विश्व हिंदू परिषद का उदय और राम जन्मभूमि प्रश्न
संगठित जनांदोलन का उदय
राम जन्मभूमि आंदोलन के आधुनिक संगठित चरण को समझने के लिए विश्व हिंदू परिषद—विश्व हिंदू परिषद—की भूमिका केंद्रीय है। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि विश्व हिंदू परिषद की स्थापना राम मंदिर आंदोलन चलाने के लिए नहीं हुई थी। उसका प्रारंभिक उद्देश्य विश्वभर के हिंदुओं, विभिन्न संप्रदायों, संतों, मठों, अखाड़ों और धार्मिक परंपराओं के बीच समन्वय स्थापित करना था। अयोध्या उसका बाद का प्रमुख अभियान बना।
यही तथ्य आंदोलन की प्रकृति समझने में मदद करता है। राम जन्मभूमि प्रश्न पहले से मौजूद था; न्यायालयों में मुकदमे चल रहे थे; स्थानीय संत सक्रिय थे; रामलला भीतर विराजमान थे। विश्व हिंदू परिषद ने इस मौजूदा धार्मिक-स्मृति को राष्ट्रीय संगठनात्मक संरचना, संत-मंच, यात्राओं, धर्म-संसदों और गांव-स्तर तक पहुंचने वाली अभियान-पद्धति दी। इसी कारण 1980 के दशक में अयोध्या अचानक देशव्यापी मुद्दे के रूप में दिखाई देने लगी।
विश्व हिंदू परिषद की स्थापना 1964 में हुई। इसके गठन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े वरिष्ठ कार्यकर्ताओं, विशेषकर एम. एस. गोलवलकर और एस. एस. आप्टे की महत्वपूर्ण भूमिका रही। प्रारंभिक बैठकों में विभिन्न हिंदू संप्रदायों, संतों और सामाजिक नेताओं को एक साझा मंच पर लाने का प्रयास किया गया।
विश्व हिंदू परिषद का मूल विचार था—
हिंदू समाज अत्यंत विविध है।
उसकी धार्मिक संस्थाएं बिखरी हुई हैं।
देश और विदेश में हिंदू समुदायों को सांस्कृतिक-सामाजिक स्तर पर जोड़ने की आवश्यकता है।
इसलिए यह प्रारंभिक चरण में चुनावी पार्टी नहीं, बल्कि एक धार्मिक-सांस्कृतिक संगठन के रूप में विकसित हुई।
विश्व हिंदू परिषद की उत्पत्ति में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका महत्वपूर्ण थी, लेकिन दोनों संस्थाएं एक नहीं थीं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वयं को सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन के रूप में संगठित करता था।
विश्व हिंदू परिषद का केंद्र संत, धर्माचार्य, मठ, अखाड़े और व्यापक हिंदू धार्मिक समाज था।
इस विभाजन का राजनीतिक महत्व आगे बहुत बढ़ा।
जब राम जन्मभूमि आंदोलन राष्ट्रीय हुआ, तो—
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संगठनात्मक नेटवर्क देता था,
विश्व हिंदू परिषद धार्मिक वैधता और संत नेतृत्व जोड़ती थी,
और बाद में भाजपा चुनावी राजनीतिक मंच बनी।
यही त्रिस्तरीय संरचना आंदोलन की शक्ति का प्रमुख कारण बनी।
1960 और 1970 के दशक में विश्व हिंदू परिषद की प्राथमिकताओं में अयोध्या अकेला या प्रमुख मुद्दा नहीं था।
उसका ध्यान था—
हिंदू धार्मिक सम्मेलन,
धर्माचार्यों के बीच संपर्क,
विदेशों में हिंदू समुदायों से संबंध,
धर्मांतरण,
गो-रक्षा,
तीर्थ और मंदिर संबंधी प्रश्न,
धार्मिक शिक्षा,
और हिंदू पहचान।
इसलिए 1964 से 1980 तक का काल विश्व हिंदू परिषद के लिए संगठनात्मक आधार निर्माण का समय था।
राम जन्मभूमि बाद में इसी आधार पर बड़ी मुहिम बन सकी।
यदि विश्व हिंदू परिषद 1964 में बन चुकी थी तो उसने उसी समय अयोध्या को राष्ट्रीय मुद्दा क्यों नहीं बनाया?
