भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था एक बड़े परिवर्तन के मुहाने पर खड़ी है। संसद में प्रस्तुत विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025 को केंद्र सरकार उच्च शिक्षा के नियमन में ऐतिहासिक सुधार के रूप में देख रही है। इसका उद्देश्य विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) की जगह एक साझा शीर्ष नियामक संस्था स्थापित करना है।

दूसरी ओर विपक्ष, शिक्षक संगठनों और शिक्षाविदों के एक वर्ग का कहना है कि यह बदलाव विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, संघीय व्यवस्था और शिक्षा के वैचारिक स्वरूप को प्रभावित कर सकता है। “शिक्षा के भगवाकरण” और अत्यधिक केंद्रीकरण जैसे आरोप भी इसी राजनीतिक बहस का हिस्सा हैं।

इस विवाद का निष्पक्ष मूल्यांकन करने के लिए राजनीतिक नारों से अलग हटकर तीन मूल प्रश्नों पर विचार करना आवश्यक है—पुरानी व्यवस्था में क्या कमियाँ हैं, नया विधेयक उनका समाधान किस प्रकार करना चाहता है और प्रस्तावित व्यवस्था स्वयं कौन-से नए खतरे उत्पन्न कर सकती है?

दशकों पुराने कानूनों पर टिकी व्यवस्था

भारत में उच्च शिक्षा का नियमन मुख्यतः विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956; अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद अधिनियम, 1987 और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद अधिनियम, 1993 के आधार पर होता रहा है। सामान्य विश्वविद्यालय और कॉलेज UGC, तकनीकी संस्थान AICTE तथा शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थान NCTE के अधीन आते हैं। चिकित्सा, कानून, वास्तुकला और दूसरे व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएँ हैं।

समस्या केवल इन कानूनों के पुराने होने की नहीं, बल्कि नियामकों के बीच काम के बँटवारे और समन्वय की भी है। बहुविषयक शिक्षा देने वाले किसी संस्थान को राज्य सरकार, संबद्ध विश्वविद्यालय, UGC, AICTE अथवा किसी व्यावसायिक परिषद से अलग-अलग अनुमतियाँ लेनी पड़ सकती हैं। इनके नियम, निरीक्षण पद्धतियाँ और स्वीकृति की समय-सीमाएँ भी समान नहीं हैं।

परिणामस्वरूप कई संस्थानों को नया पाठ्यक्रम शुरू करने, सीटें बढ़ाने, परिसर खोलने या प्रशासनिक निर्णय लेने के लिए लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। सरकार का तर्क है कि उच्च शिक्षा के तेज विस्तार और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बहुविषयक मॉडल को इस बिखरी नियामक व्यवस्था के सहारे प्रभावी ढंग से लागू करना कठिन है।

गुणवत्ता से अधिक भवन और कागजी अनुपालन

मौजूदा नियमन की दूसरी बड़ी कमजोरी उसका संसाधन-केंद्रित होना है। किसी संस्थान के पास कितनी जमीन, कितने कमरे, कितनी प्रयोगशालाएँ और निर्धारित संख्या में शिक्षक हैं—इनकी जाँच तो होती है, लेकिन विद्यार्थी ने वास्तव में क्या सीखा, शोध की गुणवत्ता कैसी है, रोजगार क्षमता कितनी बढ़ी और संस्थान ने समाज तथा अर्थव्यवस्था में क्या योगदान दिया—इन परिणामों का मूल्यांकन अपेक्षाकृत कमजोर रहा है।

प्रत्यायन, यानी एक्रेडिटेशन, की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। PRS के विश्लेषण में उद्धृत आँकड़ों के अनुसार 2022 तक देश के लगभग 20 प्रतिशत कॉलेज और 38 प्रतिशत विश्वविद्यालय ही प्रत्यायित थे। NAAC और NBA की मूल्यांकन क्षमता, संस्थानों की सीमित भागीदारी और प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न उठते रहे हैं। संसद की शिक्षा संबंधी समिति ने रिश्वतखोरी और कुछ संस्थानों द्वारा भ्रामक प्रत्यायन ग्रेड प्रदर्शित किए जाने जैसी समस्याओं का उल्लेख किया था।

देश के सामने विस्तार की चुनौती भी है। वर्ष 2021-22 में उच्च शिक्षा का सकल नामांकन अनुपात लगभग 28 प्रतिशत था, जबकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने 2035 तक इसे 50 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा है। इतनी बड़ी वृद्धि के लिए नए संस्थानों, ऑनलाइन एवं डिजिटल शिक्षा, बहुविषयक विश्वविद्यालयों और लचीली डिग्री व्यवस्थाओं की आवश्यकता होगी। इसलिए पुरानी व्यवस्था को जस का तस बनाए रखना भी व्यावहारिक विकल्प नहीं है।

नया विधेयक क्या बदलना चाहता है?

