नेहरू, गोविंद बल्लभ पंत और उत्तर प्रदेश सरकार के बीच पत्राचार : अयोध्या पर केंद्र–राज्य का वैचारिक और प्रशासनिक टकराव
1949 के बाद न्यायिक संघर्ष
दिसंबर 1949 की अयोध्या घटना के बाद जो पत्राचार सामने आया, वह स्वतंत्र भारत के शुरुआती राजनीतिक इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेजी अध्याय है। इसमें केवल जवाहरलाल नेहरू और गोविंद बल्लभ पंत के बीच मतभेद नहीं दिखते; इसके भीतर नवस्वतंत्र भारतीय राज्य की बुनियादी दुविधा दिखाई देती है—कानून का शासन बनाम तत्काल कानून-व्यवस्था, अल्पसंख्यक सुरक्षा बनाम बहुसंख्यक धार्मिक जनभावना, केंद्र की राष्ट्रीय दृष्टि बनाम प्रांतीय सरकार की जमीनी राजनीतिक विवशताएं।
इस पत्राचार को ध्यान से पढ़ने पर एक बात बहुत स्पष्ट होती है: नेहरू अयोध्या को कभी केवल फैजाबाद जिले की स्थानीय घटना नहीं मान रहे थे। उनके लिए यह भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र, मुस्लिम नागरिकों के विश्वास, पाकिस्तान के साथ संबंधों और यहां तक कि कश्मीर पर भारत की नैतिक स्थिति से जुड़ा राष्ट्रीय प्रश्न था। दूसरी ओर पंत स्थिति को अधिक व्यावहारिक प्रशासनिक नजरिए से देख रहे थे—वे कार्रवाई चाहते थे, लेकिन अयोध्या में तत्काल टकराव और बड़े दंगे से बचना भी चाहते थे।
22–23 दिसंबर की रात मूर्तियां विवादित ढांचे के केंद्रीय गुंबद के नीचे पहुंचीं। केवल तीन दिन बाद, 26 दिसंबर 1949, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने गोविंद बल्लभ पंत को तार भेजा।
उस तार की भाषा संक्षिप्त थी, लेकिन उसका अर्थ अत्यंत गंभीर था। नेहरू ने लिखा कि वे अयोध्या के घटनाक्रम से परेशान हैं, पंत से व्यक्तिगत हस्तक्षेप की अपेक्षा की और चेतावनी दी कि वहां एक “खतरनाक मिसाल” बन रही है जिसके बुरे परिणाम होंगे।
इस तार के तीन शब्द पूरे नेहरू दृष्टिकोण का सार हैं—
“खतरनाक उदाहरण being स्थापित.”
नेहरू की चिंता केवल यह नहीं थी कि मस्जिद में मूर्तियां रख दी गईं।
उनका बड़ा प्रश्न था—
यदि किसी धार्मिक समूह द्वारा प्रत्यक्ष कार्रवाई करके स्थल की यथास्थिति बदल दी जाए और राज्य उसे पलटने में असफल हो, तो स्वतंत्र भारत में आगे धार्मिक विवाद कैसे नियंत्रित होंगे?
