# भारत का दसवाँ लोकसभा चुनाव 1991–92 : राजीव गांधी की हत्या, भाजपा का विस्तार और नरसिंह राव की अल्पमत सरकार

ओमकार चौधरी / OCN Research Desk

भारतीय संसदीय चुनावों का इतिहास — दसवाँ अध्याय

भारत का दसवाँ लोकसभा आम चुनाव 20 मई, 12 जून और 15 जून 1991 को हुआ। पंजाब की 13 लोकसभा सीटों पर चुनाव 19 फरवरी 1992 को कराए गए। भारतीय संसदीय इतिहास में यह चुनाव असाधारण राजनीतिक हिंसा, सरकारों की अस्थिरता, आर्थिक संकट और बड़े राजनीतिक परिवर्तन के लिए जाना जाता है।

21 मई 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में एक चुनावी सभा के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की आत्मघाती बम विस्फोट में हत्या कर दी गई। उस समय चुनाव का पहला चरण पूरा हुआ था। हत्या के बाद शेष मतदान स्थगित करके जून में कराया गया।

1989 में 197 सीटें जीतने वाली कांग्रेस 1991 के मुख्य चुनाव में 232 सीटों तक पहुँची। पंजाब के 1992 के परिणाम जोड़ने पर कांग्रेस की संख्या **244 सीटें** हो गई। भारतीय जनता पार्टी 85 से बढ़कर 120 सीटों पर पहुँची, जबकि जनता दल 143 से घटकर 59 सीटों पर आ गया।

कांग्रेस स्पष्ट बहुमत से दूर रही, लेकिन सबसे बड़ी पार्टी होने के कारण उसने सरकार बनाई। **21 जून 1991 को पी. वी. नरसिंह राव प्रधानमंत्री बने।** उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने अल्पमत सरकार के रूप में कार्यभार संभाला।

1991–92 में चुनाव-संपन्न सीटें

## 534

कांग्रेस की अंतिम सीटें

## 244

भाजपा की सीटें

## 120

जनता दल की सीटें

## 59

## 1. दसवें लोकसभा चुनाव के प्रमुख आँकड़े

| विवरण | आँकड़े |
| --- | --- |
| लोकसभा | दसवीं |
| मतदान की मुख्य तारीखें | 20 मई, 12 और 15 जून 1991 |
| पंजाब का मतदान | 19 फरवरी 1992 |
| निर्धारित लोकसभा सीटें | 543 |
| 1991 में चुनाव संपन्न | 521 सीटें |
| पंजाब में 1992 में चुनाव | 13 सीटें |
| मुख्य 1991 तथा पंजाब 1992 के संयुक्त परिणाम | 534 सीटें |
| जम्मू-कश्मीर में चुनाव नहीं | 6 सीटें |
| अन्य तीन निर्वाचन क्षेत्र | मुख्य चुनाव में परिणाम पूर्ण नहीं हो सके |
| 1991 का मतदान प्रतिशत | लगभग 55.9% |
| कांग्रेस की मुख्य 1991 चुनाव में सीटें | 232 |
| कांग्रेस की पंजाब चुनाव के बाद सीटें | 244 |
| भाजपा की सीटें | 120 |
| जनता दल की सीटें | 59 |
| प्रधानमंत्री (चुनाव से पहले) | चंद्रशेखर |
| प्रधानमंत्री (चुनाव के बाद) | पी. वी. नरसिंह राव |
| दसवीं लोकसभा का गठन | 20 जून 1991 |

एक आवश्यक सांख्यिकीय टिप्पणी: निर्वाचन आयोग की ऐतिहासिक समय-श्रृंखला में 1991–92 के लिए 537 चुनाव-संपन्न सीटें दर्ज हैं, जबकि उसकी 1991 की मुख्य दलवार रिपोर्ट और पंजाब की 13 सीटों से 534 सीटों के परिणाम बनते हैं। इनमें बाद में पूरे हुए तीन निर्वाचन क्षेत्रों के परिणाम का अंतर है। इस अध्ययन की विस्तृत दलवार और राज्यवार तालिकाओं में तुलनीय **534 परिणामों** को आधार बनाया गया है।

## 2. चुनाव से पहले देश की राजनीतिक परिस्थितियाँ

1989 में वी. पी. सिंह के नेतृत्व में बनी राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार नवंबर 1990 में गिर गई। भाजपा ने राम रथयात्रा के दौरान लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद समर्थन वापस लिया था।

