1885 का महंत रघुबर दास मुकदमा : न्यायिक संघर्ष की औपचारिक शुरुआत
औपनिवेशिक मुकदमे और प्रशासनिक यथास्थिति
अयोध्या विवाद के आधुनिक न्यायिक इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण शुरुआती घटना 1885 का मुकदमा है, जिसे सामान्यतः महंत रघुबर दास बनाम स्थानीय मुस्लिम पक्ष/प्रशासन के रूप में याद किया जाता है। यह मुकदमा इसलिए निर्णायक है क्योंकि पहली बार राम जन्मभूमि से संबंधित धार्मिक दावा औपनिवेशिक न्यायालय के सामने स्पष्ट कानूनी रूप में पहुँचा। इससे पहले स्थानीय परंपरा, प्रशासनिक नियंत्रण, पूजा-अधिकार और सामुदायिक तनाव मौजूद थे; 1885 में वे पहली बार एक व्यवस्थित दीवानी वाद में रूपांतरित हुए।
इस मुकदमे को समझने में एक बड़ी सावधानी आवश्यक है। महंत रघुबर दास ने 1885 में पूरे तीन-गुंबद वाले ढांचे या आंतरिक प्रांगण का कब्जा नहीं मांगा था। उनका दावा राम चबूतरे पर मंदिर अथवा छत/संरचना बनाने की अनुमति से संबंधित था। यही तथ्य बाद की न्यायिक बहस में बार-बार सामने आया।
महंत रघुबर दास अयोध्या की वैष्णव धार्मिक परंपरा से जुड़े साधु-महंत थे। उनका संबंध उस स्थानीय धार्मिक व्यवस्था से था जिसमें राम चबूतरा बाहरी प्रांगण में हिंदू पूजा का प्रमुख केंद्र बन चुका था।
ब्रिटिश प्रशासन की 1858–59 के बाद की व्यवस्था के तहत हिंदू बाहरी प्रांगण में पूजा करते थे, जबकि आंतरिक गुंबद वाले हिस्से में मुस्लिम धार्मिक उपयोग जारी था।
रघुबर दास की समस्या यह थी कि राम चबूतरा खुला था और वहां स्थायी मंदिर-जैसी संरचना नहीं थी। तीर्थयात्री धूप, वर्षा और मौसम की कठिनाइयों के बीच पूजा करते थे।
इसी व्यावहारिक समस्या को उन्होंने दीवानी अधिकार के रूप में अदालत में रखा।
1885 के वाद का केंद्रीय प्रश्न यह नहीं था—
“पूरी बाबरी मस्जिद हिंदुओं को दे दी जाए।”
बल्कि—
“राम चबूतरे पर मंदिर/छत बनाने की अनुमति दी जाए।”
यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है।
क्योंकि बाद के मुस्लिम पक्ष ने तर्क दिया कि यदि हिंदू उस समय केंद्रीय गुंबद को वास्तविक जन्मस्थान मानते थे, तो उन्होंने सीधे उसी स्थल पर दावा क्यों नहीं किया?
