1947 के बाद अयोध्या : स्वतंत्र भारत में पुराना विवाद
औपनिवेशिक मुकदमे और प्रशासनिक यथास्थिति
1947 में भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन अयोध्या का राम जन्मभूमि-बाबरी विवाद स्वतंत्र नहीं हुआ। ब्रिटिश शासन चला गया, पर वह धार्मिक, प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था जस की तस बनी रही जिसमें बाहरी प्रांगण में हिंदू पूजा करते थे और आंतरिक तीन-गुंबद वाले ढांचे में मुस्लिम नमाज का दावा और उपयोग कायम था। अंतर यह था कि अब इस विवाद का प्रबंधन किसी औपनिवेशिक राज्य को नहीं, बल्कि नए भारतीय गणराज्य की ओर बढ़ रही लोकतांत्रिक सरकार को करना था।
यहीं से अयोध्या के इतिहास का एक बिल्कुल नया चरण शुरू होता है।
1947 से दिसंबर 1949 के बीच केवल दो वर्ष से कुछ अधिक समय में परिस्थितियां तेजी से बदलीं। विभाजन और सांप्रदायिक हिंसा की स्मृति ताजा थी। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। अयोध्या में साधु-संतों की सक्रियता बढ़ रही थी। 1948 के फैजाबाद उपचुनाव में धार्मिक प्रतीकों का राजनीतिक उपयोग हुआ। 1949 में जन्मस्थान क्षेत्र के आसपास हवन, कीर्तन और सामूहिक धार्मिक कार्यक्रम बढ़े। नवंबर तक पुलिस को आशंका थी कि विवादित मस्जिद में मूर्तियां स्थापित करने का प्रयास हो सकता है। फिर भी प्रशासन उस घटना को रोक नहीं सका जो 22–23 दिसंबर 1949 की रात हुई। सर्वोच्च न्यायालय ने 2019 में स्पष्ट रूप से दर्ज किया कि इस घटना से पहले प्रशासन को गंभीर चेतावनियां मिल चुकी थीं।
इस अध्याय का उद्देश्य उस रात की घटना का विस्तृत वर्णन करना नहीं है—वह अगला अध्याय होगा। यहां प्रश्न है: स्वतंत्रता के बाद केवल ढाई वर्षों में अयोध्या किस प्रकार उस निर्णायक मोड़ तक पहुंची?
15 अगस्त 1947 को सत्ता हस्तांतरण के समय अयोध्या में कोई नया विवाद पैदा नहीं हुआ था। नई सरकार को एक ऐसी स्थिति विरासत में मिली थी जिसका निर्माण लगभग एक सदी की ब्रिटिश प्रशासनिक नीति से हुआ था।
व्यवस्था मोटे तौर पर यह थी—
बाहरी प्रांगण में राम चबूतरा, सीता रसोई और अन्य हिंदू पूजा-स्थल।
आंतरिक प्रांगण में तीन-गुंबद वाला ढांचा।
दोनों के बीच भौतिक विभाजन।
मुसलमानों का मस्जिद में धार्मिक उपयोग।
हिंदुओं की बाहरी प्रांगण में निरंतर पूजा और भीतर केंद्रीय गुंबद की दिशा में जन्मस्थान की धार्मिक आस्था।
अर्थात स्वतंत्र भारत के सामने कोई कोरा कागज नहीं था।
वह सदियों की धार्मिक स्मृति, लगभग साठ वर्षों के न्यायिक रिकॉर्ड और ब्रिटिश यथास्थिति व्यवस्था का उत्तराधिकारी बना।
औपनिवेशिक सरकार का मूल सिद्धांत था—
“स्थिति मत बदलो।”
स्वतंत्र भारत के सामने प्रश्न अधिक कठिन था।
अब राज्य स्वयं भारतीय जनता का प्रतिनिधि था।
उससे केवल कानून-व्यवस्था नहीं, धार्मिक स्वतंत्रता, संपत्ति-अधिकार और समान नागरिकता की भी अपेक्षा थी।
अभी संविधान लागू नहीं हुआ था, लेकिन उसकी मूल वैचारिक दिशा स्पष्ट हो चुकी थी।
ऐसी स्थिति में अयोध्या का पुराना समझौता अधिक संवेदनशील बन गया।
क्योंकि दोनों पक्ष अब एक विदेशी प्रशासन से नहीं, अपने लोकतांत्रिक राज्य से न्याय की अपेक्षा कर सकते थे।
1947 के भारत-विभाजन ने पूरे उत्तर भारत की हिंदू-मुस्लिम राजनीति को गहरे रूप से प्रभावित किया।
पंजाब, बंगाल, दिल्ली और अनेक क्षेत्रों में भारी सांप्रदायिक हिंसा हुई।
शरणार्थियों का विस्थापन हुआ।
धार्मिक पहचान पहले से कहीं अधिक राजनीतिक और भावनात्मक प्रश्न बन गई।
अयोध्या स्वयं विभाजन की सबसे बड़ी हिंसा का केंद्र नहीं थी, लेकिन राष्ट्रीय वातावरण से अलग भी नहीं रह सकती थी।