इसके बाद जनता दल से अलग हुए चंद्रशेखर ने कांग्रेस के बाहरी समर्थन से सरकार बनाई। लेकिन मार्च 1991 में कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया। परिणामस्वरूप नौवीं लोकसभा भंग हुई और दो वर्ष से भी कम समय में फिर चुनाव कराने पड़े।

उस समय भारतीय राजनीति के केंद्र में चार मुद्दे थे—राजनीतिक अस्थिरता, मंडल आयोग के आरक्षण संबंधी फैसले, अयोध्या आंदोलन और गंभीर आर्थिक संकट।

## चुनावी घटनाक्रम की समयरेखा

1. **7 नवंबर 1990 — वी. पी. सिंह सरकार का पतन**

लोकसभा में विश्वास मत हारने के बाद वी. पी. सिंह ने प्रधानमंत्री पद छोड़ा। 2. **10 नवंबर 1990 — चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने**

कांग्रेस के बाहरी समर्थन से नई अल्पमत सरकार बनी। 3. **6 मार्च 1991 — चंद्रशेखर का इस्तीफा**

कांग्रेस से संबंध बिगड़ने के कारण सरकार गिर गई। 4. **13 मार्च 1991 — लोकसभा भंग**

राष्ट्रपति आर. वेंकटरमण ने नौवीं लोकसभा भंग कर दी। 5. **20 मई 1991 — पहले चरण का मतदान**

लोकसभा चुनाव शुरू हुए। 6. **21 मई 1991 — राजीव गांधी की हत्या**

श्रीपेरंबदूर में चुनाव प्रचार के दौरान आत्मघाती हमला हुआ। शेष मतदान स्थगित किया गया। 7. **12 और 15 जून 1991 — शेष प्रमुख मतदान**

स्थगित चुनावी चरण पूरे किए गए। 8. **21 जून 1991 — नरसिंह राव प्रधानमंत्री बने**

कांग्रेस ने अल्पमत सरकार बनाई। 9. **19 फरवरी 1992 — पंजाब में मतदान**

सुरक्षा परिस्थितियों के कारण स्थगित लोकसभा चुनाव कराए गए।

## 3. राजनीतिक दलों का प्रदर्शन : किसे कितनी सीटें और कितना वोट शेयर मिला?

1991 के चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी रही। लेकिन भाजपा ने अपने मत प्रतिशत में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की और जनता दल की सीटें काफी कम हुईं।

नीचे की तालिका **1991 के मुख्य चुनाव के आधिकारिक आँकड़ों** पर आधारित है। इसलिए कांग्रेस की सीटें 232 हैं, न कि पंजाब की 12 अतिरिक्त सीटें जोड़ने के बाद की 244। इसी तरह वोट शेयर भी 1991 के मुख्य चुनाव का है।

| राजनीतिक दल | सीटें (1991) | राष्ट्रीय वोट शेयर |
| --- | --- | --- |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस | 232 | 36.26% |
| भारतीय जनता पार्टी | 120 | 20.11% |
| जनता दल | 59 | 11.84% |
| मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी | 35 | 6.16% |
| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी | 14 | 2.49% |
| तेलुगु देशम पार्टी | 13 | 2.99% |
| अन्नाद्रमुक | 11 | 1.62% |
| झारखंड मुक्ति मोर्चा | 6 | 0.54% |
| जनता पार्टी | 5 | 3.37% |
| शिवसेना | 4 | 0.80% |
| रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी | 4 | 0.64% |
| फॉरवर्ड ब्लॉक | 3 | 0.42% |
| बहुजन समाज पार्टी | 2 | 1.61% |
| इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग | 2 | 0.31% |
| असम गण परिषद | 1 | 0.54% |
| जनता दल (गुजरात) | 1 | 0.51% |
| इंडियन कांग्रेस (सोशलिस्ट) | 1 | 0.36% |
| ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन | 1 | लगभग 0.17% |
| केरल कांग्रेस (एम) | 1 | लगभग 0.14% |
| मणिपुर पीपुल्स पार्टी | 1 | लगभग 0.06% |
| अन्य छोटे दल एवं निर्दलीय | शेष सीटें | शेष मत |

स्रोत: निर्वाचन आयोग, *Statistical Report on General Elections, 1991*, खंड I, राष्ट्रीय दलवार मत तालिका। मत प्रतिशत मुख्य 1991 के वैध मतों पर आधारित हैं।