विधेयक विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान को उच्च शिक्षा की शीर्ष नियामक संस्था बनाने का प्रस्ताव करता है। इसके अंतर्गत तीन अलग कार्यक्षेत्रों वाली परिषदें होंगी—

  • नियामक परिषद, जो संस्थानों की स्थापना, संचालन और नियमों के अनुपालन की निगरानी करेगी।
  • प्रत्यायन परिषद, जो संस्थानों के मूल्यांकन और मान्यता की व्यवस्था संभालेगी।
  • मानक परिषद, जो शैक्षणिक मानक और अपेक्षित शिक्षण परिणाम निर्धारित करेगी।

इस प्रकार नियमन, प्रत्यायन और अकादमिक मानक निर्धारित करने के काम को अलग-अलग रखने का प्रयास किया गया है। सरकार इसे “हल्का, लेकिन प्रभावी नियमन” मानती है—अर्थात अच्छा प्रदर्शन करने वाले संस्थानों को अधिक स्वायत्तता और लगातार नियम तोड़ने वालों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई।

सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना उच्च शिक्षण संस्थान स्थापित करने पर कम से कम दो करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है और संस्थान को बंद भी किया जा सकता है। अन्य उल्लंघनों पर उनकी प्रकृति और पुनरावृत्ति के अनुसार अलग-अलग दंड का प्रस्ताव है।

तकनीकी शिक्षा, शिक्षक-प्रशिक्षण और वास्तुकला शिक्षा प्रस्तावित संस्था के दायरे में आएँगी। वास्तुकला परिषद पेशेवर निकाय के रूप में बनी रहेगी, जबकि उसके अधीन शिक्षण संस्थानों का नियमन नए ढाँचे में होगा। चिकित्सा, कानून और पशु चिकित्सा जैसे पाठ्यक्रम फिलहाल इसके दायरे से बाहर रखे गए हैं।

यह विधेयक 15 दिसंबर 2025 को लोकसभा में पेश हुआ और 16 दिसंबर को दोनों सदनों की संयुक्त समिति को भेज दिया गया। समिति ने राज्यों, विश्वविद्यालयों, नियामक संस्थाओं और विषय-विशेषज्ञों से विचार-विमर्श किया तथा 17 जुलाई 2026 को अपनी मसौदा रिपोर्ट पर विचार कर उसे स्वीकार किया। जब तक संसद विधेयक को पारित नहीं करती और राष्ट्रपति की स्वीकृति नहीं मिलती, यह कानून नहीं बनेगा।

स्वायत्तता का वादा और नियंत्रण का प्रश्न

विधेयक का सबसे आकर्षक दावा यह है कि अच्छा प्रदर्शन करने वाले उच्च शिक्षण संस्थानों को क्रमबद्ध तरीके से अधिक स्वायत्तता दी जाएगी। विश्वविद्यालयों को प्रत्येक छोटे शैक्षणिक या प्रशासनिक निर्णय के लिए नियामक की अनुमति लेने के बजाय अपने प्रदर्शन और प्रत्यायन के आधार पर स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। सिद्धांततः यह उचित विचार है, क्योंकि उत्कृष्ट विश्वविद्यालय केवल सरकारी आदेशों से नहीं, बल्कि अकादमिक स्वतंत्रता, शोध की आजादी और स्वतंत्र निर्णय प्रक्रिया से विकसित होते हैं।

लेकिन विधेयक के मौजूदा स्वरूप में कुछ विरोधाभास भी दिखाई देते हैं। UGC, AICTE और NCTE के अधिकांश नियामक अधिकार समाप्त होने के बजाय नई संस्था और उसकी परिषदों में समाहित हो जाएँगे। कुछ मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालयों को वर्तमान व्यवस्था में घटक संस्थान या ऑफ-कैंपस केंद्र स्थापित करने के संबंध में जो स्वायत्तता मिली हुई है, नए ढाँचे में उस पर पूर्व अनुमति की शर्त लग सकती है।