हिंदू पक्ष का बाद का उत्तर था कि उस समय की प्रशासनिक और भौतिक स्थिति में बाहरी चबूतरे पर निर्माण की अनुमति मांगना ही व्यावहारिक और संभव दावा था; इससे भीतर के धार्मिक विश्वास का त्याग सिद्ध नहीं होता।
राम चबूतरा एक छोटा ऊंचा मंच था जो बाहरी प्रांगण में स्थित था। यह हिंदू पूजा का प्रमुख स्थल बन चुका था।
श्रद्धालु वहीं पूजा करते थे, प्रसाद चढ़ाते थे और अंदरूनी केंद्रीय स्थान की ओर नमन करते थे।
राम चबूतरा धार्मिक और कानूनी दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण था।
धार्मिक रूप से—वह राम जन्मस्थान स्मृति का बाहरी प्रतीक था।
कानूनी रूप से—वह ऐसा स्थल था जहां हिंदू पूजा का लगातार, खुला और प्रशासन द्वारा ज्ञात उपयोग मौजूद था।
इसीलिए रघुबर दास ने अपने मुकदमे का आधार इसी चबूतरे को बनाया।
बाद के न्यायिक रिकॉर्ड में राम चबूतरे का आकार लगभग 17 फीट × 21 फीट के आसपास बताया गया है, हालांकि अलग-अलग प्रतियों में मामूली अंतर मिलता है।
यह बहुत बड़ा मंदिर-परिसर नहीं था।
इससे यह भी स्पष्ट होता है कि 1885 का दावा अत्यंत सीमित निर्माण-अधिकार से संबंधित था।
यही सीमित स्वरूप अदालत के समक्ष एक महत्वपूर्ण प्रश्न बना—
यदि केवल इतने छोटे चबूतरे पर छत/मंदिर बने, तो क्या उससे निकटवर्ती मस्जिद में नमाज और सामुदायिक शांति प्रभावित होगी?
मुकदमे में स्थानीय मुस्लिम पक्ष और प्रशासनिक प्रतिनिधि प्रतिवादी के रूप में सामने आए।
उनका मूल तर्क था कि—
राम चबूतरा मस्जिद के अत्यंत निकट है।
यदि वहां मंदिर बनेगा तो धार्मिक टकराव बढ़ेगा।
घंटे-घड़ियाल, पूजा और तीर्थयात्रियों की भीड़ मस्जिद के उपयोग को प्रभावित कर सकती है।
और इससे कानून-व्यवस्था बिगड़ सकती है।
इसलिए विवाद केवल संपत्ति का नहीं, सार्वजनिक शांति का भी था।
फैजाबाद के अधीनस्थ न्यायालय ने रघुबर दास की मांग पर विचार करते हुए स्थल की प्रकृति, दोनों समुदायों के उपयोग और संभावित सांप्रदायिक परिणामों को देखा।
अदालत ने यह स्वीकार किया कि राम चबूतरा हिंदू पूजा का स्थल था।
लेकिन उसने स्थायी निर्माण की अनुमति देने में संकोच किया।
मुख्य चिंता थी—
यदि वहां मंदिर बनाया गया तो विवादित मस्जिद और मंदिर के बीच तनाव और अधिक बढ़ सकता है।
यह औपनिवेशिक न्यायिक दृष्टिकोण की विशिष्टता थी।
अदालत धार्मिक सत्य तय करने से बच रही थी।
वह यथास्थिति बनाए रखना चाहती थी।
1885–86 की न्यायिक प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि न्यायाधीशों ने स्थल की भौतिक स्थिति का प्रत्यक्ष परीक्षण किया।
उन्होंने देखा कि चबूतरा और मस्जिद एक-दूसरे के कितने निकट हैं।
इस निरीक्षण ने अदालत के मन में यह आशंका मजबूत की कि यदि चबूतरे पर मंदिर निर्माण की अनुमति दी गई तो धार्मिक ध्वनियां, तीर्थयात्री और नमाज एक ही संकीर्ण परिसर में टकराव का कारण बन सकते हैं।