यहां नेहरू के राजनीतिक मानस को समझना आवश्यक है।
1949 में विभाजन को दो वर्ष ही हुए थे।
पाकिस्तान के साथ संबंध तनावपूर्ण थे।
पूर्वी बंगाल में हिंदुओं की स्थिति को लेकर भारत में तीखा आक्रोश था।
कश्मीर संयुक्त राष्ट्र तक जा चुका था।
ऐसे समय में भारत स्वयं को पाकिस्तान से अलग एक ऐसे गणराज्य के रूप में प्रस्तुत कर रहा था जहां धार्मिक बहुमत राज्य की शक्ति का उपयोग अल्पसंख्यक धार्मिक अधिकारों को समाप्त करने में नहीं करेगा।
अयोध्या इस दावे की परीक्षा बन गई।
इसीलिए नेहरू बाद के पत्र में अयोध्या के परिणामों को “all-भारत कार्य” और विशेष रूप से “Kashmir” से जोड़ते हैं। 5 फरवरी 1950 के पत्र में उन्होंने पंत से अयोध्या की स्थिति की लगातार जानकारी मांगी और कहा कि इसके अखिल भारतीय तथा खासकर कश्मीर संबंधी प्रभावों को वे अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हैं।
पहली नजर में यह संबंध असामान्य लग सकता है।
लेकिन नेहरू की कूटनीतिक सोच स्पष्ट थी।
भारत कश्मीर में यह तर्क दे रहा था कि एक मुस्लिम-बहुल क्षेत्र धर्मनिरपेक्ष भारत का वैध हिस्सा हो सकता है और वहां मुसलमानों के अधिकार सुरक्षित हैं।
यदि उसी समय भारत के सबसे बड़े राज्य में किसी मस्जिद की धार्मिक स्थिति भीड़ की कार्रवाई से बदल जाए और सरकार उसे बहाल न करे, तो पाकिस्तान भारत के धर्मनिरपेक्ष दावे पर प्रश्न उठा सकता था।
इसीलिए अयोध्या नेहरू के लिए घरेलू कानून-व्यवस्था से अधिक अंतरराष्ट्रीय वैधता का प्रश्न भी थी।
26 दिसंबर के तार में नेहरू ने केवल “सरकार कार्रवाई करे” नहीं कहा।
उन्होंने पंत से कहा कि वे व्यक्तिगत रूप से इस मामले में रुचि लें।
यह संकेत देता है कि नेहरू इसे सामान्य जिला-प्रशासनिक मुद्दे के स्तर से ऊपर मान चुके थे।
उनके दृष्टिकोण में मामला इतना गंभीर था कि मुख्यमंत्री को सीधे देखना चाहिए।
यहीं से अयोध्या स्थानीय जिलाधिकारी की फाइल से निकलकर राष्ट्रीय राजनीतिक नेतृत्व की मेज पर आ जाती है।
गोविंद बल्लभ पंत की स्थिति नेहरू की तुलना में कहीं अधिक जटिल थी।
वे राष्ट्रीय नेता भी थे और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी।
अयोध्या उनके प्रदेश में थी।
जिला प्रशासन उन्हें बड़े रक्तपात का खतरा बता रहा था।
स्थानीय कांग्रेस नेता और संत-समाज मूर्तियां हटाने के पक्ष में नहीं थे।
दूसरी ओर प्रधानमंत्री पुराने यथास्थिति की बहाली चाहते थे।
इसलिए पंत को तीन दिशाओं से दबाव मिल रहा था—
दिल्ली से संवैधानिक-सांप्रदायिक दबाव।
फैजाबाद से कानून-व्यवस्था का दबाव।
स्थानीय राजनीति से धार्मिक दबाव।
यही उनके व्यवहार की धीमी और सावधान प्रकृति को समझने का संदर्भ है।
उपलब्ध नेहरू पत्राचार इसका समर्थन नहीं करता।
5 मार्च 1950 को किशोरीलाल मशरूवाला को लिखे पत्र में नेहरू ने स्पष्ट कहा कि पंत ने इस घटना की कई अवसरों पर निंदा की थी। साथ ही नेहरू ने यह भी लिखा कि पंत ने शायद बड़े पैमाने के दंगे के भय से निर्णायक कार्रवाई नहीं की।
यह अत्यंत महत्वपूर्ण प्रमाण है।
इससे दो बातें अलग हो जाती हैं—
पंत ने घटना को उचित नहीं माना।
लेकिन
उन्होंने उसे बलपूर्वक उलटने का जोखिम भी नहीं लिया।