इसके कई कारण थे।
अयोध्या के मुकदमे अदालतों में थे।
रामलला भीतर थे और पूजा जारी थी।
कांग्रेस का राजनीतिक प्रभुत्व अत्यंत मजबूत था।
राष्ट्रीय राजनीति युद्ध, गरीबी, कृषि, औद्योगीकरण और राजनीतिक स्थिरता जैसे प्रश्नों में व्यस्त थी।
और हिंदू धार्मिक संगठनों के सामने अन्य प्राथमिकताएं भी थीं।
इसलिए अयोध्या तत्काल राष्ट्रीय अभियान बनने की स्थिति में नहीं थी।
1970 के दशक तक विश्व हिंदू परिषद ने संत समाज के बीच अपना नेटवर्क बढ़ाया।
उसकी सबसे बड़ी पूंजी कोई चुनावी कैडर नहीं, बल्कि धार्मिक प्रतिष्ठा रखने वाले व्यक्तियों से संबंध था।
यदि किसी अभियान को—
अखाड़े,
महंत,
मठाधीश,
धर्माचार्य,
और तीर्थ-संस्थाएं—
समर्थन दें, तो वह धार्मिक समाज में अधिक वैध दिखाई देता है।
यही भविष्य के राम मंदिर आंदोलन की संरचनात्मक तैयारी थी।
1981 में तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम में बड़ी संख्या में दलितों के इस्लाम धर्म स्वीकार करने की घटना ने हिंदू संगठनों में व्यापक चिंता पैदा की।
विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इसे हिंदू समाज की आंतरिक कमजोरी और संगठनात्मक विखंडन का संकेत माना।
इसके बाद हिंदू एकता, सामाजिक समरसता और धर्मांतरण-विरोध पर अधिक जोर बढ़ा।
इसी बदले हुए वातावरण में अयोध्या जैसा साझा धार्मिक प्रतीक अधिक प्रभावी बन सकता था।
राम केवल किसी एक जाति या क्षेत्र के देवता नहीं थे।
उनका प्रतीक पूरे उत्तर भारत और देश के बड़े हिस्से में व्यापक धार्मिक स्वीकार्यता रखता था।
इसलिए अयोध्या हिंदू एकीकरण के लिए अत्यंत उपयुक्त मुद्दा बन सकती थी।
अयोध्या प्रश्न में विश्व हिंदू परिषद को कई प्रकार की शक्ति दिखाई दी।
पहली—यह अत्यंत पुरानी धार्मिक स्मृति से जुड़ा था।
दूसरी—रामलला पहले से भीतर थे।
तीसरी—ताला और सीमित दर्शन का दृश्यात्मक प्रतीक मौजूद था।
चौथी—अदालतों में मुकदमे दशकों से लंबित थे।
पांचवीं—स्थानीय संत नेतृत्व पहले से सक्रिय था।
छठी—मुद्दा मुस्लिम धार्मिक दावे से सीधे टकराता था।
इन सभी कारणों से अयोध्या एक ऐसा प्रश्न बन सकती थी जिसे केवल धार्मिक प्रवचन से नहीं, संगठित जनांदोलन में बदला जा सके।
आधुनिक राम जन्मभूमि आंदोलन के पुनरुद्धार में दाऊ दयाल खन्ना का नाम विशेष महत्व रखता है।
वे कांग्रेस से जुड़े रहे थे और उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय रहे।
1980 के शुरुआती वर्षों में उन्होंने अयोध्या, मथुरा और काशी के धार्मिक स्थलों की मुक्ति का प्रश्न उठाया।
यह महत्वपूर्ण था क्योंकि यह बताता है कि राम जन्मभूमि प्रश्न का पुनरुद्धार केवल भाजपा या संघ की बंद संरचना से नहीं आया।