इसलिए 1947 के बाद किसी पुराने हिंदू-मुस्लिम धार्मिक स्थल विवाद का अर्थ 1930 के दशक जैसा नहीं रह गया था।
अब प्रत्येक ऐसी घटना का राष्ट्रीय प्रभाव हो सकता था।
30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या हुई।
इसके बाद केंद्र सरकार और कांग्रेस नेतृत्व हिंदू सांप्रदायिक संगठनों तथा धार्मिक उग्रवाद को लेकर विशेष रूप से सतर्क हुआ।
लेकिन इसी अवधि में कांग्रेस के भीतर भी धर्म और राजनीति के संबंध पर एक समान दृष्टिकोण नहीं था।
कुछ नेता नेहरू की अधिक स्पष्ट धर्मनिरपेक्ष राज्य-दृष्टि के करीब थे।
दूसरे नेता भारतीय धार्मिक परंपराओं और हिंदू जनभावनाओं के सार्वजनिक राजनीतिक उपयोग को सहज मानते थे।
अयोध्या में यह अंतर जल्द ही प्रत्यक्ष दिखाई देने वाला था।
1948 में फैजाबाद विधानसभा क्षेत्र का उपचुनाव अयोध्या के आधुनिक राजनीतिक इतिहास में विशेष महत्व रखता है।
समाजवादी नेता आचार्य नरेंद्र देव कांग्रेस से अलग होकर चुनाव मैदान में थे।
कांग्रेस ने उनके मुकाबले बाबा राघव दास को प्रत्याशी बनाया।
राघव दास धार्मिक व्यक्तित्व होने के साथ गांधीवादी और कांग्रेस कार्यकर्ता भी थे।
चुनाव प्रचार में अयोध्या की धार्मिक पहचान का स्पष्ट उपयोग हुआ। समकालीन और बाद के विवरणों में दर्ज है कि नरेंद्र देव को “नास्तिक” बताकर प्रश्न उठाया गया कि राम की नगरी ऐसे व्यक्ति को कैसे स्वीकार करेगी। बाबा राघव दास ने 5,392 मत प्राप्त किए और नरेंद्र देव को 4,080; अंतर 1,312 मतों का था।
यह चुनाव अयोध्या के लिए एक महत्वपूर्ण परिवर्तन था।
धार्मिक प्रश्न अब स्थानीय मंदिर-मस्जिद विवाद से चुनावी राजनीति में प्रवेश कर रहा था।
इसे पूरी तरह केवल राम मंदिर जनमत-संग्रह कहना अतिशयोक्ति होगी।
आचार्य नरेंद्र देव और कांग्रेस के बीच वैचारिक तथा संगठनात्मक संघर्ष पहले से था।
सोशलिस्ट धड़ा कांग्रेस से अलग हो चुका था।
प्रत्याशी चयन और स्थानीय राजनीतिक समीकरण भी महत्वपूर्ण थे।
लेकिन यह भी स्पष्ट है कि चुनाव प्रचार में अयोध्या, राम और नरेंद्र देव की कथित नास्तिकता का प्रभावी राजनीतिक उपयोग हुआ।
इसलिए अधिक सटीक निष्कर्ष यह है—
1948 के फैजाबाद उपचुनाव ने राम और अयोध्या के धार्मिक प्रतीकों की चुनावी क्षमता को पहली बार स्वतंत्र भारत की राजनीति में स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया।
उस समय संयुक्त प्रांत—जो शीघ्र ही उत्तर प्रदेश कहलाने वाला था—के प्रमुख/मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत थे।
पंत कांग्रेस के बड़े राष्ट्रीय नेता थे।
1948 के उपचुनाव में उन्होंने बाबा राघव दास का समर्थन किया और नरेंद्र देव के विरुद्ध धार्मिक-सांस्कृतिक भाषा का उपयोग किए जाने के विवरण मिलते हैं।
यही तथ्य बाद के अयोध्या विवाद में महत्वपूर्ण बनता है।
क्योंकि दिसंबर 1949 की घटना के समय भी वही पंत राज्य सरकार का नेतृत्व कर रहे थे।
अर्थात स्वतंत्र भारत के शुरुआती अयोध्या संकट को केवल “स्थानीय अधिकारियों बनाम केंद्र” के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता।
राज्य कांग्रेस के भीतर स्वयं अलग राजनीतिक प्रवृत्तियां मौजूद थीं।
राघव दास की जीत ने अयोध्या के धार्मिक समूहों को यह संदेश दिया कि धार्मिक मुद्दा चुनावी समर्थन जुटा सकता है।
कुछ बाद के विवरणों में कहा गया है कि उन्होंने विधायक बनने के बाद राम जन्मभूमि मंदिर संबंधी मांग का समर्थन किया और 1949 में सरकार से निर्माण की अनुमति के लिए संपर्क किया।
यहां दस्तावेजी स्तर पर सावधानी आवश्यक है—उनकी प्रत्येक कथित सार्वजनिक प्रतिज्ञा या बयान का समान दर्जे का प्राथमिक स्रोत उपलब्ध नहीं है।