अर्थात फैसला केवल कागजी रिकॉर्ड पर नहीं, स्थल की वास्तविक भौतिक स्थिति पर भी आधारित था।
इस मुकदमे में अदालत का प्रमुख प्रश्न यह नहीं था कि क्या भगवान राम का जन्म वहीं हुआ था।
लेकिन न्यायिक टिप्पणियों से यह स्पष्ट था कि हिंदू उस स्थान को अत्यंत पवित्र मानते थे और राम चबूतरे पर पूजा करते थे।
इस अर्थ में अदालत ने धार्मिक आस्था के अस्तित्व को नकारा नहीं।
उसने केवल उस आस्था से स्वचालित निर्माण-अधिकार निकालने से इनकार किया।
यही अंतर आगे के सभी मुकदमों में महत्वपूर्ण रहा—
आस्था एक तथ्य हो सकती है, लेकिन कानूनी राहत अलग प्रश्न है।
निचली अदालत ने मंदिर निर्माण की अनुमति नहीं दी।
उसका मूल तर्क था—
मौजूदा व्यवस्था लंबे समय से चल रही है।
दोनों समुदायों के धार्मिक स्थल अत्यंत निकट हैं।
नई स्थायी संरचना से विवाद और हिंसा की संभावना बढ़ सकती है।
इसलिए यथास्थिति बनाए रखना बेहतर है।
यह फैसला औपनिवेशिक प्रशासन की उस व्यापक नीति से मेल खाता था जो धार्मिक विवादों में भौतिक स्थिति बदलने से बचती थी।
महंत रघुबर दास ने निचली अदालत के फैसले को स्वीकार नहीं किया और अपील की।
यह अपील फैजाबाद के जिला न्यायाधीश के समक्ष गई।
यहीं वह प्रसिद्ध टिप्पणी दर्ज हुई जिसे बाद के दशकों में राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े साहित्य में बार-बार उद्धृत किया गया।
1886 में जिला न्यायाधीश एफ. ई. ए. चामियर ने मामले पर विचार किया।
उन्होंने भी निचली अदालत का फैसला बरकरार रखा।
उनकी प्रसिद्ध टिप्पणी का आशय था कि यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि हिंदुओं द्वारा पवित्र मानी जाने वाली भूमि पर मस्जिद बनी, लेकिन अब लगभग तीन सौ से अधिक वर्ष बीत जाने के बाद उस स्थिति को बदलकर उपचार देना व्यावहारिक नहीं होगा।
इसी टिप्पणी ने बाद के आंदोलन में बहुत प्रतीकात्मक महत्व प्राप्त किया।
लेकिन इसे पूरी संदर्भ-सावधानी के साथ पढ़ना आवश्यक है।
न्यायाधीश ने मंदिर-विध्वंस का कोई पूर्ण ऐतिहासिक परीक्षण नहीं किया था।
वह उस समय प्रचलित स्थानीय/प्रशासनिक इतिहास और लंबे समय से बनी स्थिति का उल्लेख कर रहा था।
लोकप्रिय उद्धरणों में इस टिप्पणी को कभी-कभी इस रूप में प्रस्तुत किया जाता है मानो 1886 की ब्रिटिश अदालत ने यह अंतिम रूप से सिद्ध कर दिया हो कि बाबर ने मंदिर तोड़ा था।
यह सही नहीं है।
अदालत के सामने मुकदमे का प्रश्न मंदिर-विध्वंस का ऐतिहासिक परीक्षण नहीं था।
वह चबूतरे पर निर्माण-अनुमति का मामला था।
इसलिए न्यायाधीश की टिप्पणी को एक ऐतिहासिक टिप्पणी माना जाना चाहिए, न कि पूर्ण न्यायिक निष्कर्ष कि 1528 की कौन-सी घटना किस प्रकार हुई थी।
यही शोध-सावधानी आवश्यक है।
तीन कारण प्रमुख थे—
पहला—लंबे समय से चली आ रही यथास्थिति।
दूसरा—मंदिर और मस्जिद की अत्यधिक निकटता।
तीसरा—सांप्रदायिक संघर्ष का संभावित खतरा।