## 1989 की तुलना में कितना परिवर्तन हुआ?

| पार्टी | 1989 सीटें | 1991 मुख्य चुनाव | परिवर्तन |
| --- | --- | --- | --- |
| कांग्रेस | 197 | 232 | \+35 |
| भाजपा | 85 | 120 | \+35 |
| जनता दल | 143 | 59 | −84 |
| माकपा | 33 | 35 | \+2 |
| भाकपा | 12 | 14 | \+2 |
| तेलुगु देशम | 2 | 13 | \+11 |
| बहुजन समाज पार्टी | 3 | 2 | −1 |

कांग्रेस को बाद में पंजाब की 12 अतिरिक्त सीटें मिलीं, जिससे 1991–92 का कुल 244 हुआ। इस आधार पर 1989 से उसकी वृद्धि 47 सीटें थी।

जनता दल को सर्वाधिक नुकसान हुआ। पार्टी की सीटें 143 से घटकर 59 रह गईं। भाजपा ने अपनी संख्या 120 तक पहुँचा दी।

## 4. राज्यवार लोकसभा सीटें और चुनाव परिणाम

1991 के चुनाव में उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और दिल्ली में भाजपा का महत्वपूर्ण प्रदर्शन रहा। बिहार में जनता दल प्रमुख राजनीतिक शक्ति था। दक्षिण भारत में कांग्रेस ने तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में बड़ी संख्या में सीटें जीतीं, जबकि पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे का प्रभुत्व कायम रहा।

नीचे तत्कालीन राज्यों की सीमाओं के अनुसार परिणाम दिए गए हैं। पंजाब की सीटें फरवरी 1992 की हैं।

| राज्य / केंद्रशासित प्रदेश | सीटें जिनके परिणाम शामिल हैं | कांग्रेस | भाजपा | जनता दल |
| --- | --- | --- | --- | --- |
| उत्तर प्रदेश | 84 | 5 | 51 | 22 |
| बिहार | 52 | 1 | 5 | 31 |
| महाराष्ट्र | 48 | 38 | 5 | 0 |
| आंध्र प्रदेश | 42 | 25 | 1 | 0 |
| पश्चिम बंगाल | 42 | 5 | 0 | 0 |
| मध्य प्रदेश | 40 | 27 | 12 | 0 |
| तमिलनाडु | 39 | 28 | 0 | 0 |
| कर्नाटक | 28 | 23 | 4 | 0 |
| गुजरात | 26 | 5 | 20 | 0 |
| राजस्थान | 25 | 13 | 12 | 0 |
| ओडिशा | 21 | 13 | 0 | 6 |
| केरल | 20 | 13 | 0 | 0 |
| असम | 14 | 8 | 2 | 0 |
| पंजाब (1992) | 13 | 12 | 0 | 0 |
| हरियाणा | 10 | 9 | 0 | 0 |
| दिल्ली | 7 | 2 | 5 | 0 |
| हिमाचल प्रदेश | 4 | 2 | 2 | 0 |
| अरुणाचल प्रदेश | 2 | 2 | 0 | 0 |
| गोवा | 2 | 2 | 0 | 0 |
| मणिपुर | 2 | 1 | 0 | 0 |
| मेघालय | 2 | 2 | 0 | 0 |
| त्रिपुरा | 2 | 2 | 0 | 0 |
| नगालैंड | 1 | 0 | 0 | 0 |
| मिजोरम | 1 | 1 | 0 | 0 |
| सिक्किम | 1 | 0 | 0 | 0 |
| अंडमान-निकोबार | 1 | 1 | 0 | 0 |
| चंडीगढ़ | 1 | 1 | 0 | 0 |
| दादरा-नगर हवेली | 1 | 1 | 0 | 0 |
| दमन और दीव | 1 | 0 | 1 | 0 |
| लक्षद्वीप | 1 | 1 | 0 | 0 |
| पांडिचेरी | 1 | 1 | 0 | 0 |
| **कुल** | **534** | **244** | **120** | **59** |

जम्मू-कश्मीर की छह सीटों के परिणाम इस चुनाव में शामिल नहीं थे। उत्तर प्रदेश में 85 में से 84 तथा बिहार में 54 में से 52 सीटों के परिणाम इस तुलनात्मक तालिका में हैं।