IIT, IIM, NIT और दूसरे राष्ट्रीय महत्त्व के संस्थान अपने विशेष संसदीय कानूनों के कारण व्यापक अकादमिक एवं शोध स्वायत्तता रखते हैं। प्रस्तावित कानून उन्हें भी अधिष्ठान और उसकी परिषदों के दायरे में लाता है। यदि पाठ्यक्रम, प्रवेश, शोध अथवा संस्थागत निर्णयों पर नए नियामक का प्रभाव बढ़ा, तो सुधार के नाम पर पहले से प्राप्त स्वायत्तता कम होने की आशंका बनी रहेगी। संयुक्त संसदीय समिति के विचार-विमर्श में ऐसे संस्थानों की वैधानिक स्वायत्तता की सुरक्षा का प्रश्न भी प्रमुखता से उभरा है।

वित्तपोषण सबसे संवेदनशील मुद्दा

मौजूदा व्यवस्था में UGC नियमन के साथ विश्वविद्यालयों को अनुदान भी देता है। नियामक और अनुदानदाता का एक ही संस्था होना उचित है या नहीं, इस पर लंबे समय से बहस होती रही है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 ने नियमन, प्रत्यायन, मानक निर्धारण और वित्तपोषण के लिए चार अलग कार्यक्षेत्र सुझाए थे।

नए विधेयक में पहले तीन कार्यों के लिए परिषदें हैं, लेकिन स्वतंत्र वित्तपोषण परिषद का प्रावधान नहीं है। विधेयक के वित्तीय ज्ञापन के अनुसार केंद्र द्वारा वित्तपोषित उच्च शिक्षण संस्थानों को शिक्षा मंत्रालय के माध्यम से अनुदान दिया जाएगा। इससे नियमन और वित्तपोषण के पुराने हित-संघर्ष को समाप्त करने का दावा किया जा सकता है, किंतु अनुदान की शक्ति सीधे मंत्रालय के पास जाने से राजनीतिक या प्रशासनिक प्रभाव की दूसरी आशंका उत्पन्न होती है।

यदि कोई विश्वविद्यालय सरकारी नीति से असहमति व्यक्त करे और बाद में उसके अनुदान पर प्रभाव पड़े, तो संदेह पैदा होना स्वाभाविक है। इस आशंका को केवल सरकार की सद्भावना पर नहीं छोड़ा जा सकता। धन वितरण के स्पष्ट मापदंड, सार्वजनिक स्कोरिंग, स्वतंत्र ऑडिट और निष्पक्ष अपील व्यवस्था कानून में सुनिश्चित होनी चाहिए।

संघवाद और राज्यों की भूमिका

शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची का विषय है। उच्च शिक्षा में मानकों के समन्वय और निर्धारण की शक्ति केंद्र के पास है, जबकि राज्य विश्वविद्यालयों की स्थापना और संचालन में राज्य सरकारों की केंद्रीय भूमिका होती है। प्रस्तावित आयोग में राज्य उच्च शिक्षण संस्थानों के दो शिक्षाविदों को स्थान देने और नियामक तथा मानक परिषद में रोटेशन के आधार पर एक-एक राज्य प्रतिनिधि रखने की व्यवस्था है। इतने विशाल और विविध देश के लिए यह प्रतिनिधित्व सीमित माना जा सकता है।

केंद्र सरकार का पक्ष है कि विधेयक राज्य विश्वविद्यालयों का दर्जा अथवा राज्यों के वैधानिक अधिकार समाप्त नहीं करता, बल्कि राष्ट्रीय मानकों और नियमन को सुव्यवस्थित करता है। फिर भी भारत की भाषाई, सामाजिक और क्षेत्रीय विविधता को देखते हुए “समान राष्ट्रीय मानक” और “एकरूप प्रशासन” के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक है।

गुणवत्ता के न्यूनतम मानक राष्ट्रीय हो सकते हैं, लेकिन पाठ्यक्रम, भाषा, स्थानीय इतिहास, नियुक्तियों और संस्थागत प्राथमिकताओं में राज्यों तथा विश्वविद्यालयों के अधिकार सुरक्षित रहने चाहिए। यदि परिषदों में राज्यों की उपस्थिति केवल प्रतीकात्मक रही, तो संघवाद संबंधी आपत्तियाँ समाप्त नहीं होंगी।

क्या यह शिक्षा का “भगवाकरण” है?