अदालत का दृष्टिकोण यह था कि किसी धार्मिक ऐतिहासिक शिकायत को ठीक करने के प्रयास में वर्तमान सार्वजनिक शांति को खतरे में नहीं डाला जाना चाहिए।
यह औपनिवेशिक न्यायपालिका की यथास्थिति-उन्मुख सोच का स्पष्ट उदाहरण है।
राम चबूतरे पर हिंदू पूजा का तथ्य न्यायालय के सामने स्पष्ट था।
यदि ऐसा न होता तो मुकदमे का आधार ही नहीं बनता।
इसलिए बाहरी प्रांगण में हिंदू धार्मिक उपयोग का यह एक महत्वपूर्ण न्यायिक प्रमाण है।
यही कारण है कि 2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने 1885 के मुकदमे को बाहरी प्रांगण पर हिंदू कब्जे और पूजा की ऐतिहासिक श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा माना।
मुस्लिम पक्ष की सबसे मजबूत चिंता यह थी कि यदि बाहरी चबूतरे पर स्थायी मंदिर निर्माण हुआ तो मस्जिद का स्वतंत्र उपयोग कठिन हो जाएगा।
धार्मिक ध्वनि, तीर्थयात्री और भीड़ की उपस्थिति मस्जिद में नमाज के साथ टकराव पैदा कर सकती थी।
इसलिए उनका विरोध केवल “हिंदू पूजा” से नहीं था—वह पहले से हो रही थी।
विरोध स्थायी मंदिर निर्माण से था।
यानी एक महत्वपूर्ण अंतर—
हिंदू पूजा स्वीकार्य यथास्थिति थी।
नया निर्माण यथास्थिति में परिवर्तन होता।
रघुबर दास ने सीमित मांग की थी, लेकिन इसका प्रभाव बहुत बड़ा हुआ।
इससे पहली बार औपचारिक न्यायिक रिकॉर्ड में यह स्थापित हुआ कि—
राम चबूतरा एक मान्य हिंदू पूजा-स्थल था।
वह विवादित मस्जिद के निकट था।
हिंदू वहां मंदिर बनाना चाहते थे।
मुस्लिम पक्ष ने उस निर्माण का विरोध किया।
और अदालत ने यथास्थिति बनाए रखी।
यह पूरी संरचना अगले सौ वर्षों तक विवाद के केंद्र में रही।
नहीं, ऐसा कोई स्पष्ट लिखित त्याग सामने नहीं आता।
लेकिन यह भी सही है कि उनके मुकदमे की प्रार्थना सीमित थी।
यही बाद की बहस का बिंदु बना।
मुस्लिम पक्ष ने कहा—
1885 में अंदरूनी मस्जिद पर दावा नहीं किया गया, इसलिए बाद का व्यापक दावा नया है।
हिंदू पक्ष ने कहा—
1885 का मुकदमा उपलब्ध बाहरी पूजा-स्थल पर निर्माण के लिए था; धार्मिक विश्वास अंदर तक पहले से मौजूद था।
2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने बाद के व्यापक साक्ष्य के आधार पर यह माना कि हिंदू केंद्रीय गुंबद के नीचे जन्मस्थान विश्वास को छोड़ते नहीं थे।
1885 का फैसला उस औपनिवेशिक नीति की पुष्टि करता है जिसे हम पिछले अध्याय में “प्रबंधित विवाद” कह चुके हैं।
न्यायपालिका की सोच थी—
विवाद का ऐतिहासिक समाधान करना जोखिमपूर्ण है।
इसलिए वर्तमान उपयोग को बनाए रखो।
किसी पक्ष को नया निर्माण या विस्तार मत करने दो।
अल्पकाल में यह शांति का रास्ता था।
दीर्घकाल में यह समस्या को स्थगित करता रहा।
यह मुकदमा एक बड़ा दार्शनिक प्रश्न खड़ा करता है।
यदि किसी समुदाय को लगता है कि उसके पवित्र स्थल पर ऐतिहासिक अन्याय हुआ, तो क्या अदालत वर्तमान शांति के नाम पर उसे कोई राहत न दे?