लेकिन इतना निर्विवाद है कि राघव दास 1949 के अयोध्या वातावरण में मंदिर समर्थक धार्मिक समूहों के निकट दिखाई देते हैं और मूर्तियां हटाने के बाद की संभावनाओं पर उन्होंने विरोध व्यक्त किया।
अयोध्या का स्वतंत्र भारत वाला चरण शुरू से ही कांग्रेस की आंतरिक द्वंद्वात्मकता से जुड़ा था।
एक ओर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू थे, जो धार्मिक स्थल के बलपूर्वक स्थिति परिवर्तन को नए भारत के लिए खतरनाक मिसाल मानते थे।
दूसरी ओर उत्तर प्रदेश की राजनीति में ऐसे कांग्रेस नेता मौजूद थे जो हिंदू धार्मिक भावना के साथ अधिक निकट राजनीतिक संवाद रखते थे।
यह अंतर दिसंबर 1949 के बाद खुलकर सामने आया।
लेकिन उसकी राजनीतिक पृष्ठभूमि 1948 के उपचुनाव में ही दिखाई देने लगी थी।
स्वतंत्रता के बाद मुस्लिम पक्ष केवल धार्मिक उपयोग पर निर्भर नहीं था।
उसे वक्फ प्रशासन से संबंधित दस्तावेज भी विरासत में मिले।
U.P. मुस्लिम वक्फ अधिनियम, 1936 के अंतर्गत वक्फ संपत्तियों की जांच की गई थी।
बाद के मुकदमों में मुस्लिम पक्ष ने दावा किया कि बाबरी मस्जिद को सुन्नी जन वक्फ माना गया और उससे संबंधित सूची 26 फरवरी 1944 के संयुक्त प्रांत सरकारी गजट में प्रकाशित हुई।
यह तथ्य महत्वपूर्ण था क्योंकि स्वतंत्रता के समय मुस्लिम पक्ष अपने दावे को केवल “हम यहां नमाज पढ़ते हैं” तक सीमित नहीं मानता था।
उसके पास वैधानिक वक्फ वर्गीकरण का भी दावा था।
1944 की गजट प्रविष्टि स्वयं आगे विवादित हुई।
हिंदू पक्ष ने स्थान-नाम, प्रविष्टि की शुद्धता और वक्फ जांच की कानूनी बाध्यता पर गंभीर प्रश्न उठाए। न्यायिक रिकॉर्ड में यहां तक तर्क दिया गया कि संबंधित प्रविष्टि “कस्बा शाहनवा” बताती थी, न कि साफ तौर पर रामकोट-अयोध्या।
इसलिए 1944 का गजट मुस्लिम पक्ष के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज था, लेकिन वह बाद में बिना चुनौती स्वीकार किया गया अंतिम स्वामित्व-अधिकार प्रमाणपत्र नहीं बना।
यह अंतर आवश्यक है।
अयोध्या के मुस्लिम दावे को भी एकरूप नहीं समझना चाहिए।
मस्जिद सुन्नी वक्फ थी या शिया वक्फ—इस पर भी विवाद हुआ।
शिया पक्ष ने तर्क दिया कि यदि निर्माता मीर बाकी शिया था, तो वक्फ भी शिया होना चाहिए।
1945 में इस प्रश्न पर मुकदमा हुआ और उपलब्ध न्यायिक इतिहास के अनुसार 1946 में निर्णय सुन्नी पक्ष के अनुकूल रहा।
यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है।
1947 तक आते-आते “मुस्लिम पक्ष” भी अंदरूनी कानूनी विवादों से गुजर चुका था।
1947 में अयोध्या की स्थिति को केवल हिंदू बनाम मुस्लिम में नहीं समेटना चाहिए।
विवाद के कम-से-कम तीन स्तर थे—
धार्मिक स्थल की हिंदू जन्मस्थान परंपरा।
मस्जिद और मुस्लिम पूजा-अधिकार।
मस्जिद की वक्फ प्रकृति और सुन्नी-शिया प्रशासनिक दावा।
इसके ऊपर ब्रिटिश-निर्मित भीतरी/बाहरी प्रांगण व्यवस्था थी।
यानी स्वतंत्र भारत ने पहले दिन से ही अत्यंत जटिल विधिक inheritance पाया।
स्वतंत्रता के बाद अयोध्या में एक मनोवैज्ञानिक परिवर्तन भी आया।
औपनिवेशिक शासन समाप्त हो चुका था।
कुछ हिंदू धार्मिक समूहों में यह भावना विकसित हुई कि अब पुराने धार्मिक दावों की पुनर्समीक्षा संभव हो सकती है।
यही वातावरण राम जन्मस्थान प्रश्न को पुनः सक्रिय करता है।
यहां इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि अभी विश्व हिंदू परिषद का अस्तित्व नहीं था और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्रीय राम मंदिर आंदोलन नहीं चला रहा था।
आंदोलन की ऊर्जा मुख्यतः स्थानीय संत-महंत नेटवर्क, हिंदू महासभा से जुड़े तत्वों और अन्य धार्मिक समूहों से आ रही थी।