कुछ कांग्रेस पृष्ठभूमि वाले नेता भी इसे धार्मिक-सांस्कृतिक मुद्दे के रूप में उठा रहे थे।
1983 में मुज़फ्फरनगर में हिंदू सम्मेलन आयोजित हुआ।
यहीं दाऊ दयाल खन्ना ने राम जन्मभूमि, कृष्ण जन्मभूमि और काशी विश्वनाथ से जुड़े धार्मिक स्थलों का प्रश्न प्रमुख रूप से उठाया।
गुलजारीलाल नंदा सहित कई धार्मिक और सार्वजनिक व्यक्तित्वों की भागीदारी ने इस मंच को राजनीतिक दलों से ऊपर एक धार्मिक-सामाजिक स्वरूप दिया।
यह सम्मेलन इसलिए निर्णायक था क्योंकि उसने अदालत में पड़े अयोध्या विवाद को फिर सार्वजनिक आंदोलन की भाषा में बदलना शुरू किया।
अयोध्या अकेली मांग नहीं थी।
अयोध्या,
मथुरा,
और काशी—
इन तीन स्थलों का संयुक्त संदर्भ लंबे समय तक हिंदू धार्मिक राजनीति में बना रहा।
लेकिन विश्व हिंदू परिषद ने जल्द ही अयोध्या को सबसे प्रभावी और व्यावहारिक अभियान के रूप में प्राथमिकता दी।
इसके कारण स्पष्ट थे—
रामलला भीतर थे,
मामला न्यायालय में था,
स्थानीय संतों का संगठन मजबूत था,
और धार्मिक कथा व्यापक जनभावना से जुड़ती थी।
इसलिए अयोध्या आंदोलन का केंद्र बनी।
विश्व हिंदू परिषद ने स्थानीय धार्मिक प्रश्न को राष्ट्रीय संत-समर्थित अभियान बनाया।
यह परिवर्तन केवल बयान जारी करने से नहीं हुआ।
उसने—
धर्माचार्यों को जोड़ा,
बैठकें आयोजित कीं,
धर्म संसद का मंच बनाया,
यात्राओं की योजना बनाई,
संत समितियां बनाईं,
और बाद में गांव-गांव रामशिला अभियान तक पहुंच बनाई।
यानी आंदोलन को एक multi-layered लामबंदी संरचना मिला।
राम जन्मभूमि आंदोलन के इतिहास में अशोक सिंघल का नाम विश्व हिंदू परिषद की संगठनात्मक क्षमता का प्रतीक बन गया।
वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पृष्ठभूमि से आए और विश्व हिंदू परिषद में धीरे-धीरे केंद्रीय भूमिका में पहुंचे।
उनकी विशेषता थी—
संत समाज से गहरे संबंध,
संगठनात्मक अनुशासन,
सार्वजनिक आंदोलन की समझ,
और धार्मिक भाषा को जन-अभियान में बदलने की क्षमता।
1980 के दशक में राम जन्मभूमि प्रश्न को राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार देने में वे प्रमुख रणनीतिक व्यक्तियों में बने।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक मोरोपंत पिंगले का नाम भी राम मंदिर आंदोलन की रणनीति से जुड़ा मिलता है।
उनकी भूमिका विशेषकर व्यापक जन संपर्क, रामशिला और गांव-स्तरीय संगठनात्मक विस्तार जैसे अभियानों में आगे महत्वपूर्ण हुई।
ऐसे नेताओं की विशेषता यह थी कि वे मंच पर हमेशा सबसे दिखाई देने वाले व्यक्ति नहीं थे, लेकिन पीछे संगठनात्मक संरचना तैयार करते थे।
अयोध्या आंदोलन की सफलता केवल भाषणों से नहीं, ऐसी सूक्ष्म संगठनात्मक तैयारी से भी बनी।