यानी उनके रुख में स्वीकृति नहीं, प्रशासनिक संकोच दिखाई देता है।
5 मार्च 1950 के उसी पत्र में नेहरू ने उत्तर प्रदेश सरकार पर तीखी टिप्पणी की।
उनका आशय था कि सरकार ने बाहर से दृढ़ता दिखाई, लेकिन वास्तविक कार्रवाई बहुत कम की। उन्होंने फैजाबाद के जिला अधिकारी के व्यवहार पर भी कड़ी आपत्ति जताई और लिखा कि उसने घटना रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए।
यह नेहरू के दृष्टिकोण का सबसे स्पष्ट दस्तावेजी रूप है।
उनकी नजर में समस्या केवल 22–23 दिसंबर की रात के लोगों की नहीं थी।
उन्हें राज्य प्रशासन की निष्क्रियता भी अस्वीकार्य थी।
नेहरू के पत्र में फैजाबाद के जिला अधिकारी के लिए कठोर भाषा इस्तेमाल हुई।
नेहरू अभिलेखागार की संपादकीय टिप्पणी भी दर्ज करती है कि के. के. के. नायर ने मुख्य सचिव और पुलिस महानिरीक्षक की मूर्तियां हटाने संबंधी हिदायतें मानने से इनकार किया था और तर्क दिया था कि ऐसा करने से निर्दोष लोगों की जानों को व्यापक खतरा होगा। बाद में नायर को बदल दिया गया।
इससे स्पष्ट है कि नायर और राज्य सरकार के बीच वास्तविक प्रशासनिक मतभेद था।
यह महज बाद की राजनीतिक कथा नहीं है।
यह बिंदु खास तौर पर उल्लेखनीय है।
5 मार्च 1950 को नेहरू ने लिखा कि यह सही नहीं है कि बाबा राघव दास ने घटना को भड़काया था; लेकिन घटना हो जाने के बाद उन्होंने उसका समर्थन किया।
इससे एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सुधार मिलता है।
बाबा राघव दास की राजनीतिक-धार्मिक भूमिका महत्वपूर्ण थी।
लेकिन नेहरू स्वयं उन्हें मूर्ति-स्थापना का प्रत्यक्ष उकसाने वाला नहीं मान रहे थे।
इसलिए उन्हें 22–23 दिसंबर की योजना का मुख्य संचालक कहना प्रमाण से आगे जाना होगा।
7 जनवरी 1950 को नेहरू ने सी. राजगोपालाचारी को पत्र लिखा।
उन्होंने बताया कि वे पिछली रात पंत को अयोध्या के बारे में पत्र भेज चुके हैं। पंत ने बाद में टेलीफोन पर बात की और कहा कि वे बहुत चिंतित हैं तथा स्वयं मामले को देख रहे हैं। पंत कार्रवाई करना चाहते थे, लेकिन पहले कुछ प्रतिष्ठित हिंदुओं से अयोध्या के लोगों को परिस्थिति समझाने के लिए कहना चाहते थे।
यह छोटा-सा पत्र पंत के पूरे प्रशासनिक दृष्टिकोण को बहुत स्पष्ट करता है।
वे सीधा बल प्रयोग करने से पहले सामाजिक मध्यस्थता चाहते थे।
क्योंकि दिसंबर 1949 के बाद समस्या केवल कानून की नहीं रही थी।
रामलला के “प्राकट्य” की धार्मिक कथा फैल चुकी थी।
ऐसी स्थिति में यदि सरकार सीधे मूर्तियां हटाती तो उसका अर्थ केवल एक अवैध कब्जा हटाना नहीं समझा जाता।
बहुत से श्रद्धालु उसे भगवान की मूर्ति हटाने के रूप में देखते।
इसलिए पंत चाहते थे कि पहले ऐसे प्रतिष्ठित हिंदू नेता सामने आएं जिनकी धार्मिक-सामाजिक विश्वसनीयता हो और जो जनता को समझा सकें।
यह प्रशासनिक राजनीतिक बुद्धिमत्ता भी हो सकती थी, लेकिन नेहरू की दृष्टि से यह विलंब था।
यह प्रश्न अक्सर पूछा जाता है।
7 जनवरी के नेहरू-राजाजी पत्र में उल्लेख है कि वल्लभभाई पटेल पंत के अनुरोध पर लखनऊ जा रहे थे, लेकिन नेहरू स्वयं स्पष्ट करते हैं कि यह यात्रा संसद के चुनाव संबंधी विषय से जुड़ी थी।