1940 के दशक के अंत में हिंदू महासभा राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस की तुलना में बहुत छोटी शक्ति थी, लेकिन धार्मिक मुद्दों पर उसका विचारात्मक प्रभाव कुछ क्षेत्रों में बना हुआ था।
अयोध्या में भी उसके समर्थकों और स्थानीय साधु-संतों के बीच संपर्क था।
महात्मा गांधी की हत्या के बाद हिंदू महासभा राजनीतिक दबाव में थी, लेकिन राम जन्मभूमि जैसे मुद्दे उसके वैचारिक ढांचे से मेल खाते थे।
हालांकि 1949 की घटना को किसी एक संगठन का औपचारिक आदेश साबित करना अलग प्रश्न है।
1949 में अयोध्या में रामायण-पाठ, कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों की सक्रियता बढ़ी।
अखिल भारतीय रामायण महासभा से जुड़े कार्यक्रमों का उल्लेख बाद के इतिहास में मिलता है।
दिसंबर 1949 की घटना से ठीक पहले विवादित स्थल के आसपास निरंतर धार्मिक गतिविधि और बड़ी संख्या में साधुओं तथा श्रद्धालुओं की उपस्थिति बढ़ रही थी।
यह धीरे-धीरे प्रशासन के लिए सुरक्षा प्रश्न बनने लगा।
12 नवंबर 1949 को क्षेत्र में पुलिस धरना तैनात की गई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे दिसंबर की घटना से पहले की महत्वपूर्ण प्रशासनिक कार्रवाई के रूप में दर्ज किया।
इसका अर्थ है—
प्रशासन को नवंबर के मध्य तक यह महसूस हो चुका था कि स्थल सामान्य धार्मिक दिनचर्या से अधिक संवेदनशील हो रहा है।
यदि कोई खतरा नहीं था, तो विशेष पुलिस तैनाती की आवश्यकता नहीं पड़ती।
29 नवंबर को फैजाबाद के पुलिस अधीक्षक कृपाल सिंह ने जिला मजिस्ट्रेट के. के. के. नायर को अत्यंत महत्वपूर्ण पत्र लिखा।
उन्होंने स्थल का निरीक्षण किया था।
उनके अनुसार मस्जिद के आसपास अनेक हवन-कुंड बनाए जा रहे थे।
ईंट और चूना मौजूद था।
पूर्णिमा पर बड़े कीर्तन और यज्ञ की योजना थी।
बाहर से हजारों हिंदू, बैरागी और साधुओं के आने की संभावना थी।
और उन्हें आशंका थी कि ऐसी व्यवस्था बनाई जा सकती है जिससे मुसलमानों का मस्जिद तक प्रवेश कठिन होता जाए।
यह पूरे 1949 प्रकरण का एक निर्णायक दस्तावेज है।
पुलिस अधीक्षक ने केवल भीड़ की आशंका नहीं जताई थी।
सर्वोच्च न्यायालय के सार में यह भी दर्ज है कि प्रशासन को आशंका थी कि हिंदू मस्जिद में जबरन प्रवेश कर देवता की मूर्तियां स्थापित कर सकते हैं।
यानी दिसंबर 22–23 की घटना प्रशासन के लिए पूरी तरह अकल्पनीय नहीं थी।
उसकी प्रकृति की अग्रिम आशंका लिखित रिकॉर्ड में मौजूद थी।
यही तथ्य बाद में प्रशासन की भूमिका पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
उस समय फैजाबाद के डिप्टी कमिश्नर/जिला मजिस्ट्रेट के. के. के. नायर थे।
वे आगे इस पूरे विवाद के सबसे चर्चित प्रशासनिक व्यक्तियों में से एक बने।
उनकी भूमिका पर दो बिल्कुल विपरीत दृष्टियां हैं।
एक दृष्टि उन्हें ऐसे अधिकारी के रूप में देखती है जिसने हिंदू जनभावना और संभावित रक्तपात के कारण मूर्तियां हटाने से इनकार किया।
दूसरी दृष्टि उन पर आरोप लगाती है कि प्रशासन को अग्रिम सूचना होने के बावजूद पर्याप्त रोकथाम नहीं की गई।
2019 के सर्वोच्च न्यायालय ने प्रशासन के पास पूर्व चेतावनी होने का पूरा क्रम दर्ज किया, लेकिन किसी व्यक्तिगत आपराधिक षड्यंत्र का निर्णय नहीं दिया।
सर्वोच्च न्यायालय ने दर्ज किया कि 6 दिसंबर 1949 को नायर ने उत्तर प्रदेश के गृह सचिव को लिखकर मुसलमानों द्वारा मस्जिद की सुरक्षा को लेकर व्यक्त आशंकाओं को अधिक महत्व न देने की सलाह दी।
यह पत्र बाद की घटनाओं की रोशनी में विशेष महत्व रखता है।
क्योंकि इसके तीन सप्ताह से भी कम समय बाद वही आशंका वास्तविक घटना में बदल गई।
इससे प्रशासनिक निर्णय पर गंभीर प्रश्न उठता है—
क्या खतरे का कम आकलन किया गया?