विश्व हिंदू परिषद यह समझती थी कि अयोध्या को केवल एक राजनीतिक घोषणा बनाना पर्याप्त नहीं होगा।
यदि आंदोलन को धार्मिक वैधता चाहिए, तो नेतृत्व संत समाज के पास भी होना चाहिए।
इसीलिए—
महंत अवैद्यनाथ,
परमहंस रामचंद्र दास,
नृत्यगोपाल दास,
और अन्य धार्मिक नेताओं—
को अग्रिम भूमिका मिली।
यह रणनीति आंदोलन को चुनावी पार्टी से अलग धार्मिक स्वरूप देती थी।
आंदोलन के शुरुआती चरण में विश्व हिंदू परिषद का गैर-दलीय धार्मिक मंच होना अत्यंत लाभकारी था।
कांग्रेस समर्थक हिंदू भी इसमें शामिल हो सकते थे।
जनसंघ/भाजपा समर्थक भी।
निर्दलीय संत भी।
स्थानीय धार्मिक संस्थाएं भी।
इससे आंदोलन का आधार किसी एक राजनीतिक दल से बड़ा दिखाई देता था।
यही बाद में भाजपा के जुड़ने पर उसकी राजनीतिक शक्ति का आधार बना।
उसने इसे केवल जमीन का मुकदमा नहीं कहा।
आंदोलन की धार्मिक भाषा थी—
यह भगवान राम का जन्मस्थान है।
रामलला भीतर हैं।
मंदिर पूर्ण नहीं है।
भक्तों की स्वतंत्र पहुंच बाधित है।
ऐतिहासिक अन्याय का परिमार्जन होना चाहिए।
इस भाषा की शक्ति यह थी कि जटिल दीवानी मुकदमे को साधारण श्रद्धालु भी समझ सके।
यानी विश्व हिंदू परिषद ने विधिक विवाद को सभ्यतागत शिकायत में रूपांतरित किया।
1980 के दशक में “राम जन्मभूमि मुक्ति” जैसी भाषा का प्रयोग बढ़ा।
यह शब्द राजनीतिक रूप से शक्तिशाली था।
यदि कहा जाता—
“भूमि विवाद का फैसला चाहिए”—
तो मामला न्यायालय की सीमा में दिखाई देता।
यदि कहा गया—
“जन्मभूमि की मुक्ति चाहिए”—
तो मुद्दा धार्मिक-सांस्कृतिक संघर्ष बन जाता।
शब्दावली स्वयं आंदोलन की रणनीति का हिस्सा थी।
1984 के आसपास आंदोलन को औपचारिक संगठनात्मक स्वरूप देने के लिए श्री राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति जैसी संस्थाएं बनाई गईं।
महंत अवैद्यनाथ को नेतृत्वकारी भूमिका मिली।
स्थानीय संतों और विश्व हिंदू परिषद के संगठनात्मक तंत्र को एक साझा ढांचा मिला।
यह महत्वपूर्ण था क्योंकि विश्व हिंदू परिषद स्वयं हर धार्मिक निर्णय का एकमात्र प्राधिकरण बनना नहीं चाहती थी।
संत-नेतृत्व को औपचारिक स्थान देकर आंदोलन की धार्मिक वैधता बढ़ाई गई।
विश्व हिंदू परिषद ने धर्म संसद को एक ऐसे मंच के रूप में विकसित किया जहां विभिन्न संत और धर्माचार्य बड़े धार्मिक-सामाजिक प्रश्नों पर सामूहिक निर्णय लें।
यह चुनावी संसद नहीं थी।
लेकिन उसका प्रतीकात्मक अर्थ बहुत बड़ा था—
राजनीतिक संसद कानून बनाती है,
धर्म संसद धार्मिक समाज की सामूहिक आवाज प्रस्तुत करती है।
राम जन्मभूमि प्रश्न को धर्म संसद में लाने से आंदोलन को असाधारण धार्मिक वैधता मिली।