इसलिए केवल इसी उल्लेख के आधार पर यह कहना कि पटेल अयोध्या समाधान के लिए लखनऊ भेजे गए थे, सही नहीं होगा।
अयोध्या से संबंधित नेहरू अभिलेखों में पटेल का नाम संदर्भित जरूर है, लेकिन उपलब्ध इस प्राथमिक पत्र से उनकी प्रत्यक्ष मध्यस्थ भूमिका सिद्ध नहीं होती।
यह शोध के लिए महत्वपूर्ण सावधानी है।
अयोध्या पर आधुनिक राजनीतिक विमर्श में कभी-कभी पटेल को नेहरू के विपरीत स्पष्ट “मंदिर समर्थक” रुख वाला नेता मान लिया जाता है।
सोमनाथ के प्रश्न पर पटेल की भूमिका अलग थी और दस्तावेजीकृत है।
लेकिन उससे यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि दिसंबर 1949 की अयोध्या घटना पर भी उनका वही प्रशासनिक रुख था।
दोनों मामलों का राजनीतिक और कानूनी चरित्र अलग था।
इसलिए इस अध्याय में हम पटेल के बारे में वही दर्ज करेंगे जो प्राथमिक दस्तावेज स्पष्ट रूप से दिखाते हैं।
7 जनवरी वाले पत्र की संपादकीय टिप्पणी यह भी बताती है कि 16 जनवरी 1950 को फैजाबाद की दीवानी अदालत में मुकदमा दायर हुआ।
अर्थात जनवरी के मध्य तक परिस्थिति बदल चुकी थी।
अब सरकार केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं कर रही थी।
विवाद न्यायिक संरक्षण की मांग के साथ अदालत में प्रवेश कर चुका था।
यही गोपाल सिंह विशारद वाद की शुरुआत थी, जिस पर आगे अलग अध्याय आएगा।
एक बार दीवानी मुकदमा दायर हो गया और अंतरिम आदेश आने लगे, तो प्रशासनिक विवेक सीमित होने लगा।
अब मूर्तियां हटाना केवल राजनीतिक-प्रशासनिक निर्णय नहीं रह सकता था।
न्यायालय के आदेश भी बीच में थे।
इस तरह दिसंबर 1949 की तत्काल संकट प्रबंधन व्यवस्था कुछ ही सप्ताह में न्यायिक यथास्थिति का रूप लेने लगी।
यही कारण है कि समय बीतने के साथ पुनर्स्थापना और कठिन हो गया।
5 फरवरी को नेहरू ने फिर पंत को लिखा कि उन्हें अयोध्या की स्थिति से लगातार अवगत रखा जाए।
उन्होंने कहा कि वे मामले को बहुत महत्व देते हैं और यदि आवश्यक हो तो स्वयं अयोध्या जाने को भी तैयार हैं।
यह महत्वपूर्ण है।
घटना के लगभग छह सप्ताह बाद भी नेहरू ने अयोध्या को बंद अध्याय नहीं माना था।
वे व्यक्तिगत यात्रा तक पर विचार कर रहे थे।
नेहरू अभिलेखागार की टिप्पणी में पंत के 9 फरवरी के जवाब का सार उपलब्ध है।
पंत ने लिखा कि अयोध्या की स्थिति में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आया है; मुसलमान मुकदमे को जिले से बाहर स्थानांतरित कराने के लिए उच्च न्यायालय जाने पर विचार कर रहे थे; स्थानीय अधिकारियों के तबादले किए गए थे। नेहरू की संभावित यात्रा पर पंत ने कहा कि यदि समय अनुकूल होता तो वे स्वयं उन्हें अयोध्या आने को कहते।
इसका अर्थ यह था कि पंत नेहरू की यात्रा को उस समय स्थिति शांत करने के बजाय शायद और अधिक राजनीतिक ताप देने वाला मान रहे थे।
पंत के 9 फरवरी के उत्तर से यह भी स्पष्ट होता है कि स्थानीय अधिकारियों को बदला गया।
यह प्रशासनिक स्तर पर एक महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया थी।
इससे यह संकेत मिलता है कि राज्य सरकार पूरी तरह निष्क्रिय नहीं थी और वह स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था से संतुष्ट भी नहीं थी।