विपक्ष और वामपंथी संगठनों के एक वर्ग का आरोप है कि एक केंद्रीय नियामक के माध्यम से सरकार विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम, नियुक्तियों और वैचारिक दिशा को नियंत्रित कर सकती है। भारतीय ज्ञान परंपरा, प्राचीन ग्रंथों और राष्ट्रीय इतिहास को पाठ्यक्रम में स्थान देने की सरकारी पहल को भी इसी आरोप से जोड़ा जाता है। मनुस्मृति जैसे ग्रंथों का उल्लेख कर राजनीतिक आशंकाएँ बढ़ाई जाती रही हैं।

यहाँ तथ्य और संभावना को अलग करना आवश्यक है। मौजूदा विधेयक स्वयं किसी धार्मिक ग्रंथ, विचारधारा अथवा निश्चित पाठ्यक्रम को अनिवार्य नहीं करता। इसमें मनुस्मृति पढ़ाने का भी कोई प्रावधान नहीं है। दिल्ली विश्वविद्यालय में मनुस्मृति से संबंधित एक पूर्व प्रस्ताव विश्वविद्यालय स्तर पर सामने आया था और कुलपति ने उसे अस्वीकार कर दिया था। उसे इस विधेयक का प्रावधान बताना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा।

लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि वैचारिक नियंत्रण की आशंका पूरी तरह निराधार है। मानक परिषद को पाठ्यक्रमों के अपेक्षित शिक्षण परिणाम और न्यूनतम अकादमिक मानक तय करने की शक्ति मिलेगी। आयोग के अध्यक्ष का चयन केंद्र सरकार करेगी। परिषदों के अध्यक्षों और पूर्णकालिक सदस्यों का चयन खोज एवं चयन समिति के माध्यम से होगा, लेकिन समग्र नियुक्ति-प्रक्रिया तथा केंद्र के नीतिगत और अपीलीय अधिकारों के कारण स्वतंत्रता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

भारतीय इतिहास, दर्शन, विज्ञान और ज्ञान परंपरा को विश्वविद्यालयों में स्थान देना अपने आप में भगवाकरण नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होगी, जब प्राचीन ज्ञान का अध्ययन आलोचनात्मक और प्रमाण-आधारित होने के बजाय किसी एक विचारधारा का महिमामंडन बन जाए अथवा असहमत इतिहासकारों और शिक्षाविदों के लिए स्थान सीमित कर दिया जाए।

विश्वविद्यालयों में मार्क्स, गांधी, आंबेडकर, सावरकर, नेहरू, विवेकानंद, प्राचीन भारतीय ग्रंथों और आधुनिक पश्चिमी चिंतन—सभी का आलोचनात्मक अध्ययन होना चाहिए। इसलिए भगवाकरण के आरोप का ठोस उत्तर केवल राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि पारदर्शी नियुक्तियों, परिषदों की बहुलतावादी संरचना और अकादमिक स्वतंत्रता की कानूनी गारंटी से दिया जा सकता है।

किन सुरक्षा उपायों की आवश्यकता है?

संसद को अंतिम कानून बनाते समय कुछ महत्त्वपूर्ण सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करने चाहिए। नियामक संस्था और उसकी परिषदों में केंद्र, राज्यों, सरकारी तथा निजी विश्वविद्यालयों, शिक्षकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों और सामाजिक रूप से वंचित समुदायों का संतुलित प्रतिनिधित्व होना चाहिए।

प्रमुख नियुक्तियाँ स्वतंत्र चयन समिति के माध्यम से हों और चयन के मापदंड सार्वजनिक किए जाएँ। सरकार को शिक्षा नीति बनाने का अधिकार हो, लेकिन किसी पाठ्यक्रम, शोध निष्कर्ष या वैचारिक मत को निर्देशित करने का अधिकार न मिले। विश्वविद्यालयों की अकादमिक स्वतंत्रता को केवल अधीनस्थ नियमों में नहीं, मूल कानून में स्पष्ट संरक्षण दिया जाना चाहिए।

परिषदों और आयोग के निर्णयों के विरुद्ध अपील सीधे केंद्र सरकार के पास जाने के बजाय स्वतंत्र शैक्षिक न्यायाधिकरण में होनी चाहिए। अनुदान वितरण के लिए भी शिक्षा मंत्रालय से पर्याप्त प्रशासनिक दूरी रखने वाली पारदर्शी व्यवस्था बेहतर होगी। राज्यों के साथ अनिवार्य और संस्थागत परामर्श तथा परिषदों में उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व विधेयक की संवैधानिक और राजनीतिक स्वीकार्यता को मजबूत करेगा।

राष्ट्रीय महत्त्व के संस्थानों की वर्तमान वैधानिक स्वायत्तता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े, इसे भी स्पष्ट शब्दों में दर्ज किया जाना चाहिए। इसी तरह दंडात्मक शक्तियों का इस्तेमाल मनमाने ढंग से न हो, इसके लिए सुनवाई, कारणयुक्त आदेश और स्वतंत्र अपील के अधिकार की ठोस व्यवस्था आवश्यक है।

