापक षड्यंत्र’ का यूएपीए मुकदमा अलग न्यायिक प्रक्रियाएँ हैं—जमानत या अंतरिम आदेश को अंतिम दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता।

मुख्य तथ्य

इस घटना पर सरकारी अभियोजन, पीड़ितों के आरोप, मानवाधिकार रिपोर्ट और अदालतों की केस-विशिष्ट टिप्पणियाँ अलग-अलग स्रोत-श्रेणियाँ हैं।

तुलनात्मक निष्कर्ष

घटनाएँ अलग थीं—पर विफलताओं के कई पैटर्न दोहराए गए

किसी एक सूत्र से हर घटना की व्याख्या नहीं की जा सकती। फिर भी आयोगों और न्यायालयों में कुछ संस्थागत समस्याएँ बार-बार सामने आती हैं।

01अफवाह

गलत सूचना का वेग

जबलपुर, रांची, भागलपुर, मुजफ्फरनगर और उत्तर-पूर्वी दिल्ली में अपुष्ट सूचना ने भय और प्रतिशोध को बढ़ाया।

02प्रशासन

प्रारंभिक प्रतिक्रिया

कई आयोगों ने पहले घंटों की निष्क्रियता, खुफिया विफलता और कमान की अस्पष्टता को निर्णायक माना।

03न्याय

देर और कम दोषसिद्धि

विलंबित जाँच, कमजोर पहचान-साक्ष्य, गवाह-सुरक्षा की कमी और लंबी सुनवाई पीड़ितों के न्याय को प्रभावित करती रही।

प्रमुख स्रोत रजिस्टर

मूल दस्तावेज़ और सत्यापन आधार

यह सूची पृष्ठ के केंद्रीय दावों का आधार है। समाचार स्रोत केवल वहाँ उपयोग किए गए हैं जहाँ हाल का सरकारी/न्यायिक अद्यतन किसी सार्वजनिक मूल दस्तावेज में आसानी से उपलब्ध नहीं था।

A-00 · अभिलेखUK National Archives: कलकत्ता दंगों पर सैन्य रिपोर्ट, 24 अगस्त 1946A-01 · सरकारीगृह मंत्रालय: 29 जाँच आयोगों पर राष्ट्रीय एकता परिषद कार्यसमूह रिपोर्ट (2007)A-01A · संधिविदेश मंत्रालय: नेहरू–लियाकत अल्पसंख्यक संरक्षण समझौता, 8 अप्रैल 1950A-01B · सरकारीगृह मंत्रालय: वार्षिक रिपोर्ट 1964–65—कलकत्ता, राउरकेला और जमशेदपुरA-02 · संसद1984 सिख-विरोधी हिंसा: मृतक संख्या और राहत पर राज्यसभा उत्तर (2015)A-03 · आयोगन्यायमूर्ति नानावती आयोग: 1984 की हिंसा पर रिपोर्टA-03A · न्यायालयदिल्ली उच्च न्यायालय: हाशिमपुरा हिरासत-हत्या पर निर्णय, 31 अक्टूबर 2018A-04 · आयोगगुजरात गृह विभाग: गोधरा और गोधरा-पश्चात हिंसा पर आयोग रिपोर्टA-05 · न्यायालयMohd. Haroon v. Union of India: मुजफ्फरनगर पर सर्वोच्च न्यायालयB-01 · शोधGyanendra Pandey: Remembering Partition—Violence, Nationalism and HistoryB-01A · शोधCambridge University Press: Noakhali Riots, October 1946B-01B · शोधIndian History Congress: विभाजन-हिंसा के आयाम और गढ़मुक्तेश्वरB-01C · शोधCambridge University Press: दिल्ली 1947–48—स्थानीय समाज और विभाजन
OCN Research Standard

इस संस्करण में तथ्य, आरोप और व्याख्या अलग रखे गए हैं। स्रोतों के नए सार्वजनिक होने, न्यायिक निर्णय बदलने या सरकारी आँकड़े अद्यतन होने पर पृष्ठ संशोधित किया जाएगा। किसी समुदाय के अपराधियों की भूमिका को पूरे समुदाय की सामूहिक जिम्मेदारी नहीं माना गया है।