लेकिन तब तक मूल स्थिति परिवर्तन हो चुका था और उसे पलटा नहीं गया।
तीन कारण स्पष्ट दिखते हैं।
पहला—उन्हें पंत सरकार की कार्रवाई पर्याप्त निर्णायक नहीं लग रही थी।
दूसरा—उन्हें पूरे भारत में सांप्रदायिक प्रभाव का भय था।
तीसरा—वे पाकिस्तान और कश्मीर के संदर्भ में भारत की नैतिक स्थिति को लेकर चिंतित थे।
इसलिए उनके पत्र केवल प्रशासनिक reminders नहीं हैं।
वे स्वतंत्र भारत की धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र-राज्य अवधारणा का दस्तावेज हैं।
किशोरीलाल मशरूवाला को 5 मार्च के पत्र में नेहरू की निराशा सबसे स्पष्ट दिखाई देती है।
उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार को अपर्याप्त कार्रवाई के लिए आलोचना की।
नायर के व्यवहार को गलत माना।
राघव दास को घटना का उकसाने वाला नहीं माना, लेकिन बाद के समर्थन की पुष्टि की।
और यह स्वीकार किया कि पंत ने घटना की निंदा की, पर शायद बड़े दंगे के भय से निर्णायक कदम नहीं उठाया।
यह एक दुर्लभ दस्तावेज है क्योंकि इसमें नेहरू किसी औपचारिक सरकारी बयान की भाषा में नहीं, अपेक्षाकृत खुलकर अपना मूल्यांकन दे रहे हैं।
यह अंतर आवश्यक है।
नेहरू पंत की कार्रवाई से असंतुष्ट थे।
लेकिन वे यह नहीं लिखते कि पंत ने मूर्ति-स्थापना कराई या उसका समर्थन किया।
इसके उलट वे कहते हैं कि पंत ने घटना की निंदा की।
उनकी शिकायत यह थी कि पंत ने निर्णायक कार्रवाई नहीं की।
यह पंत के ऐतिहासिक मूल्यांकन में बहुत महत्वपूर्ण है।
पंत के सामने वास्तविक विकल्प थे—
यदि मूर्तियां हटवाते—
बड़ा हिंदू विरोध या दंगा संभव।
यदि नहीं हटवाते—
मुस्लिम पक्ष के अधिकार और राज्य की निष्पक्षता पर प्रश्न।
यदि बल प्रयोग करते—
1947 के तुरंत बाद एक नई सांप्रदायिक हिंसा का खतरा।
यदि केवल अदालत की प्रतीक्षा करते—
अवैध स्थिति परिवर्तन धीरे-धीरे स्थायी हो जाता।
पंत ने अंतिम दो के बीच का रास्ता चुना—
कुर्की, सीमित पूजा और न्यायिक प्रक्रिया।
क्योंकि नेहरू के लिए मूल सिद्धांत सरल था—
अवैध रूप से बदली स्थिति को राज्य स्वीकार नहीं कर सकता।
यदि सरकार हिंसा के डर से घटित तथ्य पूर्ण मान लेती है, तो भविष्य में हर संगठित धार्मिक समूह यही पद्धति अपना सकता है।
यही “खतरनाक उदाहरण” वाली चिंता थी।
इस पूरे पत्राचार को एक वाक्य में समझना हो तो—
नेहरू कानून के शासन को प्राथमिकता दे रहे थे; पंत कानून-व्यवस्था के तत्काल जोखिम को अधिक वजन दे रहे थे।
दोनों में मौलिक विरोध आवश्यक नहीं था।
पंत भी कानून तोड़ने का समर्थन नहीं कर रहे थे।
नेहरू भी रक्तपात नहीं चाहते थे।
लेकिन दोनों की जोखिम आकलन अलग थी।
यही केंद्र–राज्य अंतर की वास्तविक प्रकृति थी।
17 अप्रैल 1950 को नेहरू ने पंत को एक लंबा पत्र लिखा जिसमें उत्तर प्रदेश में बढ़ती सांप्रदायिकता पर गहरी चिंता व्यक्त की।
उन्होंने लिखा कि प्रदेश का वातावरण सांप्रदायिक दृष्टि से बदल रहा है और कांग्रेस संगठन में भी ऐसी प्रवृत्तियां प्रवेश कर रही हैं जिनसे वे स्वयं असहज थे। इसी संदर्भ में उन्होंने अयोध्या की मस्जिद और मंदिर संबंधी घटनाओं को “bad enough” कहा और इस बात पर अधिक चिंता जताई कि कांग्रेस के कुछ अपने लोग ऐसी घटनाओं को स्वीकार या समर्थन कर रहे थे।