औपनिवेशिक अदालत का उत्तर था—हाँ, वर्तमान शांति प्राथमिक है।
आधुनिक संवैधानिक अदालतें इसी प्रश्न को अलग तरह से देख सकती हैं।
अयोध्या का 2019 फैसला इसी अर्थ में 1886 से बिल्कुल अलग युग का निर्णय था।
बीसवीं सदी में राम जन्मभूमि आंदोलन के समर्थकों ने 1885 के मुकदमे को यह दिखाने के लिए उद्धृत किया कि—
हिंदू दावा आधुनिक राजनीतिक आविष्कार नहीं था।
अदालत में 19वीं सदी में ही मंदिर निर्माण की मांग पहुंच चुकी थी।
ब्रिटिश न्यायाधीश ने स्थल की पवित्रता और ऐतिहासिक शिकायत को नोट किया था।
इसलिए 1980 के दशक का आंदोलन किसी नए राजनीतिक आख्यान का जन्म नहीं, पुराने अनसुलझा दावा का राष्ट्रीय पुनरुत्थान था।
यह तर्क आंदोलन में बहुत प्रभावी रहा।
मुस्लिम पक्ष भी उसी मुकदमे को अपने पक्ष में पढ़ता था।
उनका तर्क था—
यदि पूरे मस्जिद स्थल को हिंदू जन्मस्थान का निर्विवाद दावा माना जाता, तो 1885 में केवल बाहरी चबूतरे पर मंदिर की मांग क्यों की गई?
अदालत ने मस्जिद के भीतर हस्तक्षेप नहीं किया।
इसलिए पुरानी प्रशासनिक व्यवस्था मुस्लिम भीतरी प्रांगण उपयोग को मान्यता देती थी।
यानी एक ही मुकदमा दोनों पक्षों के लिए अलग प्रकार से उपयोगी था।
यह स्पष्ट करना आवश्यक है।
1885–86 की अदालत ने—
न मंदिर-विध्वंस का पुरातात्त्विक परीक्षण किया।
न बाबरनामा का व्यापक विश्लेषण।
न 1528 की घटना का निर्णायक निर्धारण।
न पूरी 2.77 एकड़ भूमि का स्वामित्व-अधिकार तय किया।
न आंतरिक प्रांगण का अंतिम स्वामित्व घोषित किया।
उसने केवल सीमित निर्माण-अनुमति पर फैसला दिया।
इसलिए 1886 के फैसले को अधिक या कम महत्व देना दोनों गलत होंगे।
रघुबर दास ने आगे उच्च अपीलीय स्तर पर भी राहत चाही।
अंततः उनकी मांग स्वीकार नहीं हुई।
पूरे औपनिवेशिक न्यायिक ढांचे ने यही संदेश दिया—
राम चबूतरे पर पूजा जारी रहे।
लेकिन स्थायी मंदिर-निर्माण की अनुमति नहीं।
मस्जिद की मौजूदा स्थिति भी बनी रहे।
यानी यथास्थिति।
तत्काल कानूनी राहत की दृष्टि से—हाँ।
रघुबर दास मंदिर निर्माण की अनुमति नहीं ले सके।
लेकिन ऐतिहासिक प्रभाव की दृष्टि से—यह मुकदमा असफल नहीं था।
क्योंकि उसने—
दावे को न्यायिक रिकॉर्ड में दर्ज किया।
राम चबूतरे की हिंदू पूजा स्थापित की।
जन्मस्थान विवाद को औपचारिक कानूनी विषय बनाया।
और आने वाले मुकदमों के लिए दस्तावेजी आधार तैयार किया।
कई बार न्यायालय में हारने वाला मुकदमा ऐतिहासिक आख्यान में बहुत शक्तिशाली हो जाता है।
1885 इसका उदाहरण है।
व्यवहारिक रूप से बहुत कम।
राम चबूतरे पर पूजा जारी रही।
मस्जिद में मुस्लिम धार्मिक उपयोग जारी रहा।
रेलिंग व्यवस्था बनी रही।
मंदिर निर्माण नहीं हुआ।