1983 के सम्मेलन और संपर्कों के बाद विश्व हिंदू परिषद ने 1984 में संतों की व्यापक बैठकें आयोजित कीं।
यहीं से आंदोलन का औपचारिक कार्यक्रम तैयार हुआ।
मांग अब स्थानीय याचिका नहीं रही।
राम जन्मभूमि के “मुक्ति” अभियान को राष्ट्रीय प्रचार और यात्रा से जोड़ने की योजना बनी।
अगला अध्याय इसी 1984 धर्म संसद पर केंद्रित होगा।
आंदोलन को राष्ट्रीय बनाने के लिए केवल सभा पर्याप्त नहीं थी।
यात्रा भारतीय धार्मिक-सामाजिक राजनीति का प्राचीन माध्यम है।
विश्व हिंदू परिषद ने राम-जानकी यात्रा/रथयात्रा जैसी अवधारणाओं का उपयोग किया ताकि—
स्थानीय कस्बों,
गांवों,
मठों,
मंदिरों,
और साधारण श्रद्धालुओं—
को आंदोलन से जोड़ा जा सके।
यह व्यापक जन संपर्क का प्रभावी धार्मिक स्वरूप था।
यात्रा की शक्ति यह थी कि वह रैली से अलग दिखाई देती है।
लोग उसमें भक्त के रूप में जुड़ सकते हैं।
स्थान-स्थान पर पूजा हो सकती है।
संत भाषण दे सकते हैं।
नारे धार्मिक भी हो सकते हैं और आंदोलनकारी भी।
इस तरह यात्रा धार्मिक और राजनीतिक लामबंदी के बीच सेतु बनती है।
अयोध्या आंदोलन में यह तकनीक आगे अत्यंत प्रभावी सिद्ध हुई।
आंदोलन का वास्तविक विस्तार तब हुआ जब उसने महानगरों और धार्मिक नेताओं से आगे गांव तक पहुंचने की रणनीति बनाई।
आगे रामशिला पूजन इसी का चरम उदाहरण बनेगा।
देश के अनेक गांवों से पूजित ईंटें अयोध्या भेजी गईं।
इससे साधारण परिवार को भी महसूस हुआ कि वह मंदिर निर्माण में प्रत्यक्ष भागीदार है।
यह संगठनात्मक नवाचार विश्व हिंदू परिषद की सबसे बड़ी व्यापक जन-लामबंदी उपलब्धियों में से एक था।
विश्व हिंदू परिषद ने अयोध्या को केवल ब्राह्मण-संतों का मुद्दा बने रहने नहीं दिया।
आगे उसने—
दलित,
पिछड़े वर्ग,
आदिवासी,
ग्रामीण समुदाय,
और विभिन्न जातीय समूहों—
को आंदोलन में शामिल करने की कोशिश की।
कामेश्वर चौपाल को 1989 के शिलान्यास से जोड़ना इसी सामाजिक समरसता की प्रतीक-राजनीति का हिस्सा था।
अर्थात संगठन समझ रहा था कि मंदिर आंदोलन को व्यापक हिंदू सामाजिक गठबंधन बनाना होगा।
विश्व हिंदू परिषद के लिए अयोध्या का सबसे बड़ा सामाजिक आकर्षण यही था कि राम का प्रतीक जाति से ऊपर व्यापक धार्मिक पहचान प्रस्तुत कर सकता था।
भारत की राजनीति में जातीय विभाजन गहरे थे।
राम जन्मभूमि का आंदोलन एक वैकल्पिक पहचान देने की कोशिश करता था—
पहले हिंदू, फिर जाति।
यह कितना सफल हुआ और कहाँ सीमित रहा, इसका अलग विश्लेषण आगे मंडल–कमंडल और सामाजिक गठबंधन वाले अध्यायों में होगा।
प्रारंभिक चरण में ऐसा कहना अतिशयोक्ति होगा।
1980 के शुरुआती वर्षों में भाजपा स्वयं अभी अयोध्या को केंद्रीय राजनीतिक मुद्दा नहीं बना रही थी।