यानी अप्रैल तक नेहरू अयोध्या को एक व्यापक राजनीतिक रोग का लक्षण मानने लगे थे।
उसी अप्रैल पत्र में नेहरू ने पुरुषोत्तम दास टंडन और कुछ उत्तर प्रदेश कांग्रेस नेताओं के भाषणों को लेकर अपनी असहमति दर्ज की।
यह अयोध्या अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि 1949–50 में कांग्रेस के भीतर धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद बनाम सांस्कृतिक-हिंदू राजनीतिक भाषा पर वास्तविक वैचारिक संघर्ष चल रहा था।
इसलिए अयोध्या प्रश्न केवल हिंदू महासभा बनाम कांग्रेस नहीं था।
वह स्वयं कांग्रेस के भीतर भी विभाजन रेखा बना रहा था।
17 अप्रैल के पत्र में उनकी भाषा असाधारण रूप से भावनात्मक है।
वे लिखते हैं कि उत्तर प्रदेश का वातावरण ऐसा बदल रहा है कि उन्हें वहां स्वयं को लगभग असहज और पराया महसूस होने लगा है।
यह केवल अयोध्या की प्रतिक्रिया नहीं थी।
लेकिन अयोध्या उस व्यापक चिंता का प्रमुख प्रतीक थी।
इससे हमें शुरुआती गणराज्य की राजनीति में सांप्रदायिकता के प्रश्न पर कांग्रेस की गहरी अंतर्द्वंद्वता दिखाई देती है।
हाँ।
5 फरवरी 1950 के पत्र में उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि आवश्यक हो तो वे अयोध्या जाने की तारीख निकालने की कोशिश करेंगे, हालांकि वे अत्यंत व्यस्त थे।
यह बताता है कि वे मामले को केवल पंत पर छोड़कर भूल नहीं गए थे।
लेकिन पंत की प्रतिक्रिया से लगता है कि तत्काल प्रधानमंत्री की यात्रा को उचित समय नहीं माना गया।
अंततः उस दौर में नेहरू की प्रस्तावित यात्रा नहीं हुई।
यह केवल वैकल्पिक-कल्पना है; निश्चित उत्तर नहीं दिया जा सकता।
उनकी यात्रा—
मुस्लिम समुदाय को आश्वस्त कर सकती थी।
राज्य प्रशासन पर दबाव बढ़ा सकती थी।
लेकिन दूसरी ओर मंदिर समर्थक समूह इसे प्रत्यक्ष सरकारी चुनौती मानकर अधिक लामबंद भी हो सकते थे।
पंत शायद इसी जोखिम को देख रहे थे।
इतिहास में यह संभावना रोचक है, लेकिन तथ्य नहीं।
पंत के 9 फरवरी उत्तर के सार से पता चलता है कि मुस्लिम पक्ष स्थानीय न्यायिक वातावरण पर भी संदेह कर रहा था और मुकदमे को जिले से बाहर स्थानांतरित कराने के लिए उच्च न्यायालय जाने पर विचार कर रहा था।
यह अत्यंत महत्वपूर्ण संकेत है।
1949 की घटना केवल धार्मिक स्थल की क्षति नहीं थी।
उसने मुस्लिम समुदाय के स्थानीय प्रशासन और न्याय पर भरोसे को भी प्रभावित किया।
5 मार्च के पत्र में नेहरू ने अयोध्या को भारत-पाकिस्तान संबंधों और दोनों देशों में अल्पसंख्यकों की स्थिति के व्यापक संदर्भ में रखा।
उनका तर्क था कि यदि भारत अपने यहां मुसलमानों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार नहीं करता, तो पाकिस्तान में हिंदुओं के अधिकारों पर नैतिक दबाव डालना कठिन होगा।
यह नेहरू की पारस्परिक-नैतिक कूटनीति का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
संवैधानिक सिद्धांत की दृष्टि से नहीं।
भारत ने नागरिक अधिकारों को पाकिस्तान के व्यवहार से conditional नहीं बनाया।
नेहरू की चिंता भी यही थी।
वे चाहते थे कि भारत अपनी नीति अपने संवैधानिक मूल्यों से तय करे, न कि पाकिस्तान की प्रतिकृति बनकर।
इसीलिए अयोध्या उन्हें इतनी गंभीर लगती थी।