## पाँच महत्वपूर्ण राज्यों का विश्लेषण

**उत्तर प्रदेश:** भाजपा ने 84 चुनाव-संपन्न सीटों में से 51 जीत लीं। जनता दल को 22 और कांग्रेस को केवल पाँच सीटें मिलीं। 1989 में भाजपा को राज्य में आठ सीटें मिली थीं। इस प्रकार दो वर्ष में उसे 43 अतिरिक्त सीटें मिलीं।

**बिहार:** जनता दल ने 52 सीटों में से 31 जीतीं। कांग्रेस को केवल एक सीट मिली। झारखंड मुक्ति मोर्चा और वाम दलों का भी प्रभाव रहा।

**गुजरात:** भाजपा ने 26 में से 20 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस को पाँच सीटें मिलीं।

**तमिलनाडु:** कांग्रेस-अन्नाद्रमुक गठबंधन ने सभी 39 सीटें जीतीं। कांग्रेस को 28 और अन्नाद्रमुक को 11 सीटें मिलीं।

**पश्चिम बंगाल:** वाम दलों ने 42 में से 37 सीटें जीतीं। कांग्रेस को पाँच सीटें मिलीं।

## 5. कौन-कौन से प्रमुख दल चुनाव मैदान में थे और उनके नेता कौन थे?

| राजनीतिक दल | प्रमुख नेता |
| --- | --- |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस | राजीव गांधी; हत्या के बाद पी. वी. नरसिंह राव |
| भारतीय जनता पार्टी | लालकृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी |
| जनता दल | विश्वनाथ प्रताप सिंह, लालू प्रसाद यादव, शरद यादव |
| जनता पार्टी | सुब्रह्मण्यम स्वामी, चंद्रशेखर से जुड़ी अलग राजनीतिक धारा |
| मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी | ई. एम. एस. नंबूदरीपाद, ज्योति बसु, हरकिशन सिंह सुरजीत |
| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी | इंद्रजीत गुप्त, सी. राजेश्वर राव |
| तेलुगु देशम पार्टी | एन. टी. रामाराव |
| अन्नाद्रमुक | जे. जयललिता |
| डीएमके | एम. करुणानिधि |
| बहुजन समाज पार्टी | कांशीराम, मायावती |
| शिवसेना | बाल ठाकरे |
| झारखंड मुक्ति मोर्चा | शिबू सोरेन |
| असम गण परिषद | प्रफुल्ल कुमार महंत |
| इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग | इब्राहिम सुलेमान सैत |
| केरल कांग्रेस (एम) | के. एम. मणि |
| फॉरवर्ड ब्लॉक | चित्त बसु |
| रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी | त्रिदीब चौधरी |
| ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन | सुल्तान सलाहुद्दीन ओवैसी |

चंद्रशेखर उस समय जनता दल से अलग समाजवादी जनता पार्टी (राष्ट्रीय) के नेतृत्व में थे। इसलिए उन्हें जनता पार्टी अथवा वी. पी. सिंह के जनता दल का नेता मानना उचित नहीं होगा।

## 6. चुनाव की प्रमुख घटनाएँ और राजनीतिक व्यक्तित्व

**राजीव गांधी की हत्या से चुनाव की दिशा बदली**

21 मई 1991 को श्रीपेरंबदूर में लिट्टे (LTTE) से जुड़ी आत्मघाती हमलावर ने राजीव गांधी की हत्या कर दी। यह घटना चुनाव के पहले चरण के बाद हुई थी।

इसके परिणामस्वरूप शेष चुनावी कार्यक्रम स्थगित हुआ। हत्या के बाद कांग्रेस के नेतृत्व का प्रश्न भी उत्पन्न हुआ। जून में पी. वी. नरसिंह राव कांग्रेस संसदीय दल के नेता बने।

**पी. वी. नरसिंह राव की सरकार**

entity["politician","पी. वी. नरसिंह राव"] 21 जून 1991 को प्रधानमंत्री बने। वे तत्कालीन आम चुनाव में लोकसभा सदस्य निर्वाचित नहीं हुए थे। बाद में आंध्र प्रदेश के नांद्याल लोकसभा उपचुनाव में निर्वाचित हुए।

उनकी सरकार ने संसदीय बहुमत के बिना कार्यकाल आरंभ किया और बाद में राजनीतिक समर्थन जुटाकर पाँच वर्ष पूरे किए।