विश्व हिंदू परिषद और संत समाज पहले अधिक सक्रिय थे।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दोनों के बीच वैचारिक-संगठनात्मक सेतु बना सकता था, लेकिन भाजपा का औपचारिक निर्णायक समर्थन बाद में आया।
इस कालक्रम को समझना बहुत जरूरी है।
1984 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस को भारी सहानुभूति लहर मिली।
भाजपा केवल दो सीटों तक सिमट गई।
यही पराजय आगे उसके वैचारिक पुनर्संयोजन का कारण बनी।
लेकिन उस समय विश्व हिंदू परिषद का राम जन्मभूमि अभियान राजनीतिक चुनावी असफलता से स्वतंत्र धार्मिक-सामाजिक गति पकड़ रहा था।
इसलिए आंदोलन और भाजपा की दिशाएँ शुरुआती चरण में समानांतर थीं, एक ही नहीं।
विश्व हिंदू परिषद कहती थी—
धार्मिक न्याय,
जन्मभूमि की मुक्ति,
संतों का निर्णय,
राम मंदिर।
भाजपा को चुनाव में—
संविधान,
न्यायालय,
नीति,
गठबंधन,
और बहुसंख्यक मतदाताओं—
सबका संतुलन देखना था।
यही अंतर आगे कभी सहयोग और कभी तनाव का कारण बना।
1950–70 के दशकों तक मुस्लिम पक्ष मुख्यतः अदालत में था।
अब पहली बार उसे एक बड़े संगठित धार्मिक आंदोलन का सामना करना था।
यह बदलाव गहरा था।
अदालत में प्रश्न स्वामित्व-अधिकार का था।
सड़क पर प्रश्न “मुक्ति” का हो गया।
यही कारण है कि आगे मुस्लिम पक्ष भी केवल वक्फ बोर्ड और अदालत तक सीमित नहीं रहा।
बाबरी मस्जिद कार्य समिति जैसे संगठन बने।
कुछ हद तक हाँ।
जब विवाद न्यायालय स्वामित्व-अधिकार से सभ्यतागत शिकायत में बदलता है, तो समझौता कठिन हो जाता है।
भूमि का हिस्सा बांटा जा सकता है।
लेकिन “जन्मभूमि” और “मुक्ति” जैसी अवधारणाएं विभाज्य नहीं होतीं।
इसी तरह मुस्लिम पक्ष के लिए मस्जिद की धार्मिक पहचान केवल संपत्ति नहीं थी।
इसलिए विश्व हिंदू परिषद की mobilizational सफलता ने राजनीतिक वार्ता को अधिक जटिल भी बनाया।
आंदोलन में इतिहास एक केंद्रीय साधन बना।
बाबर।
मीर बाकी।
मंदिर-विध्वंस की परंपरा।
ब्रिटिश अभिलेख।
1885 मुकदमा।
1949।
ताला।
इन सबको एक सतत आख्यान में जोड़ा गया।
इस आख्यान का उद्देश्य था—
यह दिखाना कि मंदिर की मांग नई नहीं, एक लंबे ऐतिहासिक संघर्ष का अंतिम चरण है।
इतिहास यहां केवल अकादमिक विषय नहीं, आंदोलनकारी resource बना।
दशकों से मुकदमे लंबित थे।
विश्व हिंदू परिषद ने इसे इस रूप में प्रस्तुत किया कि साधारण न्यायिक प्रक्रिया समाधान देने में विफल रही है।
इससे धार्मिक लामबंदी को नैतिक औचित्य मिला—
“इतने वर्षों से अदालत में मामला है; रामलला ताले में हैं; समाज कब तक प्रतीक्षा करे?”
यह प्रस्तुतीकरण बेहद प्रभावी थी।
लेकिन मुस्लिम पक्ष का उत्तर भी उतना ही तीखा था—
“यदि 1949 में हमें गलत ढंग से बाहर किया गया, तो आंदोलन कानून से ऊपर कैसे हो सकता है?”