26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ।
अब धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और राज्य की निष्पक्षता केवल राजनीतिक आदर्श नहीं रहे; वे संवैधानिक मानक बन गए।
अयोध्या संकट संविधान लागू होने के ठीक पहले पैदा हुआ और उसके लागू होने के बाद भी जारी रहा।
इसलिए नेहरू-पंत पत्राचार औपनिवेशिक प्रशासन और संवैधानिक शासन के बीच संक्रमण का अनोखा दस्तावेज है।
व्यवहारिक रूप से यह अत्यंत असाधारण कदम होता।
कानून-व्यवस्था प्रदेश का विषय था और केंद्र सीधे जिला स्तर पर सेना/बल का उपयोग बिना राज्य प्रशासन के समन्वय के नहीं कर सकता था।
इसके अलावा दिसंबर 1949 के बाद धार्मिक भीड़ और संभावित हिंसा का खतरा वास्तविक था।
इसलिए नेहरू राजनीतिक दबाव और पत्राचार के माध्यम से पंत पर निर्भर रहे।
दस्तावेजों से ऐसा दिखाई देता है।
पहले प्रतिष्ठित हिंदू नेताओं को समझाने की कोशिश।
फिर स्थानीय अधिकारियों में परिवर्तन।
न्यायिक प्रक्रिया को चलने देना।
प्रधानमंत्री की तत्काल यात्रा टालना।
यह सब एक ऐसी नीति जैसा लगता है जिसमें पंत तत्काल टकराव से बचते हुए स्थिति को धीरे-धीरे नियंत्रित करना चाहते थे।
लेकिन इसका अनपेक्षित परिणाम यह हुआ कि नया यथास्थिति मजबूत होता गया।
यह इस पर निर्भर है कि कसौटी क्या है।
यदि कसौटी है—
बड़ा तत्काल दंगा रोकना—
तो उनकी नीति सफल रही।
यदि कसौटी है—
22 दिसंबर से पहले की स्थिति बहाल करना—
तो वे असफल रहे।
यदि कसौटी है—
स्थायी समाधान—
तो वह भी नहीं हुआ।
इसलिए पंत प्रशासन ने संकट नियंत्रित करना किया, समाधान नहीं।
नेहरू ने राजनीतिक-संवैधानिक आपत्ति स्पष्ट रूप से दर्ज कर दी।
उन्होंने अयोध्या को राष्ट्रीय मुद्दा माना।
उन्होंने पंत पर कार्रवाई का दबाव रखा।
लेकिन मूर्तियां नहीं हटाईं गईं।
मुस्लिम नमाज बहाल नहीं हुई।
इसलिए तत्काल नीति परिणाम की दृष्टि से उनकी इच्छा भी पूरी नहीं हुई।
लेकिन उनके पत्र आगे भारतीय धर्मनिरपेक्ष राज्य की आधिकारिक वैचारिक दिशा के महत्वपूर्ण दस्तावेज बने।
यह पत्राचार उस लोकप्रिय धारणा को तोड़ता है कि 1949 की घटना पर कांग्रेस सरकार एकमत थी।
वास्तविकता थी—
नेहरू अत्यंत चिंतित और निर्णायक पुनर्स्थापना के पक्षधर थे।
पंत घटना की निंदा करते थे लेकिन बड़े दंगे से डरते थे।
नायर हटाना लागू करने के विरुद्ध थे।
स्थानीय कांग्रेस के कुछ नेता नई स्थिति के समर्थक थे।
मुस्लिम पक्ष न्यायिक निष्पक्षता को लेकर चिंतित था।
यानी सरकार के भीतर एक नहीं, कई अयोध्या थीं।
26 दिसंबर 1949 — नेहरू का पंत को तार; अयोध्या को खतरनाक मिसाल बताते हुए व्यक्तिगत हस्तक्षेप की मांग।
6 जनवरी 1950 के आसपास — नेहरू ने पंत को विस्तृत पत्र भेजा; मूल पत्र उपलब्ध नहीं, लेकिन 7 जनवरी के राजाजी पत्र से उसका उल्लेख मिलता है।
7 जनवरी 1950 — नेहरू का राजगोपालाचारी को पत्र; पंत अत्यंत चिंतित, कार्रवाई चाहते हैं लेकिन पहले प्रतिष्ठित हिंदुओं से जनता को समझाने की योजना।
16 जनवरी 1950 — गोपाल सिंह विशारद का मुकदमा; विवाद का नया न्यायिक चरण।
5 फरवरी 1950 — नेहरू का पंत को पत्र; अयोध्या के अखिल भारतीय और कश्मीर संबंधी प्रभावों पर जोर; स्वयं अयोध्या जाने की पेशकश।