यानी अदालत ने वर्तमान स्थिति को स्थिर कर दिया।
लेकिन धार्मिक आकांक्षा समाप्त नहीं हुई।
इसके बाद लगभग पचास वर्ष तक विवाद किसी बड़े न्यायिक परिवर्तन के बिना चला।
स्थानीय धार्मिक गतिविधियां जारी रहीं।
रामनवमी और तीर्थयात्रा होती रही।
मुस्लिम नमाज होती रही।
राजस्व और प्रशासनिक रिकॉर्ड बनते रहे।
फिर 1934 में सांप्रदायिक हिंसा ने एक बार फिर विवादित ढांचे को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किया।
इसलिए 1885 और 1934 के बीच का काल एक प्रकार का तनावपूर्ण स्थायित्व था।
1885 का मामला दिखाता है कि औपनिवेशिक अदालतें धार्मिक स्थल विवादों में प्रायः तीन चीजें देखती थीं—
लंबे समय से चली आ रही उपयोग व्यवस्था।
कानून-व्यवस्था।
और किसी नई राहत से संभावित सांप्रदायिक परिणाम।
यह दृष्टिकोण आधुनिक स्वामित्व-अधिकार न्यायनिर्णयन से अलग था।
आधुनिक अदालतें ऐतिहासिक कब्जा, दस्तावेजी साक्ष्य, विधिक स्वामित्व-अधिकार और संवैधानिक अधिकार का अधिक व्यवस्थित परीक्षण करती हैं।
अयोध्या का न्यायिक इतिहास वास्तव में भारतीय न्यायशास्त्र के विकास का भी इतिहास है।
रघुबर दास के पास पूजा का व्यावहारिक अधिकार था।
लेकिन अदालत ने पूजा-अधिकार से स्वतः निर्माण-अधिकार नहीं निकाला।
यह अंतर संपत्ति और धार्मिक कानून में आज भी महत्वपूर्ण है।
किसी स्थान पर पूजा करना और वहां स्थायी निर्माण करना दो अलग कानूनी अधिकार हो सकते हैं।
1885 का मुकदमा इस भेद का प्रारंभिक उदाहरण है।
उस समय की परिस्थितियों में काफी मजबूत।
1855 की हिंसा अभी बहुत पुरानी नहीं थी।
अयोध्या संवेदनशील धार्मिक नगर था।
मंदिर और मस्जिद बहुत पास थे।
किसी नए निर्माण से संघर्ष की संभावना वास्तविक थी।
इसलिए अदालत का भय केवल काल्पनिक नहीं था।
लेकिन यही तर्क स्थायी रूप से लागू करने का अर्थ यह भी था कि मूल विवाद का कभी समाधान न हो।
यही औपनिवेशिक यथास्थिति नीति की सीमा थी।
जिला न्यायाधीश की प्रसिद्ध टिप्पणी यही संकेत देती है कि वह उस स्थानीय-ऐतिहासिक धारणा से परिचित था कि मस्जिद किसी हिंदू-पवित्र स्थल पर बनी थी।
लेकिन उसने इस धारणा को उपचार देने का आधार नहीं बनाया।
उसका दृष्टिकोण था—
इतिहास में जो हुआ, वह बहुत पुराना है।
आज की शांति बिगाड़कर उसका सुधार संभव नहीं।
यह एक प्रकार का सीमा द्वारा इतिहास था, भले यह तकनीकी सीमा कानून की भाषा में न हो।
“तीन सौ से अधिक वर्ष बीत चुके हैं” वाली टिप्पणी का राजनीतिक प्रभाव बाद में बहुत बड़ा हुआ।
राम मंदिर आंदोलन के समर्थकों ने प्रश्न उठाया—
यदि अदालत स्वयं ऐतिहासिक अन्याय को मानती थी, तो केवल समय बीत जाने से क्या वह अन्याय वैध हो जाता है?
दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष कहता था—
सदियों से चली आ रही संपत्ति व्यवस्था को आधुनिक धार्मिक दावे के आधार पर उलट देना कानून के शासन के लिए खतरनाक होगा।
यही मूल वैचारिक संघर्ष आगे भी चलता रहा।
1885 के मुकदमे ने दो स्थायी प्रतीक छोड़े—
राम चबूतरा और न्यायिक अस्वीकृति।
एक छोटा चबूतरा आने वाले सौ वर्षों में विशाल राष्ट्रीय आंदोलन की स्मृति का हिस्सा बना।
यही दिखाता है कि धार्मिक आंदोलनों में छोटे भौतिक स्थल भी बड़े सांस्कृतिक प्रतीक बन सकते हैं।
विश्व हिंदू परिषद और बाद के मंदिर समर्थक साहित्य में रघुबर दास को प्रारंभिक न्यायिक संघर्ष के प्रतिनिधि के रूप में देखा गया।
उनका मुकदमा यह दिखाने के लिए महत्वपूर्ण था कि—
“मंदिर की मांग 1980 के दशक की नहीं, 19वीं सदी की अदालत में दर्ज मांग है।”
यह ऐतिहासिक निरंतरता आंदोलन के आख्यान के लिए बहुत मूल्यवान थी।
2019 की सुनवाई में 1885 का मुकदमा कई कारणों से महत्वपूर्ण था—
बाहरी प्रांगण में हिंदू पूजा की पुष्टि।
राम चबूतरे की स्थिति।
मंदिर निर्माण की मांग।
मुस्लिम पक्ष की आपत्ति।
और औपनिवेशिक यथास्थिति।
सर्वोच्च न्यायालय ने इसे व्यापक साक्ष्यगत श्रृंखला का हिस्सा माना, न कि अकेला निर्णायक प्रमाण।
यही सही तरीका था।
यह पूर्ण व्यापक स्वामित्व वाद नहीं था जैसा बाद के मुकदमों में विकसित हुआ।
यह सीमित राहत-उन्मुख दीवानी कार्रवाई था।
इसलिए उससे पूरे परिसर का अंतिम स्वामित्व निर्धारित नहीं हुआ।
यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है।
बाद के मुकदमों को 1885 से bound मानना सरल नहीं था क्योंकि पक्षकार, कारण का कार्रवाई और राहतें अलग थे।
बाद में यह प्रश्न भी उठा कि क्या 1885 का फैसला भविष्य के हिंदू दावों को रोकता है?
कानूनी रूप से इसका उत्तर सरल नहीं था।
पूर्व न्यायनिर्णय से बाधित लागू होने के लिए वही पक्ष, वही मुद्दा और वही कारण का कार्रवाई जैसी शर्तें महत्वपूर्ण हैं।
चूंकि बाद के मुकदमे रामलला, निर्मोही अखाड़ा, वक्फ बोर्ड और पूरे स्वामित्व-अधिकार से जुड़े थे, 1885 का सीमित मुकदमा उन्हें स्वतः समाप्त नहीं करता था।
यही कारण है कि 20वीं सदी में नए वाद संभव हुए।
1885 में वादी एक महंत था।
1989 में स्थिति बहुत अलग हुई—रामलला विराजमान स्वयं एक विधिक व्यक्ति के रूप में वादी बने।
यह कानूनी परिवर्तन बहुत बड़ा था।
महंत का व्यक्तिगत/प्रबंधकीय दावा और देवता का स्वयं भूमि पर दावा एक ही चीज नहीं थे।
इसलिए 1885 की सीमित मांग बाद के रामलला वाद पर अंतिम बाधा नहीं बनी।
आज की दृष्टि से ऐसा लग सकता है कि उन्होंने बहुत सीमित राहत मांगी।
लेकिन 1885 की प्रशासनिक परिस्थिति देखें तो उनकी रणनीति व्यावहारिक थी।