12 दिसंबर को वक्फ निरीक्षक की रिपोर्ट में कहा गया कि नमाज पढ़ने आने वाले मुसलमानों को हिंदुओं द्वारा परेशान किया जा रहा था। सर्वोच्च न्यायालय ने इस रिपोर्ट को भी दिसंबर 1949 की घटना की पूर्वपीठिका के रूप में दर्ज किया।
इससे स्पष्ट है कि घटनास्थल पर तनाव केवल अफवाह नहीं था।
मुस्लिम धार्मिक उपयोग पर वास्तविक दबाव की शिकायत सरकारी तंत्र तक पहुंच चुकी थी।
नवंबर-दिसंबर 1949 की घटनाओं को क्रम में रखें—
पुलिस धरना।
हवन-कुंड।
बड़े धार्मिक कार्यक्रम की तैयारी।
ईंट और चूना।
बाहर से साधुओं की संभावित भीड़।
मस्जिद प्रवेश कठिन होने की आशंका।
मूर्ति स्थापना का जोखिम।
मुस्लिम नमाजियों की उत्पीड़न शिकायत।
यह सब 22–23 दिसंबर से पहले हो चुका था।
इसलिए 1949 का संकट अचानक आकाश से नहीं गिरा।
वह धीरे-धीरे बन रहा था।
यही इतिहास का कठिन प्रश्न है।
पुलिस तैनात थी।
प्रशासन के पास चेतावनी थी।
राज्य सरकार को भी शिकायतें और सूचनाएं पहुंच रही थीं।
इसके बावजूद स्थल पर वह परिवर्तन हुआ जिसने अगले सात दशकों का न्यायिक इतिहास बदल दिया।
इस आधार पर यह कहना उचित है कि निवारक प्रशासन विफल रही।
लेकिन किस स्तर पर और किस व्यक्ति की कितनी जिम्मेदारी थी—इसके लिए अलग-अलग दस्तावेजों का परीक्षण आवश्यक है।
दिसंबर 1949 से पहले अयोध्या में विभिन्न साधु-संत समूहों की धार्मिक सक्रियता बढ़ी हुई थी।
बाबा अभिराम दास का नाम आगे 22–23 दिसंबर की घटना से विशेष रूप से जुड़ता है।
वह हनुमानगढ़ी की एक परंपरा से जुड़े साधु थे और 1948 के चुनावी वातावरण में भी धार्मिक राजनीति के समर्थक माने जाते थे।
उनकी वास्तविक भूमिका का विस्तृत परीक्षण अगले अध्याय में प्राथमिकी और अन्य अभिलेखों के आधार पर किया जाएगा।
यहां इतना पर्याप्त है कि 1949 के अंत तक स्थानीय संत-नेटवर्क निष्क्रिय नहीं था।
फैजाबाद के कांग्रेस विधायक बाबा राघव दास की भूमिका भी महत्वपूर्ण थी।
उनकी 1948 की चुनावी जीत धार्मिक पहचान की राजनीति से जुड़ी रही थी।
दिसंबर 1949 के बाद वे मूर्तियां हटाए जाने के विरोध में सामने आए और कुछ विवरणों के अनुसार उन्होंने ऐसा होने पर पद छोड़ने की चेतावनी तक दी।
यह तथ्य दिखाता है कि राम जन्मभूमि प्रश्न कांग्रेस बनाम गैर-कांग्रेस की सरल रेखा में विभाजित नहीं था।
मंदिर समर्थक भावना स्वयं कांग्रेस के भीतर मौजूद थी।
जवाहरलाल नेहरू का दृष्टिकोण राष्ट्रीय था।
विभाजन के बाद वे किसी भी ऐसे धार्मिक स्थल परिवर्तन को लेकर चिंतित थे जिससे अल्पसंख्यकों में असुरक्षा बढ़े और भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि प्रभावित हो।
उत्तर प्रदेश के स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व के सामने अलग दबाव थे—
अयोध्या के संत।
स्थानीय हिंदू जनभावना।
कांग्रेस संगठन।
कानून-व्यवस्था।
और संभावित सांप्रदायिक हिंसा।
यहीं केंद्र और राज्य की राजनीतिक प्राथमिकताएं अलग दिखाई देने लगीं।
घटना के तुरंत बाद 26 दिसंबर को नेहरू ने गोविंद बल्लभ पंत को तार भेजा।
उन्होंने कहा कि वे अयोध्या के घटनाक्रम से परेशान हैं और इसे एक “खतरनाक मिसाल” के रूप में देखते हैं जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
यह पत्र बाद की केंद्र-राज्य बहस की शुरुआत था।
नेहरू का मुख्य भय केवल अयोध्या नहीं था।
उनके लिए प्रश्न था—
यदि धार्मिक स्थल का स्वरूप स्थानीय जनदबाव से बदल सकता है, तो नए भारतीय राज्य की प्रकृति क्या होगी?