9 फरवरी 1950 — पंत का उत्तर; कोई बड़ा परिवर्तन नहीं, मुस्लिम पक्ष स्थानांतरण पर विचार कर रहा, स्थानीय अधिकारी बदले गए, नेहरू की यात्रा के लिए समय अभी अनुकूल नहीं।
5 मार्च 1950 — नेहरू का मशरूवाला को पत्र; उत्तर प्रदेश सरकार की अपर्याप्त कार्रवाई पर असंतोष, नायर की आलोचना, बाबा राघव दास को उकसाने वाला न मानना, पंत द्वारा घटना की निंदा लेकिन दंगे के डर से निर्णायक कार्रवाई न करना।
17 अप्रैल 1950 — नेहरू का पंत को विस्तृत पत्र; उत्तर प्रदेश कांग्रेस और प्रदेश में बढ़ती सांप्रदायिकता पर गहरी चिंता; अयोध्या को व्यापक वैचारिक समस्या के उदाहरण के रूप में देखना।
नेहरू और पंत के बीच अयोध्या पर वास्तविक मतभेद था, लेकिन उसे व्यक्तिगत शत्रुता या “मंदिर समर्थक बनाम मंदिर विरोधी” की सरल रेखा में रखना गलत होगा।
नेहरू के लिए प्रश्न था—
राज्य की वैधता और धर्मनिरपेक्षता।
पंत के लिए प्रश्न था—
उसी सिद्धांत को लागू करते हुए तत्काल व्यापक रक्तपात कैसे रोका जाए।
नायर के लिए प्रश्न था—
मौके पर मूर्ति हटाने का आदेश लागू करना संभव है या नहीं।
यही तीन अलग प्रशासनिक स्तर तीन अलग जोखिम perceptions पैदा कर रहे थे।
नेहरू का 26 दिसंबर का “खतरनाक उदाहरण” वाला तार, 5 फरवरी का कश्मीर संदर्भ, 5 मार्च की उत्तर प्रदेश सरकार पर कड़ी आलोचना और 17 अप्रैल की प्रदेश कांग्रेस में सांप्रदायिकता को लेकर चिंता—इन सबको साथ पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि अयोध्या उनके लिए नए गणराज्य के चरित्र की परीक्षा बन चुकी थी।
दूसरी ओर प्राथमिक दस्तावेज यह भी दिखाते हैं कि पंत ने घटना को समर्थन नहीं दिया था। उन्होंने उसकी निंदा की, कार्रवाई पर विचार किया और स्थानीय मध्यस्थता चाही, लेकिन बड़े दंगे के भय से पुरानी स्थिति बलपूर्वक बहाल नहीं की।
यही निर्णय आगे इतिहास बदल गया।
1949–50 का नेहरू–पंत पत्राचार अयोध्या इतिहास में केवल राजनीतिक नेताओं के पत्रों की श्रृंखला नहीं है। वह स्वतंत्र भारत की पहली बड़ी धार्मिक-राज्य दुविधा का दस्तावेज है।
22–23 दिसंबर की रात जो परिवर्तन हुआ, उसे नेहरू सिद्धांततः स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।
पंत उसे तुरंत बलपूर्वक पलटने को तैयार नहीं थे।
नायर उसे व्यावहारिक रूप से पलटने में असमर्थ अथवा अनिच्छुक थे।
अदालतें अब हस्तक्षेप करने लगी थीं।
इसलिए किसी भी स्तर पर पूर्ण नियंत्रण नहीं रहा।
और इसी शून्य में एक अस्थायी व्यवस्था बनी—
रामलला भीतर रहे, पूजा सीमित रूप से जारी रही, मुस्लिम नमाज बंद रही, परिसर प्रशासनिक नियंत्रण में गया और अंतिम निर्णय अदालतों पर छोड़ दिया गया।
यही वह स्थिति थी जो आगे दशकों तक “यथास्थिति” कहलाने वाली थी।
अगला अध्याय 16 — “परिसर का कुर्क होना, ताला लगना और पूजा जारी रहना” होगा। उसमें धारा 145 की कार्रवाई, रिसीवर प्रियादत्त राम, अंदर–बाहर प्रवेश व्यवस्था, वास्तव में कौन-सा ताला लगा था, पुजारियों को कैसे पूजा की अनुमति रही, आम श्रद्धालुओं के दर्शन की स्थिति और 1949 की व्यवस्था से सीधे 1986 के “ताला खुलने” तक की कानूनी कड़ी को विस्तार से लिया जाएगा।