पूरे मस्जिद पर दावा करना तत्काल असंभव और हिंसक परिणाम वाला हो सकता था।
चबूतरे पर मंदिर मांगना तुलनात्मक रूप से सीमित और संभाव्य मांग थी।
इसलिए उस समय की रणनीति को आज के अंतिम परिणाम से नहीं आंकना चाहिए।
एक बहुत महत्वपूर्ण बात—
अदालत ने मंदिर निर्माण से इनकार कर दिया, लेकिन राम चबूतरे पर हिंदू पूजा को समाप्त नहीं किया।
अर्थात हिंदू धार्मिक उपयोग न्यायिक रूप से व्यवहारिक यथास्थिति का हिस्सा बना रहा।
यह आने वाली पीढ़ियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण था।
यदि पूजा भी रोक दी जाती, तो आगे हिंदू पक्ष की साक्ष्यगत स्थिति अलग होती।
1885 का मुकदमा अयोध्या विवाद के न्यायिक इतिहास की औपचारिक शुरुआत इसलिए है क्योंकि इसमें पहली बार—
राम चबूतरा स्पष्ट धार्मिक दावा बना।
मंदिर निर्माण की मांग अदालत पहुंची।
मुस्लिम पक्ष ने उस निर्माण का विरोध किया।
ब्रिटिश न्यायपालिका ने सार्वजनिक व्यवस्था के आधार पर राहत ठुकराई।
और यथास्थिति को विधिक संरक्षण मिला।
इस मुकदमे ने विवाद हल नहीं किया।
उसने उसे न्यायिक रूप दे दिया।
1885 का महंत रघुबर दास मुकदमा आकार में छोटा लेकिन ऐतिहासिक प्रभाव में अत्यंत बड़ा था।
उन्होंने पूरे बाबरी ढांचे पर कब्जा नहीं मांगा।
उन्होंने बाहरी प्रांगण के राम चबूतरे पर मंदिर अथवा छत बनाने की अनुमति मांगी।
अदालत ने यह स्वीकार किया कि वहां हिंदू पूजा होती है, लेकिन निर्माण की अनुमति देने से सांप्रदायिक तनाव बढ़ने की आशंका के कारण राहत से इनकार कर दिया।
1886 की अपील में जिला न्यायाधीश ने भी यही निर्णय बरकरार रखा और उस पवित्रता तथा ऐतिहासिक शिकायत का उल्लेख किया जिसे बाद के राम मंदिर आंदोलन ने बार-बार उद्धृत किया।
लेकिन उस टिप्पणी को 1528 के मंदिर-विध्वंस पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष समझना सही नहीं होगा।
मुकदमे का वास्तविक महत्व इससे कहीं अधिक ठोस है—
उसने यह प्रमाणित किया कि 19वीं सदी में राम चबूतरे पर नियमित हिंदू पूजा थी, मंदिर निर्माण की औपचारिक मांग अदालत में पहुंच चुकी थी, और औपनिवेशिक न्यायपालिका ने विवाद को हल करने के बजाय यथास्थिति बनाए रखने का निर्णय लिया।
यही यथास्थिति अगले लगभग आधे शताब्दी तक बनी रही।
फिर 1934 की हिंसा ने तीन-गुंबद वाले ढांचे को प्रत्यक्ष क्षति पहुंचाई और ब्रिटिश प्रशासन को एक बार फिर हस्तक्षेप करना पड़ा।
अगला अध्याय 9 — “1886 के अपीलीय निर्णय और उसके दूरगामी प्रभाव” होगा, जिसमें चामियर के निर्णय, प्रसिद्ध टिप्पणी की मूल न्यायिक संदर्भ-व्याख्या, अपील की पूरी प्रक्रिया और बाद के मुकदमों तथा राम मंदिर आंदोलन में उसके उपयोग का विस्तार से विश्लेषण किया जाएगा।