यही टकराव आगे तीव्र हुआ।
विश्व हिंदू परिषद की बड़ी सफलता यह थी कि उसने अलग-अलग धार्मिक नेताओं को एक साझा मंच पर रखा।
किसी एक महंत का बयान स्थानीय हो सकता था।
सैकड़ों संतों की सामूहिक घोषणा राष्ट्रीय संदेश बन सकती थी।
धर्म संसदों ने यही भूमिका निभाई।
यहीं से अयोध्या प्रश्न धार्मिक प्राधिकरण की सामूहिक भाषा में राष्ट्रीय रूप से सामने आया।
1980 के दशक में टेलीविजन सीमित था, लेकिन अखबार, पोस्टर, यात्राएं, धार्मिक सभाएं और बाद में रामायण धारावाहिक ने सांस्कृतिक वातावरण बदल दिया।
विश्व हिंदू परिषद की अभियान शैली दृश्य प्रतीकों पर आधारित थी—
रामध्वज,
रथ,
शिला,
कलश,
जय श्रीराम,
संतों की शोभायात्रा।
ये प्रतीक जटिल इतिहास की तुलना में ज्यादा तेजी से जनमानस में प्रवेश करते थे।
1987–88 में दूरदर्शन पर रामानंद सागर का रामायण प्रसारित हुआ।
यह विश्व हिंदू परिषद की स्थापना या 1984 अभियान की शुरुआत से बाद की घटना थी।
लेकिन उसने राम की दृश्य-सांस्कृतिक उपस्थिति को घर-घर पहुंचाया।
इससे आंदोलन के धार्मिक प्रतीकों को अभूतपूर्व सांस्कृतिक विस्तार मिला।
इसका विस्तृत अध्ययन आगे अलग अध्याय में होगा।
राम जन्मभूमि अभियान में विश्व हिंदू परिषद ने मोटे तौर पर पाँच स्तर विकसित किए—
संत नेतृत्व
केंद्रीय संगठनात्मक योजना
क्षेत्रीय समितियां
यात्राएं और धार्मिक कार्यक्रम
गांव/परिवार स्तर की भागीदारी
इसी multi-layer संरचना ने आंदोलन को केवल शहरों का राजनीतिक अभियान बनने से रोका।
राम जन्मभूमि आंदोलन उसका सबसे प्रमुख अभियान बन गया, लेकिन संगठन का व्यापक उद्देश्य हिंदू सामाजिक-सांस्कृतिक एकीकरण था।
अयोध्या उसके लिए प्रतीक भी थी और साधन भी।
मंदिर की मांग वास्तविक धार्मिक उद्देश्य थी।
साथ ही उस अभियान ने संगठन को देशव्यापी पहचान और विशाल सामाजिक पहुँच दी।
दोनों प्रक्रियाएं साथ चलीं।
राम जन्मभूमि आंदोलन के कारण विश्व हिंदू परिषद एक विशिष्ट धार्मिक संगठन से निकलकर भारत की सबसे पहचानी जाने वाली हिंदू लामबंदी संस्थाएँ में बदल गई।
संतों, गांवों, मंदिरों और शहरी समर्थकों का विशाल नेटवर्क बना।
इससे आगे—
रामशिला,
कारसेवा,
निधि अभियान,
और आंदोलनकारी यात्राएं—
संगठित करना संभव हुआ।
जितना बड़ा धार्मिक लामबंदी हुआ, उतना ही हिंदू-मुस्लिम तनाव भी बढ़ा।
आंदोलन की भाषा और प्रतिलामबंदी ने सामाजिक ध्रुवीकरण को बढ़ाया।
1986 के बाद बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी और अन्य मुस्लिम संगठनों की सक्रियता ने इस ध्रुवीकरण को और तीखा किया।
इसलिए विश्व हिंदू परिषद की सफलता का राजनीतिक-सामाजिक परिणाम केवल मंदिर समर्थन नहीं था; वह देशव्यापी सांप्रदायिक विवाद भी बना।
1983 तक अयोध्या अदालत में लंबित धार्मिक विवाद था।
1984 तक वह संगठित राष्ट्रीय धार्मिक अभियान बन चुका था।
इस एक वर्ष के भीतर सबसे बड़ा परिवर्तन हुआ—
स्थानीय प्रश्न → संतों का राष्ट्रीय मुद्दा।
विश्व हिंदू परिषद इस रूपांतरण की केंद्रीय संस्था थी।
1964 — विश्व हिंदू परिषद की स्थापना; हिंदू धार्मिक-सांस्कृतिक संस्थाओं को साझा मंच देने का प्रयास।
1960–70 का दशक — संगठन विस्तार; अयोध्या अभी केंद्रीय अभियान नहीं।
1981 — मीनाक्षीपुरम धर्मांतरण के बाद हिंदू एकता और संगठनात्मक सक्रियता बढ़ी।