**भाजपा की 120 सीटों तक पहुँच**

1990 की राम रथयात्रा, अयोध्या आंदोलन और उत्तर भारत में पार्टी के विस्तार की पृष्ठभूमि में भाजपा ने लोकसभा की 120 सीटें जीतीं।

विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में 51, गुजरात में 20, मध्य प्रदेश और राजस्थान में 12-12 सीटें मिलीं।

**तमिलनाडु में जयललिता और कांग्रेस का गठबंधन**

अन्नाद्रमुक ने कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ा। गठबंधन ने तमिलनाडु की सभी 39 लोकसभा सीटें जीत लीं।

उसी वर्ष विधानसभा चुनाव में अन्नाद्रमुक-कांग्रेस गठबंधन की जीत के बाद जयललिता पहली बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनीं।

## 7. 1991 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों को अलग-अलग समझना जरूरी

इस वर्ष कई राज्यों में विधानसभा चुनाव भी हुए, जिनके परिणामों का लोकसभा चुनावों से अलग राजनीतिक महत्व था।

**उत्तर प्रदेश:** भाजपा ने विधानसभा चुनाव में 221 सीटें जीतकर सरकार बनाई। कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने। लोकसभा में भाजपा ने 51 सीटें जीती थीं।

**बिहार:** 1990 से लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री थे। जनता दल ने 1991 के लोकसभा चुनाव में बिहार की 31 सीटें जीतीं। राज्य में उस समय विधानसभा चुनाव नहीं हो रहे थे।

**तमिलनाडु:** जयललिता के नेतृत्व में अन्नाद्रमुक-कांग्रेस गठबंधन ने विधानसभा चुनाव जीता और जयललिता मुख्यमंत्री बनीं।

**पश्चिम बंगाल:** ज्योति बसु के नेतृत्व में वाम मोर्चा सरकार ने विधानसभा चुनाव में अपना बहुमत बनाए रखा।

## 8. पंजाब में फरवरी 1992 में चुनाव क्यों हुए?

पंजाब उस दौर में आतंकवादी हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता का सामना कर रहा था। 1991 में वहाँ लोकसभा चुनाव नहीं कराए जा सके।

19 फरवरी 1992 को राज्य की 13 लोकसभा सीटों तथा विधानसभा के चुनाव कराए गए।

| दल | लोकसभा सीटें |
| --- | --- |
| कांग्रेस | 12 |
| बहुजन समाज पार्टी | 1 |
| **कुल** | **13** |

चुनाव का प्रमुख अकाली दलों ने बहिष्कार किया था। मतदान काफी कम रहा। विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस के बेअंत सिंह मुख्यमंत्री बने।

यहाँ एक महत्वपूर्ण राजनीतिक अंतर है। कांग्रेस ने पंजाब की 13 में से 12 लोकसभा सीटें जीतीं, लेकिन इसे राज्य के समस्त राजनीतिक समूहों की सामान्य भागीदारी वाले चुनाव के समान नहीं माना जा सकता, क्योंकि प्रमुख अकाली दलों का बहिष्कार और कम मतदान इसके महत्वपूर्ण संदर्भ थे।

## 9. आर्थिक संकट और 1991 की नई आर्थिक नीति

1991 के चुनाव और नई सरकार के गठन के समय भारत गंभीर भुगतान संतुलन संकट से गुजर रहा था। विदेशी मुद्रा भंडार इतना कम हो गया था कि आयात भुगतान के लिए बहुत सीमित संसाधन बचे थे।

नरसिंह राव ने डॉ. मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री नियुक्त किया। 24 जुलाई 1991 को प्रस्तुत बजट और उसी समय घोषित औद्योगिक नीति के माध्यम से आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई।

इसमें औद्योगिक लाइसेंस व्यवस्था में व्यापक छूट, विदेशी निवेश संबंधी नियमों में परिवर्तन, व्यापार नीति में सुधार और सरकारी नियंत्रणों में कमी जैसे निर्णय शामिल थे।

1991 का चुनाव इसलिए भी ऐतिहासिक है कि इसके बाद सत्ता में आई सरकार ने भारत की आर्थिक नीतियों में दीर्घकालिक परिवर्तन किए।