यहीं एक सीमा खींचना आवश्यक है।
22–23 दिसंबर की घटना के बाद—
प्राथमिकी दर्ज हुई।
मूर्तियों को हटाने का प्रश्न उठा।
नायर ने असहमति जताई।
राज्य सरकार और केंद्र के बीच पत्राचार हुआ।
29 दिसंबर को धारा 145 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत कुर्की की प्रक्रिया शुरू हुई।
ये सब अगले अध्यायों में विस्तार से आएंगे।
इस अध्याय का मुख्य उद्देश्य यह स्थापित करना है कि दिसंबर 1949 का संकट किन राजनीतिक और प्रशासनिक परिस्थितियों से पैदा हुआ।
स्वतंत्रता का एक मनोवैज्ञानिक अर्थ भी था।
कुछ धार्मिक समूहों में यह धारणा थी कि विदेशी शासन के समाप्त हो जाने के बाद ऐतिहासिक धार्मिक grievances पर नया विचार होना चाहिए।
सोमनाथ पुनर्निर्माण भी लगभग इसी व्यापक सांस्कृतिक वातावरण का हिस्सा था।
अयोध्या के संदर्भ में यह भावना स्थानीय संतों और मंदिर समर्थक कार्यकर्ताओं में अधिक तीव्र रूप में दिखाई दी।
यहां सावधानी आवश्यक है—
सोमनाथ सरकारी नीति और अयोध्या की स्थानीय रणनीति एक जैसी घटनाएं नहीं थीं।
लेकिन स्वतंत्रता के बाद धार्मिक पुनर्स्थापना की व्यापक मानसिकता को समझने में दोनों का संदर्भ उपयोगी है।
अयोध्या के मुसलमानों के लिए परिस्थिति बिल्कुल अलग थी।
विभाजन के बाद वे ऐसे भारत में अल्पसंख्यक बने थे जिसने स्वयं को सभी नागरिकों का राज्य घोषित किया था।
उनके लिए बाबरी मस्जिद का धार्मिक उपयोग केवल स्थानीय भूमि-अधिकार नहीं, नए राज्य की अल्पसंख्यक सुरक्षा की परीक्षा भी बन सकता था।
यदि प्रशासन पहले से चेतावनी के बावजूद मस्जिद में अनधिकृत धार्मिक परिवर्तन न रोक सके, तो इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव स्थानीय विवाद से कहीं बड़ा होना स्वाभाविक था।
संविधान अभी 26 जनवरी 1950 को लागू होना था।
लेकिन दिसंबर 1949 में अयोध्या ने उस संविधान की आने वाली मूल अवधारणाओं की परीक्षा पहले ही शुरू कर दी—
धार्मिक स्वतंत्रता।
समानता।
संपत्ति।
कानून का शासन।
अल्पसंख्यक सुरक्षा।
राज्य की निष्पक्षता।
यही कारण है कि 1949 को केवल राम मंदिर आंदोलन की धार्मिक घटना कहना अधूरा होगा।
वह स्वतंत्र भारतीय राज्य की प्रारंभिक संवैधानिक परीक्षा भी थी।
क्योंकि कांग्रेस उस समय केवल राजनीतिक दल नहीं, लगभग संपूर्ण राष्ट्रीय राजनीतिक स्पेक्ट्रम को समेटे हुए थी।
उसमें—
धर्मनिरपेक्ष आधुनिकतावादी।
गांधीवादी धार्मिक नेता।
हिंदू सांस्कृतिक परंपरावादी।
समाजवादी पृष्ठभूमि वाले लोग।
रूढ़िवादी नेता।
सभी प्रवृत्तियां मौजूद थीं।
इसलिए अयोध्या पर एकदम एकरूप कांग्रेस नीति अपेक्षित करना ऐतिहासिक वास्तविकता को सरल बनाना होगा।
1948 का चुनाव और 1949 का संकट इसी आंतरिक विविधता को उजागर करते हैं।
ऐसा कहना भी अतिशयोक्ति होगा।
राम जन्मस्थान विवाद उससे बहुत पुराना था।
स्थानीय संतों और हिंदू धार्मिक समूहों की स्वतंत्र भूमिका थी।
हिंदू महासभा जैसे संगठन भी सक्रिय थे।
लेकिन यह भी ऐतिहासिक तथ्य है कि 1948 के फैजाबाद उपचुनाव में कांग्रेस नेताओं ने राम-अयोध्या प्रतीकों का चुनावी उपयोग किया और बाबा राघव दास जैसे धार्मिक व्यक्तित्व को नरेंद्र देव के विरुद्ध उतारा।
इसलिए कांग्रेस को उस शुरुआती राजनीतिककरण से पूरी तरह बाहर रखना भी सही नहीं होगा।
बाद के राजनीतिक साहित्य में कभी-कभी 1949 की पूरी घटना सीधे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खाते में डाल दी जाती है।
दूसरी ओर विरोधी साहित्य उसे पूरी तरह स्थानीय स्वतःस्फूर्त घटना बताता है।