निष्कर्ष: सुधार की सफलता स्वतंत्रता से तय होगी

विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक को केवल सरकार का क्रांतिकारी सुधार मान लेना या विपक्ष के अनुसार शिक्षा पर वैचारिक कब्जे का उपकरण घोषित कर देना—दोनों अतिवादी निष्कर्ष होंगे। यह निर्विवाद है कि अनेक नियामकों, परस्पर उलझी अनुमतियों, कमजोर प्रत्यायन और कागजी अनुपालन पर आधारित वर्तमान व्यवस्था में व्यापक सुधार आवश्यक है।

एक साझा ढाँचा नियमों का दोहराव कम कर सकता है, मानकों को स्पष्ट बना सकता है और उच्च शिक्षा के विस्तार में सहायक हो सकता है। लेकिन यदि यही व्यवस्था नियुक्तियों, वित्तपोषण, मानक निर्धारण और अपील की शक्तियों को केंद्र सरकार के आसपास केंद्रित कर देती है, तो विश्वविद्यालयों की स्वतंत्रता और संघीय संतुलन कमजोर हो सकता है।

इस विधेयक की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होगी कि तीन पुराने नियामकों को समाप्त कर एक नई संस्था बना दी गई। वास्तविक कसौटी यह होगी कि क्या नई व्यवस्था विद्यार्थियों को बेहतर शिक्षा, शिक्षकों को अकादमिक स्वतंत्रता, संस्थानों को उत्तरदायी स्वायत्तता और समाज को पारदर्शी गुणवत्ता प्रदान करती है।

भारत को एक सक्षम राष्ट्रीय नियामक की आवश्यकता है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यकता ऐसे स्वतंत्र विश्वविद्यालयों की है, जहाँ सरकार सहित प्रत्येक विचार, इतिहास और संस्था की प्रमाणों के आधार पर समीक्षा की जा सके। सुधार और स्वतंत्रता के बीच यही संतुलन इस महत्त्वपूर्ण विधेयक की सबसे बड़ी परीक्षा है।

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प्रमुख संदर्भ

वर्तमान संसदीय स्थिति

विधेयक 15 दिसंबर 2025 को लोकसभा में प्रस्तुत हुआ और 16 दिसंबर 2025 को संयुक्त संसदीय समिति को भेजा गया। 31 जुलाई 2026 तक यह पारित कानून नहीं है; लेख में सभी व्यवस्थाएँ प्रस्तावित प्रावधानों के रूप में वर्णित हैं।

प्रमुख संदर्भ

विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक को केवल सरकार का क्रांतिकारी सुधार मान लेना या विपक्ष के अनुसार शिक्षा पर वैचारिक कब्जे का उपकरण घोषित कर देना—दोनों अतिवादी निष्कर्ष होंगे। यह निर्विवाद है कि अनेक नियामकों, परस्पर उलझी अनुमतियों, कमजोर प्रत्यायन और कागजी अनुपालन पर आधारित वर्तमान व्यवस्था में व्यापक सुधार आवश्यक है।

एक साझा ढाँचा नियमों का दोहराव कम कर सकता है, मानकों को स्पष्ट बना सकता है और उच्च शिक्षा के विस्तार में सहायक हो सकता है। लेकिन यदि यही व्यवस्था नियुक्तियों, वित्तपोषण, मानक निर्धारण और अपील की शक्तियों को केंद्र सरकार के आसपास केंद्रित कर देती है, तो विश्वविद्यालयों की स्वतंत्रता और संघीय संतुलन कमजोर हो सकता है।

इस विधेयक की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होगी कि तीन पुराने नियामकों को समाप्त कर एक नई संस्था बना दी गई। वास्तविक कसौटी यह होगी कि क्या नई व्यवस्था विद्यार्थियों को बेहतर शिक्षा, शिक्षकों को अकादमिक स्वतंत्रता, संस्थानों को उत्तरदायी स्वायत्तता और समाज को पारदर्शी गुणवत्ता प्रदान करती है।

भारत को एक सक्षम राष्ट्रीय नियामक की आवश्यकता है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यकता ऐसे स्वतंत्र विश्वविद्यालयों की है, जहाँ सरकार सहित प्रत्येक विचार, इतिहास और संस्था की प्रमाणों के आधार पर समीक्षा की जा सके। सुधार और स्वतंत्रता के बीच यही संतुलन इस महत्त्वपूर्ण विधेयक की सबसे बड़ी परीक्षा है।

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