## 10. दसवीं लोकसभा के कार्यकाल की महत्वपूर्ण घटनाएँ

| वर्ष | प्रमुख घटना |
| --- | --- |
| 1991 | नरसिंह राव सरकार का गठन और आर्थिक उदारीकरण |
| 1992 | पंजाब में लोकसभा और विधानसभा चुनाव |
| 6 दिसंबर 1992 | अयोध्या में विवादित बाबरी मस्जिद का विध्वंस |
| 1993 | मुंबई में सिलसिलेवार बम धमाके |
| 1993 | नरसिंह राव सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव और समर्थन जुटाने से जुड़ा विवाद |
| 1994 | दूरसंचार क्षेत्र की नई राष्ट्रीय नीति |
| 1995 | विश्व व्यापार संगठन से भारत की सदस्यता का दौर शुरू |
| 1996 | दसवीं लोकसभा का कार्यकाल समाप्त और ग्यारहवाँ आम चुनाव |

## 11. पहले दस लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन

| चुनाव वर्ष | कांग्रेस की सीटें | राष्ट्रीय वोट शेयर |
| --- | --- | --- |
| 1951–52 | 364 | 44.99% |
| 1957 | 371 | 47.78% |
| 1962 | 361 | 44.72% |
| 1967 | 283 | 40.78% |
| 1971 | 352 | 43.68% |
| 1977 | 154 | 34.52% |
| 1980 | 353 | 42.69% |
| 1984–85 | 414 | लगभग 48.12% |
| 1989 | 197 | 39.53% |
| 1991–92 | 244 | लगभग 36.4% |

1991–92 का सीट आँकड़ा पंजाब के चुनावों सहित है। वोट प्रतिशत अलग-अलग रिपोर्टों में मुख्य 1991 और संयुक्त 1991–92 अवधि के कारण बदलता है।

जनता दल का गठन 1988 में हुआ था; इसलिए 1984 का शून्य आँकड़ा चुनावी पराजय नहीं, उस समय दल के अस्तित्व में न होने का संकेत है।

## 12. मूल आधिकारिक और ऐतिहासिक स्रोत

[निर्वाचन आयोग : दसवें लोकसभा चुनाव 1991 की मूल सांख्यिकीय रिपोर्ट, खंड I और II](https://www.eci.gov.in/statistical-report/ge/1991/4121)

[1991 लोकसभा चुनाव — दलवार वोट, निर्वाचन क्षेत्र और राज्यवार परिणाम (PDF)](https://ceomadhyapradesh.nic.in/Links/Books/91_Vol_I.pdf)

[अंतर-संसदीय संघ : 1991 चुनाव, राजनीतिक परिस्थितियाँ और सरकार गठन](https://data.ipu.org/election-summary/HTML/2145_91.htm)

## 13. ऐतिहासिक निष्कर्ष

1991 के दसवें लोकसभा चुनाव ने भारत की राजनीति में कई बड़े परिवर्तन स्थापित किए।

कांग्रेस ने 1989 की तुलना में अधिक सीटें जीतकर सत्ता में वापसी की, लेकिन उसे स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। भाजपा की सीटें बढ़कर 120 हो गईं। जनता दल की सीटें 143 से घटकर 59 रह गईं। उत्तर प्रदेश में भाजपा का उभार, बिहार में जनता दल का आधार, पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे का प्रभाव और दक्षिण भारत में कांग्रेस तथा क्षेत्रीय दलों का समर्थन अलग-अलग राजनीतिक प्रवृत्तियों को दर्शाता था।

राजीव गांधी की हत्या ने चुनावी कार्यक्रम और राजनीतिक नेतृत्व दोनों को प्रभावित किया। उनके निधन के बाद नरसिंह राव प्रधानमंत्री बने और उनकी सरकार ने देश में आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू की।

**इस चुनाव का केंद्रीय ऐतिहासिक महत्व यह है कि 1991 में देश ने राजनीतिक अस्थिरता, एक पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या और गंभीर आर्थिक संकट के बीच नई सरकार चुनी। कांग्रेस की अल्पमत सरकार ने अपना पाँच वर्षीय कार्यकाल पूरा किया और उसी दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा में व्यापक परिवर्तन हुए।**

अगला, **1996 का ग्यारहवाँ लोकसभा चुनाव**, तीन प्रधानमंत्रियों—अटल बिहारी वाजपेयी, एच. डी. देवेगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल—के एक ही लोकसभा कार्यकाल में प्रधानमंत्री बनने तथा गठबंधन राजनीति के नए दौर की शुरुआत के कारण विशेष महत्व रखता है।

मूल वेबसाइट: https://omkarchaudhary.com/research/lok-sabha-elections-1951-2024/election-10