उपलब्ध सर्वोच्च न्यायालय रिकॉर्ड दिसंबर 1949 की घटना में 50–60 हिंदुओं द्वारा मूर्तियां रखे जाने, प्रशासनिक पूर्व चेतावनी और प्राथमिकी को स्पष्ट रूप से दर्ज करता है, लेकिन इस हिस्से में वह किसी राष्ट्रीय संगठन के औपचारिक आदेश की न्यायिक निष्कर्ष नहीं करता।
इसलिए संगठनात्मक जिम्मेदारी के प्रश्न पर वही कहा जाना चाहिए जो प्रमाणित हो।
यह ऐतिहासिक कालक्रम बहुत महत्वपूर्ण है।
विश्व हिंदू परिषद की स्थापना 1964 में हुई।
भारतीय जनसंघ 1951 में बना।
भारतीय जनता पार्टी 1980 में।
इसलिए 1949 की घटना को सीधे बाद की विश्व हिंदू परिषद-भारतीय जनता पार्टी आंदोलन संरचना पर आरोपित करना कालक्रम की दृष्टि से गलत होगा।
उस समय की वास्तविक शक्तियां अलग थीं—
स्थानीय संत-महंत।
हिंदू महासभा से संबंधित धाराएं।
कांग्रेस के स्थानीय धार्मिक-रूढ़िवादी तत्व।
प्रशासन।
और स्थानीय मुस्लिम धार्मिक नेतृत्व।
यदि 1949 के पूरे संकट से केवल एक पूर्व-घटना दस्तावेज चुनना हो तो 29 नवंबर का पुलिस अधीक्षक पत्र सबसे महत्वपूर्णों में होगा।
क्योंकि उसमें वह लगभग पूरी संभावित प्रक्रिया दिखाई देती है जो आगे वास्तविकता बनी—
धार्मिक घेराव।
बड़ी भीड़।
मस्जिद तक मुस्लिम पहुंच में बाधा।
और मूर्ति स्थापना की आशंका।
इतिहास में ऐसी चेतावनियां बाद की जिम्मेदारी तय करने में बहुत महत्वपूर्ण होती हैं।
यह प्रश्न दशकों से विवादित है।
प्रमाणित तथ्य हैं—
पूर्व चेतावनी थी।
पुलिस धरना थी।
पुलिस अधीक्षक ने खतरा बताया।
वक्फ निरीक्षक ने उत्पीड़न बताया।
जिलाधिकारी ने खतरे को अपेक्षाकृत कम गंभीर माना।
और अंततः मूर्तियां भीतर रखी गईं।
इन तथ्यों से निवारक विफलता निष्कर्षित होता है।
लेकिन “पूर्वनियोजित सरकारी मिलीभगत” का मजबूत आरोप लगाने के लिए अलग और अधिक प्रत्यक्ष प्रमाण चाहिए।
शोध में दोनों के बीच सीमा रखना आवश्यक है।
राम जन्मभूमि ने स्वतंत्र भारत को बहुत जल्दी यह सिखा दिया कि धार्मिक प्रश्न केवल कानून से नियंत्रित नहीं होते।
यदि—
स्थानीय आस्था गहरी हो,
संत नेटवर्क संगठित हो,
राजनीतिक नेतृत्व विभाजित हो,
प्रशासन असमंजस में हो,
और भीड़ संगठित करना हो जाए,
तो छोटी प्रशासनिक देरी भी स्थायी ऐतिहासिक परिवर्तन पैदा कर सकती है।
दिसंबर 1949 इसका क्लासिक उदाहरण बनने वाला था।
दिसंबर 1949 की घटना से पहले भी सरकार के सामने व्यापक रूप से तीन रास्ते थे।
ब्रिटिश यथास्थिति को कठोर सुरक्षा के साथ जारी रखना।
दोनों पक्षों को अदालत में अंतिम स्वामित्व-अधिकार न्यायनिर्णयन के लिए भेजना।
राजनीतिक/धार्मिक समझौते से नया समाधान खोजना।
वास्तविकता में सरकार पहले विकल्प पर बनी रही, लेकिन उसे पर्याप्त सुरक्षा के साथ लागू नहीं कर सकी।
घटना होने के बाद तीसरे और पहले दोनों विकल्प लगभग असंभव हो गए और मामला न्यायालय की ओर बढ़ गया।
1885 में मामला फैजाबाद अदालत का स्थानीय विवाद था।
1949 तक स्थिति बदल चुकी थी।
अब इसमें—
उत्तर प्रदेश सरकार।
प्रधानमंत्री।
केंद्रीय नेतृत्व।
वक्फ प्रशासन।
कांग्रेस विधायक।
राष्ट्रीय धार्मिक समूह।
और प्रेस—
सभी की रुचि होने लगी।
यानी अयोध्या का स्थानीय विवाद स्वतंत्रता के केवल ढाई वर्ष बाद राष्ट्रीय राजनीतिक प्रश्न बनने की दिशा में कदम रख चुका था।
1947 — स्वतंत्रता और विभाजन; ब्रिटिश भीतरी/बाहरी प्रांगण यथास्थिति नई भारतीय सरकार को विरासत में मिला।
1948 — फैजाबाद विधानसभा उपचुनाव; कांग्रेस के बाबा राघव दास ने आचार्य नरेंद्र देव को 1,312 मतों से हराया; चुनाव प्रचार में राम और अयोध्या की धार्मिक भाषा महत्वपूर्ण रही।
1949 के दौरान — स्थानीय मंदिर समर्थक धार्मिक सक्रियता तेज हुई।