1982–83 — राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ/विश्व हिंदू परिषद के भीतर अयोध्या को बड़े धार्मिक अभियान में बदलने की रणनीतिक चर्चा तेज।
1983 — मुज़फ्फरनगर हिंदू सम्मेलन; दाऊ दयाल खन्ना द्वारा अयोध्या, मथुरा और काशी का प्रश्न प्रमुखता से उठाया गया।
1983–84 — संत संपर्क, समितियां, धार्मिक नेतृत्व का समन्वय।
1984 — धर्म संसद और राम जन्मभूमि मुक्ति अभियान का औपचारिक नया चरण।
इसके बाद—
यात्राएं,
ताला खोलने की मांग,
रामशिला पूजन,
शिलान्यास,
और कारसेवा—
आंदोलन के अगले चरण बनेंगे।
गलत। उसका प्रारंभिक उद्देश्य व्यापक हिंदू धार्मिक-सांस्कृतिक समन्वय था।
गलत। अयोध्या विवाद उसके गठन से बहुत पहले न्यायालय और स्थानीय धार्मिक इतिहास में मौजूद था।
अधूरा। स्थानीय संत, मुकदमे और धार्मिक मांग पहले से थे; विश्व हिंदू परिषद ने उन्हें राष्ट्रीय संगठनात्मक रूप दिया।
इतिहास इसका समर्थन नहीं करता। 1983–84 के प्रारंभिक चरण में विश्व हिंदू परिषद और संत समाज भाजपा से आगे सक्रिय थे।
अधूरा। वह चुनाव नहीं लड़ती थी, लेकिन उसके आंदोलन ने भारतीय चुनावी राजनीति पर गहरा प्रभाव डाला।
विश्व हिंदू परिषद का सबसे बड़ा योगदान यह नहीं था कि उसने राम जन्मभूमि का प्रश्न खोजा।
वह प्रश्न बहुत पुराना था।
उसका वास्तविक ऐतिहासिक योगदान था—
एक स्थानीय धार्मिक-न्यायिक विवाद को राष्ट्रीय हिंदू जनांदोलन की संरचना देना।
उसने संतों को मंच दिया।
स्थानीय अयोध्या नेतृत्व को राष्ट्रीय नेटवर्क से जोड़ा।
धार्मिक यात्राओं और प्रतीकों का उपयोग किया।
मंदिर मांग को व्यापक हिंदू पहचान से जोड़ा।
और दशकों से लंबित न्यायिक प्रश्न को सार्वजनिक धार्मिक तात्कालिकता में बदल दिया।
इसलिए 1980 के दशक के बाद अयोध्या की कहानी विश्व हिंदू परिषद के बिना समझी ही नहीं जा सकती।
1964 में विश्व हिंदू परिषद बनी तो अयोध्या उसका तत्काल केंद्रीय एजेंडा नहीं था। लेकिन अगले दो दशकों में उसने वह धार्मिक-संगठनात्मक पूंजी तैयार की जिसकी आवश्यकता अयोध्या जैसे मुद्दे को राष्ट्रीय अभियान बनाने के लिए थी।
1980 के शुरुआती दशक तक परिस्थितियां बदल चुकी थीं।
स्थानीय संत आंदोलन जीवित था।
न्यायालय समाधान नहीं दे पाए थे।
रामलला भीतर थे।
प्रवेश नियंत्रित था।
हिंदू एकता का प्रश्न विश्व हिंदू परिषद के लिए अधिक महत्वपूर्ण हो चुका था।
दाऊ दयाल खन्ना जैसे नेताओं ने अयोध्या को फिर सार्वजनिक एजेंडे पर रखा।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संगठनात्मक रणनीतिकार सक्रिय हुए।
संत नेतृत्व तैयार था।
और विश्व हिंदू परिषद के पास देशव्यापी नेटवर्क था।
इन सबका मिलन 1984 में हुआ।
वहीं से आधुनिक संगठित राम जन्मभूमि आंदोलन औपचारिक रूप से राष्ट्रीय मंच पर प्रवेश करता है।
अगला अध्याय 24 — “1984 की धर्म संसद : आधुनिक राम मंदिर आंदोलन का औपचारिक आरंभ” होगा। उसमें धर्म संसद की तारीख और स्थान, प्रमुख संत और नेता, पारित प्रस्ताव, राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति की संरचना, अयोध्या–मथुरा–काशी के प्रश्न, आगामी यात्राओं की योजना और 1984 के बाद आंदोलन किस प्रकार न्यायालय से सड़क तक पहुँचा—इन सबका विस्तृत अध्ययन होगा।