12 नवंबर 1949 — विवादित स्थल पर पुलिस धरना तैनात।
29 नवंबर 1949 — पुलिस अधीक्षक कृपाल सिंह ने जिलाधिकारी K. K. K. Nair को मस्जिद के आसपास हवन-कुंड, निर्माण सामग्री, बड़ी धार्मिक भीड़ और संभावित जबरन प्रवेश की गंभीर चेतावनी दी।
6 दिसंबर 1949 — नायर ने राज्य सरकार से मुस्लिम आशंकाओं को अधिक महत्व न देने की बात कही।
12 दिसंबर 1949 — वक्फ निरीक्षक ने नमाज के लिए आने वाले मुसलमानों को परेशान किए जाने की रिपोर्ट दी।
22–23 दिसंबर 1949 — निर्णायक घटना; केंद्रीय गुंबद के नीचे रामलला की मूर्तियां रखी गईं। सर्वोच्च न्यायालय ने बाद में दर्ज किया कि लगभग 50–60 व्यक्तियों ने यह कार्य किया।
यह अंतिम घटना अगले अध्याय का केंद्र होगी।
1947 के बाद अयोध्या का विवाद किसी नई सरकार द्वारा उत्पन्न नहीं किया गया था।
लेकिन स्वतंत्र भारत की राजनीति ने उसे नई परिस्थितियां अवश्य प्रदान कीं।
1948 का फैजाबाद उपचुनाव दिखाता है कि अयोध्या और राम के धार्मिक प्रतीक चुनावी राजनीति में उपयोग होने लगे थे।
कांग्रेस स्वयं इस प्रश्न पर एकरूप नहीं थी।
स्थानीय और प्रांतीय नेता धार्मिक जनभावनाओं के साथ संवाद कर रहे थे, जबकि नेहरू राष्ट्रीय राज्य के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को लेकर अधिक चिंतित थे।
साथ ही मुस्लिम पक्ष के पास मस्जिद उपयोग और वक्फ व्यवस्था से जुड़े अपने कानूनी दावे थे। 1944 के गजट तथा सुन्नी-शिया मुकदमेबाजी ने इस संस्थागत आयाम को और जटिल बना दिया था।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दिसंबर 1949 की घटना से पहले प्रशासन को पर्याप्त संकेत मिल चुके थे।
पुलिस अधीक्षक ने लिखित चेतावनी दी।
मुस्लिम नमाजियों के उत्पीड़न की रिपोर्ट आई।
पुलिस धरना मौजूद थी।
इसके बावजूद निर्णायक परिवर्तन रोका नहीं जा सका।
इसलिए स्वतंत्र भारत में अयोध्या की पहली बड़ी कहानी धार्मिक विवाद जितनी ही प्रशासनिक विफलता और राजनीतिक असमंजस की भी कहानी है।
1947 से दिसंबर 1949 के बीच अयोध्या तीन युगों के बीच खड़ी थी।
पीछे था औपनिवेशिक यथास्थिति का लगभग एक शताब्दी पुराना ढांचा।
सामने था नया लोकतांत्रिक और शीघ्र ही संवैधानिक गणराज्य।
और बीच में थीं वे धार्मिक आकांक्षाएं जिन्हें ब्रिटिश शासन कभी स्थायी रूप से हल नहीं कर पाया।
1948 के चुनाव ने दिखाया कि राम और अयोध्या अब स्वतंत्र भारत में भी राजनीतिक शक्ति रखते हैं।
1949 की धार्मिक सक्रियता ने दिखाया कि स्थानीय संत और मंदिर समर्थक समूह यथास्थिति से संतुष्ट नहीं थे।
नवंबर-दिसंबर की पुलिस और वक्फ रिपोर्टों ने स्पष्ट कर दिया कि संकट निकट था।
फिर भी राज्य उसे रोकने में सफल नहीं हुआ।
यही वह क्षण है जहां अयोध्या का इतिहास निर्णायक रूप से बदल जाता है।
22–23 दिसंबर 1949 की रात के बाद वही तीन-गुंबद वाला ढांचा, जिसमें अंदर मुस्लिम धार्मिक उपयोग और बाहर हिंदू पूजा लगभग नौ दशकों से अलग-अलग चल रही थी, अपनी पुरानी व्यवस्था में कभी वापस नहीं लौट सका।
और यहीं से अयोध्या विवाद का आधुनिक न्यायिक युग शुरू होता है।
अगला अध्याय 13 — “22–23 दिसंबर 1949 : रामलला की मूर्तियों का प्रकट होना/स्थापना” होगा। उसमें हम घंटे-दर-घंटे उपलब्ध घटनाक्रम, प्राथमिकी, रामदुबे की रिपोर्ट, अभिराम दास और नामजद व्यक्तियों, 50–60 लोगों के प्रवेश संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के निष्कर्ष, “प्रकट होने” की धार्मिक कथा और “स्थापना” की प्रशासनिक/न्यायिक भाषा—दोनों को अलग रखकर, स्रोत-दर-स्रोत विस्तार से देखेंगे।